मुलाक़ात

01-05-2020

मुलाक़ात

सपना अग्रवाल

सुनो, 

ख़ाली बैठ कंप्यूटर की चौदह इंची स्क्रीन को देखते हुए तुम्हे मन ही मन दोहराने में जो सुकून है वो तुम्हारे साथ बैठ चाय की उस चुस्की में तुमसे बतियाते नहीं मिलता। न जाने क्यों तुम्हारे साथ गुनगुनाने पे वो सुर नहीं लगते; चाह कर भी कभी उतना जुड़ा महसूस ही नहीं कर पाती कि तुम्हारी आँखों के उस पार झाँक सकूँ। शायद इसलिए क्योंकि तुम्हारे साथ-साथ अपने आप को भी खो देती हूँ, और उस चौदह इंची स्क्रीन के शोर मचाते सन्नाटे में ख़ुद को पा लेती हूँ। और फिर काफ़ी देर तक ख़ुद को कोसने के बाद अपने आप को समझा पाती हूँ कि तुम तक पहुँचने का रास्ता, ख़ुद से होकर गुज़रेगा। उन तंग गलियों में साँस रोक, घुटते हुए एक बार फिर टहल आना ही मुनासिब होगा वरना तुम तो बेशक कहीं खो ही जाओगे। तो क्यों न निकल ही पड़ूँ, ताकि तुम जब किसी राह में मिलो तो तुम्हें ख़ुद से मिला सकूँ, और बता सकूँ कि मैं कभी बिछड़ी ही नहीं थी तुमसे; बस चाहती थी कि तुम आवाज़ दे रोक लो, या फिर बस चलते-चलते कहीं फिर से टकरा जाओ और मुझसे कहो, “मैं तो बस यहाँ से गुज़र रहा था, सोचा मिलता चलूँ”। और तुम्हारी मुस्कराहट तुम्हारी नज़रों से वो सच फिसला दे जो तुम्हारे होठों से छूटने की ज़ुर्रत न कर पाया।

तो चलो, ये तो तय रहा कि मैं मिलूँगी फिर एक बार तुमसे, कभी न कभी, कहीं न कहीं, पर अभी ख़ुद से मिलकर आती हूँ, शाम होने को आयी।  

– तुम्हारी परछाईं

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

लघुकथा
विडियो
ऑडियो