“शिक्षा के साथ ही लोगों की पसन्द तेज़ी से बदली है रचित। अब वो ज़माना गया जब लोग वक़्त काटने के तरीक़े खोजा करते थे किताबों में। आज लोग सिर्फ़ पैसा कमाने पर वक़्त लगाते हैं। और तिस पर मनोरंजन के इतने साधन हैं कि चुनाव आसान नहीं। आज लोग सच पढ़ना पसन्द करते हैं, व्यवहारिक चीज़ें पढ़ना चाहते हैं। कौन आज पेड़ के नीचे बैठकर प्यार की किसी काल्पनिक कहानी में डूब जाना चाहेगा?” एक गहरी साँस भरकर- “और हिन्दी कि किताब हाथ में लेते हुए तो लोगों को जैसे शर्म ही आ जाती है।” एक अल्पविराम लेकर- “तुम समझ रहे हो ना?” उन्होंने रचित के चेहरे को पढ़ने का प्रयास किया। “आज लेखन कला नहीं बल्कि व्यवसाय बन गया है। और फिर दर्जी का बेटा दर्जी ही बने, ये जरूरी तो नहीं? तुम्हारे पास आलीशान घर है। गाड़ी है। सब कुछ तो छोड़ गये हैं तुम्हारे पिताजी तुम्हारे लिए।” ज़ोर देते हुए- “आख़िर किस बात की कमी है तुम्हें? तुम ख़ुद भी मल्टीनेशनल कम्पनी में नौकरी कर रहे हो?”

“धन्यवाद,” हाथ जोड़कर एक छोटे से पूर्णविराम के साथ रचित उनके सामने से उठ गया। 

आंनद जी कहना तो बहुत कुछ चाहते थे मगर रचित ने सुनना गवारा नहीं किया। उससे बेहतर कौन समझ सकता है कि उसके पास पिताजी का कमाया सब कुछ है उसके पास। पैसा है, पहचान है, नाम है... लेकिन उसे ख़ुद का भी तो ऐसा ही कुछ चाहिये?

इस केबिन से निकलते हुए उसके चेहरे पर जो रोष था, जो हार थी वह दरवाज़े से बाहर क़दम रखते ही एक ज़बरदस्ती की संतुष्टि के बीच कहीं छुपा ली उसने। बाहर बैठे किसी भी कर्मचारी को ज़ाहिर ही नहीं होने दिया कि उसे नकार दिया गया है। उसकी रचना को एक बार फिर नकार दिया गया है, वह भी उस इंसान के द्वारा जो कभी उसके दिंवगत पिता और एक मशहूर लेखक, मुकेश सिन्हा के अच्छे मित्र थे। उनकी मित्रता की नींव भी थी मुकेश जी की क़लम। 60 के दशक में, जब लोगों के पास मनोरंजन के साधन बहुत ही सीमित थे, उस वक़्त किताबें लोगों के लिए एक बहुत ही अच्छा साधन हुआ करती थी वक़्त गुज़ारने के लिए। ख़ासतौर पर महिलायें जो घरों से बाहर कम ही जा सकती थीं, उनके पास तो सिवाय किताबों, उपन्यासों के अलावा जैसे कुछ था ही नहीं। टेलीविज़न अब भी कुछ आलीशान घरों की रौनक़ होते थे। उस दौर में सिनेमा और उपन्यासों का ही बोलबाला था, और लोग लेखकों के दीवाने हुआ करते थे। उस दौर में मुकेश जी एक चैंधियाता हुआ सितारा थे, लेखन के आकाश में। जिस प्रकाशक के दरवाज़े से आज रचित मायूस होकर लौट रहा है, कभी वह ख़ुद भी मायूस हो चुका था अपने डूबते प्रकाशन के कारोबार से। तब मुकेश जी किसी पार्टी में उनसे मिले और अपनी अगली कई किताबों को उन्हीं के प्रकाशन संस्थान से निकलवाने का निश्चय किया। आज ये प्रकाशन संस्थान दौड़ में सब से आगे नहीं है, तो सब से पीछे भी नहीं है। 

“कैसी रही मीटिंग?” खाना परोसते वक़्त वान्या ने उससे झिझकते हुए पूछा

“ठीक थी। अभी कुछ फाइनल नहीं किया है मेरी किताब को लेकर।” 

रचित के झूठ वान्या के लिए झूठ नहीं है, बस एक पर्दा है जिसके पीछे वह अपनी थकन को छुपाये रखना चाहता है। इसमें ग़लत भी क्या है, लेकिन बस बात करने के लिए कुछ बचा नहीं रहता उसके पास। वह समझ नहीं पाती कि आख़िर अब क्या कहे? क्या प्रतिक्रिया करे? किस तरह बात को ख़त्म करे… या बढ़ाये? या फिर यूँ ही ख़ामोश हो रहे, मगर डर है कि ये ख़ामोशी कहीं रचित को ज़ाहिर ना कर दे, कि वह सब जानती है। 

“आंनद जी ही क्यों? दक्ष ने भी तो अपना पब्लिशिंग हाऊस शुरू किया है ना? उस बेचारे को ही मौक़ा दे दो?” शायद मज़ाक में गंभीर बातें कह देना वाक़ई आसान होता है। 

“देखता हूँ,।” सामान्य होते हुए वह बोला। “मैं चाहता था कि मेरे उपन्यास को कोई अच्छा... या पुराना प्रकाशक बाज़ार में लाये ताकि मेरे लिए भी पहचान बनाना आसान हो।”

“लेकिन ऐसे प्रकाशक ढंग की रॉयल्टी कहाँ देते हैं?”

“रॉयल्टी की भूख किसे है?” उसने कहा। “मगर पुराने प्रकाशकों की पकड़ बाज़ार की रगों में होती है। जो छापते हैं, उसका पाठकों तक पहुँचना पहले से ही तय होता है।” 

वान्या चुप हो गयी। रचित ने तो ज़िन्दगी गुज़ार दी है किताबों, कहानियों, प्रकाशकों के बीच मगर उसके लिए ये सब बिल्कुल नया है। तीन सालों के प्रेम के बाद अभी पिछले ही साल वह बहू बनकर इस घर में आयी थी। वह एक कसी हुई मुस्कुराहट के साथ दोबारा खाने के कौर निगलने लगी।

रचित की लिखी पहली किताब, जो प्रेम-कविताओं का संग्रह था, और उसके बाद एक उपन्यास, बाज़ार में बुरी तरह विफल रहा। प्रकाशकों और वितरकों को पहले ही विश्वास नहीं था उसके लेखन पर, बस उसके पिता के नाम के चलते उसकी शुरूआती किताबें बड़ी आसानी से बाज़ार में आ गयीं थीं। दो-चार अलोचकों के छोटे-छोटे आलेखों को पढ़कर ही बाज़ार ने राय बना ली कि रचित की क़लम में पिता सा दम नहीं है। बस उसके शब्दों में कहीं-कहीं उसके पिता की छाप ज़रूर मिल जाती है।

“और उसी छाप को मैं इस्तेमाल करना चाहता हूँ,” दक्ष ने अपनी बात पर पूरा ज़ोर दिया। 

वान्या ख़ामोश बैठी उनके बीच की वार्ता सुनती रही है। रचित अब भी हाथों की उँगलियों को आपस में उलझाये एक किनारे तक रहा है। एक कोने पर उसकी आँखें अटकी हुईं हैं। वह नहीं जानता कि वान्या ने दक्ष को कल रात फोन कर के उससे मिलने का आग्रह किया था। बस इतना जानता है कि वह इस बात के लिए, इस झूठ के लिए वह दक्ष को पहले भी कई बार मना कर चुका है। वह अपने पिता के नाम का सहारा लेकर अपना नाम नहीं बनाना चाहता। 

अपनी पढ़ाई के दौरान कितनी ही बार कविता और निबन्ध लेखन की प्रतियोगिताओं में उसने भाग लिया और एक लफ़्ज़ की भी मदद अपने पिताजी से नहीं ली। भले ही उसे तीसरा स्थान भी ना मिले, लेकिन उसका लेखन बस उसी का होता था। जब उसे पुरस्कार मिले, तो वह जीत उसकी अपनी होती थी और जब नहीं, तो वह हार भी उसी की थी। उसके अपनों को उस पर पूरा यक़ीन था, और ख़ुद उसे भी अपने आप पर। मगर पिछले दो-तीन सालों से उसके यक़ीन पर कुछ दरारें उभर गयीं है।

“आई एम सॉरी दक्ष,” वह अपनी जगह से उठा। “मैं ये करने के लिए तैयार नहीं हूँ। लोग फ़्रेंच, इंग्लिश या अरबी कुछ भी पढ़ें, ये उनकी अपनी पसन्द है, लेकिन मेरी मूल रचनायें हिन्दी में ही आयेंगी। बाद में तुम अनुवाद करवा सकते हो।” दक्ष ने अपने माथ पर हाथ रख लिया। “लोगों के पास विकल्प ही नहीं है दक्ष। सारी अच्छी रचनायें विदेशी भाषाओं में ही छपेंगी, तो लोग हिन्दी में क्या पढ़ेंगे?”

“चल तेरी ये बात मैंने मान ली,” दक्ष ने हाँ में सिर हिला दिया। “तेरी किताबें हिन्दी में ही छपेगीं लेकिन मेरी उसी शर्त पर।” 

रचित ने उसकी बात पर थकन के साथ आँखें मूँद लीं। दक्ष ने आकर उसके कन्धे पर हाथ रखा। 

“तुझे याद है एक दिन हमारी सोसायटी में गुलाब की एक झाड़ी दिखायी दी थी मैनें तुम्हें?” 

रचित ने हाँ में सिर हिलाया। चटक लाल रंग के जंगली गुलाब की वह झाड़ी उसे बहुत ही अच्छे से याद है। आसपास का पूरा माहौल उसकी ख़ुशबू से महकता रहता है। 

“लेकिन तुझे ये नहीं पता होगा कि हमारी सोसायटी के चेयरमैन ने उसे जब पहली बार देखा तो वह एक छोटा सा पौधा था... सूखी और बंजर सी ज़मीन पर अपनेआप उगा एक उपेक्षित सा झाड़।” एक अल्पविराम- “उन दिनों माली की तबीयत नहीं थी वर्ना वह पौधा उस वक़्त काट दिया जाता। लेकिन जब उस पौधे ने दुनिया के सामने ख़ुद को साबित किया... उसमें फूल खिले तो जो चेयरमैन उसे काट देना चाहता था, उसी ने आदेश दिया कि बग़ीचे के अन्य पौधों की तरह उसकी भी देखभाल की जाये। और लोग उसके इर्द-गिर्द खड़े होकर बड़े चाव से अपने मोबाइल पर सेल्फ़ी लेते हैं।” 

रचित मुस्कुरा गया। 

“हालात आपके विरोध में नहीं होते रचित, बस आप से चाहते हैं कि आप ख़ुद को साबित करो।”

“मुझे भी ये सही लगता है रचित,” आख़िर वान्या भी अपनी जगह से उठकर उसके पास आयी। “देखो, हर काम सीधे तरीक़े से नहीं होता। रामायण हो या महाभारत, थोड़ा छल तो ईश्वर ने भी किया है सही को सही साबित करने के लिए। जो उत्तम है उसे उसकी जगह दिलाने के लिए?” एक साँस भरकर- “जीतने के लिए हर युग में नीतियाँ बदल कर लड़ना ही जीत सुनिश्चित करता है।”

रचित के पास जवाब नहीं हैं अब; वान्या को देने के लिए, दक्ष को देने के लिए, और ख़ुद को देने के लिए भी। कुछ देर वह ख़ामोश खड़ा रहा। 

“और दुनिया के सामने कभी सच आ गया तो?” उसने दोनों की ओर प्रश्नभाव से देखा।

“सच तुम ख़ुद एक दिन दुनिया को बताओगे, लेकिन बस तरीक़ा मेरा होगा।” 

सब कुछ दक्ष के दिमाग़ में पहले से ही तैयार था। बस, कुछ महीनों से रचित की ना के चलते वह रुका हुआ था। आख़िर, उसे आज कामयाबी मिल ही गयी। रचित के लेखन को वह बचपन से सराहा करता था। रचित को पढ़ चुके लोगों की तरह वह भी मानता था कि रचित का लेखन अलग है, लेकिन अपठनीय नहीं। उसकी रचनायें रोचक हैं, मगर एक नयी सोच को अपनी जगह बनाने में वक़्त तो लगता है। बस उस वक़्त के बीच रचित टूट सकता था, और यही दक्ष नहीं चाहता था। पतझड़ के बाद सावन का आना तो तय होता है, मगर कुछ दरख्त इस बीच सूख जाते हैं, बिखर जाते हैं।

दक्ष ने बिल्कुल वक़्त नहीं लिया। 

अगले ही दिन एक नामी अख़बार में एक छोटा सा आलेख छपा कि मुकेश जी की लिखी कई अधूरी रचनायें उनके किसी पुराने सन्दूक में मिलीं। प्रकाशकों में होड़ मच गयी उन रचनाओं को हासिल करने की। उनके लिए यह किसी ख़ज़ाने से कम नहीं था। कुल मिलाकर प्रकाशकों को एक बार फिर मुकेश जी के नाम के साथ अच्छी कमायी का मौक़ा मिलने वाला था। ख़बर पाठकों और वितरकों तक पहले ही पहुँच चुकी थी। बस इन्तज़ार था उनकी किताब बाज़ार में आने का।

इस बीच आंनद जी बड़ी उम्मीद के साथ रचित से मिले। 

“बहुत ही अच्छी बात है कि तुम ख़ुद अपने पिताजी की रचनाओं को पूरा कर के बाज़ार में लाने वाले हो। आई एम रियली हैप्पी!” उत्सुकता उनके चेहरे पर हँसी को भी पछाड़ रही थी। “लेकिन प्रकाशन का काम दक्ष को क्यों दे रहे हो? वह जानता ही क्या है प्रकाशन के बारे में?” रचित ने कोई जवाब देना सही नहीं समझा। “मैं शर्त लगा सकता हूँ कि वह इन किताबों को पिटवा देगा।”

“धन्यवाद,” पिछली बार की तरह इस बार भी रचित दोनों हाथ जोड़े उनके सामने से उठ गया। बस इस बार नाउम्मीदी को चेहरे पर पोते वह ख़ुद बाहर जा रहे थे। दरवाज़े के बाहर उनकी मुलाक़ात वान्या से हुई। उन्हें लगा कि मात तो तय है लेकिन एक बार फिर कोशिश करनी चाहिये। बहुत कुछ बक लेने के बाद, “किसी ऐरे-ग़ैरे प्रकाशक से किताबें छपवाना तो मुकेश जी की रचनाओं का ख़ून करने के बराबर है। तुम उसे कुछ समझाओ बहू।”

“जी आप निश्चिंत रहें,” वान्या ने भी दोनों हाथ जोड़कर बडे़ आदर के साथ उन्हें रास्ता दिखा दिया।

फिर वही हुआ जो दिल और दिमाग़ के एक साथ चलने से होता है। रचित के दिल से निकले शब्द लोगों के दिलो-दिमाग़ पर अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहे। मुकेश जी की लिखी रचनायें जब उसके द्वारा पूरी होकर पाठकों के हाथों में आयीं, तो सब बोल पड़े कि रचित ने मुकेश जी के नाम को और ऊँचाई पर पहुँचा दिया। 

एक के बाद एक, चार सफल किताबें अपने पिता के साथ देने के बाद आख़िर रचित ने अपनी ख़ुद की लघु कहानियों का एक संकलन और एक उपन्यास निकाला, जिसे उतना ही सम्मान मिला। जब वक़्त बदलता है तो दोस्त और दुश्मन भी बदल जाते हैं। प्रकाशक अब रचित पर भरोसा करने लगे थे। जो पहचान वह बनाना चाहता था, बना चुका था। और एक सच था जो कभी वह समाज के सामने लाना चाहता था, मगर अब वह बहुत आगे निकल चुका था उस मुक़ाम से जहाँ उस सच का कोई मतलब होता। अब कोई नहीं जानना चाहता था कि मुकेश जी ने अपना अन्तिम समय सिर्फ़ देश-विदेश घूमने में बिता दिया था, किताबें लिखने में नहीं। कोई नहीं जानना चाहता था कि उनका लिखा आख़िरी दस्तावेज़ सिर्फ़ उनकी वसीयत थी। लोग रचित की कल्पनाओं में डूब गये थे और साथ ही एक बड़ा सच भी उसके साथ डूब गया।

अपनी कामयाबी की ऊँचाई पर खड़ा रचित आज भी आंनद जी की एक बात याद कर के मुस्कुरा जाता है - “कि लोग सब से पहले सिर्फ़ नाम पढ़ते हैं।”

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