(यहाँ कुछ हुआ तो था)

प्रेषक : रेखा सेठी

 

आँख में आँसू की
तरह
अटका हुआ है बच्चा
रुकेगा नहीं
दुःख सुख से इस बात
का कोई सरोकार नहीं
सरोवर से उठा था
मथ कर
सर्दी गर्मी में
हवा धूप बादल बन कर
मँडराया था
तरल डली बन
टपकेगा
रुका नहीं रहेगा आँख में

लेकिन सूखने क बाद का
गीलापन बना रहेगा
आख़िरी नज़र की

धरोहर तक।

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