सपनों के महल

डॉ. हेमलता पाण्डे

याद आते हैं सपनों के वे महल, 
जिन्हें हक़ीक़त की बारिश बहा ले गयी. 
... इतनी भी बेदर्द नहीं थी बारिश वह, 
विश्राम को हरियाली की चादर तो बिछा ही गयी।

महल न मिले तो क्या हुआ,
उस चादर में सोकर फिर
हम अच्छे मकान बनाने लगे हैं।

अब नए सपने
दुबारा मीठी नींद हमें सुलाने लगे हैं...
कभी न मुस्कुरा पाएँगे
अब यह सोच बैठे थे हम 
...पता भी न चला 
पर न जाने हम – 
कब से फिर मुस्कुराने लगे हैं...

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