राजनीतिक होली 

15-03-2020

राजनीतिक होली 

आरिफा एविस

हर साल की तरह इस बार भी माघ के बाद फाल्गुन लग चुका था। मौसम का मिज़ाज क्या बदला राजनीतिक मिज़ाज भी बदल गया पर अपना मिज़ाज जैसा था वैसा ही रहा बिलकुल विपक्ष की तरह। जैसे-जैसे रात छोटी हुई अपनी नींद भी बड़ी होने लगी। रात और नींद का रिश्ता भी चोली दामन जैसा ही है। मैं नेताओं की तरह बिस्तर में चीर निद्रा में लीन थी और ख़्याली पुलाव नहीं ख़्वाब में पुलाव देख रही थी। तभी अम्मी मेरे सिर से चादर हटाते हुए बड़बड़ायी, “एक यह मोहतरमा हैं कि चैन की नींद सो रही हैं और हम हैं रात की नींद भी हराम हो रही है। कब से आवाज़ दे रही हूँ। पर तुम्हारे कानों पर जूँ तक नहीं रेंगती है। उठो सर पर सूरज सवार हो चुका है।”

अम्मी की बात सुनकर मुझे ग़ुस्सा आ गया, "क्या है अम्मी, आप आला कमान की तरह बीस घंटे काम करती हो तो इसमें मुझे क्या? कम से कम मुझे तो सोने दो! कभी-कभार तो नींद का मौक़ा मिलता है वरना ग़रीब आदमी को नींद कहाँ उसकी नींद तो रोज़ी-रोटी के चक्कर में ही उड़न छू रहती है।”

“अच्छा अब नेताओं की तरह बकबक न करो। ज़रा इस लड़के को पढ़ा दो वर्ना तुम्हारे पढ़े-लिखे होने का या फ़ायदा।”

अम्मी के पीछे छोटा भाई अमन खड़ा मुँह लटकाए खड़ा था। मैंने उसे आँखों ही आँखों में देखा और पता लगा लिया ज़रूर हर बार की तरह अपना स्कूल का काम करवाने आया होगा। उसे देख मुझे तरस आया ये स्कूल वाले सिर्फ काग़ज़ों में पढ़ाते हैं असली पढ़ाई तो घर वाले ही करते हैं। अम्मी के जाते ही नेताओं की तरह उसका रंग बदल गया और बोला, “आपी जल्दी करो मुझे स्कूल में होली पर निबन्ध दिखाना है। और हाँ 'हम देखेंगे' की तरह तर्जुमा मत कर देना। निबन्ध हिंदी में ही लिखना वरना मुझ पर फ़तवा न लागू हो जाये।”

’अजीब मुसीबत है जिस तरह नेता अपना भाषण अपने एक्सपर्ट से लिखवा वाहवाही लूटते हैं उसी तरह मेरा भाई मुझसे।' बड़बड़ाते हुए मैंने भी आव देखा न ताव किसी युद्ध में लड़ रहे सैनिक की तरह अपनी क़लम की तलवार निकाली और होली पर निबन्ध लिख मारा, न मालूम उस पर मास्टर जी कितने नंबर देंगे- 

"होली", यह विभिन्न रंगों का त्यौहार है। इसमें लफंगीरंग, हुड़दंगीरंग, चेला-चपाटीरंग, देशभक्ति और देशद्रोही रंग भी ख़ूब लगाया जाता है क्योंकि बुरा न मानो होली है। बाक़ी कोई बुरा भी मान जाये तो कोई कर भी क्या सकता है? किसी विषय को राजनीतिक मुद्दा बनाना हो तो उसमें राजनीतिक रंग डाल दो फिर देखो रंगों के कमाल। राजनीति में भी तो कुछ ही रंगों की भरमार है ऐसा लगता है जैसे बाक़ी रंग राजनीति से कतराते हैं। वक़्त बे वक़्त इन रंगों पर दूसरे रंग चढ़ जाते हैं मानो रंग न हो रंगरेज़ की दुकान हो। वैसे तो दिखावट में एक रंग दूसरे का विरोधी होता है मजाल दोनों रंग आपस में मिल जाएँ, पर राजनीति में रंगों का घालमेल चलता है, कोई आज स्याह है तो कल सफ़ेद भी हो सकता है। राजनीति में होली खेलने के लिए किसी पंचांग की ज़रूरत नहीं होती जब चाहो होली, दीवाली मना लो। नीली, पीली, लाल, भगवा, हरा, गुलाबी, सफ़ेद सब अपने आप में अलग और एक दूसरे से जुड़े हैं।

यूँ तो यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है लेकिन अब इसकी कोई निश्चितता नहीं; जिसे देखो वो अपने हिसाब से मना ले जब चाहे और जहाँ चाहे मना ले, बस बहाना चाहिए। एक बात और इन राजनीतिक पार्टियों की ईद ए गुलाबीया, धुलेंडी, धुरड्डी, धुरखेल या धूलिवंदन मनाने का कोई हिसाब-किताब नहीं है कि कब तक और किस दिन मनाना है। इनकी तो अपने मन की गंगा अपने मन की जमुना बहती रहती है।

कहने को होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला भारतीय लोगों का त्यौहार है, लेकिन ख़ूनी होली देश से लेकर विदेशों में आये दिन खेली ही जाती है जिसके लिए किसी ख़ास मौसम की ज़रूरत नहीं। अब इसे मनाने के लिए किसी होलिका को जलाने की ज़रूरत नहीं, ज़िन्दा इंसानों और उनके मकानों-दुकानों को जला देने से ही काम चल जाता है। हाँ नारा ज़ोरदार होना चाहिए। ख़ून की होली खेलने के अपने नियम हैं। कोई अपने घर से खेलता है कोई मंचों का इस्तेमाल करके प्यार और सद्भाव की धमकी देकर। हाँ कभी-कभी इसका रंग-रूप बदल ज़रूर जाता है- मसलन जातिगत ख़ूनी होली, धार्मिक सौहार्द दंगे-फ़साद की होली, स्थानीय विशेष की होली, लोगों के उजाड़न की होली...। ऐसी होली किसी धर्म विशेष से नहीं जुड़ी होती, इसके लिए राजनीतिक रंग सर्वोपरि है। राजनीति से बड़ा कोई धर्म नहीं। वैसे इन दिनों नागरिकता छीनने की होली भी खेली जा रही है। विरोध करने वाले को विद्रोही का गुब्बारा फेंक दो फिर देखो फ़र्ज़ी देशभक्ति होली का रंग। असली देशभक्त गोली से लेकर गाली रंग इस्तेमाल करके दुश्मन को लपेट देते हैं। अब आने वाले सालों में डिटेंशन सेंटर में भी होली मिलन समारोह होगा जहाँ नागरिक बनाम अनागरिक एक दूसरे रंग लगायेंगे। इसके लिए सरकार तीन विशेष प्रकार के रंग लायी है। वैसे एक राज्य में इनमें से एक रंग का इस्तेमाल हो चुका है जो बहुत पक्का रंग है।

राजनीतिक लोग आपस में आरोप-प्रत्यारोप के गुब्बारे आये दिन फेंकते रहते हैं। संसद में ज़ुबानी गुलाल-अबीर की बौछार भी करते रहते हैं। इनकी एक ख़ास पहचान है... रंगहीन होते हुए भी ये सभी रंगों को मिलकर काला रंग बनाते हैं और ये स्याह लोग सफ़ेदपोश कहलाते हैं।

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