मेरी गुड़िया का मुंडन 

15-06-2020

मेरी गुड़िया का मुंडन 

आमित्या (अंक: 158, जून द्वितीय, 2020 में प्रकाशित)

सुंदर सुनहरे कंधे तक बाल 
गोरी त्वचा, गाल लाल लाल 
डर से घबरा रही है मैय्या 
जाने क्या होगा मुंडन में हाल 

अभी सब सो ही रहे थे, मैंने घड़ी देखी सुबह के तीन बज गए थे, मेरी आँखों में नींद नहीं थी। मेरी बिटिया का मुंडन था, पर वो अभी ३ साल की ही तो है और कभी पहले हमने उसके बाल नहीं कटाये। सभी बच्चे आज तक जो मैंने मुंडन कराते देखे वो हमेशा रोते हैं, और यही था मेरी चिंता का विषय।

मुझे बस किसी तरह एक उपाय चाहिए था कि बिटिया ज़्यादा असहज ना हो। क्या वज़ह होती हैं कि बच्चे रोते हैं? कैसे उन्हें सहज करें। मैंने किताबों में पढ़ा, इंटरनेट पे खोज भी की और सारी बातों की एक सूची तैयार कर ली। भीड़, मौसम, डर सबसे प्रमुख कारण थे और बताए गए उपाय थे पेट भरा होना चाहिए, बच्चे की तबीयत ठीक हो, मौसम ज़्यादा गरम न हो आदि इत्यादि। ये सब ज़्यादातर लोग करते थे पर बच्चे तो फिर भी रोते थे। मैंने सोचा अपने बड़ों से भी पुछूँ। 

माँ बोली, "बच्चों को थोड़ा रोने देना चाहिए दिल मज़बूत होता है।" 

बड़ी भाभी तो मेरी समस्या सुन हँसने लगी बोली, "मुडंन के बाद आ जाएगी न तुम्हारी गोद मे तो करा देना शांत; इतना क्यों सोच रही हो।" 

बड़ी बुआ ने चुटकी लेते हुए कहा, "ऐसी क्या ख़ास बात है जो इतना सोच रही हो,सभी बच्चों का होता है मुंडन, सभी रोते भी हैं।" 

तभी सासु माँ बोली, ”ज़्यादा सोचने से बच्चे मुंडन पे रोना नहीं बंद करेंगे।” 

बड़ी ननद बोली, “अरे भाभी क्यों परेशान हो? आख़िर हमेशा तो तुम उसे रोने से नहीं रोक सकती।" 

बात तो सही थी हर बार तो नहीं पर शायद इस बार।   

इसी सब गणना में सुबह के पाँच बज गए, खर्राटों की गूँज से भरा घर अब सुबह की आवाज़ों से भर गया था। पर मेरे मन मे अभी भी वही आवाज़ें गूँज रही थी, “कैसे देख पाओगी तुम दूर से उसे इतना असहज और रोते हुए?" घर में चहलक़दमी चालू थी, मेरे मस्तिष्क में भी। सभी जाने को तैयार थे, मेरा शरीर भी, बस मेरा दिमाग़ अभी भी उलझा हुआ था। हम निकल पड़े, अपनी उलझन में उलझी हुई मैं अभी तक कोई हल नहीं निकाल पायी थी। हम सहस्त्रधारा पहुँच चुके थे। बिटिया का पेट भरा था, स्वास्थ्य अच्छा था और मौसम भी। वह ख़ुश भी थी और यहाँ तक आते-आते एक नींद सो भी चुकी थी। पर भीड़ तो थी, सब उसे घेर के खडे़ होने वाले थे। जिस पर मेरा कोई नियंत्रण नहीं था। ऐसा मैं क्या करूँ कि चारों तरफ़ से घिरी हुई बिटिया आराम से अपने बालों का मुंडन करा ले। सीढ़ियों के ऊपर मन्दिर था, दर्शन करने जब हम ऊपर जाने लगे तो मुझे वहाँ एक छोटी सी दुकान दिखाई दी; जहाँ से थोडे़ फूल मैंने ख़रीदे, क्या फूल कर सकते हैं समस्या का समाधान या फिर शायद घंटी? शायद नहीं। ख़ैर देवता के दर्शन करके जब हम नीचे उतरे तो एक जगह मैं औरों का इन्तज़ार करती खड़ी हुई तो फिर सोच में पड़ गयी कि ऐसे क्या कर सकती हूँ? तभी मेरी नज़र उसी दुकान पर पड़ी पूजा के सामानों के अन्दर से झाँक रहे खिलौने को देख मैं मुस्कुरा उठी। क्या ये है वो उपाय?

हाँ, यही था वो उपाय,  पूर्वजों ने मेरी मंशा समझ के मुझे ये राह दिखाई थी। मैंने एक खिलौना उसके लिये ख़रीदा जिसमें बिटिया को मज़ा आ रहा था और वो ज़ोर-ज़ोर से हँस रही थी। सभी लोग भी उसे देख ख़ुश हो रहे थे। ये पहला मुंडन था जिसमें बच्चे की आह नहीं, उसकी किलकारियाँ छायीं थीं। बिना किसी परेशानी के मुंडन संपन्न हो गया था। मैं विजयी भाव से मुस्कुरा रही थी और हर तरफ़ हो रही बिटिया की वाह-वाही बटोर रही थी।

कट गये सुनहरे कन्धे तक के बाल, 
मुस्कुराहट से खिल गये गाल लाल लाल 
चैन से मुस्कुरा रही हैं मैय्या
नहीं हुई है बिटिया बेहाल।

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