परिंदे

अनिल खन्ना

मन के पिंजरे में बंद
ख़्वाहिशों के परिंदे
रह-रह कर
बाहर निकलने को
छटपटाते हैं,
शोर मचाते हैं,
पिंजरे की सलाखों से
सर टकराते हैं,
आख़िर में
पिंजरे के सीमित
दायरे को ही
दुनिया समझ कर
चुप हो जाते हैं।


खोल दो
अपने
पिंजरों के
दरवाज़ों को,
फैलाने दो पंख
परिंदों को,
शायद
इनमें से
कोई एक
आसमानों की बुलंदियाँ
छू जाए
या
क्षितिज के पार
निकल जाए।
 

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