स्त्री

भीम 'ग़ालिब'

ताड़ के सीधे वृक्ष सी होती है स्त्री
रिश्तों के विषैले तूफ़ानों में भी
अपने वजूद को लिए सीधी रहती है स्त्री


हर बिखरे से घर को
समेटती है स्त्री
हर दुख को मुस्कुराहट
की झोली में लपेटती है स्त्री
दूजों का पेट भरने को
अपनी भूख को खोती है स्त्री


इस घर पराई
उस घर पराई
जाने किस घर की
होती है स्त्री


मृत मकान को
जीवित घर बनाती है स्त्री
कीचड़ से भी
आँगन को सुंदर बनाती है 
स्त्री
बहू, बेटी, बहन, पत्नी
हर रिश्ते को बख़ूबी
निभाती है स्त्री


प्रसव की पीड़ा को
अकेले ही सह जाए है
स्त्री
ख़ुद को मार कर
एक नया जन्म पाती है
ऐसे जाने कितने दर्दों को
अंदर ही अंदर सह जाती है स्त्री


कोख में कोख जननी का
अंत हो जाता है
उस समय मानवता का पाठ
कहाँ खो जाता है
मार कर लाज भी ना आती
ऐसे समय विचारों से
कहाँ जाती है स्त्री


ताड़ के सीधे वृक्ष सी होती है स्त्री.....

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