मन उद्‍गम है इच्छाओं का,
उँची-नीची शिक्षाओं का।
मन में बसती अद्‍भुत तरंग,
मन के अन्दर है महा उमंग।

बुझती नहीं कभी मन की प्यास, 
बढ़ती जाती निज हित की आस।
मन के अंदर अद्भुत प्रकाश, 
कल्पित होता मन का प्रयास।

जो सही कल्पना बन जाती,
मन के अंदर जो ठन जाती।
वह सफल काम शुभ हो जाता,
मानव का मन तब हर्षाता।

मन विह्वल होता है हारकर ,
कल्पित लक्ष्य को भूल जानकार।
चुभने देता है मन उसको,
निज तरंग को शूल मानकर।

मन में बनते है छायाचित्र,
मन के अंदर है सहज प्रीत। 
मन बन जाता जब प्रेम भ्रमर,
दिखने लगता शृंगार निखर।

मन की तरंग अभिलाषी हो,
अच्छे कर्मों की प्यासी हो।
कभी आये न ऐसा विचार,
जिससे जीवन में उदासी हो।

मन बुद्धि का उचित संतुलन,
कर देता गलती का उन्मूलन।
प्राणी का मन सुख पाता है,
बन जाता जीवन का संतुलन।

0 Comments

Leave a Comment

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
विडियो
ऑडियो