मुन्नू अनशन पर

डॉ. नरेंद्र शुक्ल

एक दिन मेरे मित्र राधेश्याम मेरे पास हाँफते हुये आये। मैंने पूछा, "राधेश्याम इतना भाग क्यों रहे हो? ओलेम्पिक्स तो कब की ख़तम हो गई है… तुम अभी तक अभ्यास कर रहे हो!" 

वे अत्यंत घबराये हुये थे। बदहवास से बोले,"भैया शुक्ला फ़ौरन मेरे साथ घर चलो। मुन्नू को न जाने क्या हो गया है। इन्कलाब ज़िन्दाबाद… भारत माता की जय… और न जाने क्या-क्या बक रहा है।" 

मैंने कहा, "कहीं उस पर पढ़ाई तो नहीं सवार हो गई है? नंबरों के चक्कर में अक्सर ऐसा हो जाता है।"

वे बोले, "अजी लानत भेजो पढ़ाई को... पढ़ना-लिखना तो वह हराम समझता है। उसके साथ उसके मुस्टंडे दोस्त भी हैं जो "मन्नू तुम आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ हैं" के नारे लगा रहे हैं।" 

मैंने उन्हें हौंसला दिया, "तुम घबराओ नहीं... चल का देख लेते हैं। आजकल मीडिया वाले बेवज़ह हड़तालों का लाइव कवरेज़ दिखाकर पब्लिक की बुद्धि सुन्न कर रहे हैं। सभी अपने आपको नेता समझने लगे हैं।" 

वे कुछ न बोले चुपचाप आकर कार की अगली सीट पर बैठ गये। जैसे ही हम घर के पास पहुँचे ...हवा का तेज़ झोंका आया, "मुन्नू तुम आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ हैं।" मैंने देखा राधेश्याम के घर के बिल्कुल सामने वाले पार्क में जहाँ अक्सर अवारा कुत्ते सरकारी फ़ैमली प्लैनिंग को धत्ता बताते हुये आपस में लिपटे रहते थे और जहाँ कभी-कभी ज़ालिम दुनिया वालों की नज़रों से बचकर प्रेमी एक-दूसरे की बाँहों में लिपटे हुये एक-दूसरे को सहारा देते थे, वहीं आज साफ़-सुथरी दरियाँ बिछी हुई हैं। सामने मंच सजाया हुआ है। लाउड स्पीकरों की भी व्यवस्था की गई है। अनशनधारी चाहते हैं कि उनकी आवाज़ सभी घरों के ड्राइंगरूम तक पहुँच जाये ताकि घर में बैठे मेहमान भी उन भोले-भाले मासूमों पर हो रहे अत्याचारों को महसूस कर सकें। मंच के बीचों-बीच गांधी टोपी लगाये मुन्नू उसी प्रकार बैठा है जिस प्रकार घोटाला पब्लिक के सामने आने या निजी संपति एकाएक सार्वजनिक होने पर आजकल के नेता एकबारगी यह सोचने के लिये चुप हो जाते हैं कि इसका ठीकरा किस पार्टी पर फोड़ें या फिर इसे किस चैनल की साज़िश करार दें। चारों ओर धूप-दीप जल रहे थे। मुन्नू के ठीक पीछे बैठे उसके दोस्त शांत मुद्रा में चुपचाप बैठे हुये थे। उन्हें अब इस बात की चिंता नहीं थी कि परीक्षा में नंबर कम आने पर उन्हें घर वालों की ताड़ना सहनी पड़ेगी। वे अब परम संतोषी हो चले थे। यहाँ सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि इस अनशन में लड़कियों की तादात भी कम नहीं थी। उन्हें मुक्ति का मार्ग सूझ गया था। वे शांत बैठे लड़कों में होंसला भर रही थीं, "अब हमें कोई रोक नहीं सकता। कोई टोक नहीं सकता। जो हमसे टकरायेगा, चूर-चूर हो जायेगा।" 

मुन्नू के दोस्तों के ठीक पीछे तीसरी व चौथी कक्षा के बच्चे भजन गा रहे थे, "रघुपति राघव राजा राम। सबको सन्मति दे भगवान।" सामने दरियों पर लोग पंक्तिबद्ध बैठे हुये थे। पहली पंक्ति छठी व सातवीं कक्षा के बच्चों की थी। उनके पीछे नौवीं से लेकर बारहवीं तक के व्यस्क बच्चे आधुनिक माताओं से फ़र्ल्ट करने की योजना बनाने में व्यस्त थे। इन व्यस्कों के ठीक पीछे "मैं अनशनधारी हूँ" की टोपी लगाये हुये रिक्शे व टैंपू चलाने वाले तथा अंतिम पंक्ति में घरेलू नौकर, दूध बेचने वाले, स्थानीय डिस्पेंसरी के वार्ड ब्वॉय, सरकारी दफ़्तरों के बाबूनुमा चपड़ासी तथा चपड़ासीनुमा बाबू भी बैठे हुये थे। मंच के दायीं ओर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के रिर्पोटर तथा बायीं ओर स्थानीय अख़बारों के रिर्पोटर यहाँ की प्रत्येक ख़बर को सीधे जनता के पास पहुँचाने के लिये आतुर खड़े थे। कुछ नेतानुमा पेरेंटस कंधे पर झोला लटकाये मैदान की परिक्रमा कर रहे थे। उनकी झोली में दो-दो किलो मुसम्मियाँ थीं। न जाने कब ज़रूरत पड़ जाये! पूरा नज़ारा राजनीतिक था। मैंने राधश्याम के कंधे पर हाथ रखा, "भैया राधेश्याम, आख़िर मामला क्या है?" 

इससे पहले कि शोक में डूबे राधेश्याम मुँह खोलते, सामने से आते हुये लक्की ने कहा, "अंकिल, अब हम पेरेंटस की मनमानी और बर्दाश्त नहीं करेंगे। जो हमसे टकरायेगा, चूर-चूर हो जायेगा। मन्नू तुम आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ हैं।" 

लक्की, राधेश्याम के पड़ोसी मिस्टर खन्ना का बेटा है और पिछले तीन सालों से दसवीं कर रहा है। लक्की आज पूरे तैश में था। आँखें लाल थीं। मुँह से झाग निकल रहा था। मैंने डरते हुये पूछा, "पर..., लक्की बात क्या है?" 

वह बोला, "अंकिल, हमारे पेरेंटस ने हमारे नाक में दम कर रखा है। परसों रॉकी के यूनिट टैस्ट में फ़ेल हो जाने पर उसके डैड ने उसका मोबाइल छीन लिया। पिंकी की मॉम उसे उसके ब्वॉय फ़्रेंड शैमी से नहीं मिलने देती। हमारे एस.एम.एस. तक पढ़े जाते हैं। आज़कल मॉम्स किट्टी पार्टिज़ में बिज़ी रहती हैं। हमें अपना होमवर्क ख़ुद करना पड़ता है। स्कूल में टीचर्स पेपर बताने और पास न होने पर नंबर बढ़ाने तक के पैसे माँगते हैं। हम फ़ेसबुक पर नहीं बैठ सकते। देर रात तक पार्टीज़ नहीं कर सकते।... यू नो ड्रिंकस तक अलाउड नहीं है। पेरेंटस पाँच सौ रुपये पॉकिट मनी देते हैं। हफ़्ते में दो-तीन सौ ट्रैफ़िक पुलिस वाला झटक लेता है। वीकली कोई न कोई गिफ़्ट न दो तो गर्लफ़्रेंड भाग जाती है। ऊपर से यह महँगाई... पैट्रोल तक का हिसाब देना पड़ता है। साली नरक बन गई है ज़िंदगी...।" 

वह थूक कर उस ओर चल देता है जहाँ कुछ कॉलेज के विद्यार्थी "मुन्नू ज़िंदाबाद, पेरेंटस मुर्दाबाद" के नारे लगाते हुये स्टेज की ओर बढ़ रहे थे। मंच के दायीं ओर पेरेंटस का हुजूम है।"खींचू ख़बर" चैनल का एक रिपोर्टर एक पेरेंट से पूछता है, "जी आप..हाँ हाँ.. आप ही से पूछ रहे हैं... हाँ हाँ.. आप नीली शर्ट वाले साहब, हाँ हाँ आप.. किसके पेरेंट हैं?" 

"डब्बू के।" 

"अच्छा ये बताइये कि आप इन भोले-भाले मासूम बच्चों पर इतना अत्याचार क्यों कर रहे हैं?" 

"भाई साहब, कुछ नियम-क़ानून होते हैं, जिन्हें समझना और उनका पालन करना बच्चों की डयूटी है,” नीली शर्ट वाले पेरेंट ने कहा।

रिपोर्टर ने फिर पूछा, "जैसे?" 

"जैसे, बड़ों का सम्मान करना। पढ़ाई करना। मेहनत करना। आपको तो पता ही है कि आजकल कंपीटीशन कितना बढ़ गया है,” नीली शर्ट वाले पेरेंट ने कहा।

"ऐसे कैसे किडस को आज़ादी दे दें। कोई क़ायदा होता है। कोई कानून है,” सामने से आती हुयी अधेड़ महिला ने अपनी ज़ुल्फ़ों की लट को कान के पीछे चढ़ाते हुये ग़ुस्से से कहा। उसके होंठ सचमुच अंगारे लग रहे थे। अब तक कुछ और पेरेंटस उधर खिसक आये थे... उन्हें अनशन से ज़्यादा इस बात की चिंता थी कि कहीं पड़ोसी का चेहरा उनसे अधिक कैमरे में न आ जाये। एक साँवले रंग के बुज़ुर्ग ने होंठ चबाते हुये कहा, "ये बच्चे एक से बढ़कर एक ख़ुराफ़ाती हैं।.. दिल तो करता है कि सामने नीम के पेड़ से एक पतली सी छड़ी तोड़ लूँ और सबको लाइन में खड़ा कर के पीटूँ।" 

रिपोर्टर ने पूछा, "क्या आप हिंसक तरीकों से अनशन उखाड़ना चाहते हैं? गांधी जी के रास्ते पर चलते हुये इन मासूमों पर आप कोड़े बरसायेंगे? कॉन्स्टीच्यूशन की परवाह नहीं है आपको?"
 
एक महिला, जो टी.वी. पर आने के लिये अपने होंठ सँवार रही थी, बोली, "तो क्या इनकी आरती उतारें? हमारी बिल्ली हमीं से म्यांउ। ...जितनी कांस्ट्रेशन से यहाँ बैठे हैं उतनी कांस्ट्रेशन से अगर पढ़ाई कर लें तो कल सभी आई.ए.एस. हो जायें और कल से रोज़ नोट छापकर देश की डूबती नैया को सहारा देने का काम करें।" 

नीली शर्ट वाले पेरेंट ने कहा, "देखिये भाई साहब, अपनी बात कहने का भी एक तरीक़ा होता है। क़ायदे-क़ानून सड़क पर तो नहीं न बनाये जा सकते। आपस में बैठकर, शांति से भी मामला सुलझाया जा सकता है।" डब्बू के फादर ने अचानक चुप्पी तोड़ी।

यहाँ आपस में विचार-विमर्श का दौर चल ही रहा था कि "मुन्नू तुम आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ हैं। अब हमें कोई रोक नहीं सकता। कोई टोक नहीं सकता। जो हमसे टकरायेगा, चूर-चूर हो जायेगा।" का एक और झोंका आया। मैंने देखा-स्थानीय गवर्मेंट कॉलेज़ की कुछ छात्रायें हाथों में "इंकलाब ज़िंदाबाद" की तख्तियाँ लिये मंच की ओर बढ़ रही थीं। उनके ठीक पीछे रिक्शे व टैंपू वाले चले आ रहे थे। मैंने चेचक के दाग़ वाले रिक्शे वाले से पूछा, "भैया, तुम इनके साथ क्या कर रहे हो?" 

"हमउ अनशन पर हैं। इ कार वाले हमका सड़क के बीचों- बीच रिक्शा नहीं चलाने देते। .. हमउ वोट दिया है। हमउ का चलै का अधिकार है।"

"हम भी अनशन करेंगे। .. प्रोफेसर गुप्ता मेरी गर्ल फ़्रेंड को छेड़ते हैं और अटेंडस पूरी करने के पैसे भी माँगते हैं," बी.ए. कर रहे एक छात्र ने कहा।

"हम भी अनशन पर हैं। सड़क पर जब हम दायीं ओर हाथ देकर बायीं ओर मुड़़ जाते हैं तो ये कार वाले हमें आँखें दिखातें हैं। सड़क पर हम किसी की दादागिरी बर्दाश्त नहीं करेंगे।" 

"मैं अनशनधारी हूँ" की टोपी लगाये एक टैंपू वाले ने जोश में कहा। 

"बड़े बाबू घूस के पैसे अकेले डकार जाते हैं। हमें हमारा हिस्सा नहीं देते। एक कर्ल्क आरोप लगाता है। 

"जय श्री राम, हम भी अनशन पर हैं। रोज शेयर बाज़ार गिर जाता है। सारा धंधा चौपट होता जा रहा है। इस विज्ञान ने नाक में दम कर रखा है।... साला कोई हाथ दिखाने नहीं आता," बस स्टैंड के पास बैठने वाले बाबा ने लगभग रोते हुये कहा। 

"हम भी अनशन पर हैं। ये मीडिया वाले हमें त्योहारों के सीज़न में भी मिलावटी मिठाइयाँ नहीं बेचने देते।"मैं अनशनधारी हूँ" की टोपी लगाये नुक्कड़वपले हलवाई ने अपना दु;ख प्रकट किया।" 

मैं देखता हूँ कि सामने मंच की ओर, के.जी. व नर्सरी के बच्चे "मैं अनशनधारी हूँ" की छोटी-छोटी टोपी लगाये चले आ रहे हैं। उनके हाथों में तिरंगा है। मैंने अपने पड़ोसी मिस्टर नेगी के झबरे बालों वाले रॉकी से पूछा, "बेटा टॉफी खाओगे?" 

उसने सिर झटक कर जेब की ओर इशारा किया। मैंने उसकी जेब में टॉफी रखते हुये पूछा, "अच्छा, यह बताओ बेटा कि तुम यहाँ करने आये हो?"

"अनथन करने," वह तपाक से बोला।

"तुम्हें अनशन पर किसने बैठाया?"

"हम आपके-आप बैठे।" 

"क्या चाहते हो?" 

"मुन्नू तूम अनथन कलो हम तुमाले साथ हैं।" रॉकी आगे बढ़ जाता है।

सामने देखता हूँ... लक्की भागता चला आ रहा है। उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रहीं हैं। मैंने उसे रोक कर पूछा, "लक्की बेटा, तुम्हें क्या हुआ?"

वह बोला, "अंकिल, मुन्नू की तबियत ख़राब हो गई है। उसके पैशाब में एसिटोन आने लगा है।"

मैंने ख़ुश होते हुये कहा, "बेटा, तो अनशन तोड़़ दो। तुम कहो तो मैं उन पेरेंटस से बात करूँ जो मुसम्मियाँ लिये इधर-उधर फिर रहें हैं और जिनकी मुसम्मियाँ सूख रहीं हैं।"

वह बोला, "नहीं अंकिल, सब देख लिया जायेगा। हमारी कोशिश है कि यह आंदोलन सफल हो और अगर यह सफल रहता है तो आगे नेता बनने के पूरे चांस हैं। वैसे भी सरकार महँगाई काबू नहीं कर पा रही। हम इसी तरह से आगे लोगों का मार्गदर्शन करेंगे।" 

मैंने कहा, "पर तुम्हारे इस प्रयास में बेचारा मुन्नू बेमौत मारा जायेगा।" 

वह आत्मविश्वास से बोला, "अंकिल उसे कुछ नहीं होगा । हमारी एक आँख मैडिकल रिर्पोट पर तो दूसरी आँख मध्यस्थ नीना पर है।"

 मैंने पूछा, "ये नीना कौन?"

वह बोला, "वही नुक्कड़ वाले प्रोफसर गुप्ता की बेटी।... अरे वही जो पिछले महीने सैंडी के साभ भागी थी। अब वह अपने मुन्नू की गर्लफ़्रेंड है।" उसने मेरे आगे नीना की तस्वीर खोल दी।

"अगर तुम सबकी यही ज़िद्द है तो हमारी भी एक बात गाँठ बाँध लो, जब तक यह अनशन ख़त्म नहीं होगा, तुम्हारी कोई बात नहीं सुनी जायेगी," राधेश्याम को अब तक होश आ चुका था।

मैंने राधेश्याम को समझाते हुये कहा, "भैया राधेश्याम, जोश से नहीं होश से काम लो। हमें हमारे सपूतों की सेहत के बारे में सोचना चाहिये। मेरा विचार है कि वक़्त की नज़ाकत को समझते हुये हमें उनकी माँगों को सै़द्धांतिक रूप में स्वीकार कर लेना चाहिये।" 

वे बोले, "ऐसे तो वे हमें कमज़ोर समझ लेंगे और मनमानी करेंगे।" 

मैंने उन्हें समझाते हुये कहा, "तुम मेरा मतलब नहीं समझे। दरअसल, मेरा मतलब है कि उनकी माँगों को सैद्धांतिक रूप में स्वीकार करके उस पर एक कमीशन बैठा दिया जाये जो यह तय करे कि बच्चों को किस सीमा तक आज़ादी दी जाये।" 

मेरी बात से पेरेंटस सहमत हो गये तो मैंने लक्की को एक ओर ले जाकर समझाया, "बेटा, अब आप लोग भी ज़िद्द छोड़ दो। इस तरह से बेचारा मुन्नू मर जायेगा और कुछ हासिल नहीं होगा।" 

वह ग़ुस्से में आ गया। हाथ झटक कर बोला, "अंकिल, हम मर जायेंगे पर झुकेंगे नहीं। समूचा बॉलीवुड-टॉलीवुड हमारे साथ है। सभी क्रिकेटर्स हमारे साथ हैं। सामने देखो मुन्नू को देखने आने वालों की भीड़ लगी है। सभी कॅालेजों और नगर-निगम के नेता हमारे साथ हैं।.. अब हमें कोई रोक नहीं सकता। कोई टोक नहीं सकता। जो हमसे टकरायेगा, चूर-चूर हो जायेगा। मुन्नू तुम आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ हैं। इन्कलाब ज़िदाबाद। भारत माता की जय। आज वह पूरा नेता हो गया है।"

मामला गंभीर होता देखकर मैंने पर जाकर पेरेंटस की ओर से घोषणा की, "बच्चों, हम तुम्हें इस तरह से मरते हुये नहीं देख सकते। सैद्धांतिक रूप से हम आपकी सभी माँगें स्वीकार करते हैं लेकिन आपको किस सीमा तक आज़ादी दी जाये । कौन-कौन से अधिकार दिये जायें ताकि भविष्य में हमारे बीच तनातनी न हो, इसके लिये चौकी नंबर 12 के सस्पेंड इंसपैक्टर, थानेदार सिंह की अध्यक्षता में एक कमीशन बैठाया जायेगा जो एक महीने में अपनी रिर्पोट देगा और उसके आधार पर घरेलू संविधान में संशोधन करके, आप लोगों की आज़ादी संबंधी एक क़ानून बनाया जायेगा। थानेदार सिंह स्थानीय चौकी नंबर 12 के इंचार्ज थे और घूसखोरी के आरोप में पिछले एक साल से सस्पेंशन पर होने के कारण बेकार हो गये थे तथा जिन्होंने पिछले महीने हताशावश दसवीं में फेल हो जाने पर अपने पु़त्र योगराज को इतना पीटा कि उसकी बायीं टाँग में फ़्रेक्चर हो गया।"

बच्चे भय से सहमत हो गये। अनशन समाप्त हो गया। राधेश्याम ख़ुशी-ख़ुशी मुन्नू को जूस पिलाने के लिये चल पड़े और 

1 Comments

  • 25 Apr, 2019 09:11 AM

    बेजोड़.... सच का चित्र सजीव होकर आँखों में खिंच गया।

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