मैं . . .

एक सूखे हुए पेड़ की
टूटी हुई डाली हूँ,
जिसको सदियों की ग़र्द ने
अपने अंदर छुपा लिया है।

मैं . . .

एक टूटे हुए फूल की
मसली हुई कली हूँ,
जिसको समाज ने
कुचल कर, दफ़न कर दिया है।

मैं . . .

सूखी हुई सरिता की
टूटी हुई नाव हूँ,
जिसको भाग्य ने
कफ़न उढ़ा दिया है।

मैं . . .

सिर्फ़ मैं
वह इंसान हूँ, जिसको
काँटों से मुहब्बत है और
फूलों से नफ़रत है

क्योंकि . . .
मैं सिर्फ़ मैं
टूटी हुई डाली
मसला हुआ फूल
और एक ठंडी लाश हूँ, 
जिसको विधाता ने, शायद
सहनशीलता की मिट्टी से बनाकर
लोगों के विष को पीने
के लिए भेजा है
मुझे और सिर्फ़ मुझे।

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