मैंने नाता तोड़ा - 2

13-11-2007

मैंने नाता तोड़ा - 2

सुषम बेदी

एक रात जब हम खाना-वाना खत्म करके सोने के कमरे में आये और मैं कपड़े बदल रही थी तो अनी ने बिस्तर में लेटते ही कहा -

“तुम इतनी उदास-अनमनी सी क्यों रहती हो? क्या हिंदुस्तान याद आता है।”

“क्या मुझे हिंदुस्तान याद आता है?” मैंने खुद से पूछा!

“नहीं अनी। मुझे हिंदुस्तान-वान कोई याद नहीं आते। मुझे तुम याद आते हो।” अचानक मैं बड़े आक्रामक से मूड में थी।

“मैं क्यों? मैं तो हरदम साथ हूँ तुम्हारे।”

“हो। लेकिन नहीं हो। मैंने सोचा या तुम मेरे भीतर झाँक सकते हो। मुझे जान सकते हो। समझ सकते हो। लेकिन कहाँ? तब पास कैसे हुए?”

“मुझे मालूम है तुम मुझे कुछ कहना चाहती हो। पर जब तक तुम खुद तैयार नहीं होगी बताने के लिये, मैं कभी भी इसरार नहीं करूँगा। तुम्हारी निजता का भी सम्मान करता हूँ मैं।” वह उठकर बैठ गया था।

“लेकिन तुमसे अलग मेरी निजता कैसी?”

“ठीक कह रही हो। सोचा नहीं था इस तरह। तो बोलो। निडर होकर बोलो।”

“मुझे बस यही कहना है कि मैं अबूझ थी। बच्ची थी। मेरा कोई दोष नहीं था। आई वाज़ इन टैन्थ गरेड! एंड दिस वाज़ माई अंकल। माई ओन अंकल। माइ लोकल गार्जियन।”

“एंड आइ हैव सफ़र्ड इनफ़ फार दैट। माइ फादर हेट्‌स मी, माइ मदर हेट्‌स मी। एवरीबडी हेट्‌स मी। अब तुम भी मुझसे नफरत करो बस।”

सहसा मेरी रुलाई छूट पड़ी। रोते-रोते पता नहीं और क्या बकती रही होऊँगी, अब कुछ याद भी नहीं। अनी खामोश रहा, सब सुनने के बाद भी कुछ पल खामोश। वह भी शायद सक़ते की हालत में था। यह सब कभी मेरे साथ हुआ... इसका अंदाज़ कहाँ था उसे!

मुझे डर लगने लगा कि मुझे सब कुछ बतलाना नहीं चाहिये था।

उसने मेरा चेहरा अपने दोनों हाथों में लिया और आगे झुक कर हल्का सा चुंबन मेरे माथे पर जड़ दिया। मुझे बाँहों में भरकर बिस्तर पर लेटा दिया।

“तभी इतनी डरी-डरी, इतनी खामोश रहती हो तुम। पगली! तुम तो बच्ची थीं तब। तुम्हारा क्या दोष? भूल जाओ यह सब। पीछे धर दो यह कड़वा अतीत। यहाँ सब कुछ नया, एक नये सिरे से शुरू होगा।”

“आइ विश यू हैड टोल्ड मी मच बिफोर.... इतने सालों की पहचान में भी मुझसे ओपरा करती रहीं। उसने जोड़ा।

मैं अब तक क्यों छुपाती रही इसका हलका सा अफसोस भी हुआ था उसे। शायद इसलिये कि उसे भला नहीं लगा कि मैं उस हद तक उसका विश्वास नहीं कर पायी पर उसने खुद फिर कहा - “हमारे समाज में अभी भी ऐसे दरिंदे हैं कि कोई भी लड़की उनकी करतूतें बतलाने की हिम्मत नहीं कर पाती। तुम्हारा यह डर भी समझ सकता हूँ।”

अब मैं बहुत हल्का महसूस कर रही थी जैसे किसी की अमानत संभाल कर रखी हो और उसे लौटा कर राहत मिल गयी हो। सुदर्शन की हार की जीत वाली कहानी का वह बूढ़ा जो घोड़े चोरी हो जाने के बाद चैन की नींद सोता है।

बहुत देर तक उसके किसी न किसी सवाल का जवाब देते हुए हमारी इस बारे में बातचीत जारी रही। कब बातें करते-करते उसकी बाँहों की गिरफ़्त के सुरक्षित संसार ने मुझे नींद की दुनिया में पहुँचा दिया। वह सुबह दफ़्तर जाने को उठा तभी मेरी नींद खुली।

“आज मत जाओ” मैंने मचलते हुए कहा।

“जाना होगा पर जल्दी आ जाऊँगा। तैयार रहना। बाहर चलेंगे खाना खाने। आज तुमको स्पेनिश रेस्तराँ लेकर चलूँगा।”

“क्या कपड़े पहनूँ?”

उसने छेड़ने के अंदाज़ में कहा “स्पेनिश।” “ओह! तुम्हारे पास साड़ी – सलवार-कमीज के अलावा यहाँ के तो अच्छे कपड़े हैं ही नहीं। काम वाली पैंट-स्कर्ट शाम के फारमल रेस्तराँ में नहीं चलेगी। तुमको यहाँ के खुबसूरत कपड़ों की खरीददारी भी करानी होगी। ठीक है सुदर सी साड़ी पहन लेना। वीकैंड पर तुम्हारे कपड़ों की शापिंग करेंगे।”

मैं सारा दिन कपड़े निकाल निकाल के खुद को सजाती रही। शाम के रंग। दिन के रंग। हल्के रंग। गहरे रंग। आइने में देखती रही कौन सी साड़ी मुझ पर कैसी फबती है। कत्थई रंग की हरे बार्डर वाली साड़ी मैंने शाम के लिये निकाल कर रख ली। साथ में मूँगे का सेट।

मुझे अनी पर बहुत-बहुत प्यार आ रहा था।

शाम को घर आया तो मैंने उसे बाँहों में घेर लिया।

जब वह घर आया तो देर हो चुकी थी। मैं एकदम तैयार यी कत्थई साड़ी में। पर मुझे न जाना बुरा नहीं लगा। मुझे सिर्फ़ अनी का साथ ही चाहिये था। वह घर या बाहर... कुछ फर्क नहीं पड़ता था। मैं तो सुबह से ही अपने मुक्त मन को मना रही थी। सेलिबरेट कर रही थी। मैंने साड़ी पर ही एप्रन बाँध के रसोईघर में खाना तैयार कर दिया। कुछ पहले से फ्रिज में तैयार रखा ही था। जब हम बिस्तर में थे तो मैं उसे निर्द्वंद्व भाव से चूम रही थी। उसके जिस्म का हर हिस्सा चूम रही थी। उसके जिस्म पर उगे घने बालों से खेलने में बहुत सुख मिल रहा था। अनी मुझे किसी बच्चे के एक निर्दोष खिलौने सा महसूस हो रहा था। जिसे वह बच्चा जैसे चाहे हाथों में मसल सकता था, मनचाहा खिलवाड़ कर सकता था और एक भरोसे के साथ कि कोई उससे उस खिलौने को छीनेगा नहीं। वह उसी का है और वह जी भर के उसके साथ खेल सकता है।

पर खेल-खेल में जब वह मेरे ऊपर आया तो फिर मेरा दम घुटने लगा मैं चिल्लायी। वह झट से उतर आया और धीरे-धीरे मुझे चूमता-सहलाता रहा। मुझे अपराध भाव महसूस हो रहा था। यह क्या हो रहा है? मैं अपने पति के साथ न सुख ले सकती हूँ न उसी को सुख दे पाती हूँ! मेरी आँख की कोरों से बूँदे चूने लगीं।

बहुत देर तक हम जागे ही रहे।

अनी ने कहा - “मे बी वी शुड सी ए डाक्टर! ए सायकायट्रिस्ट!”

“नो मुझे डर लगता है। वह क्या कर सकता है? दिस इज़ वैरी पर्सनल अनी। मैं कभी किसी डाक्टर के पास नहीं जाऊँगी।”

मुझे अनी का यह सुझाव अच्छा नहीं लगा था जैसे कि मैं कोई पागल औरत होऊँ जिसके इलाज की ज़रूरत हो!

मेरे पास भी क्या उपाय था सिवा इसके कि मेरे ही भीतर कोई ऐसी ताकत उठे जो मुझे इस दमघोट डर से बचाये!

हर आज़माइश ने तो मुझे हराया था। अब न अनी को मेरा भरोसा होगा न मुझे खुद को!

दिन फिर गुजरने लगे। हर रात हम दोनों के बीच एक पुल बन कर खड़ी हो जाती। जिसे पार करने की कोशिश कोई न करता।

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 अनी शायद खुद ही कुछ अता-पता करता रहा होगा। उसने मुझे कभी कुछ कहा नहीं। जो कुछ हमारे बीच नहीं हुआ, उसकी उसने कोशिश या शिकायत फिलहाल बंद कर दी थी। कम से कम मेरा तो यही ख्याल था। पर एक दिन अजीब घटा हम दोनों के बीच। चाहे वह घटना सालों बाद ही हुई। पर हुई और उसका होना हम दोनों को और भी करीब ले आया। पूरी तरह से!

उस रात चूमते हुए उसने धीरे से मेरे निर्वस्त्र शरीर को अपने ऊपर लिटा लिया। अब अनी मेरे नीचे था। मुझे अजीब शर्म सी लगी। मैं न.. न करती रही..”यह क्या कर रहे हो? शर्म आती है मुझे” लेकिन मिनटों में मैंने पाया में मुस्कुरा रही थी। मुझे मज़ा आ रहा था। अजीब सा सुख था यह.. अनी मेरे नीचे था और मैं एक अनहोना सा आनंद महसूस कर रही थी!

अनी की आँखें मेरे चेहरे पर जमी थीं और मैं लगातार उसी को देख रही थी। उस असीम सुख को उसने मेरे चेहरे पर देखा होगा।

बोला - “अब तो दम नहीं घुट रहा न!”

“नाऽऽऽऽऽ।” मेरे जिस्म का पोर-पोर खिला हुआ था। हर पोर से मैं अनी का सुख ले रही थी।

“कैसा लगता है?”

मुझे हँसी आ गयी - “जैसे मैं तुम्हारा बलात्कार कर रही हूँ।”

अनी मुस्कुराकर बोला- “रोज़ करना!”

अब मुझे फिर से शर्म आ गयी थी।

ओह! ऐसे सुख की तो कभी कल्पना भी नहीं कर पायी थी। मेरी कल्पनायें तो डर और अंधेरे सायों से चिंदी पड़ी थीं। शरीर भी सुख का माध्यम बन सकता है यह उसी दिन जाना था पहली बार! शरीर सिर्फ़ गर्हणा हेतु नहीं, आत्मग्लानि और आत्मरक्षा ही लक्ष्य नहीं। शरीर कोष है उन सारे सुखों का जो शायद कभी रीतता नहीं।

उसके बाद बहुत दिनों बाद अनी ने मेरे ऊपर आने की कोशिश की थी। मैं पल भर को घबरायी थी पर पता नहीं एक अजीब सा विश्वास कछुए की पीठ की तरह मजबूत संबल बना हुआ था। जिसे मैं खुद को इतने निर्द्वंद्व भाव से सौंप रही थी, जिसे मेरे मन की भावनाओं का पूरा ज्ञान था, जिसे मेरे प्यार का तनिक भी संदेह नहीं था, उसे लेकर फिर दुविधा कैसी! शायद यह अनिरुद्ध के प्यार करने का तरीका था या कि मेरे घबराये मन की तैयारी। मैं पूरी तरह से उसके लिये भी तैयार हो गयी थी। उसके सामीप्य को पूरी तरह जी रही थी। हर साँस से उसे पी रही थी। फिर भी अनी ने पूछा - “दम घुटता है?”

मैंने कहा- “ऊँहूँ..”

अब मैंने सुख पाना सीख लिया था। अनी के साथ यह रिश्ता बहुत आनंदमय था। अनी ही गुरु था मेरा और अनी ही हमसफर, साथी।

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