साहित्य ही समाज को गढ़ता है

15-12-2019

साहित्य ही समाज को गढ़ता है

सलिल सरोज

समाज का ऐसा कोई वर्ग नहीं है जो कभी न कभी, किसी न किसी रूप में साहित्य के किसी न किसी विधा के संपर्क में न आया हो। इतिहास से लेकर अब तक की बात करें तो भित्तिचित्र, शिलालेख, मिट्टी और काँसे के बर्तनों पर उकेरे चित्र, पत्तों पर लिखे शब्द, लोक संगीत, देववाणी, सत्संग, भजन, कीर्तन, उपदेश, गाँव के चौपालों पर मंडली द्वारा गाया जाने वाला संगीत, शादी -विवाह के अवसर पर वर पक्ष को वधू पक्ष की ओर से दी जाने वाली गालियाँ, दादी-नानी की कहानियाँ, चित्रकथाएँ, कॉमिक्स, कार्टून, नवीन संगीत, नृत्य, नाटक एवम अन्य कई और तरह की साहित्यिक विधाएँ जन मानस में रची बसी होती हैं। साहित्य केवल एक ख़ास वर्ग के लिए ही नहीं होता, नहीं तो आइंस्टीन और कलाम जी जैसे वैज्ञानिक संगीत के मुरीद न होते। साहित्य का हर रूप समाज को जोड़ने की कोशिश ही करता है। यह किसी दायरे में बँधा हुआ नहीं होता। अब्दुर्रहीम खानेखाना अगर कृष्ण की भक्ति कर सकते हैं तो काशी में गंगा घाट पर बैठे सन्त-महात्मा सूफ़ी गीत भी गाये जा सकते हैं। साहित्य मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने की सबसे बड़ी वजह है। 

"यूनान,मिस्र,रोमाँ सब मिट गए जहाँ से 
बाक़ी मगर है फिर भी नामो-निशाँ हमारा 
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी 
सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहाँ हमारा "

भारत से पुरानी और भव्य सभ्यताएँ भी गर्त में चली गईं, जो अपने साहित्य को सँभाल कर नहीं रख पाईं। सबसे ज़्यादा पढ़ने-लिखने वालों देशों में एक देश, रूस का साहित्य बहुत ही समृद्ध माना जाता है। वहाँ मेट्रो, रेल, बस, लिफ़्ट हर जगह, हर उम्र का व्यक्ति कुछ न कुछ पढ़ता नज़र आ ही जाता है। पुश्किन, लरमनतेंव, गोर्की, दोस्तोवेस्की जैसे विद्वानों के धरोहर को आज भी सँभाल कर रखा गया है। हालाँकि पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से रूसी भाषा का स्वरूप ज़रूर बदला है लेकिन लोगों के पढ़ने की रुचि आज भी बरकरार है। भारत की साहित्यिक धरोहर भी काफ़ी विशाल है। बात है कि हमें क्या मिला और हम कितना अगली पीढ़ी के लिए बचा पाए। भारत के बारे में मैक्स मूलर, रोमां रोलाँ, हेनरी रोरिक जैसे विद्वानों ने बेहतरीन बातें लिखी हैं। कितनों ने अपने जीवन की सफलता का पूरा श्रेय ही भारतीय संस्कृति के अध्ययन को दे दिया है। मूलतः यह प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं रह जाती है कि जो साहित्य जितना उदार और सीखने-सिखाने को आतुर होता है वह उतना ही ज्यादा दीर्घायु होता है। 

मेरा मत है कि मनुष्य बने रहने का प्रथम शर्त है कि आप समाज के साहित्य से किसी न किसी रूप में जुड़े रहें। लिखते रहें, पढ़ते रहें और दूसरे व्यक्तियों को बताते भी रहें। चूँकि मैं कभी भी विज्ञान का अच्छा विद्यार्थी नहीं रहा और भाषाएँ मुझे हमेशा आकर्षित करतीं थीं, इसीलिए साहित्य की ओर रुझान बचपन से ही हो गया। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में रूसी और तुर्की भाषा सीखने के कारण विदेशी साहित्यकारों को भी पढ़ने का मौक़ा प्राप्त हुआ। बचपन में नंदन, चम्पक, बालहंस, नन्हें सम्राट, चंदा मामा, अहा ज़िंदगी, कॉमिक्स ने मेरी इस रुचि को बनाए रखा। इंग्लिश हॉनर्स के दौरान चिनुआ अचेबे की थिंग्स फालेन अपार्ट, चार्ल्स डिकेंस की हार्ड टाइम्स, विक्रम सेठ की ए सुटेबल बॉय, अरुंधति रॉय की गॉड ऑफ़ स्माल थिंग्स, सलमान रुश्दी की सैटेनिक वर्सेज, ओशो की समाधि से सम्भोग की ओर, इस्मत चुगताई और सआदत हसन मंटो की लघु कथाओं ने इस भूख को और भी बढ़ा दिया। अपने कोर्स से इतर जाके ग़ज़ल, नज़्म, जीवनी, साक्षात्कार, यात्रा वृत्तांत, संस्मरण, उपन्यास पढ़ता ही चला गया। यह कहना आसान नहीं होगा कि मैं सब समझता भी चला गया लेकिन सैनिक स्कूल में पढ़ने के कारण आए अनुशासन के कारण जो भी किताब उठाई, बिना पढ़े हुए मैंने नहीं छोड़ी। इसी दौरान जयशंकर प्रसाद की कामायनी, रामधारी सिंह दिनकर की रश्मिरथी, मैथिली शरण गुप्त की भारत भारती जैसी रचनाओं से रूबरू हुआ। चूँकि मैं ख़ुद ट्यूशन पढ़ाया करता था इसलिए पैसे की कोई कमी नहीं हुई लेकिन मेरी रुचि ने ही लगभग 300 साहित्यिक पुस्तकों को मेरी निगाहों के सामने से परिलक्षित करवाया। कुछेक किताबें रूह में बस गईं। धर्मवीर भारती की गुनाहों का देवता उन में से ही एक पुस्तक है। नायिका के मरने का वर्णन इतना हृदयविदारक है कि कोई भी पाठक रोए वगैर उसे पूरा नहीं कर सकता और मैं भी कई बार रोया। हालाँकि इसी पर बनी फ़िल्म में जितेन्द्र साहब ने काफ़ी अच्छी कोशिश कि लेकिन धर्मवीर साहब का कोई जोड़ नहीं। हालाँकि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की सूनी चौखटें और प्रेमचंद का वरदान भी प्रेम कहानी का बेजोड़ उदहारण है लेकिन गुनाहों के देवता की मिसाल नहीं। धर्मवीर भारती ने मानो सब आँखों के सामने लाकर रख दिया हो। मैंने पढ़ने के बाद यह पुस्तक दसियों लोगों को भेंट की और पढ़ने को बोला ताकि प्रेम का सही अर्थ पता चले। इसी क्रम में दुष्यत कुमार को पढ़ा तो फिर रुका ही नहीं। 

"हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए 
इस हिमालय से फिर कोई गंगा निकलनी चाहिए 
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में ही सही 
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए "

ग़ज़लों में हिंदी शब्दों के प्रयोग की नए रीत चलाई दुष्यंत कुमार ने। बाबा नागार्जुन, धूमिल को पढ़कर साम्यवाद को जाना। कबीर को पढ़ा तो मानवतावाद में पहुँच गया। मीर, मोमिन, ग़ालिब, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, अहमद फ़राज़, परबीन शाकिर, गुलज़ार, तहज़ीब हाफ़ी को पढ़ा तो एक नए रूमानी स्वप्न में खो सा गया। बेगम अख़्तर, मुन्नी बाई, बड़े ग़ुलाम अली साहब, हरि प्रसाद चौरसिया, शिव कुमार शर्मा, पंडित जसराज, अमजद अली खान को सुनकर लगा कि साहित्य कितना ज़रूरी है इंसानी रूह को बचाए रखने के लिए। श्याम बेनेगल, सईद जाफरी, प्रकाश झा जैसे फ़िल्मकारों की फ़िल्में जैसे कि मंथन, आक्रोश, अर्धसत्य, दामुल व् भारत एक खोज जैसे वृत्तचित्र को देखकर स्वयं में एक अलग ही तरह के ज्ञान और सम्पूर्णता का उदय होते हुए भी मैंने देखा। राजा रवि वर्मा, अमृता शेरगिल, मक़बूल फ़िदा हुसैन की चित्रकारी ने साहित्य के प्रति मेरी निष्ठा को और भी मज़बूत कर दिया। साहित्य के प्रति इस प्यार ने मुझे मेरी बेहतरीन लाइब्रेरी मेरे घर में प्रदान की है। 

मैं आज भी इसी जोश से पढ़ने और लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। मेरा मानना है कि पीएच. डी. करने वाले हर व्यक्ति को लिखकर या बोलकर अपनी अगली पीढ़ी को और इस समाज को कुछ न कुछ नया ज़रूर देना चाहिए। साहित्य ने मुझे इस तरह गढ़ा है कि मुझे हिंदी और उर्दू दो बहनें लगती हैं और हिन्दू और मुस्लिम नाखून और माँस की तरह जुड़े हुए लगते हैं। साहित्य सच में मनुष्य और समाज को गढ़ने का काम करता है, इसमें कोई दो राय नहीं। 

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