निकृष्टता

अपूर्वा कुशवाहा

आज तड़ित का विषम रूप था,
निशाने पर अंबा का स्वरूप था।
स्मरण कर जिसको सहम -सा जाता,
कृत्य ऐसा वीभत्स कुरूप था॥

कु-योजना को अंजाम देने को,
प्रांगण में था वह घुस आया।
अपवित्र हाथों से उसने डाला,
भवानी माँ पर काला साया!!

परंतु ख़ब्त के अंधेपन में,
निर्बुद्धि यह जान न पाया।
भटके को रास्ते पर लानेवाली,
तुझे बिन सीख न छोड़ेगी 'अभया'।

क्यों खंडित की भुजा तूने?
क्या सँभाला नहीं तुझे रूह ने?
ओ अपूजक! तुझे लाज न आई?
जो अपनी माँ की कोख लजाई।

जिन गौरी माँ की अनुकम्पा से,
सुशोभित था शिव का परिवार।
उस माँ की सम्मान स्वरूपी नथ,
को चुरा ले गया काला मंगलवार॥

ज़रा स्मरण तो कर लेता स्व अज को, 
जब अपवित्र किया मंदिर की रज को।
घमंड तो रक्तबीज का भी न रहा,
तो तेरा तुच्छ अस्तित्व ही क्या है़ !

महिष-मर्दिनी को है ललकारा,
तैयार खड़ी है तेरी चिता।
ओ अधर्मी - दानव - दनुज!
तुझे छोड़ेंगी न अपराजिता!!

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