13-11-2007

मैंने नाता तोड़ा - 3

सुषम बेदी

कामों के जमघट में मेरे भीतर की दुनिया खो ही गयी थी। कभी सोचने की फुरसत होती ही नहीं थी। थक कर चूर हो बिस्तर पर पहुँचती तो नींद वहाँ पहले से ही इंतज़ार कर रही होती। बस आते ही दबोच लेती। लेकिन भीतर बैठा वह खुफिया संसार चैन कब लेने देता है! वहीं से वार करता है न। वह भी रात के सन्नाटे में।

उस रात अचानक नींद एकद दुस्वप्न से टूटी। मैं हवाई अड्‌डे पर हूँ। बहुत भीड़ है। और मुझे कोई अपना पहचाना चेहरा नहीं दीख रहा। मैं अजय को ढूँढ रही हूँ। उसे होना था यहाँ। मैं चलती जाती हूँ। बहुत बड़ा सा एयरपोर्ट है... मैं बेहद घबरायी सी हूँ।  अब क्या करूँगी...क्या करूँ... इसी तरह के ख्याल आये चले जा रहे हैं। मुझे कुछ पता नहीं कि कहाँ जाना है, न कोई जान-पहचान न रहने का ठिकाना...एकदम अनजान अकेली हूँ...बस नापे चली जा रही हूँ लंबे-लंबे भीड़ भरे गलियारे...इसी घबराहट में आँख खुल जाती है...और फिर चैन की साँस लेती हूँ।

फिर एक और सपना शुरू हो जाता है...मैंने अपने परिवार के सदस्यों को घर में देखा...घनी उदासी छायी हुई है..मैं जानना चाहती हूँ कि अजय कहाँ है...एक कुछ बुरा घटने जैसी अनुभूति सब पर छायी हुई है... अजय नहीं है...मैं सारे कमरों में उसे खोज रही हूँ।

सपने बार-बार आते हैं...मैं जग जाती हूँ और देर तक जागी रहती हूँ..एक और दुस्वप्न बार-बार आता है...एक छोटे से कमरे में हूँ, कहीं बाहर नहीं निकल सकती, कोई भारी सी चीज मेरे ऊपर आ गिरती है, मुझे लगता है मेरा दम घुट जायेगा, कोई मुझे मार रहा है जान से पर मैं चीख नहीं पाती..न कोई मेरे आसपास है बचाने वाला...मेरी बेआवाज़ चीख ही अचानक मेरी नींद खोलती है और मैं हाँफती सी साँस खींचने लगती हूँ।

अजय... अजय कहाँ है? यह पहला नाम है जो सपना टूटते ही मेरे मुँह पर है! या सपना चलते हुए?

किसी तरह अजय नहीं आ सकता मेरे पास। मैं सारे कमरों में ढूँढ आती हूँ उसे!

शिकायत करना चाहती हूँ उससे!

और अजय? अजय ऐसा नहीं हो सकता। कितना स्नेह सद्‌भाव है उसमें। कितनी परवाह करता है मेरी। कितना प्यार। लेकिन अजय तुम कहाँ थे जब मुझ पर ईंटों के अंबार बरस रहे थे! तुमने मुझे कभी अंकल के खिलाफ अगाह क्यों नहीं किया? तुम तो मिले थे अंकल से। मुझे याद है तुमको अंकल अच्छे नहीं लगे थे। फिर भी तुमने यह भी अंदाज़ा था कि अंकल की रुचि मुझमें ज्यादा है। पर तब मैंने सोचा था कि शायद तुम ईर्ष्यालु हो कि अंकल मुझे ज्यादा प्यार करते हैं। पर तुम घर पर होते ही कहाँ थे। तुम्हारी तो अपनी ज़िन्दगी थी। फिर डिफेंस अकेडमी में जाने के बाद तो तुम सिर्फ़ छुट्टी-छुट्टी ही मिल पाते थे। अगर तुमने कहा होता कि मुझे अंकल के यहाँ नहीं रुकना चाहिये तो मैं कतई न रुकती। पर तुम इस फैसले के दौरान कहीं भी आसपास नहीं थे।

न फैसले के दौरान, न ही हादसे के दौरान।

देस से चली तो तुम्हारी आर्द्र आँखें मेरे सामने रही बहुत देर। फिर सोचा कि क्या सचमुच समझे हो मेरी पीड़ा? क्या एक पुरुष होकर तुम सही तौर पर औरत का महसूस करना जान सकते हो? तुमने मेरी पीड़ा को कुछ तो जाना है पर उन घावों को देख सकते हो जो मेरे भीतर बने रहते हैं। हवाई अड्‌डे पर जब मैं सबसे बाय कर रही थी तो अचानक अपना अकेला हो जाना मुझे खला था। पर फिर सोच लिया कि यह सफर मुझे अकेले ही काटना था। अनी को तो मिलना ही था। मिला भी। पर वह भी मेरे भीतर के छेद कहाँ देख पायेगा। मेरे भीतर उठने वाले ये झंझावात कहाँ देख पायेगा जो कभी तो मुझे एक हलके से कागज की तरह नितार कर ऊपर ले आते हैं तो कभी अपने घेरे में इस तरह कसते हैं कि लगता है अपनी साँसे भी मुझे बेदम कर देंगी।

तुम तो हमेशा वहाँ होते थे। हमेशा मुझे बचाने पहुँच जाते थे। माँ से, बाबूजी से, दीदियों से भी। पर जो सबसे बड़ा खतरा मेरी ज़िन्दगी में आया तो तुम कहीं दिखे ही नहीं।

क्या तुमको अंदाज़ भी है कि मेरे साथ हुआ क्या था? तुमको तो माँ-बाबूजी ने जो कहानी दी तुमने मान ली। मुझसे बस वहीं एक बार बर्दवान में पूछा था या अमरीका आने से पहले। पर क्या तुम्हें यह अंदाज़ हुआ था कि मेरा घाव इतना ज्यादा बड़ा था कि मेरे पास उनके ज़िक्र का कोई लफ़्ज़, कोई ज़रिया न था। कहती तो क्या.. कैसे कहती। अगर तुम कुरेदते रहते तो शायद मैं कह भी डालती। पर तुमने कुरेदने से घबरा गये। तुम भी कहीं असलियत से दूर रहना चाहते थे। उसका सामना करने की हिम्मत तुममें भी नहीं थी। या तुम्हारे पास मेरी तकलीफ के उपचार का कोई उपाय भी नहीं था।

कितनी अजीब बात है इस देश में किसी लड़की के साथ बलात्कार होता है तो बात खुल कर सामने आती है। लड़की के माँ-बाप भी उसका साथ देते हैं न्याय माँगने में। शर्म से सिर झुकाकर खामोश नहीं बैठे रहते। न्याय की गुहार लगाने में सिर्फ़ लड़की की अकेली आवाज़ नहीं होती। बहुत सी सम्मिलित आवाजें होती हैं। मेरी तो अपनी आवाज़ ही बंद हो गयी थी। न किसी ने मेरा मुँह खुलवाने की कोशिश की न ही इसका साहस दिलाया।

सच कह रही हूँ न। तुमको अंदाज़ तो होगा ही कि कुछ हुआ है। फिर क्यों? क्यों चुप कर गये थे? क्यों नहीं कहते रहे कि रितु बोलो...बोलो! हमारा औरत  या मर्द होना, हमारा लिंग हमारे भाई-बहन के रिश्ते से ज्यादा बड़ा हो गया था न कि उस रिश्ते की मर्यादा को बनाये रखने के लिये तुमने सवाल भी नहीं पूछा और बड़े होते हुए अंदरूनी अदलाव-बदलाव की जो दीवार हमारे बीच खड़ी हुई वह आज तक कायम है। कभी तोड़ोगे उसे? कभी पूछोगे मुझसे खुलके?

भाई-बहन के रिश्ते की मर्यादा? मेरे अंतस के मरोड़ों, मेरे जिस्म के छालों से ज्यादा बड़ी थी न!

जानते हो तुम्हारे मेरे शरीर तो एक साथ बने थे न। तुम और मैं एक शरीर भी हो सकते थे। फिर मेरी पीड़ा को तुम क्योंकर महसूस न कर सके?

या कुछ किया भी तो चुपचाप? कि मुझसे सिर्फ़ एक दो औपचारिक सवाल? बस? क्यों नहीं और पूछा।

जानते हो मेरे भीतर का वह विष खत्म ही नहीं होता। किसी महासागर सा ठाठें मारता रहता है। कौन शिव बनके धारेगा वह गरल!

कितना गाढ़ा था तुम्हारा मेरा रिश्ता। कभी लगता है कि तुमको अहसास हो गया है - चलते वक्त तुम्हारी वे आँखें...मुझसे शायद कुछ कह रहीं थीं, क्या कह रहीं थीं अजय? मुझे पूछने से भी डर लगता है। मैं खुद भी तो सब कुछ भुला देना चाहती हूँ। इसीसे भारत आने से डर लगता है। बहुत डर। पर अजय तुम तो वहाँ हो। तुमसे मिलने में डर कैसा? क्या यह डर अभी भी कायम है कि तुम भी मेरी रक्षा नहीं कर सकोगे। वक्त पर मौजूद नहीं हो पाओगे! देखा जाये तो तुम जो मेरे लिय सबसे ज्यादा अहम इंसान थे मगर तुम पे ही विश्वास न कर पायी तो भारत में रखा ही क्या है मेरे लिये! पिताजी को तो यूँ भी नहीं भाती थी। दीदियों की अपनी ज़िन्दगी है। माँ वही करेंगी जो बाबूजी कहेंगे। मेरी किसे परवाह है?

मुझे यह शिकायत भी मिलती रहती है कि खत नहीं लिखती किसी को। क्यों लिखूँ। जब कुछ कहना हो तभी लिखा जाता है खत। पर मुझे कुछ कहना ही नहीं किसी से। तुमसे कहना होता है पर खत में नहीं। सिर्फ़ जब तुम मेरे सामने हो। इसी वजह से जब भी भारत आ सकूँ, भारत आना होगा। तुमसे बतियाने। तुमसे कहने।

तुम्हारे वे कभी-कभार आ जाने वाले खत मुझे मिलते रहे हैं। अनी ने ही शायद तुम्हारे और बाबूजी के खत का जवाब दिया था। सच बताऊँ तो मैं यहाँ की ज़िन्दगी में इतनी मसरूफ़ हो गयी हूँ कि मुझे खत लिखने की सूझती ही नहीं। कुछ न कुछ हमेशा करना होता है। घर का सामान लाना है तो कालेज में पढ़ने जाना है। बहुत तरह के काम। बड़ा बेमानी सा लगता है खत लिखना। जैसे कि दुनिय भर के ढेर सारे मसले तपती धूप की तरह आपको तपा रहे हों और आप आराम से आम के पेड़ के नीचे छाया में बैठ विश्राम करते रहें। नो...आई काँट अफ़ोर्ड दैट! मुझे जरूरी काम हैं वही पहले निभाने हैं उसके बाद ही खत लिखने जैसे फुर्सत के कामों में उलझा जा सकता है।

पर तुमको वहाँ बैठे-बैठे यहाँ के दबावों की समझ भी नहीं आयेगी। वहाँ कालेज, दफ़्तर सभी कुछ यहाँ से आसान होता है। यहाँ सात घंटे की नौकरी है तो एक-एक मिनट गिन कर नौकरी में लगाना होता है। यह नहीं कि अब दोस्त आ गया तो बीच में उठ के चाय पीने चले गये या चपरासी से कहा जाओ - दो चाय ले आओ और लग गये गुफ़्तगू करने।

यहाँ ऐसा कुछ नहीं होता न हो सकता है। बहुत बार मैंने सोचा भी कि लंच के घंटे में खत लिख लूँगी पर इस कदर तब भूख और थकान चढ़ी होती है कि पूरा वक्त खाने के लिये बाहर जाने और निगलने में ही लग जाता है। तुम्हें खत लिखने की फुर्सत मिल जाती होगी पर मेरी मसरूफ़ियत का अंदाज़ लगा सकते तो अपने खतों में कभी यह इशारा न करते। शिकायत नहीं कह रही। तुम शिकायत नहीं करते। उलाहना ज़रूर दे देते हो!

यूँ तुमको खत मैंने बहुत बार लिखे बस कागज पर कभी नहीं उतार पायी। कहीं तुम मेरा मन पढ़ पाते तो मेरे पास भी उन उलाहनों के बाकायदा जवाब थे।

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