राजेन्द्र  यादव की लघुकथाएँ

01-05-2019

राजेन्द्र  यादव की लघुकथाएँ

सुकेश साहनी

हिंदी की ज़्यादातर लघुकथाएँ वाहियात हैं। लघुकथा चुटकुले और गद्य के बीच सिर पटकती नज़र आती है। हमारी ज़िदंगी की सच्चाई इतनी गहरी एवं संश्लिष्ट है कि सब लघुकथा में समाहित नहीं हो सकती। मुद्राराक्षस, गोविंद मिश्र एवं शानी जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकारों की इन एकतरफ़ा टिप्पणियों से हटकर राजेन्द्र  यादव लघुकथा के विषय में अपने विचार कुछ इस तरह व्यक्त करते हैं, "मैंने पाँच-सात लघुकथाएँ लिखी हैं। मुझे लगा, यह विधा बहुत कठिन है, मैं नहीं लिख पाऊँगा, लेकिन चुटकुले ज़रूर लिख सकता हूँ, जिनको मैं लघुकथा नहीं मानता, क्योंकि लघुकथा में लेखक मूल स्वर पकड़ता है। बड़ी कहानी को संक्षिप्त करके लिखना लघुकथा नहीं है।"

राजेन्द्र यादव की वर्षों पूर्व की इस टिप्पणी के ‘हंस’ और ‘इंडिया टुडे’ के वार्षिकांक में उनकी नई लघुकथाओं का प्रकाशन लघुकथा से जुड़े कथाकारों के लिए अच्छी बात है। दावे के साथ कहा जा सकता है कि लघुकथा लेखकों ने ‘हंस’ में छपी राजेन्द्र  यादव की लघुकथाओं को सबसे पहले पढ़ा होगा। राजेन्द्र  यादव सरीखे कथाकार से अति गंभीर, उत्कृष्ट या कहा जाए कि मानक लघुकथाओं की अपेक्षा की जा रही थी। आज लघुकथा के क्षेत्र में बहुत गंभीर लेखन हो रहा है। आसान विधा समझकर इसमें घुसपैठ करनेवालों की भीड़ काफ़ी हद तक छँट चुकी है। इसका मतलब यह नहीं है कि अब लघुकथा में श्रेष्ठ ही लिखा जा रहा है। कूड़ा-करकट फैलाने वाले आज भी मौजूद हैं, सभी विधाओं में होते हैं। समय अपने आप श्रेष्ठ को अलग कर देता है। अन्य विधाओं की तुलना में लघुकथा को इन तथाकथित रचनाकारों ने सबसे अधिक हानि पहुँचाई है। स्थापित साहित्यकारों की लघुकथा के प्रति चिढ़ पहले ही लघुकथा की स्थापना में अवरोधक का काम कर रही थी, उस पर इसमें उग आए खरपतवार ने इसका और अधिक अवमूल्यन कर दिया था। आज स्थिति बेहतर है। अन्य विधाओं की भाँति लघुकथा में अनेक ऐसी रचनाएँ लिखी जा रही हैं, जिनकी तुलना विश्वस्तरीय रचनाओं से की जा सकती है। 

राजेन्द्र  यादव के अलावा अन्य कई स्थापित साहित्यकारों की लघुकथाएँ ‘हंस’ तथा ‘कथादेश’ में प्रकाशित हुई हैं। क्या यह लघुकथा के लिए शुभ संकेत है? इस प्रश्न के उत्तर के लिए देखना होगा कि क्या लघुकथा की ओर आकृष्ट हुए स्थापित साहित्यकार लघुकथा के प्रति पूरी तरह गंभीर हैं? यदि हैं तो यह वास्तव में शुभ संकेत है। इन प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए स्थापित साहित्यकारों की लघुकथाओं की पड़ताल करना ज़रूरी है।

‘विश्व लघुकथा कोश’ में बलराम ने राजेन्द्र  यादव की नौ लघुकथाएँ संकलित की हैं। इनमें से पाँच: ‘सजा या सम्मान’, ‘सिद्धांत’, ‘अपनी ही मूर्ति’, ‘मरण कामना’, ‘आस्था’, आदि ‘हंस’ में प्रकाशित हुई थीं। ‘अपने पार’ को भी बलराम ने ‘भारतीय लघुकथा कोश’ में संकलित किया था। ‘हनीमून’, ‘पहला झूठ’, ‘प्रेमपत्र’, ‘प्रतिकार’, ‘मुक्ति’, ‘आत्महत्या’, ‘प्रेमिकाएँ’, ‘माँ की कमर’, तथा ‘पकड़ से बाहर एक क्षण’ आदि राजेन्द्र  यादव की अन्य प्रकाशित लघुकथाएँ हैं।

सर्वप्रथम राजेन्द्र  यादव की ‘अपने पार’ लघुकथा पर चर्चा करना उचित होगा। यह लघुकथा स्त्री-पुरुष संबंधों पर लिखी गई श्रेष्ठ रचनाओं में से एक है। लघुकथा के गठन में जिन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए, उनकी सशक्त प्रस्तुति इसमें देखी जा सकती है। लघुकथा का प्रारंभ बच्चे के द्वंद्व से होता है: ‘पापा नहीं हैं। यहाँ सिर्फ मम्मी हैं। उनकी बहुत-सी सहेलियाँ हैं। उनसे मैं बहुत जल्दी से बोर हो जाता हूँ। कुछ देर में ही वे अपनी और अपने बच्चों की बातें करने लगती हैं, लेकिन बाहर खेलने जाता हूँ तो वहाँ सिर्फ लड़के होते हैं या आदमी। लड़के बहुत शैतान हैं। मारते हैं, कपड़े फाड़ देते हैं, मेरी चीज छीन लेते हैं। उनकी बातें भी बहुत गंदी होती हैं। वे मुझे अपने साथ नहीं खिलाते। आदमी बहुत जल्दी भूल जाते हैं मेरी तरफ ध्यान नहीं देते। कहते हैं, मैं इतना बड़ा होकर भी गोदी के बच्चों जैसी हरकतें करता हूँ। तुतलाता हूँ। लड़कियाँ शैतान लड़कों के साथ ही क्यों खेलती हैं? मैं घर जाता हूँ। मम्मी से, नौकरानी से लड़ता हूँ। जिद करता और तुनकता हूँ। मम्मी की साड़ी पकड़े-पकड़े इधर से उधर घूमता हूँ। उसे चिपककर सोता हूँ। मम्मी से मुझे नफरत है। मैं उसे मुक्के मारता हूँ।’ छोटे-छोटे चुस्त एवं सटीक वाक्यों से पाठक को बच्चे की आयु, उसके परिवेश एवं मानसिकता का पता चलता है और वह एकाएक बच्चे की संवेदना से जुड़ जाता है। लघुकथा में कथ्य विकास के लिए अनावश्यक विवरणों के लिए कोई स्थान नहीं होता। राजेन्द्र  यादव ‘अपने पार’ में नपे-तुले शब्दों से कथ्य-विकास करते हैं: ‘साल-दो साल में हम लोग पापा से मिलने जाते हैं। हर बार उनके साथ एक औरत होती है… मुझे तुम्हारे गले में हाथ डालनेवाले अंकल नहीं, पापा चाहिए।’ बच्चे की सोच के साथ-साथ इन वाक्यों से पाठक को पता चल जाता है कि पति-पत्नी में तलाक़ हो चुका है। बच्चे के पिता ने दूसरी शादी कर ली है लड़के की माँ का भी कोई पुरुष मित्र है। मित्रता किस हद तक है, इसकी ओर संकेत ‘गले में हाथ डालने वाले अंकल’ के माध्यम से किया गया है। चरमोत्कर्ष पर ही लघुकथा का अंत होना चाहिए। कथ्य उद्घाटन के साथ लघुकथा समाप्त होती है। लघुकथा में अंत का बहुत महत्व है। अंत अतिरिक्त परिश्रम ओर लेखकीय कौशल की माँग करता है। चरमात्कर्ष के साथ कथा का अंत देखें: वापस आकर मैं पाँव पटकता हूँ, गिलास फोड़ता हूँ, बाल नोंचता हूँ। मम्मी कहती हैं, "बिलकुल अपने पापा की तरह कर रहा है।" फिर वह रोने लगती हैं, पलंग पर लेटकर। उसे रोता देखकर मैं भी रोने लगता हूँ। उसे चूमता हूँ। उससे लिपटता हूँ, उसकी छातियों पर लदकर, उसके पल्ले से आँखें पोंछता हूँ। मम्मी मुझे अजीब-अजीब आँखों से देखती हैं। लगता है, वह मुझे पहचानती नहीं हैं। ध्यान से देखकर कुछ याद करने की कोशिश कर रही हैं। पता नहीं, मम्मी को देखते-देखते मुझे क्या हो जाता है। लगने लगता है जैसे मैं, मैं नहीं पापा हूँ… फिर हम दोनों चिपककर सो जाते हैं… " अंत बहुत ही मर्मस्पर्शी, अभिव्यंजनात्मक एवं सांकेतिक होने के कारण लघुकथा बहुत ही प्रभावशाली हो गई है।

एक श्रेष्ठ लघुकथा में एक भी शब्द फ़ालतू नहीं होता। यदि उसमें से एक भी वाक्य कम कर दिया जाए तो वह अधूरी लगने लगती है। ‘अपने पार’ इस दृष्टि से भी प्रथम कोटि की लघुकथा है। इसी प्रकार ‘प्रेमपत्र’ में भी राजेन्द्र  यादव का रचना-कौशल देखने लायक़ है। हालाँकि इस लघुकथा का कथ्य ‘अपने पार’ की तुलना में आम पाठक को शायद उतना प्रभावित न कर पाए। ‘अपने पार’ की व्याख्या से स्पष्ट है कि राजेन्द्र यादव लघुकथा की धड़कन से भली-भाँति वाकिफ़ हैं, लघुकथा को आवश्यक डैप्थ देने में सक्षम हैं।

अब उनकी ‘सिद्धांत’ लघुकथा देखें: ‘लड़के का पिता लड़की वालों से पाँच लाख की माँग करता है और माँग पूरी न होने पर बारात वापस ले जाने की धमकी देता है। लड़की का पिता गिड़गिड़ाता हैं। लड़की बीच में हस्तक्षेप पर झूठे-लालची लोगों के यहाँ जाने से इन्कार कर देती है और लड़के के पिता को ख़ूखूब खरी-खरी सुनाती है।’ लघुकथा लड़की के पिता के इन शब्दों के साथ समाप्त हो जाती है: "बेटी का जन्म तो आपके घर भी हुआ था समधी जी, मगर आपने उसे जनमते ही मार डाला। अब आप हम सबको इसीलिए तो जलील करने की हिम्मत कर रहे हैं कि हमने अपनी बेटी को आपकी तरह क्यों नहीं मारा? उस बेटी का प्रेत आपसे रोज एक नई बेटी का खून माँगता है।"

राजेन्द्र  यादव ने ‘सिद्धांत’ लघुकथा संवाद-शैली में लिखी है। लघुकथा संवाद से शुरू होकर संवाद में ही समाप्त हो जाती है। यह शैली लघुकथा में सशक्त रूप से उभरकर सामने आई है। इस शैली में डॉ. सतीश दुबे एवं रमेश बतरा ने उत्कृष्ट लघुकथाएँ लिखी हैं। दो प्रमुख कारणों से यह लघुकथा प्रभावहीन होकर रह गई है। एक तो विषय पुराना है। इस तरह की घटनाएँ फ़िल्मों एवं दूरदर्शन धारावाहिकों में अकसर देखने को मिलती हैं। लघुकथा जगत् में इस विषय पर पहले ही काफ़ी सशक्त लघुकथाएँ लिखी जा चुकी हैं। दूसरे, कथ्य विकास में उलझाव है, संवाद-शैली में लेखक को संवादों के दौरान ही कथ्य का विकास करना होता है। ‘सिद्धांत’ में कथ्य विकास पिता एवं पुत्री के संवादों के बीच गड्डमड्ड हो गया है। अकसर लघुकथा की शुरुआत द्वंद्व से होती है और चरमोत्कर्ष पर अंत। इस लघुकथा में बेटी का हस्तक्षेप कर विवाह के लिए मना करना चरमोत्कर्ष की स्थिति है। इसके बाद भी दोनों पिताओं के मध्य संवाद जारी रहते हैं। अंत में लड़केवालों द्वारा अपनी बेटी को जनमते ही मार देने की बात उजागर होती है। इससे लघुकथा का गठन कमज़ोर हुआ है।

‘सजा या सम्मान’ में राजेन्द्र  यादव तीन कालखंडों को भिन्न-भिन्न स्थितियों का ब्योरा देकर अपनी बात कहने का प्रयास करते हैं। यह लघुकथा भी पाठक पर अपना प्रभाव छोड़ने में सफल नहीं होती। कारणों की पड़ताल की जाए तो लघुकथा में घटनास्थल क्या कुछ क्षणों अथवा घंटों का ही होना चाहिए, आदि प्रश्न उठ खड़े होते हैं। भगीरथ लिखते हैं: ‘नए लेखक कई बार कंटेंट एवं फ़ॉर्म, दोनोें ही स्तर पर अस्पष्ट होते थे। कोई लाइट-हाउस था नहीं, जहाँ से ये लेखक गाइडेंस ले सकें। उन्हें तो स्थापित साहित्यकारों की लघुकथा के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ने की प्रवृत्ति से लोहा लेना पड़ा और उन्होंने स्वयं ही रास्ता खोजना प्रारंभ किया। यह प्रयास कोलंबस की यात्रा का-सा था। अतः प्रयोग और लगातार प्रयोग ही इसके स्वरूप को निश्चिंतता दे सकते थे। कंटेंट और फ़ॉर्म के निरंतर प्रयोगों ने ही लघुकथा लेखन को ज़िंदा रखा, उसका विकास किया और उसे लघुकथा का स्वरूप दिया।’ कालखंड की बात उठाकर यहाँ उद्देश्य किसी विवाद को खड़ा करना नहीं है, इसलिए भगीरथ की टिप्पणी को उद्धृत करना पड़ा। लघुकथा लेखकों के लंबे प्रयासों के बाद अनेक श्रेष्ठ लघुकथाएँ प्रकाश में आई हैं। इन श्रेष्ठ लघुकथाओं के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि लघुकथा के लिए कुछ क्षणों, घंटों अथवा एक-दो दिनों का घटना काल ‘आदर्श’ होता है और इससे लघुकथा का ‘नावक के तीर’ वाला फ़ॉर्म बना रहता है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि लघुकथा में वर्षों की बात को उठाया ही नहीं जा सकता। जहाँ आवश्यक हो, वहाँ फ़्लैश बैक अथवा सोच के माध्यम से वर्षों की बात को संप्रेषित किया जा सकता हैै। जिन लघुकथाओं में काल-अवधि कई घटनाओं एवं ब्योरों के माध्यम से कथ्य में संप्रेषित की जाती है, वहाँ लघुकथा नीरस, उद्देश्यहीन और कहानी का सार मालूम होने लगती है। राजेन्द्र  यादव की लघुकथा ‘सजा या सम्मान’ इसी दोष की शिकार हो गई है। ‘अपने पार’ का लेखक अपनी अन्य लघुकथाओं में अपने भीतर के कहानीकार से मुक्त नहीं हो पाया है (उनके स्तर पर इस तरह का प्रयास दिखाई भी नहीं देता, उन्होंने यह रचनाएँ लघुकथा मानकर लिखी होंगी, इसमें भी संदेह है)। फलस्वरूप ‘आस्था’ जैसी रचनाओं ने जन्म लिया है, जिन्हें लघुकथा की श्रेणी में रखना मुश्किल लगता है।

उपन्यास-कहानी में तरह-तरह के वर्णन, वार्तालाप एवं अन्य उपायों से पाठक को बाँधा जा सकता है, परंतु लघुकथा में इसकी गुंजाइश नहीं होती। आपको अत्यधिक कुशल होना चाहिए, अर्थपूर्ण होना चाहिए। आप आठ-दस पंक्तियों में भी अपनी बात कह सकते हैं, परंतु आपको संक्षिप्तता, सामग्री की  सान्द्रता का जो अत्यावश्यक हो, उसे चुन लेने में पारंगत होना चाहिए। यदि किसी लघुकथा के कथ्य का पात्र के चश्में से कोई सम्बन्ध नहीं है ,तो उसका उल्लेख व्यर्थ है। जहाँ एक वाक्य से काम चल सकता है, वहाँ एक अवतरण का प्रयोग लघुकथा के प्रभाव को कम करता है। राजेन्द्र  यादव की लघुकथाओं में इस प्रकार का अनावश्यक वर्णन बहुत अधिक दिखाई देता है, यथा: गदबदी भी मारवाड़ी है, कुछ समय बाद फूलेगी और पूरी सेठानी बन जाएगी। आखिर गट्ठे और कैर-सांगरी की सब्जी, पापड़ कुछ तो असर दिखाएँगे ही। गहरी कत्थई कमीज, चेन और हाथ में सुनहरी घड़ी साथ में चमकदार स्टील का टिफिन, लोटा, गिलास, सोचा, तिरुपति की तरह क्या वहाँ से भी बालों का निर्यात होता है, रानी सती तो बहुत प्रसिद्ध हैं (मरण कामना) इस लघुकथा में राजेन्द्र  यादव ने पारंपरिक रूढ़ियों और धार्मिक अंधविश्वासों पर चोट की है। लघुकथा का कथ्य कहीं से भी गदबदी...सेठानी....गट्ठे और कैर-सांगरी की सब्जी से प्रभावित नहीं होता, इस उल्लेख की लघुकथा में ज़रूरत नहीं थी।

झूठ समाज की देन है। समाज के साथ बच्चे का पहला परिचय माँ-बाप के रूप में होता है। मुझे नहीं मालूम, मैंने पहला झूठ कब बोला था। आज भी नहीं मालूम, आख़िरी झूठ कौन-सा था। हाँ, याद आया, ढीले-ढीले ओर भद्दे-से कपड़े पहने एक ऊल-जलूल लद्धड़ बूढ़े-से सज्जन से मैंने बड़ी सादगी से कहा था, "क्या बात है, आज तो बड़े चुस्त-दुरुस्त, एकदम नौजवान बने घूम रहे हो…" बस, वे इतने ख़ुश हुए कि खिल गए। और तब सचमुच उनकी उम्र दस साल कम हो गई। अब चाहे तो कह लीजिए, यह झूठ नहीं था। मैं तो सिर्फ़ सच को बचा गया था? लेकिन पहले झूठों में से जो याद आ रहा है, वह इतना प्रसन्नदायक नहीं है। कभी वह उलटी गांधी-टोपी जैसे खरल में कुछ कूटते-पीसते रहते, उसमें अर्क और सत्त मिलाते जाते। कभी दूसरी तरफ हवा में घास फैलाते हुए तम्बाकू में शीरा और न जाने क्या-क्या मसलकर, छोटे-बड़े पिरामिड बनाकर रखते जाते। उन्हें वे पिंडी कहते। छोटी पिंडी एक आने की, बड़ी आठ आने या एक रुपये की। जहाँ तक याद है, उनके परिवार में शायद कोई नहीं था। उस समय का एक आना, आज के रुपये जितना तो था ही। विश्वास था कि महाराज के आने से पहले दो-चार पिंडियाँ तो बिक ही जाएगी और इन इकन्नियों में पता भी नहीं चलेगा। किसी बहाने उठने की भी हिम्मत नहीं पड़ रही थी।’ (पहला झूठ)

लघुकथा की शुरुआत नैरेटर के चिंतन से होती है। फिर वह एक घटना का वर्णन करता है, जिसमें वह एक ऊल-जलूल लद्धड़ बूढ़े की झूठ-मूठ तारीफ़ करता है। इस घटना का लघुकथा की आगेवाली मूल घटना से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह घटना रचना में पैबंद-सी मालूम होती है। यदि इसे लघुकथा से निकाल दिया जाता तो वह अधिक कांपेक्ट हो जाती। इसी प्रकार अन्य अनेक छोटे-बड़े वाक्य अनावश्यक रूप से लघुकथा में मौजूद हैं। इन कमियों के बावजूद राजेन्द्र  यादव की यह लघुकथा ‘अपने पार’ के बाद सबसे अधिक प्रभावित करती है। पाठक ‘मैं’ की धड़कन महसूस करता चलता है, जो अपने पहले झूठ के कारण शांति की पीठ पर पड़ी हर संटी को आज भी अपने शरीर पर महसूस करता है।

‘बहुत धीमे से अंदर आने को कहा। वे सामने ही बैठी थीं। पढ़ने का चश्मा लगाए गौर से कोई कागज देख रही थीं। अँधेरे से उजाले में आ जानेवाले व्यक्ति की तरह सामनेवाले को पहचानने की कोशिश की। मैं पीछे था। इसलिए हाथ में लदी मालाएँ उन्होंने नहीं देखीं। दोनों हाथों में चश्मे की कमानियाँ पकड़कर सामने किए हुए पर्स से पचास का नोट निकालकर दिया। देखो, अपनी सोनी शादी करके आई है। चपरासी ने भी परिचय से मुस्कराकर नमस्कार नमस्कार किया। वे चश्मे की कमानियों को यों ही खोलती बंद करती रहीं। फिर मुस्कराकर सोनी से पूछा, "तुम्हारे पापा-मम्मी की अब क्या प्रतिक्रिया होगी? वहाँ जाओगी?” 

"एकदम तो नहीं… हिम्मत नहीं पड़ रही। गुस्सा कुछ ठंडा हो जाए तो सोचेंगे…" सोनी बोली। फिर वे देर तक न जाने क्या-क्या बातें करती रहीं। मैं प्रसन्न और विनम्र दर्शक की तरह सुनता रहा। शायद उन्होंने कहा था, "अरे, ये गुस्सा-वुस्सा कोई रहनेवाला थोड़े ही है। कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा। कहीं मांस से नाखून अलग हुए हैं।… लेकिन वाकई बड़ी हिम्मत कर डाली सोनी तुमने......वह तो करनी ही थी, आखिर अब कौन इन बातों की परवाह करता है? पच्चीस-तीस साल पहले ज़रूर.....” चश्मे की दोनों कमानियाँ एक मुट्ठी में पकड़े वे बोलीं....।(हनीमून)

‘हनीमून’ में कहानी-सा फैलाव स्पष्ट दिखाई देता है। यदि राजेन्द्र  यादव इसे लघुकथा की श्रेणी में मानते हैं ,तो उक्त अनावश्यक वाक्यों, संवादों की रचना में कोई जगह नहीं होनी चाहिए, क्योंकि कथा में चरमोत्कर्ष के साथ कथ्य उद्घाटन वहाँ होता है, जहाँ पचासेक वर्ष की कुमारी माधुरी अरोड़ा नवदंपती को हनीमून मनाने हेतु चहल जाने का सुझाव देती हैं और फिर तन्मय होकर वहाँ के प्राकृतिक दृश्यों एवं मनाए जानेवाले हनीमून का चित्र उनके सम्मुख खींचती हैं। रचना में संवादों के माध्यम से बताया गया है कि सोनी और नैरेटर (मैं) की शादी सोनी के माता-पिता की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ हुई है। यहाँ इस बात का रचना के कथ्य से कोई संबंध नहीं है। यदि कथाकार इस ओर संकेत करना चाहता है कि कुमारी अरोड़ा के ज़माने में इतनी हिम्मत करना मुश्किल था, तो उसे संक्षेप में कहा जा सकता था।

‘वे उस मूर्ति के सामने खड़े थे। मूर्ति स्वयं उनकी अपनी थी। स्वयं अपने जीते-जी अपनी मूर्ति लगाई जाए और उसका अनावरण भी वे ही करें, यह बात कहीं भीतर उन्हें अनुचित लग रही थी, मगर फिर मन को समझा लिया कि दुनिया के अनेक देशों में ऐसी परम्पराएँ रही हैं। दक्षिण भारत में, विशेषकर तमिलनाडु में तो अनेक नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं की मूर्तियाँ उनके जीवन काल में ही लगीं और स्वयं उन्होंने उन प्रतिमाओं का अनावरण किया। इसमें अशोभनीय कुछ भी नहीं है।’ (अपनी ही मूर्ति)

लघुकथा में एक ही वाक्य के दोहराव के लिए कोई स्थान नहीं रहता। ‘अपनी ही मूर्ति’ में पाठक को प्रथम दो वाक्यों के बग़ैर भी पता चल जाता है कि ‘वे’ अपनी मूर्ति के सम्मुख खड़े हैं। तीसरे अवतरण में ‘उनकी’ अपनी जीते-जी अपनी मूर्ति अनावरण करने सम्बन्धी जो सोच तर्क प्रस्तुत किया गया है, उसकी कोई आवश्यकता नहीं थी। अनावश्यक रूप से विस्तार हुआ है, क्योंकि ‘उनकी’ सोच को कथाकार रचना के प्रारंभ में ही बेनक़ाब कर देता है: ‘उनके इशारे पर बड़े-बड़े पूँजीपतियों ने करोड़ों रुपए इस मूर्ति-निधि में दिए थे। अगर वे स्वयं इस मूर्ति में इतनी दिलचस्पी न लेते, तो सचमुच यह प्रतिमा इतनी भव्य नहीं बन सकती थी। वे प्रसन्न थे।’

‘अपने पार’ जैसी उत्कृष्ट लघुकथा का लेखक अपनी दूसरी लघुकथाओं में वैसा प्रभाव नहीं छोड़ पाता। लघुकथा का वर्तमान स्वरूप कुछ जुझारू लघुकथा लेखकों के संघर्ष एवं लम्बी सृजन यात्रा के फलस्वरूप बन पाया है। लघुकथा की ओर आकृष्ट स्थापित साहित्यकार लघुकथा को गम्भीरता से लेंगे तो विधा के लिये शुभ होगा।
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