उबड़-खाबड़ पथरीले रास्तों पर दौड़ती हुई हमारी जीप तेज़ी से छावनी की ओर बढ़ रही थी। आस - पास नैर्सगिक सौन्दर्य बिखरा हुआ था किन्तु इस समय उसको निहारने की फ़ुर्सत न थी। मैं जल्द से जल्द श्रीनगर से 85 किमी. दूर बनी अपनी छावनी तक पहुँच जाना चाहता था।

आज सुबह ही तो मैं सेना के अधिकारियों की बैठक में भाग लेने श्रीनगर आया था। काश्मीर रेंज में तैनात ब्रिगेडियर और उससे ऊपर के रैंक के सभी अधिकारी इस बैठक में शामिल हुये थे। वहाँ अत्यन्त गोपनीय एवं संवेदनशील विषयों पर चर्चा होनी थी। इसलिये किसी भी अधीनस्थ अधिकारी को बैठक कक्ष के भीतर आने की इजाज़त नहीं थी।

बैठक दो बजे समाप्त हुई। मैं बैठक कक्ष से बाहर निकला ही था कि सार्जेन्ट राम सिंह ने बताया, "सर, छावनी से कैप्टन बोस का दो बार फोन आ चुका है। वे आपसे फ़ौरन बात करना चाहते हैं।"

"कोई चिंता वाली बात तो नहीं है?" मेरा दिल किसी अनिष्ट की आशंका से धड़क उठा। आज कल मिलेट्री कैम्पों और छावनियों पर आंतकवादी हमलों की घटनायें काफ़ी बढ़ गयीं थीं जिसके कारण छावनी से दूर रहने पर भी वहाँ की चिंता बनी रहती थी।

"सर, मैंने पूछा था कि अगर चिंता वाली कोई बात हो तो बैठक कक्ष के भीतर ख़बर भिजवा दूँ लेकिन कैप्टन साहब ने मना किया था। बोलें आप जब बैठक से बाहर निकलें तब फ़ौरन बात करवा दूँ," राम सिंह ने सम्मानित स्वर में बताया। 

राहत की साँस लेते हुये मैंने राम सिंह को छावनी का नम्बर मिलाने के लिये कहा। कैप्टन बोस के लाईन पर आते ही राम सिंह ने फोन मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।

"हैलो कैप्टन, वहाँ सब ठीक तो है?" मैंने पूछा।

"हाँ सर, सब ठीक तो है लेकिन. . ."

"लेकिन क्या?" मेरा दिल एक बार फिर तेज़ी से धड़क उठा। जाने क्यों मुझे लग रहा था कि वहाँ सब ठीक नहीं है।

"सर, अपनी छावनी के भीतर भारतीय फौजी की वेशभूषा में घूमता हुआ पाकिस्तानी सेना का एक लेफ़्टीनेन्ट पकड़ा गया है," कैप्टन बोस ने बताया।

"तुम्हें कैसा पता चला कि वह पाकिस्तानी सेना का लेफ़्टीनेन्ट है और वो छावनी के भीतर घुस कैसे आया? उसके साथ और कितने आदमी हैं? उन्होंने छावनी में किसी को कोई नुक़सान तो नहीं पहुँचाया?" मैंने एक ही साँस में प्रश्नों की बौछार कर दी।

"सर, आप परेशान मत हों। यहाँ सब ठीक-ठाक है। वह अकेला ही है। उसके पास से बरामद आई.डी. कार्ड से पता चला कि वह पाकिस्तानी सेना का लेफ़्टीनेन्ट है। हमने उससे हर तरह से पूछ-ताछ करके देख लिया किन्तु वो बता नहीं रहा है कि यहाँ किस लिये आया था," कैप्टन बोस ने बताया।

"मैं फ़ौरन यहाँ से निकल रहा हूँ। तुम उससे पूछ-ताछ जारी रखो लेकिन ध्यान रखना कि वह मरने न पाये। हमें उससे काफ़ी जानकारी मिल सकती है," इतना कह कर मैंने फोन काट दिया।

कच्चे पहाड़ी रास्तों पर जीप की गति बहुत कम होती है। 85 किमी. की दूरी तय करने में चार घंटे का समय अवश्य लग जायेगा। मैं अँधेरा होने से पहले छावनी तक पहुँच जाना चाहता था इसलिये खाना खाये बग़ैर तुरंत वहाँ से चल दिया।

छावनी तक पहुँचते-पहुँचते शाम हो गयी थी। हल्का-हल्का अँधेरा घिरने लगा था। मेरे आने की ख़बर पा कैप्टन बोस फ़ौरन मेेरे कक्ष में आये।

"कुछ बताया उसने?" मैंने कैप्टन उन्हें देखते ही पूछा।

"नहीं सर" कैप्टन बोस ने ठंडी साँस भरी फिर दाँत भींचते हुये बोले, "पता नहीं किस मिट्टी का बना हुआ है। हम लोग थर्ड डिग्री तक टार्चर कर-कर के हार गये लेकिन वह मुँह खोलने के लिये तैयार नहीं है।"

"परेशान मत हो। मुझे अच्छों-अच्छों का मुँह खुलवाना आता है," मैंने सिगरेट सुलगाते हुये कैप्टन बोस को सांत्वना दी फिर एक लम्बा कश खींच कर ढेर सारा धुँआ छोड़ते हुये पूछा, "क्या नाम है उस पाकस्तानी का लेफ़्टीनेन्ट का?"

"शाहदीप खान," कैप्टन बोस ने बताया।

मैं सिगरेट का दूसरा कश खींच रहा था किन्तु कैप्टन बोस का उत्तर सुन बुरी तरह चौंक पड़ा। ’शाहदीप खान‘ इन दो शब्दों ने मुझे झकझोर कर रख दिया। पूरा धुँआ मेरे सीने में घुमड़ कर रह गया और मुझ पर खाँसी का दौरा पड़ गया।

"क्या हुआ सर?" कैप्टन बोस ने पूछा।

"धुँये की धसक लग गयी है," कहते हुये मैंने सिगरेट को एशट्रे में इस बेदर्दी से मसला जैसे अपने अन्तर्मन में उठे हुये विचारों को कुचल रहा हूँ।

कैप्टन बोस ने इस बीच पंखे को चला दिया था जिससे धुँआ कुछ छँट गया था। इसी के साथ मेरे अंदर का कुहासा कुछ हल्का हुआ। दुनिया में एक ही नाम के कई व्यक्ति हो सकते हैं। मैंने अपने मन को सांत्वना देने की कोशिश की। किन्तु क्या ’शाहदीप‘ जैसे अनोखे नाम के भी दो व्यक्ति हो सकते हैं? क्या ऐसा अनोखा संगम सृष्टि में कहीं और संभव है? मेरे अंदर के संदेह ने पुनः अपना फन उठाया।

"सर, क्या सोचने लगे?" कैप्टन बोस ने टोका।

"वह पाकस्तानी यहाँ क्यों आया था यह हर हालत में पता लगाना ज़रूरी है," मैंने सख़्त स्वर में कहा और अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। 

कैप्टन बोस मुझे बैरक नम्बर चार में ले आये। उस पाकस्तानी लेफ़्टीनेन्ट के हाथ इस समय छत से टँगी हुई एक रस्सी से बँधे हुये थे। नख से शिख तक वह ख़ून से लथपथ था। मेरी अनुपस्थित में उससे काफ़ी कड़ाई से पूछताछ की गयी थी। मुझे देख उसकी बड़ी-बड़ी आँखें पल भर के लिये कुछ सिकुड़ीं फिर उनमें एक अजीब बेचैनी सी समा गयी।

मुझे वे आँखें कुछ जानी-पहचानी सी लगीं किन्तु उसका पूरा चेहरा ख़ून से भीगा हुआ था इसलिये चाह कर भी मैं उसे पहचान नहीं पाया। मुझे अपनी ओर घूरता देख उसके होंठ हल्के से फड़फड़ाये। उसने कोशिश करके अपनी बाँह को हल्का सा नीचे खींचा फिर पंनों के बल ऊपर उठ कर अपने चेहरे को कमीज़ की बाँह से पोंछ लिया। 

ख़ून पुंछ जाने के कारण उसका आधा चेहरा दिखायी पड़ने लगा था किन्तु इतना ही मेरे पूरे अस्तित्व को हिला देने के लिये काफ़ी था। वह शाहदीप ही था। मेरे और शाहीन के प्यार की निशानी। हूबहू मेरी जवानी का प्रतिरूप। यदि उसके चेहरे पर बड़ी-बड़ी मूँछें लगा कर सिर के बाल सफ़ेद कर दिये जायें तो उसमें और ब्रिगेडियर दीपक कुमार सिंह में कोई अंतर नहीं रह जायेगा। आश्चर्य की बात थी कि कैप्टन बोस ने इस ओर ध्यान नहीं दिया था।

मेरा अपना ही ख़ून आज दुश्मन के रूप में मेरे सामने खड़ा था और मुझे उससे पूछताछ करनी थी। मेरा ही ख़ून मेरी आँखों के सामने बह रहा था किन्तु उसे पोंछने के बजाय उसे और बहाना मेरी ज़िम्मेदारी थी। बेटे के घावों पर मरहम रखने के बजाये उसे और कुरेदना मेरी मजबूरी थी। कैसी विचित्र विडम्बना थी। अपनी बेबसी पर मेरी आँखें भर आयीं। मेरा पूरा शरीर काँपने लगा। एक अजीब सी कमज़ोरी मुझे जकड़ती जा रही थी। ऐसा लग रहा था कि कोई सहारा न मिला तो मैं गिर पड़ूँगा।

"लगता है हिंदुस्तानी कैप्टन ने पाकस्तानी लेफ़्टीनेन्ट से हार मान ली तभी अपने ब्रिगेडियर को बुला लाया," तभी शाहदीप ने कहकहा लगाया।

यह सुन मेरे विचारों को झटका सा लगा। इस समय मैं दीपक कुमार सिंह नहीं बल्कि हिंदुस्तानी सेना के ब्रिगेडियर की हैसियत से वहाँ खड़ा था और सामने खड़ा इन्सान और कोई नहीं बल्कि दुश्मन की सेना का लेफ़्टीनेन्ट था। उसके साथ कोई रियायत बरतना अपने देश के साथ गद्दारी होगी। 

मेरे जबड़े भिंच गये। मैंने सख़्त स्वर में कहा, "लेफ़्टीनेन्ट, तुम्हारी भलाई इसी में है कि सच-सच बता दो कि यहाँ क्यों आये थे वरना मैं तुम्हारी वो हालत करूँगा कि तुम्हारी सात पुश्तें भी तुम्हें नहीं पहचान पायेंगीं।"

"आज कल एक पुश्त दूसरे पुश्त को नहीं पहचान पाती है और आप सात पुश्तों की बात कर रहे हैं? अच्छा मज़ाक है" शाहदीप हँस पड़ा। उसके चेहरे पर भय का कोई चिन्ह न था।

मैंने लपक कर उसकी गर्दन पकड़ ली और पूरी ताक़त से उसे झकझोरते हुये बोला, "मैं आख़िरी बार पूछ रहा हूँ , बता दो यहाँ क्यों आये हो?"

"आज सुबह से यह सवाल सैकड़ों बार पूछा जा चुका है और हर बार मेरा यही उत्तर है कि मैं कुछ नहीं बताऊँगा," शाहदीप का भी स्वर कड़ा हो गया। 

यह सुन मेरे ऊपर एक अजीब सा पागलपन सवार हो गया। मेरी ऊँगलियों की पकड़ अचानक ही सख़्त हो गयी और मैं पूरी शक्ति से शाहदीप की गर्दन को दबाने लगा। देशभक्ति साबित करने के जुनून में मैं बेरहमी पर उतर आया था। शाहदीप की आँखें बाहर उबलने लगीं थीं। वह बुरी तरह छटपटाने लगा। बहुत मुश्किलों से उसके मुँह से अटकते हुये स्वर निकले, "छोड़. . .दो मुझे. . .। मैं. . . सब. . . बताने के लिये तैयार हूँ।"

"बताओ," मैं उसे धक्का देते हुये चीखा। उत्तेजना के कारण मेरी साँस फूलने लगी थी। ऐसा लग रहा था जैसे मैं बहुत दूर से दौड़ कर आ रहा हूँ।

"मेरे हाथ खोलो!" शाहदीप कराहया।

मैं असमंजस की स्थित में था लेकिन कैप्टन बोस ने अपने होलस्टर से रिवाल्वर निकाल कर शाहदीप के ऊपर तान दिया। उनके इशारे पर पीछे खड़े सैनिक ने उसके हाथ खोल दिये।

 हाथ खुलते ही शाहदीप ने अपनी गर्दन को सहलाया फिर मेरी ओर देखते हुये बोला, "क्या पानी मिल सकता है?"

मेरे इशारे पर एक सैनिक पानी का जग ले आया। शाहदीप ने मुँह लगा कर तीन-चार घूँट पानी पिया फिर पूरा जग अपने सिर के ऊपर उड़ेल लिया। शायद इससे उसके दर्द को कुछ राहत मिली। उसने एक गहरी साँस भरी फिर बोला, "हमारी ब्रिगेड को ख़बर मिली थी कि कारगिल युद्व के बाद हिंदुस्तानी फौज ने सीमा के पास एक अंडरग्राउंड आयुध कारखाना बनाया है। वहाँ ख़तरनाक हथियार बना कर जमा किये जा रहे हैं ताकि युद्व की दशा में फौज को तत्काल सप्लाई प्रदान की जा सके। उस कारखाने का रास्ता इस छावनी से होकर जाता है। मैं उसकी वीडियो फ़िल्म बनाने यहाँ आया था।"

इस रहस्योद्घाटन से मेरे साथ कैप्टन बोस भी बुरी तरह चौंक पड़े। भारतीय फौज की यह बहुत गुप्त परियोजना थी इसके बारे में पाकिस्तानियों को पता चल जाना ख़तरनाक था।

कैप्टन ने चंद पलों तक अविश्वसनीय दृष्टि से शाहदीप को घूरा फिर दाँत भींचता हुआ बोला, "इसका मतलब तुम्हारे साथ कोई और भी यहाँ आया है।"

"नहीं मैं अकेला हूँ।"

"अगर अकेले हो तो तुम्हारा कैमरा कहाँ है जिससे तुम वीडियोग्राफी कर रहे थे?" कैप्टन बोस ने डपटा।

शाहदीप ने कैप्टन बोस की तरफ़ यूँ देखा जैसे उन्होंने कोई बचकानी बात पूछ ली हो। इसके बाद वह मेरी ओर मुड़ते हुये बोला, "आज के युग में फ़िल्म बनाने के लिये कंधे पर कैमरा लाद कर घूमना ज़रूरी नहीं है। मेरे गले के लाकेट में एक संवेदनशील कैमरा फ़िट है जिसकी सहायता से मैंने छावनी की वीडियोग्राफी की है।"

इतना कह कर उसने अपने गले में पड़ा लाकेट निकालकर मेरी ओर बढ़ा दिया। वास्तव में वो लाकेट न होकर छोटा सा कैमरा था जिसे लाकेट की शक्ल में बनाया गया था। मैंने उसे कैप्टन बोस की ओर बढ़ा दिया।

उन्होंने लाकेट को उल्ट-पुल्ट कर देखा फिर प्रसंशात्मक स्वर में बोला, "सर, यू आर ग्रेट। हम लोग दिन भर में जिस बात का पता नहीं लगा सके उसे आपने दो मिनट में पता कर लिया। भारतीय सेना के हौसले आप जैसे क़ाबिल अफसरों के कारण ही इतने बुलन्द हैं।"

’क़ाबिल‘ यह एक शब्द किसी हथौड़े की भाँति मेरे अन्तर्मन पर पड़ा था। मैं ख़ुद नहीं समझ पा रहा था कि यह मेरी क़ाबलियत थी या कोई और कारण जिसके ख़ातिर शाहदीप इतनी जल्दी टूट गया है। मैं एक खानदानी राजपूत था। मेरे बाप-दादाओं की वीरता के क़िस्से लोक कथाओं के रूप में आज भी प्रसिद्ध हैं। शाहदीप की रगों में मेरा ख़ून दौड़ रहा है फिर वह इतना कायर कैसे हो गया? मेरे सामने टूटने के बजाय अगर वह अपनी फौज के लिये जान दे देता तो शायद मुझे ज़्यादा ख़ुशी होती।

"सर, अब इस लेफ़्टीनेन्ट का क्या किया जाये?" तभी कैप्टन बोस ने मेरी तंद्रा भंग की।

"इसे आज रात इसी बैरक में रहने दो। कल सुबह इसे श्रीनगर भेज देगें," मैंने किसी पराजित योद्धा की भाँति साँस भरी।

शाहदीप को वहीं छोड़ मैं कैप्टन बोस और अन्य सैनिकों के साथ वहाँ से चल पड़ा। हम लोग बैरक से बाहर निकले ही थे कि शाहदीप ने आवाज़ दी, "ब्रिगेडियर साहब, मैं आपसे कुछ बात करना चाहता हूँ।"

हम लोग वापस लौट पडे़ किन्तु शाहदीप ने अपने हाथ से सभी को रुकने का इशारा किया, "मुझे केवल ब्रिगेडियर साहब से बात करनी है।"

मैं असमंजस में फँस गया। ऐसी कौन सी बात हो सकती है जो वह मुझसे अकेले में करना चाहता है? क्या उससे अकेले में बात करना उचित होगा? कैप्टन बोस ने मेरे असमंजस को भाँप लिया था। अतः वह सैनिकों के साथ दूर हट गये।

मैं वापस बैरक के भीतर घुसा। मैंने शाहदीप को ध्यान से देखा। वह बुरी तरह घायल था। उसका पूरा शरीर काँप रहा था। ऐसा लग रहा था कि ठीक से खड़े होने के लिये भी उसे काफ़ी मशक़्क़त करनी पड़ रही है। 

मैं उसके क़रीब पहुँचा ही था कि उसका शरीर लहराते हुये मेरी ओर गिर पड़ा। मैंने उसे अपनी बाँहों में सँभाल लिया। मेरी पूरी वर्दी उसके ख़ून से रंग गयी किन्तु उसकी परवाह किये बिना मैंने उसे सँभाल कर सामने बने चबूतरे पर बिठा दिया। उसने अपनी पीठ दिवाल से टिका ली और लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगा।

जब उसकी उखड़ी हुई साँसें कुछ नियंत्रित हुईं तो मैंने पूछा, "बताओ क्या कहना चाहते हो?"

"सिर्फ़ इतना कि मैंने आपका ऋण चुका दिया है," शाहदीप ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखें मेरी ओर उठाईं।

"कैसा ऋण मैं कुछ समझा नहीं?"

"अगर मैं चाहता तो आप मुझे मार भी डालते किन्तु मेरे यहाँ आने का राज़ कभी मुझसे न उगलवा पाते। मैं यह भी जानता था कि देशभक्ति के जुनून में आप मुझे मार डालेगें लेकिन यदि ऐसा हो जाता तो फिर ज़िंदगी भर आप अपने को कभी माफ़ नहीं कर पाते। मेरी हत्या का पाप आपकी ज़िंदगी को मौत से भी बदतर बना देता," शाहदीप की आँखों में एक अजीब सा आत्मविश्वास झलकने लगा था।

"कैसा पाप? फौजी तो अपने दुश्मनों को मारते ही रहते हैं, उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता है," मैंने अचकचाते हुये कहा। जाने क्यों मुझे अपना ही स्वर अनजाना सा महसूस हुआ।

"लेकिन एक बाप को फ़र्क पड़ता है। अपने बेटे की हत्या करने के बाद वह भला चैन से कैसे जी सकता है?" शाहदीप के होठों पर एक दर्द भरी मुस्कराहट तैर गयी।

"कैसा बाप और कैसा बेटा? तुम कहना क्या चाहते हो?" मेरा स्वर कड़ा हो गया।

शाहदीप ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों को मेरे चेहरे पर टिका दिया फिर बोला, "ब्रिगेडियर दीपक कुमार सिंह। यही नाम लिखा है न आपकी शर्ट पर लगी नेम-प्लेट पर? सच-सच बताइये कि आपने मुझे पहचाना कि नहीं?"

मेरा सर्वांग काँप उठा। मेरी समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या कहूँ। तभी शाहदीप ने टोका, "अगर नहीं पहचाना हो तो मेरे चेहरे पर बड़ी-बड़ी मूँछें लगा कर मेरे बाल सफ़ेद कर दीजये शायद तब आपसे मुझे पहचानने में कोई भूल न होगी।"

अब तो शक की कोई गुंजाईश ही नहीं बची थी। मेरी ही तरह मेरे ख़ून ने भी अपने ख़ून को पहचान लिया था। हम बाप-बेटों ने जिंदगी में पहली बार एक दूसरे को देखा था किन्तु अब रिश्ते बदल चुके थे। हम दुश्मनों की भाँति एक-दूसरे के सामने खड़े थे। मेरे अंदर भावनाओं का समुद्र उमड़ने लगा था। मैं बहुत कुछ कहना चाहता था किन्तु जड़ हो कर रह गया। ज़ुबान ने मेरा साथ छोड़ दिया था।

"डैडी, आपको पुत्र-हत्या के पाप से बचा कर मैं पुत्र-धर्म के ऋण से उऋण हो चुका हूँ। आज के बाद जब भी हमारी मुलाक़ात होगी आप अपने सामने पाकस्तानी सेना के जांबाज़ और वफ़ादार अफ़सर को पायेगें जो कट जायेगा लेकिन झुकेगा नहीं," शाहदीप ने एक-एक शब्द पर ज़ोर देते हुये कहा।

"इसका मतलब तुमने जान-बूझ कर अपना राज खोला है?" बहुत मुश्किलों से मेरे मुँह से स्वर फूटा।

"मैं कायर नहीं हूँ। मेरी रगों में एक बहादुर बाप का ख़ून दौड़ रहा है। मैंने अपना एक फ़र्ज़ पूरा किया है और अब दूसरा फ़र्ज़ भी पूरा करूँगा। मैं आपकी सौगन्ध खाकर वादा करता हूँ कि जिस देश का नमक खाया है उसके साथ नमकहरामी नहीं करूँगा," शाहदीप की आँखें आत्मविश्वाश से जगमगा उठीं।

"तुम करना क्या चाहते हो?" किसी अनिष्ट की आशंका से मेरा स्वर काँप उठा।

"नमकहलाली" शाहदीप ने एक-एक शब्द पर ज़ोर देते हुये कहा, "मैं जिस मिशन के लिये यहाँ आया था उसे पूरा अवश्य करूँगा।"

शाहदीप के स्वर मेरे कानों में पिघले शीशे की भाँति दहक उठे। मैं एक फौजी था अतः अपने बेटे को अपनी फौज के साथ गद्दारी करने के लिये नहीं कह सकता था लेकिन जो वह कह रहा था उसकी भी इजाज़त कभी नहीं दे सकता था। अतः उसे समझाते हुये बोला, "बेटा, तुम इस समय हिंदुस्तानी फौज की हिरासत में हो इसलिये कोई दुस्साहस करने का स्पप्न मत देखो। ऐसा करना तुम्हारे लिये ख़तरनाक हो सकता है।"

"दुस्साहस तो फौजी का सबसे बड़ा हथियार होता है, उसे मैं कैसे छोड़ सकता हूँ। आप अपना फ़र्ज़ पूरा करियेगा मैं अपना फ़र्ज़ पूरा करूँगा," शाहदीप निर्णायक स्वर में बोला।

मैं इस समय बहस करने की मनोस्थित में नहीं था। मेरे अंदर अनेकों प्रश्न घुमड़ रहे थे जिनके उत्तर खोजे बिना मुझे चैन नहीं मिलने वाला था। हमारे पास समय भी काफ़ी कम था। बाहर खड़े कैप्टन बोस और दूसरे सैनिक ज़रूर जानना चाहेंगे कि इतनी देर मैंने एक दुश्मन से क्या बात की।

अतः दर्द भरे स्वर में बोला, "बेटा, तुम ख़ुशक़िस्मत हो कि तुमने अपना फ़र्ज़ पूरा कर लिया किन्तु मैं इतना बदक़िस्मत हूँ कि चाह कर भी तुम्हें गले नहीं लगा सकता। हमारे पास समय बहुत कम है। अतः मेहरबानी करके इतना बता दो कि तुम्हारी माँ इस समय कहाँ है और यहाँ आने से पहले क्या तुम मेरे बारे में जानते थे?"

"साल भर पहले माँ मेरा साथ छोड़ दुनिया से चली गयीं है। वे बताया करतीं थीं कि मेरे सारे पूर्वज सेना में रहे हैं। मैं भी उनकी तरह बहादुर बनना चाहता था इसलिये फौज में भरती हो गया था। अपने अंतिम दिनों में माँ ने आपका नाम भी बताया था। मैं जानता था कि आप भारतीय फौज में हैं किन्तु यह नहीं जानता था कि आपसे इस तरह मुलाक़ात होगी," बोलते-बोलते पहली बार शाहदीप का स्वर भीग उठा और आँखें नम हो गयीं।

मैं भी अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रख पा रहा था। ऐसा लग रहा था कि यदि ज्यादा देर यहाँ रूका तो रो पड़ूँगा। अतः शाहदीप को अपना ख़्याल रखने के लिये कह तेज़ी से वहाँ से चला आया।

"सर, वह क्या कह रहा था?" बाहर निकलते ही कैप्टन बोस ने पूछा।

"कह रहा था कि मैंने आपकी मदद की है इसलिये मेरी मदद कीजये और मुझे यहाँ से निकल जाने दीजये" मेरे मुँह से अनजाने में ही निकल गया। जल्दबाज़ी में इसके अलावा मुझे और कोई उत्तर सूझा ही नहीं।

"बास्टर्ड, अपनी ही तरह हम हिंदुस्तानियों को भी गद्दार समझता है," कैप्टन बोस का स्वर कसैला हो उठा।

मैं तड़प कर रह गया। मेरे ही सामने मेरे बेटे को ‘हरामी’ कहा जा रहा था और मैं सुनने के लिये मजबूर था! जिस बेटे ने आज वीरता की नयी मिसाल क़ायम की थी उसे मेरे ही कारण गद्दार क़रार किया जा रहा था और मैं चुप था! चाह कर भी दुनिया को सच्चाई नहीं बता सकता था। शाहदीप की महानता के आगे मुझे अपना क़द बहुत छोटा दिखायी पड़ रहा था।

मैं चुपचाप अपने कक्ष में आ गया। बाहर खड़े संतरी से मैंने कह दिया था कि किसी को भी भीतर न आने दिया जाये। इस समय मैं किसी का सामना करने की स्थित में नहीं था। मैं दुनिया से दूर अकेले में अपनी यादों के साथ अपना दर्द बाँटना चाहता था।

सिगरेट सुलगा कर मैं कुर्सी पर बैठ गया। उसकी पुश्त से पीठ टिका कर मैंने लम्बे-लम्बे तीन-चार कश खींचे और फिर ढेर सारा धुँआ छोड़ दिया। धुँये की एक पतली सी चादर मेज़ के सामने तैरने लगी जिससे उस पार की चीज़ें कुछ धुँधली सी दिखायी पड़ने लगी थीं।

उस शाम भी धुँधलका सा छाया हुआ था जब लंदन में थेम्स नदी के किनारे मैं अकेला टहल रहा था। अचानक एक अँग्रेज़ नवयुवक दौड़ता हुआ आया और मुझसे टकरा गया। इससे पहले कि मैं कुछ कह पाता उसने अत्यन्त शालीनता से मुझसे माफ़ी माँगी और आगे बढ़ गया। अचानक मेरे छठी इंद्रिय जाग उठी। मैंने अपनी जेब पर हाथ लगाया तो मेरा पर्स ग़ायब था।     

"पकड़ो-पकड़ो वह बदमाश मेरा पर्स लिये जा रहा है," चिल्लाते हुये मैं उसके पीछे दौड़ा।

मेरी आवाज़ सुन उसने अपनी गति कुछ और तेज़ कर दी। मेरे और उसके बीच काफ़ी फ़ासला था। लग रहा था कि मैं उसे पकड़ नहीं पाऊँगा। तभी सामने से आ रही एक लड़की ने अपना पैर उसके पैरों में फँसा दिया। वह अँग्रेज़ मुँह के बल गिर पड़ा। मेरे लिया इतना मौक़ा काफ़ी था। पलक झपकते ही मैंने उसे दबोच कर अपना पर्स छीन लिया। उसके भीतर पाँच सौ पांउड के अलावा कुछ ज़रूरी काग़ज़ात भी थे। पर्स खोल कर मैं उन्हें देखने लगा इस बीच मौक़ा पा कर वह बदमाश भाग लिया। मैं उसे पकड़ने के लिये दोबारा उसके पीछे दौड़ा।

"छोड़ दो, जाने दो उसे," उस लड़की ने लगभग चिल्लाते हुये कहा।

उसकी आवाज़ में जाने कैसी कशिश थी कि मेरे क़दम ठिठक कर रुक गये। उस बदमाश के लिये इतना मौक़ा काफ़ी था। पलक झपकते वह मेरी पहुँच से दूर निकल गया। मैंने उस लड़की की ओर लौटते हुये तेज़ स्वर में पूछा , "आपने उसे जाने क्यों दिया?"

"इंग्लैंड में नये आये हो?" उस लड़की ने उत्तर देने के बजाय प्रति प्रश्न किया।

"हाँ।"

"तभी" वह हल्का सा मुस्करायी फिर बोली, "ये अँग्रेज़ आज भी अपनी सामन्ती विचारधारा से मुक्त नहीं हो पाये हैं। कालों की तरक़्क़ी इनसे बरदाश्त नहीं हो पाती है। प्रतिभा की दौड़ में आज ये हमसे पिछड़ने लगे हैं तो अराजकता पर उतर आये हैं। बाहरी लोगों के इलाक़ों में दंगा करना और उनसे लूटपाट करना अब आम बात होती जा रही है। यहाँ की पुलिस पर संप्रदायिकता का आरोप तो नहीं लगाया जा सकता किन्तु फिर भी उनकी स्वाभाविक सहानभूति अँग्रेज़ों के साथ ही रहती है। सभी के दिमाग़ में यह मानसिकता भर गयी है कि बाहर से आकर हम लोग इनकी समृद्धि को लूट रहे हैं।"

मुझे उस लड़की की बातों में अपनेपन की झलक मिली। मैंने उसे ग़ौर से देखते हुये पूछा, "तुम भी इंडियन हो।"

"एक्स-इंडियन।"

"क्या मतलब?"

"मतलब पाकिस्तानी हूँ," लड़की ने बताया।

यह सुन मेरा चेहरा उतर गया। वह मेरे मनोभावों को भाँप गयी थी अतः गंभीर स्वर में बोली, "यहाँ पर हम हिन्दुस्तानी-पाकिस्तानी नहीं बल्कि सिर्फ़ एशियन हैं। अँग्रेज़ों की दृष्टि में दोनों में कोई अंतर नहीं है। दोनों ही उनके भूतपूर्व गुलाम हैं जिन्हें मजबूरी में आज़ादी देनी पड़ी थी। वे आज भी हमें ज़लील करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते हैं। इसलिये जितने भी दिन यहाँ रहना इस बात का ध्यान रखना कि अपनी ख़ाबलियत से इन्हें पराजित कर हमें अपनी गुलामी के कलंक को धोना है।"

"तुम ठीक कहती हो," मैंने मुस्कराते हुये सहमति जतायी।

"शाहीन नाम है मेरा। कैंब्रिज यूनिर्वसटी से ग्रेजुऐशन कर रही हूँ," उस लड़की ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

"दीपक कुमार सिंह, दो दिन पहले मैंने भी वहीं पर एम.बी.ए. में एडमीशन लिया है," मैंने भी अपना हाथ आगे बढ़ाया।

"फिर तो हमारी दोस्ती पक्की। ऊपर वाले ने चाहा तो हमारी ख़ूब निभेगी," शाहीन ने गर्मजोशी से मेरा हाथ थाम लिया।

उस अनजान देश में शाहीन जैसा दोस्त पाकर मैं बहुत ख़ुश था। उसके पापा का पाकिस्तिान में इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट का बिजनेस था। उसकी माँ की काफ़ी पहले मृत्यु हो गयी थी और पापा काफ़ी व्यस्त रहते थे इसलिये वो यहाँ पर अपनी मौसी के पास रह रही थी। उनसे मिल कर मुझे बहुत अच्छा लगा। 

शाहीन के मौसा-मौसी से मैं जल्दी ही घुल-मिल गया और अक्सर साप्ताहांत उनके साथ ही बिताने लगा। शाहीन की तरह वे लोग भी काफ़ी खुले विचारों वाले थे और मुझे काफ़ी पसन्द करते थे। सबसे अच्छी बात तो यह थी कि यहाँ पर ज़्यादातर हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी आपस का बैर भाव भुला कर मिल-जुल कर रहते थे। ईद हो या होली-दीवाली सारे त्योहार साथ-साथ मनाये जाते थे। आज़ादी देते समय अँग्रेज़ विभाजन की जो कृत्रिम सीमा-रेखा खींच गये थे उसका यहाँ पर प्रभाव न के बराबर था।

शाहीन बहुत अच्छी लड़की थी। हमारी और उसकी विचारधारा बिल्कुल एक जैसी थी। किसी भी चीज़ को देखने का हमारा और उसका नज़रिया बिल्कुल एक जैसा ही होता था। ऐसा लगता था जैसे कुदरत ने हम दोनों को एक-दूसरे के लिये ही बनाया है। हमारी और उसकी दोस्ती जल्दी ही प्यार में बदल गयी। साल बीतते-बीतते हमने शादी करने का फ़ैसला कर लिया। हमें विश्वास था कि शाहीन के मौसी-मौसा इस रिश्ते से बहुत ख़ुश होंगे और वे उसके पापा को इस शादी के लिये राज़ी कर लेगें किन्तु यह हमारा भ्रम निकला। 

"तुम्हारी यह सोचने की हिम्मत कैसे हुई कि कोई ग़ैरतमंद पाकिस्तानी तुम हिंदुस्तानी काफ़िरों से अपनी रिश्तेदारी जोड़ सकता है?" शाहीन के मौसा हमारी बात सुन बुरी तरह भड़क उठे थे।

"अंकल, यह आप कैसी बातें कर रहे हैं? इंग्लैंड में तो सारे हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी आपस का बैर भुला कर साथ-साथ रहते हैं," मैं आश्चर्य से भर उठा।

"अगर साथ-साथ नहीं रहेंगे तो मारे जायेंगे। इसलिये तुम सबको झेलना मजबूरी है," मौसा जी ने कटु सत्य से पर्दा उठाया।

"इस मजबूरी का यह मतलब तो नहीं कि हम अपनी बेटी तुम्हें दे देंगे," शाहीन की मौसी ने भी पति की बातों का समर्थन किया।

"आंटी, क्या फ़र्क है हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी में। दोनों का ख़ून एक जैसा ही होता है। दोनों की ज़मीन एक है, नदियाँ एक हैं, हवा-पानी और रहन-सहन सब कुछ एक है। अगर अँग्रेज़ों ने ज़बरदस्ती बँटवारा न करवा दिया होता तो आज हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी जैसे शब्द ही न होते। हम सब एक होते," शाहीन ने समझाने की कोशिश की।

"तुम चुप रहो। अभी अच्छा-बुरा समझने की तुम्हारी उम्र नहीं है," मौसा जी ने शाहीन को डपटा।

हम दोनों ने उन्हें काफ़ी समझाने की कोशिश की लेकिन सब व्यर्थ रहा। उस दिन के बाद से मेरे और शाहीन के मिलने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। मेरे घर वाले काफ़ी प्रगतिशील विचारों के थे। मुझे विश्वास था कि वे मेरा साथ ज़रूर देंगे किंतु मैं यहाँ भी ग़लत था। 

डैडी ने फोन पर साफ़ कह दिया, "हम फौजी हैं। हम लोग जात-पांत में विश्वास नहीं रखते। हमारा धर्म, हमारा मज़हब सब कुछ हमारा देश ही है इसलिये अपने जीते जी में दुश्मन की बेटी को अपने घर में घुसने की इज़ाज़त नहीं दे सकता।"

"कैसा दुश्मन? शाहीन के पापा लाहौर के रहने वाले हैं और आपका बचपन भी वहीं बीता था। हो सकता है कि आप दोनों एक ही मोहल्ले में खेले हों, एक ही कालेज में पढ़े हों," मैंने तर्क दिया।

"ज़रूर हो सकता है" पापा का स्वर पल भर के लिये गंभीर हुआ फिर वे तल्ख़ स्वर में बोले, "ये भी हो सकता है कि उसने या उसके घर वालों ने ही तेरी बुआ का क़त्ल किया हो। क्या तू नहीं जानता कि लाहौर में हम लोगों पर क्या-क्या ज़ुल्म हुये थे? तू भले भूल जाये मगर मैं कैसे भूल जाऊँ कि उन लोगों ने हमारे साथ जो दुश्मनी अदा की थी उससे हैवानियत भी शर्मा गयी होगी।"

"डैडी, वे सब पुरानी बातें हैं। क्या उसे भुला कर हम नया इतिहास नहीं रच सकते?" मैंने समझाने की कोशिश की।

"इतिहास रचा जा चुका है। हिंदुस्तान-पाकिस्तिान का बँटवारा पत्थर की लकीर है जिसे अब कोई नहीं मिटा सकता। अगर तुमने ये कोशिश की तो ख़ुद मिट जाओगे," डैडी ने कहा और फोन काट दिया।

गुपचुप कोर्ट मैरिज के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा था। मजबूरन हमने वही किया। शाहीन के मौसा-मौसी को जब पता चला तो उन्होने बहुत हंगामा किया किन्तु कुछ कर न सके। हम दोनों बालिग थे और अपनी मर्ज़ी की शादी करने के लिये स्वतंत्र थे। मौसा जी ने उसी दिन शाहीन के पापा को फोन पर ख़बर की तो वे यह सदमा बर्दाश्त न कर सके और उन्हें दिल का दौरा पड़ गया। बहुत मुश्किलों से उनकी जान बचायी जा सकी। यह बात हमें काफ़ी बाद में पता चली थी।

अपनी दुनिया में हम दोनों बहुत ख़ुश थे। शाहीन ने तय किया था कि छुट्टियों में पाकस्तिान चल कर हम लोग उसके पापा को मना लेगें। मैंने वीज़ा के लिये आवेदन भेज दिया था। मुझे विश्वास था कि वह जल्द ही मिल जायेगा।

एक दिन शाहीन ने बताया कि वह माँ बनने वाली है तो मैं ख़ुशी से झूम उठा। मेरे चौड़े सीने पर सिर रखते हुये उसने कहा, "दीपक, जानते हो अगर मेरा बेटा हुआ तो मैं उसका नाम शाहदीप रखूँगी।"

"ऐसा नाम तो किसी का नहीं होता," मैंने टोका।

"लेकिन मेरे बेटे का होगा। शाहीन और दीपक का सम्मिलित रूप शाहदीप। इस नाम का दुनिया में केवल हमारा ही बेटा होगा। जो भी ये नाम सुनेगा जान जायेगा कि वो हमारा बेटा है," शाहीन मुस्करायी। 

कितनी निश्छल मुस्कराहट थी शाहीन की लेकिन वह ज़्यादा दिनों तक मेरे साथ नहीं रह पायी। एक बार मैं दो दिनों के लिये बाहर गया हुआ था। मेरी अनुपस्थित में उसके पापा आये और ज़बरदस्ती उसे पाकिस्तान लिवा ले गये। वह मेरे लिये एक छोटा सा पत्र छोड़ गयी थी जिसमें लिखा था ’हमारी शादी की ख़बर सुन पापा को हार्ट अटैक हो गया था। वे बहुत कमज़ोर हो गये हैं। उन्होंने धमकी दी है कि अगर मैं तुम्हारे साथ रही तो वे ज़हर खा लेगें। मैं जानती हूँ वह बहुत ज़िद्दी हैं। मैं उनकी मौत की गुनहगार बन कर अपनी दुनिया नहीं बसाना चाहती इसलिये उनके साथ जा रही हूँ। लेकिन मैं तुम्हारी हूँ और सदा तुम्हारी ही रहूँगी। अगर हो सके तो मुझे माफ़ कर देना।‘

इस घटना ने मेरे वजूद को हिला कर रख दिया था। मैं पागलों की तरह पाकस्तिान का वीज़ा पाने के लिये दौड़ लगाने लगा किन्तु यह इतना आसान न था। बँटवारे ने दोनों देशों के बीच इतनी ऊँची दीवार खड़ी कर दी थी जिसे लाँघ पाने में मुझे कई महीने लग गये। लाहौर पहुँचने पर पता चला कि शाहीन के पापा अपनी सारी जायदाद बेच कर कहीं चले गये हैं। मैंने काफ़ी कोशिश की लेकिन शाहीन का पता नहीं लगा पाया।

मेरा मन उचट गया था। अतः इंग्लैंड न जाकर भारत लौट आया। एम.बी.ए. तो मैं केवल डैडी का मन रखने के लिये कर रहा था वरना बचपन से मेरा सपना भी अपने पूर्वजों की भाँति फौज में भर्ती होने का था। मैंने वही किया। धीरे-धीरे 28 वर्ष बीत गये। 

शाहीन को मैं कभी भुला नहीं सका। मैंने उससे सच्चा प्यार किया था किन्तु यह कोई गुनाह न था। यदि दुनिया की नज़रों में यह गुनाह था तो क्या इतना बड़ा गुनाह था कि मेरे समाने मेरे ही बेटे को दुश्मन के रूप में खड़ा कर दिया जाये? शीरी-फरहाद रहे हों या लैला-मजनूं, सोहनी-महिवाल रहे हों या हीर-रांझा ये दुनिया हमेशा से सच्चे प्रेमियों की दुश्मन रही है। उन्हें उनके गुनाह की सज़ा देती रही है किन्तु इतनी बड़ी सज़ा? इतना बड़ा अभिशाप? ऐसा क्रूर मज़ाक? 

मेरे अंदर की बेचैनी हर पल बढ़ती जा रही थी। मैंने उठ कर कमरे की खिड़कियाँ खोल दीं। ठंढी हवा के झोंके भीतर आ गये किन्तु उनसे मेरे मन के अंदर उठ रही अग्नि को शांति नहीं मिली। मैंने घड़ी की ओर देखा। रात के दो बज गये थे। चारों ओर निस्तबद्धता छायी हुई थी। पूरी दुनिया शांति से सो रही थी किन्तु मेरे अंदर हाहाकार मचा हुआ था। मेरा बेटा मेरी ही क़ैद में था और मैं अभी तक उसकी कोई मदद नहीं कर पाया था। मुझसे बेबस बाप इस दुनिया में और कोई न होगा।

बेचैनी जब हद से ज़्यादा बढ़ने लगी तो मैं बाहर निकल आया। अनायास ही मेरे क़दम बैरक नम्बर 4 की ओर बढ़ गये। वहाँ मेरे जिगर का टुकड़ा मेरी ही तरह तड़प रहा होगा। मन का एक कोना वहाँ जाने से रोक रहा था किन्तु दूसरा कोना उधर खींचे लिये जा रहा था। मेरे दिल की धड़कनों की गति काफ़ी तेज़ हो गयी थी। उसी के साथ क़दमों की गति भी तेज़ होती जा रही थी। मुझे इस बात का एहसास भी न था कि इतनी रात मुझे अकेले एक पाकस्तानी की बैरक की ओर जाते देख कोई क्या सोचेगा? किन्तु इस समय अपने ऊपर मेरा कोई नियंत्रण नहीं बचा था। मैं स्वयं नहीं जानता था कि मैं क्या करने जा रहा हूँ।

शाहदीप की बैरक के बाहर सींखचों के पास बैठा पहरेदार आराम से सो रहा था। मैं दबे पाँव उसके क़रीब पहुँचा किन्तु उसकी गर्दन पर दृष्टि पड़ते ही बुरी तरह चौंक पड़ा। उस पर ऊँगलियों के नीले निशान उभरे हुये थे। मैंने उसकी नब्ज़ को टटोला। वो चल रही थी। इसका मतलब वह सिर्फ़ बेहोश हुआ है। 

किसने किया होगा यह? पल भर के लिये मेरे मस्तिष्क में प्रश्न चिन्ह सा उभरा किंतु अगले ही पल वहाँ ख़तरे की घंटियाँ बज उठीं। निश्चय ही शाहदीप ने अपनी सौगन्ध पूरी करने की कोशिश की है। मैंने बैरक के भीतर झाँका किन्तु शाहदीप वहाँ नहीं था। 

"क़ैदी भाग गया। क़ैदी भाग गया," मैं पूरी शक्ति से चिल्लाया। रात के सन्नाटे में मेरी आवाज़ दूर तक गूँज गयी। 

मैंने पहरेदार की जेब से चाभी निकाल कर फुर्ती से बैरक का दरवाज़ा खोला। भीतर घुसते ही मैं चौंक पड़ा। बैरक के रोशनदान की सलाखें कटी हुई थीं और शाहदीप उससे बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था किन्तु रोशनदान छोटा होने के कारण उसे परेशानी हो रही थी। 

"शाहदीप, रुक जाओ," मैं पूरी ताक़त से चीख पड़ा।

शाहदीप पर कोई असर नहीं पड़ा। उसका एक कंधा रोशनदान के बाहर निकल चुका था। समय बहुत कम था। अगर एक बार वह रोशनदान से बाहर निकल गया तो रात के अँधेरे में उसे पकड़ पाना मुश्किल होगा। मेरे जबड़े सख़्ती से भिंच गये। मैंने अपना रिवाल्वर निकाल कर शाहदीप के ऊपर तान दिया और सर्द स्वर में बोला, " शाहदीप, अगर तुम नहीं रुके तो मैं गोली मार दूँगा।"

मेरे स्वर की सख़्ती को शायद शाहदीप ने भाँप लिया था। अपने धड़ को पीछे खिसका सिर निकाल कर उसने क़हर भरी दृष्टि से मेरी ओर देखा। अगले ही पल उसका दायाँ हाथ सामने आया। उसमें नन्हा सा रिवाल्वर दबा हुआ था। उसे मेरी ओर तानते हुये वह गुर्राया, "ब्रिगेडियर दीपक कुमार सिंह, वापस लौट जाइये वरना मैं अपने रास्ते में आने वाली हर दीवार को गिरा दूँगा चाहे वो कितनी ही मज़बूत क्यों न हो।"

इस बीच कैप्टन बोस और कई सैनिक दौड़ कर वहाँ आ गये थे। इससे पहले कि वे बैरक के भीतर घुस पाते शाहदीप दहाड़ उठा, "तुम्हारा ब्रिगेडियर मेरे निशाने पर है। अगर किसी ने भी भीतर घुसने की कोशिश की तो मैं इसे गोली मार दूँगा।"

आगे बढ़ते क़दम ठिठक कर रुक गये। बड़ी विचित्र स्थित उत्पन्न हो गयी थी। मैं शाहदीप के ऊपर रिवाल्वर ताने हुये था और वह बायें हाथ से रोशनदान को थामे दायें हाथ से मेरे ऊपर रिवाल्वर ताने हुये था। दोनों एक-दूसरे के निशाने पर थे। 

"लेफटीनेन्ट, तुम यहाँ से भाग नहीं सकते," मैं गुर्राया।

"और तुम मुझे पकड़ नहीं सकते," शाहदीप ने अपना रिवाल्वर मेरी ओर लहराया।

कई पल इसी तरह बीत गये। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ? जिस दावानल से मैं गुज़र चुका था क्या वो कम था जो कुदरत ने मुझे इस अग्नि परीक्षा में डाल दिया था। 

शाहदीप का भी सब्र शायद समाप्त होता जा रहा था। उसने क़हर भरे स्वर में कहा, "ब्रिगेडियर, तुम्हारे कारण ही मेरे मिशन में बाधा पड़ी है। मैं आख़री बार कह रहा हूँ कि वापस लौट जाओ वरना मैं गोली मार दूँगा।"

मेरे वापस लौटने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था। उधर शाहदीप भी जिस स्थित में लटका हुआ था उसमें ज़्यादा देर नहीं रहा जा सकता था। जाने क्या सोच कर उसने एक बार फिर अपने शरीर को रोशनदान की तरफ़ बढ़ाने की कोशिश की।

"धाँय. . .धाँय. . ." मेरे रिवाल्वर से दो गोलियाँ निकलीं। शाहदीप की पीठ इस समय मेरी ओर थी, दोनों ही गोलियाँ उसकी पीठ में समा गयीं। वह कटे हुये पक्षी की तरह नीचे गिर पड़ा और तड़पने लगा। 

मुझसे और बर्दाश्त नहीं हुआ। अपना रिवाल्वर फेंक मैं उसकी ओर दौड़ पड़ा और उसका सिर अपने हाथों में ले बुरी तरह फफक पड़ा, "शाहदीप, मेरे बेटे, मुझे माफ़ कर दो।"

कैप्टन बोस दूसरे सैनिकों के साथ इस बीच भीतर घुस आये थे। मुझे इस तरह रोता देख वे चौंक पड़े, "सर, ये आप क्या कह रहे हैं?"

"कैप्टन, तुम तो जानते ही हो कि मेरी शादी एक पाकिस्तानी लड़की से हुई थी। ये मेरा बेटा है। मैं इसके निशाने पर था, अगर यह चाहता तो पहले गोली चला सकता था लेकिन इसने ऐसा नहीं किया," इतना कह कर मैंने शाहदीप के सिर को झिंझोड़ते हुये पूछा, "बता तूने मुझे गोली क्यों नहीं मारी? बता तूने ऐसा क्यूँ किया?"

शाहदीप के होठों पर एक दर्द भरी मुस्कान तैर गयी। उसने काँपते स्वर में कहा, "डैडी, जन्मदाता के लिये त्याग करने का अधिकार सिर्फ़ हिंदुस्तान के राम को ही नहीं है। हम पाकस्तानियों का भी इस पर बराबर का हक़ है।"

शाहदीप ने एक बार फिर मुझे बहुत छोटा साबित कर दिया था। मैं उसे अपने सीने से लगा कर बुरी तरह फफक पड़ा।      

"डैडी, मुझे पीठ में गोलियाँ लगी हैं। सुना है कि पीठ में गोली खाने वाले कायर होते हैं," शाहदीप ने हिचकी भरी।

"कौन कहता है कि तू कायर है," मैंने उसका माथा चूम उसके चेहरे को अपने आँसुओं से भिगोते हुये कहा, "कायर तो मैं हूँ जिसने अपनी जान बचाने के लिये अपने बेटे पर गोली चलायी है।" 

"आपने तो वीरता की मिसाल क़ायम की है," शाहदीप ने अपने ख़ून से सने काँपते हाथों से मेरे आँसुओं को पोंछा फिर मेरे हाथों को थाम हिचकी भरते हुये बोला, "डैडी, मुझे आपकी वीरता पर गर्व है। जीते जी तो मैं आपकी गोद में न खेल सका किन्तु अंतिम समय मेरी यह इच्छा पूरी हो गयी। अब मुझे ज़िंदगी से कोई शिकायत नहीं है।"

इसी के साथ शाहदीप ने एक ज़ोर की हिचकी ली और उसका सिर एक ओर लुढ़क गया। मेरे हाथ में थमा उसका हाथ फिसल गया और इसी के साथ उसकी ऊँगली में दबी अँगूठी मेरे हाथों में आ गयी। उस अँगूठी पर दृष्टि पड़ते ही मैं एक बार फिर चौंक पड़ा। उसमें भी एक नन्हा सा कैमरा फिट था। इसका मतलब उसने एक साथ दो कैमरों से वीडियोग्राफी की थी। एक कैमरा हमें देकर उसने अपने एक फ़र्ज़ की पूर्ति की थी और अब दूसरा कैमरा लेकर अपने दूसरे फ़र्ज़ की पूर्ति करने जा रहा था। किन्तु मेरे कारण वह अपना फ़र्ज़ पूरा नहीं कर सका था। मुझसे अभागा बाप और कोई नहीं हो सकता था।

शाहदीप के निश्चेत शरीर से लिपट कर मैं विलाप कर उठा। अपने आँसुओं से उसे भिगोकर मैं अपना प्रयाश्चित करना चाहता था। तभी कैप्टन बोस ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुये कहा, "सर, आँसू बहाकर शहीद की आत्मा का अपमान मत करिये।"

मैंने आँसुओं भरी दृष्टि से कैप्टन बोस की ओर देखा फिरे भर्राये स्वर में पूछा, "कैप्टन, क्या तुम मेरे बेटे को शहीद मानते हो?"

"हाँ सर, न भूतो न भविष्यते। ऐसी शहादत न तो पहले कभी किसी ने दी थी और न ही देगा। एक वीर के बेटे ने अपने बाप से भी बढ़ कर वीरता दिखायी है। इसका जितना भी सम्मान किया जाये वो कम है," इतना कह कर कैप्टन बोस ने शाहदीप के पार्थिव शरीर को सलाम किया फिर पीछे मुड़ कर अपने सैनिकों को इशारा किया।

वे सब पंक्तिबद्ध तरीक़े से खड़े हो कर आसमान में गोली बरसाने लगे। पाकस्तानी लेफेटीनेन्ट को 101 गोलियों की सलामी देने के बाद ही हिंदुस्तानी रायफ़लें शांत हुईं। दुनिया में आज तक किसी भी शहीद को इतना बड़ा सम्मान प्राप्त नहीं हुआ होगा।

1 Comments

  • 11 Nov, 2019 08:57 AM

    बहुत सुंदर कहानी है कहीं भी छोड़कर रुकने को मन नहीं करतापूरी कहानी अंत तक पाठक को अपने साथ जोड़े रखती है अपने फ़र्ज़ और देश प्रेम की भावना का अद्वीतीय उदाहरण बड़ी सजीवता से दर्शाया है हार्दिक बधाई।

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