प्रार्थना-समय: अपने समय के सवालों से मुठभेड़ करती कहानियाँ

15-02-2020

प्रार्थना-समय: अपने समय के सवालों से मुठभेड़ करती कहानियाँ

गोविन्द सेन 

किताब : प्रार्थना-समय [कहानी संग्रह] 
लेखक : प्रदीप जिलवाने
प्रकाशक : सेतु प्रकाशन, दिल्ली-110092
मूल्य: 148 / -

आज का यथार्थ जटिल और बहुस्तरीय है। चर्चित युवा कवि, उपन्यासकार प्रदीप जिलवाने का पहला कहानी संग्रह 'प्रार्थना-समय' नवीन कथा-शिल्प में इस जटिल और बहुस्तरीय यथार्थ को सलीक़े से खोलता है। मनुष्य के दैनिक संघर्षों और दंद्वों की परतों को प्रदीप ने एक कलात्मक सादगी के ज़रिए कहानी में स्वाभाविक ढंग से पिरोया है।

इन कहानियों में स्थानीयता के साथ एक व्यापकता भी है। लगभग सभी कहानियों में प्रदीप जी ने रोचकता और सामाजिक सरोकारों पर विशेष बल दिया है। लेखकीय हस्तक्षेप के ज़रिए प्रदीप कई भटकती कहानियों को पटरी पर लाकर उसे वांछित मोड़ देते हैं। अपने कथ्य की प्रभावी बनाने के लिए एकाधिक कहानियों में लोककथा की फंतासी का इस्तेमाल भी किया गया है। कोमल और महीन भावनाओं को वास्तविक और कल्पित पक्षियों के ज़रिए भी प्रकट करने की सफल कोशिश की गई है। दमित-पीड़ित पात्रों के दुखों को प्रदीप ने ख़ासतौर पर चित्रित किया है। इन कहानियों में लोक भाषा निमाड़ी की ख़ुशबू भी बिखरी है।

पहली कहानी 'बानवे के बाद' गंगा-जमुनी तहज़ीब के धीरे-धीरे छिन्न-भिन्न होने के कारक तत्वों की क्रमशः पड़ताल करती है। यह कहानी पाँच उप शीर्षकों-बहत्तर के बाद, बयासी के बाद, बानवे के बाद, दो हज़ार दो के बाद, दो हज़ार बारह के बाद यानी हाल-फ़िलहाल-में बँटी है। पाँचों सार्थक उप शीर्षक कथा प्रवाह को आगे बढ़ाते हुए चरमोत्कर्ष तक ले जाते हैं। पाँच दशकों में फैली यह कहानी एक शिक्षक मिर्ज़ा साहब के टेमनीहाँई गाँव में बसने और आख़िर में वहाँ से उनके उखड़ने की मार्मिक दास्तान है। कहानी की भाषा की सादगी और प्रवाह प्रेमचंद की याद दिलाती है। यह कहानी ही नहीं, संग्रह की अन्य कहानियाँ भी यह सिद्ध करती है कि समय कितना ही जटिल क्यों न हो, उसे सरलता और सादगी से व्यक्त किया जा सकता है।

'प्रार्थना-समय' कहानी भी सांप्रदायिक कट्टरता और क्रूरता की भयावहता को बख़ूबी व्यक्त करती है। कथानायक मनीष और असद के साथ इंदौर में एक कमरे में रहकर पढ़ते था। उनमें मज़हब के कारण कोई भेद नहीं था। असद कथानायक और मनीष के साथ मंदिर चला जाता था। गणेश विसर्जन के समय झूमने-नाचने लग जाता था और उन्हें भी नचवाता था। दशहरा मैदान पर ख़ुशी-ख़ुशी तिलक लगवाता था। पर सात साल बाद आने वाली ख़बर कथानायक को विचलित कर देती है। ख़बर के मुताबिक़ एक हिंदूवादी नेता की हत्या के ज़ुर्म में संदेह के आधार पर एटीएस द्वारा असद बेग मिर्ज़ा नाम के एक युवक को गिरफ़्तार कर लेती है। वह विकल मन से प्रार्थना करता है कि यह असद, उनका रूम पार्टनर असद न हो। दरअसल यह प्रार्थना सांप्रदायिक सौहाद्र के बने रहने के लिए की गई आज के समय की एक सार्थक प्रार्थना है।


 'उधेड़बुन' में बेरोज़गार और रोज़गार की अनिश्चितता में फँसे एक युवक के मन की उथल-पुथल का स्वाभाविक और सजीव चित्रण है। कथानायक पर अपनी पत्नी और एक बच्ची की ज़िम्मेदारी है। वह मामूली-से वेतन पर कंप्यूटर ऑपरेटर है। जी-तोड़ मेहनत के बावजूद मालिक से दस तरह की बातें सुननी पड़ती है। नए लड़के दो-दो हज़ार में नौकरी करने को तैयार हैं। फिर मालिक उसे साढ़े तीन हज़ार क्यों दे? उसकी नौकरी छूट जाती है। वह पत्नी के सवालों से डरता है और अपनी नौकरी छूटने के बारे में नहीं बताना चाहता । वह जानता है कि यह देश सबसे ज़्यादा सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स का देश नहीं चिंताओं का देश है। बड़े-बड़े डिग्रीधारी छोटी-छोटी नौकरी करने पर मजबूर हैं। कहानी के उपशीर्षक काव्यात्मक, सार्थक और कहानी को आगे बढ़ाते हैं।

'चिड़िया रानी की गल्प कथा का सत्य...' कहानी में एक फंतासी बुनी गई है। लड़की की दोस्ती एक चिड़िया से हो जाती है। कोमल, अबोध और सूक्ष्म भावनाओं को इस फंतासी में चिड़िया और लड़की के संवाद के ज़रिए कुशलता से प्रकट किया गया है। लड़की की गर्भवती माँ से लड़के होने की उम्मीद की जाती है पर होती लड़की ही है। स्त्री पर पड़ने वाले दबावों और लड़कियों की उपेक्षा और लड़कों को प्राथमिकता देने की पुरुषवादी मानसिकता को यहाँ फंतासी के ज़रिए बख़ूबी व्यक्त किया गया है।

'काबर' कहानी पुरुष वर्चस्व के तले शोषित स्त्री और उसके दुःख की कई परतों को लोककथा के ज़रिए खोलती है। कहानी का मुख्य किरदार कथानायक की नानी है। नानी का लाड़ला कथानायक नानी से कहानी सुनता है। नानी कहानी में अपने असमाप्त दुखों को तलाशती है। मायके और ससुराल दोनों ही जगहों पर केवल स्त्री होने के नाते उसे जीवन भर प्रताड़ित किया गया था। कहानी में लोककथा के दो अंत थे- माँ जो कथा सुनाती है उसका अंत सुखद है जबकि नानी की उसी कथा का अंत दुखद है। इस कहानी में रचनात्मकता के ज़रिए सदियों से शोषित स्त्री के दुखों को बहुत मार्मिक ढंग से प्रकट किया गया है। कहानी के दूसरे ही पैरे का वाक्य बहुत सार्थक है। वाक्य है- 'मेरी नानी अंधी थी लेकिन उसने दुनिया देखी थी।'

'बिरबट' कहानी में नैरेटर के मामा गिरधारी किसी रहस्यमयी मानसिक बीमारी से ग्रस्त हैं पर अंत में जब असलियत सामने आती है तो पाठक सोचने पर विवश हो जाता है कि क्या ऐसा भी होता है? दरअसल बँटवारे के लिए गिरधारी मामा ने बीमारी का ढोंग रचा था। बँटवारा होने पर उसकी बीमारी ग़ायब हो जाती है।

कहानी 'वरसूद का लोकतंत्र' में चित्रित है कि कैसे लोकतंत्र की मूल भावना को नेस्तनाबूद किया जाता है। छद्म लोकतंत्र की चक्की में वही ग़रीब और शोषित पिसता है जिसकी बेहतरी के लिए ही सारी योजना बनायी जाती है। गाँव के पूर्व सरपंच अयोध्या बाबू अपने वरसूद सोमसिंग के कंधे पर बन्दूक रखकर चलाते हैं। फ़ायदा उठाते हैं अयोध्या बाबू और भुगतता है सोमसिंग। अच्छी भावना से बने क़ानून भी ज़मीन पर उतरकर अयोध्या बाबू जैसे लोगों के लिए फ़ायदेमंद और सोमसिंग जैसे लोगों के लिए कष्टकारी हो जाते हैं।

अपनी माँ के प्रेमी के प्रति उसके किशोर बेटे के मन होने वाली उथल-पुथल को बख़ूबी व्यक्त करती है कहानी- 'झाल'। 'सत्यकथा वाया झूठे किस्से' में पुर्तगाल के सुप्रसिद्ध समुद्री यात्री वास्कोडिगामा की दिलचस्प प्रेम कहानी है। भारत में आकर वह श्यामा के प्रति आकर्षित हो जाता है। इतिहास में इसका कहीं ज़िक्र नहीं मिलता। शायद इसीलिए शीर्षक में इसे झूठ पर आधारित सत्यकथा कहा गया है।

'बारिश बुखार और प्यार' कहानी का सार-संक्षेप नहीं बताया जा सकता है। इसे तो पढ़कर सराहा जा सकता है। इस कहानी की भाषा काव्यात्मक है। इसका एक वाक्य देखें- 'अपनी आँखें मैंने बूँद को सौंप दी हैं।'

प्रदीप नए औज़ारों से कहानी को रचते हैं। समकालीन जीवन और समय के सवालों को केवल उठाते ही नहीं, उन्हें धीरज के साथ किसी अंजाम तक पहुँचाने की कोशिश भी करते हैं। यथार्थ और फंतासी दोनों तत्वों से कथा का रचाते हैं और पठनीयता की रक्षा करते हुए उसे अबूझ भी नहीं बनने देते। प्रदीप निमाड़ के आंचलिक शब्दों का प्रसंगानुसार प्रयोग कर कहानियों को विश्वसनीय और सजीवता प्रदान करते हैं। कभी-कभी तो एक आंचलिक शब्द कहानी का आत्मा ही बन जाता है, जैसे- 'झाल' में हुआ है।

समीक्षक कहानी में 'क्या हुआ' तो बता सकता है पर 'कैसे हुआ', यह नहीं बता पाता। इसके लिए तो आपको कहानी संग्रह की शरण में ही जाना होगा। संग्रह का कलेवर, आवरण और छपाई-सफ़ाई सुरुचि सम्पन्न है। क़ीमत भी वाजिब है। यह संग्रह निश्चित ही आपको संतोष प्रदान करेगा ।


समीक्षक
गोविन्द सेन
193 राधारमण कॉलोनी, मनावर-454446, जिला-धार

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