शिक्षा, समाज और हम

15-09-2020

शिक्षा, समाज और हम

इला कुमार

(शिक्षा दिवस के अवसर पर)

 

मानव इतिहास के आदिकाल से ही शिक्षा का विविध भाँति सतत् विकास तथा विस्तार होता रहा है। प्रत्येक देश अपनी अनूठी सामाजिक तथा सांस्कृतिक पहचान की अभिव्यक्ति तथा संवृद्धि के लिए अपनी विशिष्ट शिक्षा प्रणाली विकसित करता रहा है। भारतवर्ष की मौजूदा स्थिति में यदि शिक्षा जैसे जाग्रत विषय पर नज़र डाली जाए तो हमें एक बार पूरे परिप्रेक्ष्य पर अपनी निरपेक्ष दृष्टि डालनी पड़ेगी यानि कि वैदिक काल ई. पू. 2500 से होते हुए बौद्धकाल 1200 मुस्लिम काल 1700 ई., संधिकाल 1213 ई., ब्रिटिशकाल 1947 ई. तक के समय को शिक्षा के संदर्भ में परखना पड़ेगा।

सच है देशकाल के साथ-साथ शिक्षा ने भी एक लंबा सफ़र तय किया है और इस बीच पता नहीं कितनी शताब्दियाँ गुज़र गईं। बात "ऋग्वेद काल" से शुरू होकर "परमाणुयंत्र-काल" तक आ पहुँची है। यदि हम वास्तव में शिक्षा संबंधी तथ्य को पूरा जान लेना चाहते हैं तो हमें यह अवश्य देखना चाहिए कि हमने शुरूआत कहाँ से की थी और अभी के काल में वास्तव में हमें चाहिए क्या?

इन सभी बातों पर एक संक्षिप्त दृष्टि डालते हुए ज़रूरी लगता है कि अपने अनुभवों के बल पर हम शिक्षा के सूक्ष्म विवेचनात्मक पहलुओं का विश्लेषण, अपने ढंग से करें और तब उचित नतीजों पर पहुँचें, या फिर उचित समाधानों की बात उठाएँ।

जैसा कि प्रमाणों में वर्णित तथ्यों द्वारा पता चलता है कि वैदिक काल में शिक्षा का मतलब था– शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक – तीनों दृष्टियों से व्यक्तित्व का अधिकतम समन्वित विकास तथा राष्ट्रीय आदर्शों के अनुरूप शिक्षार्थी के स्वस्थ चरित्र का निर्माण!

इसके साथ ही सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक विकास तथा वैदिक साहित्य और आध्यात्मिक रहस्यों की रक्षा तथा उनका अगली पीढ़ी में संक्रमण। साथ ही उस काल में अपनी परम्परा को जीवित रखने तथा उसे विकसित करने की महत्वाकांक्षा के मानसिक उत्पादन पर भी विशेष ध्यान दिया जाता था।

पुरातन शिक्षा प्रणाली की जो जानकारी श्रुतियों, स्मृतियों और इतिहास की पुस्तकों में बिखरी पड़ी हैं उसके आधार पर यही सिद्ध होता है कि उस काल की शिक्षा के यही कुछ उपर्युक्त ठोस उद्देश्य थे। और शायद स्वस्थ ढंग से सामाजिक स्थिरता के मूल कारण और तत्व भी यही थे। वैसे आज के आधुनिक युग में भी, कई शिक्षा शास्त्री सच्ची शिक्षा में कमोवेश इन्हीं तथ्यों को तलाशते हैं।

राल्फ बारस्पेडी के अनुसार – "शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य मानव को मानवता सिखाना है।"

वास्तव में शिक्षा का प्रमुख लक्ष्य शिक्षार्थी का सामाजीकरण करना ही होना चाहिए। अर्थात् व्यक्ति को सामाजिक जीवन के लिए तैयार होने तथा उसमें समायोजित होने में उसकी सहायता करना ही शिक्षा का मूल उद्देश्य होना चाहिए। परंतु आज की शिक्षा प्रणाली जिसकी हम ख़ुद उपज हैं, में शिक्षा के मुख्य लक्ष्यों, उद्देश्यों का कहीं नामों-निशान भी नहीं दीख पड़ता है।

हम पाते हैं कि हर पीढ़ी को स्कूलिंग की जिस भूलभुलैया में चार वर्ष की उम्र में प्रविष्ट करा दिया जाता है, वह उन्नति का रास्ता नहीं है। बच्चों को, सामाजिक आर्थिक स्थिति से पूर्णतया पृथक करके मौजूदा शिक्षा पद्धति कुछ और ही पढ़ने-सीखने पर मजबूर करती है और ऐसे में शिक्षा के मूल तत्व लुप्त हो जाया करते हैं, ऐसा क्यों है? किसलिए? यह एक अलग क़िस्म की लंबी बहस का मुद्दा है परंतु सत्य यही है।

अगर आज के लाखों युवाओं, प्रौढ़ों, प्रौढ़ाओं के व्यक्तिगत अनुभवों की बात की जाए जिन्होंने अपनी ज़िंदगी के सुनहले वर्ष (18 से 22 तक ही उम्र) युनिवर्सिटी कैम्पस में पढ़कर बी.एससी., एम.एससी. आदि की डिग्री की ख़ातिर बिताए हैं, तो उनका कहना है कि उनके द्वारा पढ़े गए विषय न तो उन्हें नौकरी दिला पाए, न ही किसी क़िस्म के उपार्जन का कारण बने। यह बात वर्षों से समाज में नकारात्मक वलयों को रचती रही है, रगों में असंतोष और आक्रोश को भरती रही है।

कई बेहतर ठोकर खाए हुए व्यक्ति तो यहाँ तक स्वीकार करते हैं कि उन्होंने यदि सिर्फ़ बारहवीं पास करके पढ़ाई छोड़ दी होती और चाट-पकौड़ों की दुकान खोल ली होती तो कम से कम कुछ ढंग का उपार्जन तो कर लेते। सच है कि एम.एससी. पास करने के बाद उनसे चाट-पकोड़ों की दुकान भी नहीं खोली जाती। कहीं न कहीं व्यर्थ क़िस्म के ज्ञान द्वारा पोषित अहंकार उन्हें रोक लिया करता है।

ठीक इसी तर्ज़ पर कई गृहणियाँ, बहुएँ अपना सर ठोकतीं हुई नज़र आती हैं – "काश! हमने फिजिक्स, केमेस्ट्री की जगह होम साइंस पढ़ा होता या फिर कोई छोटा-मोटा डिप्लोमा ही ले लिया होता, तो कम से कम हम घर की साज-सँभाल, बच्चे की देखभाल तो अच्छी तरह तो कर पातीं, या कोई छोटा-मोटा उद्योग ही शुरू कर पातीं"।

सच है जब चौदह-चौदह घंटों की कठिन पढ़ाई करने वाली एक कुशाग्र विद्यार्थिनी अचानक शादी के बाद कुछ ऐसी-ऐसी समस्याओं के सामने ख़ुद को रूबरू खड़ा पाती है जिनके बारे में उसका ज्ञान शून्य है और इतने सालों तक हासिल किया गया ज्ञान कहीं काम नहीं आता तो वह नई परिस्थिति जिस घने संत्रास को उपजाती है, उसे सिर्फ़ भुक्तभोगी ही समझ सकते हैं।

यूनिवर्सिटी कैम्पस से निकलकर सीधे विवाहिता बनी स्त्री को लंबे समय तक तो यही समझ नहीं पड़ता कि क्लास में ज़्यादातर सवालों का सही उत्तर देने वाली उसकी वही बुद्धि, सामाजिक बिंदुओं पर इस क़दर कुंठित कैसे हो गई? पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़े होने का सपना कहाँ बिला गया।

वास्तव में होना तो यह चाहिए कि शिक्षा के एक पहलू को समाज से तथा दूसरे पहलू को व्यक्ति से संबंधित होना चाहिए। सच तो यह है कि ये दोनों पक्ष यथार्थ के धरातल पर इतने संबद्ध होते हैं कि इन्हें एक-दूसरे से पृथक किया ही नहीं जा सकता। लेकिन कितने आश्चर्य की बात है कि आज की शिक्षा में इन मूलभूत तत्वों को ही अनुपस्थित कर दिया गया है।

हमें ऐसी शिक्षा दी जाती है जो व्यवहारिक धरातल पर तो काम में नहीं ही आती, उपार्जन वाले बिंदु पर भी हमें अँगूठा दिखा जाया करती है यानी कि "पढ़े फारसी बेचे तेल, देखो भई, क़िस्मत का खेल" वाली कहावत बार-बार चरितार्थ होती है।

यदि यहाँ के माग्रेट मीड के शब्दों को दुहराएँ, तो कहना पड़ेगा कि "शिक्षा वह सांस्कृतिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा प्रत्येक नवशिशु मानव, समाज का पूर्ण सदस्य बनता है।" सच है और कितना आश्चर्यजनक है कि ठीक इसी स्वर में तैत्तरिए उपनिषद में वर्णित शिक्षा संबंधी पुरातन कालीन मानदंड दीख पड़ते हैं। उस समय जब समावर्तन संस्कार के अनन्तर विद्यार्थी "स्नातक" कहलाते थे और अंतिम दीक्षा के समारोह में जाते थे, तो उन्हें अंतिम दीक्षा इन शब्दों में दी जाती थी –

"सदा सत्य बोलना। धर्म का आचरण करना। स्वाध्याय में प्रमाद (आलस) मत करना। संतान और शिष्य परम्परा का लोप मत होने देना। अपनी सुरक्षा एवं कल्याण में प्रमाद मत करना। ऐश्वर्य प्राप्ति में प्रमाद मत करना। वृद्धजनों की सेवा में प्रमाद मत करना।"

दीक्षा की अंतिम पंक्तियाँ ये होती थीं– "यही आदेश है। यही उपदेश है। यही वेदों का रहस्य है। यही अनुशासन है। ऐसा ही आचरण करना चाहिए।"

और इन्हीं मान्यताओं के साथ वैदिक काल के स्नातक दीक्षांत समारोह से निकलते थे, विषय उन्होंने जो भी पढ़े हों, वेद-वेदांत, इतिहास या पुराण, व्याकरण या ज्योतिष शास्त्र या देवजन-शिल्प विधा, संगीत शास्त्र या आयुर्वेद शास्त्र, परंतु उपर्युक्त बातें सभी स्नातकों के लिए एक ही थीं और समाज में इन स्नातकों द्वारा प्रयोग में भी लाई जाती थीं, जिसके कारण उस समय के समाज में एक अलग क़िस्म की स्थिरता थी, अन्वेषणात्मक उत्सुकता थी, अध्यात्मिक ऊँचाइयाँ थीं। पूर्ण शिक्षित स्त्रियों को बड़ी सभाओं में वेदांत चर्चा आदि करने की सुविधा थी। जैसा कि मैत्रेयी, गार्गी, मण्डन मिश्र की पत्नी आदि की विद्वता से ज़ाहिर है, साथ ही योगवाशिष्ठ में वर्णित लीला, चुड़ाला आदि की कथाओं में उनके ब्रह्मज्ञानी होने से परिलक्षित है।

यदि व्यवहारिक स्तर पर शिक्षा के इन सत्यों को आज के समय के अनुसार, क़ायदे से प्रतिपादित किया जाए तो कोई संदेह नहीं कि समाज का ढांचा ज़्यादा व्यवस्थित, ज़्यादा सकारात्मक हो सकता है। और यही तो शिक्षा का एक तरह से ध्येय होना चाहिए यानी कि मानव को मानवता सिखाना। यही व्यवस्था कम तत्व मनुष्यों के हुजूम को समाज में बदल डालती है, वरना जंगलों में भी तो जीवित जीव जंतुओं और नरभक्षी आदिवासियों के समूह रहा करते हैं और अजीबो-ग़रीब जीवन पद्धति के बीच जीवन बिताया करते हैं।

अंत में यह इंगित करना ज़रूरी है कि नई शिक्षा - नीति से सबों को बड़ी-बड़ी अपेक्षाएँ हैं कि वह निश्चय ही कई गूढ़ अर्गलाओं को खोलने में सक्षम सिद्ध होगी और आगे के वर्षों में शिक्षा के बल पर सुदृढ़, स्वाबलंबी व्यक्तित्वों का निर्माण करके समाज को दृढ़ता प्रदान करेगी।

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