क़ब्रिस्तान की सैर

15-07-2019

क़ब्रिस्तान की सैर

विनोद महर्षि 'अप्रिय'

एक रोज़ में ज़िंदगी से कुछ तंग था। समाज के माहौल से परेशान सा होकर शाम के खाने के बाद घूमने निकल पड़ा। कुछ सोचते-सोचते, शहर की गलियों से होकर निकल रहा था। रात के कोई दस बजे होंगे। चलते-चलते एक घर से बर्तनों के फेंकने जैसी आवाज़ आई तो रुक गया। सोचा कि रुक कर कुछ देखूँ। लेकिन किसी के घर में झाँकना ग़लत है सोच कर रुक गया। कान लगाकर सुनने लगा।

एक शराबी अपनी पत्नी से लड़ाई कर रहा था। 

“कलमुँही ऐसी रोटी बनाती है। यह देख आधी पकी हुई रोटी है।” 

“तो क्या करूँ तुम्हीं बताओ? आजम दादा से पाँच रुपये के कोयले लाई थी; अब इतनी सी अंगीठी में क्या-क्या पकाऊँ? और हम तो रोज़ ही कच्ची ही खाते हैं। छोटे बच्चे भी ऐसी रोटी खाते हैं, वो नहीं दिखता तुमको? हर रोज़ सौ रुपये का बेवड़ा पीकर आ जाते हो। वो पैसे घर में दिया करो।” क्रोध में पत्नी कह रही थी।

“चुप! कुलटा, जबान लड़ाती है। मैं कम कमाता हूँ तो तू जबान लड़ाएगी क्या मुझसे?”

इसके बाद एक और ज़ोर से बर्तन फेंकने की आवाज़ आई, और साथ ही औरत के रोने की भी। बच्चों के चीखने की आवाज़ भी आने लगी। शायद वो शराब के नशे में पत्नी को पीट रहा था। मुझसे ज़्यादा नहीं सुना गया और मैं आगे बढ़ गया। अभी थोड़ा सा चला था कि एक सज्जन की आवाज़ सुनाई दी। शायद फ़ोन पर बात कर रहा था।

“देखिये मैं कुछ नहीं सुनना चाहता। आपको चुनाव के समय बैग भरकर नोट दिए थे। अब आपको जितनी ज़रूरत है और ले लीजिए। लेकिन मेरे बेटे का नाम अख़बार में आया ना... तो सोच लेना मैं आपकी पार्टी के सभी कच्चे चिट्ठे खोल दूँगा।” 
…..
“तो क्या हो गया? जवान खून था गरमा गया। दे दो दो-चार लाख और करो मुँह बन्द।”
…..
“हाँ तो जाँच अधिकारी के घर भी मिठाई भेज दो। क्या है उसमें!”

अब तो मस्तिष्क घूम गया। यह तो सारे सिस्टम में ही भ्र्ष्टाचार भरा हुआ है। सोचते-सोचते आगे चलने लगा। थोड़ा सा आगे बढ़ा था कि एक नौजवान अपने घर के आगे खड़ा था। अंदर से एक औरत उसे बार-बार बुला रही थी, समझा रही थी और वो अभद्र भाषा में बके जा रहा था। वो औरत शायद उसकी माँ थी। और वो युवक नशे में धुत था। इस वय में इस तरह नशे का आदी होना और ऐसी अभद्र भाषा का इस्तेमाल देखकर बात याद आई जो अक्सर हम कहते हैं कि यह युवा देश का भविष्य हैं। जबकि हक़ीक़त तो यह है कि भविष्य शराब की बोतल में डूबा हुआ है। मन में बहुत ग्लानि हुई। मेरे स्वयं के विचार अब शून्य हो गए और जो आँखों से देख रहा था, सुन रहा था उसके बारे में सोचने लगा।

अगले ही पल में मैं एक समाज सेवक ही तरह सोचने लगा। यह वाक़ये जो अक्सर हम समाज में देखते हैं सुनते हैं, वास्तव में असली ज़हर यह है लेकिन इनकी भी जड़ें कहीं न कहीं सिस्टम तक जाती हैं। चाहे शराब हो, रिश्वत हो, या फिर बेरोज़गारी। सब इसी सिस्टम की शाखाएँ हैं।

चलते-चलते और सोचते-सोचते मुझे पता नहीं चला कि कब मैं शहर के बाहर क़ब्रिस्तान तक पहुँच गया। बाहर कुत्ते भौंकने लगे। जैसे कि कह रहे हों कि तुम यहाँ क्या करने आये हो? यहाँ तो सिर्फ़ संसार से विमुख इंसान किसी झूठी हमदर्दी के कंधे पर आता है। तुम अपने पैरों पर चलकर किसलिये आये हो? कहीं जायदाद के लिए अपने पिताजी की क़ब्र पर पत्थर लगाने तो नहीं आये हो ना?

मैं सलीक़े से पास पहुँचा तो उन्होंने भौंकना बन्द कर दिया। मैंने जैसे ही क़ब्रिस्तान में क़दम रखा, एक भूचाल सा आ गया। अचानक हलचल सी मच गई। एक तेज़ हवा का झोंका आया और अपने साथ धूल उड़ा कर चला गया। फिर एक मद भरी हँसी सुनाई दी। एक बारगी मैं डर गया। क़ब्रिस्तान के बारे में बहुत सी बातें सुन रखी थीं। लेकिन आज अनजाने में ही अंदर आ गया था। मैं बहुत डर गया, वापिस भागकर आया तो देखा कि गेट पर तीन-चार कुत्ते विकराल रूप में भौंक रहे थे। मुझे बाहर निकलने का रास्ता नहीं दिया उन्होंने। जैसे कि कह रहे हों कि यहाँ तक आये हो तो अंदर सब कुछ देखो... महसूस करो। वरना बाहर नहीं जाने देंगे।

मैंने कोशिश की बाहर निकलने की लेकिन एक कुत्ते ने मेरी तरफ़ गुर्राकर झपटा मारा। मारे भय के मैं क़ब्रिस्तान के अंदर भागा और एकदम बीच में आ गया। अंदर का दृश्य तो और भी विकराल था।

चारों तरफ़ बस क़ब्रें ही क़ब्रें थीं। कुछ टूटी-फूटी तो कुछ एकदम चकाचक, कुछ पर नाम अंकित थे तो कुछ बिना ढकी हुई थीं। मैं डरने की बजाय उत्सुक हो गया। आगे देखने लगा। जैसे सोचा और सुना था वैसा तो नहीं होता क़ब्रिस्तान...। बाहर बाज़ार की गली से ज़्यादा सुकून इस क़ब्रिस्तान में लगा मुझे। वैसे यह मेरा वहम भी हो सकता है।

अचानक एक लंबा चौड़ा व्यक्ति मेरे पास खड़ा था, “क्या देख रहे हो?” उसने पूछा… मैं एकदम से डर गया।

“अरे भाई यहाँ क्यों आये हो? क्या देख रहे हो?” उसने फिर कहा।

“जी कुछ नहीं... आ... आ... आप कौन?”

“डरो मत, मुझे बताओ किसकी क़ब्र ढूँढ़ रहे हो? मैं तुम्हारी मदद कर देता हूँ।”

“तुम सबकी क़ब्रें जानते हो?”

“हाँ, पिछले तीस साल से हूँ इस क़ब्रिस्तान में। सब जानता हूँ।”

“ठीक है चलो फिर, देखते हैं तुम कितना जानते हो।”

सबसे पहले मैंने एक चकाचक नई बनी क़ब्र के बारे में पूछा, “यह किसकी है?”
 
“यह एक नेता की है। सुना है इसके ऊपर छप्पर भी लगेगा ताकि नेताजी का धूप बरसात से बचाव हो सके।”

“हम्म्म….”

आगे बढ़े तो एक बिल्कुल जर्जर क़ब्र दिखी। मैंने पूछा, “भाई यह किसकी है? लगता है दफ़नाने के बाद किसीने इसको सँभाला भी नहीं।”

“हाँ... यह एक समाजसेवक की है। बाज़ार में साम्प्रदायिक दंगे में मारा गया बेचारा और चंदे के पैसे से दफ़नाया गया। अब सँभालने वाला कौन है!”

आगे एक क़ब्र पर फूल रखा था। मैंने कहा, “लगता है यह किसी आशिक़ की क़ब्र है।”

“नहीं, यह एक शहीद की क़ब्र है, अभी दो दिन पहले ही शहीद हुआ था।”

“इसका मतलब शहीदों का तो सम्मान होता है।”

“नहीं! बस दो-चार दिन... कुछ नेता आते हैं, फूल चढ़ाते हैं। फिर कोई सुध नहीं लेता।”

“हम्म... सही है; शहीदों के परिवार की ही सुध नहीं लेता कोई तो क़ब्र की भला कौन लेगा,” मैंने कहा।

आगे बढ़ते गए ऐसे ही एक-एक क़ब्र के बारे में वो मुझे बताता गया। मेरी उत्सुकता बढ़ती गई और मुझे जवाब भी मिलता गया। मन के एक-एक प्रश्न हर एक क़ब्र पर हल हो रहे थे।

आगे चला तो एक अनोखी क़ब्र देखी जो चार भाग में बँटी हुई थी। चारों भागों में अलग-अलग तरह के पत्थर लगे थे।

“वाह…! इसका भाग्य कितना अच्छा है। कितनी अच्छी सजाई गई है,” मैंने कहा।

“नहीं... इसकी कहानी भी अलग है। यह एक अमीर वृद्ध की क़ब्र है, जिसके चार बेटे हैं। अंतिम साँस तो बेचारे ने वृद्धाश्रम में ली। लेकिन मौत के दूसरे दिन ही चारों बेटे आ धमके। और हर चीज़ का बँटवारा भी कर लिया। लोगों को दिखाने के लिए मुर्दे की क़ब्र को भी चार भागों में बाँट दिया।”


मैंने एक ठंडी साँस ली, सच है यह तो ऐसा ही होता है आजकल। अब मैं आगे बढ़ा तो एक छोटी क़ब्र दिखी। जिस पर बहुत से पुष्प थे और कैंडल भी। 

मुझे अजीब सा लगा। 

मैंने पूछा, “यार इस क़ब्र की क्या कहानी है?”

वो भावुक होकर बोला, “बाबूजी, इस दुनिया से यक़ीन ही उठ गया है। इस क़ब्रिस्तान में आकर सुकून मिला है मुझे, वरना दुनिया में जब तक था तब तक आँसू ही बहते थे।”

मैंने पूछा, “भाई ऐसी क्या बात है? बताओ इस छोटी क़ब्र का राज़।”

“बाबूजी कुछ दिन पहले एक आठ साल की बच्ची का कुछ दरिंदों ने मिलकर बलात्कार किया और उसे मार डाला। समाज के सभ्य इंसानों ने जुलूस निकाला। रोज़ कोई ना कोई यहाँ आता कैंडल जलाता और पुष्प अर्पित करता। बड़े-बड़े अख़बारों में मुख्य पृष्ठ पर भी ख़ूब छपा। बड़ी हस्तियाँ कुछ दिन ब्लॉग, ट्विटर और फ़ेसबुक पर हमदर्दी से लिखने लगे । बाज़ारों में कैंडल मार्च भी हुए। नई कमेटी बनाने की भी बातें चलीं। बस दस दिन यह झमेला चला उसके बाद कोई इधर नहीं दिखा।”

सच में मैं भी भावुक हो गया। “यार हम इतने गिर गए हैं, समाज के चश्मे से हमें दिखाई नहीं देता है, जो आज इस क़ब्रिस्तान में आकर दिखा। हम यही सब तो करते हैं। लेकिन वास्तविकता से कोसों दूर हमने कभी सच्चाई के लिए नहीं बल्कि स्वार्थ के लिए ही कुछ किया है।

“आज जाना कि असली मंदिर तो यह क़ब्रिस्तान है। जहाँ इंसान कुछ माँगता नहीं है बस यहाँ आकर पश्चाताप ज़रूर करता है। भले ही चंद पलों के लिए ही सही लेकिन सोचता तो है। बाहर की चकाचौंध वाली दुनिया में तो बस अपने दिखावे के लिए, अपनी साख के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। कहीं रिश्तों का खून होता है तो कहीं लाशों की सीढ़ियाँ बनाते हैं। कहीं इंसानियत को शर्मसार करते हैं तो कहीं किसी की लाचारी का फ़ायदा उठाते हैं। यही एक जगह ऐसी है जहाँ अपने किये कर्म की असलियत नज़र आने लगती है।

“सच में घर से निकल कर आज जो कुछ देखा-सुना वो अद्भुत था। अकल्पनीय था। समाज के अंदर से तो वो आईना साफ़ नहीं दिखाता है, लेकिन यह आईना सब कुछ स्पष्ट दिखा गया। बाहर का हिंदुस्तान तो क़ब्रिस्तान बन चुका है और आज क़ब्रिस्तान में हिंदुस्तान के दर्शन कर लिए।”

चलते चलते वापिस गेट पर पहुँच गए। मैं उस भले आदमी का शुक्रिया करने लगा और पूछा कि आप यहाँ कैसे रहते हो? क्या आपको डर नहीं लगता?

“नहीं बाबूजी, पहले लगता था… जब ज़िंदा था। अब तो रात भर इस क़ब्रिस्तान की सैर करता हूँ और ख़ुश रहता हूँ।”

मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। मुझे चक्कर आ गया। इतनी देर मैं एक भूत के साथ था। 

उसने सँभालते हुए कहा बाबूजी, “आजकल इंसानों के जितने डरावने भूत नहीं हैं।”

मैं वहीं गिर गया। 

अचानक बीवी की तेज़ आवाज़ से आँख खुली तो पता चला कि घर पर सो रहा हूँ। बाहर रात बीत चुकी थी, तेज़ धूप निकली हुई है और पक्षियों के चहकने की आवाज़ आ रही है।

ओह!! मैं तो सपना देख रहा था। लेकिन इस भयानक सपने ने मुझे बहुत ही अच्छे दर्शन कराए। समाज का वो रूप दिखाया जो शायद हम देख कर भी अनदेखा कर देते हैं।

1 Comments

  • 20 Jul, 2019 08:40 AM

    Bahut hi sundar tareeke se apne samaaj ke on pehlouon ko darshaya hai jo hum dekhte hai lekin nazarandaaz kar dete hai.

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