मानवता नहीं रोएगी

01-10-2019

मानवता नहीं रोएगी

अलका प्रमोद

रजत आज सुबह की फ़्लाइट से ही अमेरिका से लौटे और शाम को ही अपने बचपन के मित्र नमन ने मिलने चल दिये। इधर लगभग साल भर से उनके नमन से सभी संपर्क के सूत्र टूट गये थे अन्यथा प्रायः फोन पर या मेल और फ़ेसबुक से उससे सम्पर्क हो ही जाता था। अचानक नमन से सभी सम्पर्क सूत्र टूट गये थे। न तो उनका मोबाइल मिलता था न ही फ़ेसबुक पर उसका अता पता था। रजत ने किसी अन्य मित्र से पता करने का प्रयास किया तो बस इतना ही ज्ञात हुआ कि वो अपना अस्पताल आदि बेच कर कहीं चला गया है। रजत ने बहुत प्रयास किये पर इतनी दूर बैठ कर उनके अन्य मित्रों से वैसे भी विशेष सम्पर्क रह नहीं गये थे, एक नमन ही था जो उनका बाल्यकाल से ही प्रिय मित्र था और वो उससे सम्पर्क में रहते थे पर वह तो अचानक ही विलुप्त हो गया था। आज जब वो भारत आये तो स्वयं को रोक नहीं पाये और चल पड़े उसकी खेाज में।

रजत नमन द्वारा स्थापित अस्पताल ‘आरोग्य चिकित्सालय’ के सामने खड़े थे। वहाँ अस्पताल तो था उसका नाम भी वही था पर उसके डॉक्टर की नामपट्टिका पर नाम के स्थान पर किन्हीं डॉक्टर धवन के नाम की पट्टिका लटक रही थी, जो रजत की आँखों में शूल सी चुभी। उन्होंने द्वार के प्रहरी से पूछा, "इसके मालिक डॉक्टर नमन कहाँ गये, ये अस्पताल तो उन्हीं का है?”

उसे प्रहरी ने निर्लिप्त भाव से ऊबे-ऊबे कहा, "इहाँ के मालिक तो डॉक्टर धवन हैं।"

"पर पहले तो डॉक्टर नमन थे," रजत ने कहा।

"हमको नहीं पता, हम छह महीने पहले आये हैं और तब से इन्हीं डॉक्टर साहब को जानते हैं वही इसके मालिक हैं।”

रजत ने डॉक्टर धवन से मिल कर ही स्थिति जानना उचित समझा। उसने वहाँ बैठी रिसेप्शनिस्ट को अपना कार्ड देते हुए डॉक्टर धवन से मिलने की इच्छा जतायी। रजत को डॉक्टर धवन मिलने के लिये प्रतीक्षा में बैठने का एक-एक क्षण भारी लग रहा था पर विवशता थी।

कुछ देर बाद उसका बुलावा आया। डॉक्टर धवन ने उनका स्वागत करते हुए खड़े हो कर हाथ मिलाया, "आय एम डॉक्टर विनय धवन।"

"आय एम डॉक्टर रजत वर्मा न्यूरो सर्जन, प्रैक्टिसिंग इन अमेरिका।"

"हाँ आप का कार्ड देखा। कहिये मैं आप की क्या सहायता कर सकता हूँ?"

डॉक्टर धवन ने उसे प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा तो रजत ने स्पष्ट किया कि वो रजत का मित्र है और लम्बे समय से उसका कोई समाचार न होने के कारण वो उसका पता लगाने आया है।

डॉक्टर धवन ने एक लम्बी साँस लेते हुए कहा, "देखिये डॉक्टर रजत आप उनके मित्र हैं और मैं भी डॉक्टर होने के नाते उनसे सहानुभूति रखता हूँ पर अब उनकी जो स्थिति है उसमें उनसे मिल कर आपको प्रसन्नता नहीं होगी।"

"मतलब क्या हुआ नमन को?" रजत का हृदय अनहोनी की आशंका से धड़क उठा।

डॉक्टर धवन ने जो बताया उसने डॉक्टर रजत के झिंझोड़ कर रख दिया। लगभग एक वर्ष पूर्व यह अस्पताल डॉक्टर नमन श्रीधर का ही था और उनके यश का परचम गर्व से सिर ऊँचा किये लहरा रहा था। दूर-दूर से मरीज़ उनका नाम सुन कर आते थे। उनके अस्पताल में इलाज के लिये नम्बर मिलना भाग्य की बात होती थी। डॉक्टर नमन जैसे अपने काम के लिये समर्पित इंसान कम ही होते हैं। वह अपने जीवन का अधिकांश समय अस्पताल को ही देते थे।

एक दिन एक लगभग 80-82 वर्ष के एक मरीज़ को ले कर कुछ लोग आये। डॉक्टर के सहयोगी डॉक्टर गुप्ता ने उनका निरीक्षण किया, जाँच की तो पता चला कि उनकी किडनी ख़राब है, लिवर भी ख़राब है और स्थिति काफ़ी नाज़ुक है। डॉक्टर गुप्ता ने मरीज़ के साथ आये परिजन से कहा, "मरीज़ की स्थिति निराशाजनक है।" उन्होंने उस मरीज़ को भर्ती न करने का सुझाव दिया।

मरीज़ के परिजन उस अस्पताल का यश सुन कर ही इतनी दूर से आये थे अतः वह वापस क्यों जाते? किसी स्टाफ़ की राय पर वो डॉक्टर नमन से मिले। उनमें से एक ने डॉक्टर साहब से हाथ जोड़ कर अनुरोध किया, "डॉक्टर साहेब आप का नाम सुन कर ही हम दूर से आये हैं, अब हमें निराश न करें, हमें विश्वास है कि आप का हाथ लगेगा तो हमारे दद्दू ठीक हो जाएँगे।"

डॉक्टर नमन ने समझाया, "देखिये ऐसा नहीं है कि हम उनका इलाज करना नहीं चाहते, हमारा तो काम यही है पर आपके मरीज़ की स्थिति गंभीर है उनकी स्थिति और आयु देखते हुए उनका ठीक होना कठिन है।"

"हमें विश्वास है डॉक्टर आपका हाथ लगेगा तो ठीक हो जाएँगे।"

डॉक्टर उनके अनुनय विनय को ठुकरा नहीं पाये और उन्होंने उनके इलाज के लिये सहमति दे दी। चरणदास को चिकित्सा के लिये अस्पताल में भर्ती कर लिया गया।

डॉक्टर नमन ने अपनी पूरी योग्यता अनुभव का उपयोग करते हुए समर्पित भाव सेे चरणदास का इलाज प्रारम्भ किया। मरीज़ के परिजनों का विश्वास पूर्णतया ग़लत नहीं था। डॉक्टर नमन की देख-रेख में चरणदास की स्थिति में थेाड़ा-बहुत सुधार होने लगा। यद्यपि स्थिति अभी भी गंभीर ही थी संकट टला नहीं था। कभी आशा की किरण चमक जाती तो कभी निराशा के बादल हावी हो जाते। लगभग दो महीने ऐसे ही धूप छाँव का खेल खेलते व्यतीत हो गये।

रात का समय था, इमरजेंसी ड्यूटी पर डॉक्टर नमन अपने कक्ष में थे रात की पाली में एक नर्स और वार्ड ब्वाय स्टूल पर बैठे ऊँघ रहे थे, शेष स्टाफ़ को सुबह आना था। उस काली रात की सुबह सूर्य उदित तो हुआ पर आशा की किरण साथ नही थी चरणदास की साँसें उखड़ने लगीं। जब तक डॉक्टर नमन के कक्ष में उन्हें सूचित किया गया और वह मरीज़ के बेड तक पहुँचे उस मरीज़ की साँसें उससे अपना पल्ला निष्ठुरता से छुड़ा कर विलुप्त हो गई थीं।
 डॉक्टर ने आ कर निरीक्षण करके उसे मृत घोषित कर दिया। वह मरीज़ के परिजन से बोले, "आय एम सारी मैं आप के मरीज़ को बचा नही पाया।"

नर्स ने कहा, "आप इन्हें ले जाने का इंतज़ाम करिये और हाँ जाने से पूर्व बिल वग़ैरह चुका दीजियेगा।"

डॉक्टर नमन तब तक अपना दस्ताना उतार कर हाथ धो कर मुड़े ही थे कि अचानक उन पर ताबड़-तोड़ लात-घूँसे पड़ने लगे।

"साले हमारे दद्दू की जान ले ली,बड़ा नाम था तेरा, पर तू तो बस लुटेरा निकला।" 

उसके बाद डॉक्टर को कुछ कहने या बचने का अवसर ही नहीं दिया और वो सब अपने दद्दू के अंतिम दर्शन के बजाए डॉक्टर साहब को घेर कर उन पर चोट पर चोट करने लगे। वार्ड ब्वाय इस अप्रत्याशित घटना से घबरा कर बदहवास सा वहाँ से लोगों को बुलाने भागा। डॉक्टर नमन सहायता की गुहार ही लगाते रह गये।

जब तक यह समाचार अस्पताल के लोगों तक पहुँचता, कोई घटना की वस्तुस्थिति को समझ पाता और डॉक्टर नमन की सहायता करता डॉक्टर नमन लहु-लुहान बेसुध हो गये थे।

कुछ ही देर में अस्पताल में तहलका मच गया था सारे मरीज़ उनके परिजन, स्टाफ़ अन्य डॉक्टर सब एकत्र हो गये थे विचित्र अफरा-तफरी मची थी। पर अफरा-तफरी के मध्य उस मृत मरीज़ को उसके परिजन कब ले भागे किसी ने ध्यान नहीं दिया; वो तो सब डॉक्टर नमन के उपचार में व्यस्त हो गये और चरणदास के परिजनों ने इसका भरपूर लाभ उठाया।

कुछ देर में किसी की सूचना पर पुलिस आ गई। पूछताछ हुई अंत में अपराधी पकड़े भी गये, उन पर मुकदमा चला।इधर डॉक्टर नमन की गंभीर स्थिति ने सभी को दुखी कर दिया था, लोग अपने अपने ढंग से उनके स्वस्थ होने की दुआ कर रहे थे उधर आक्रमणकारियों के इस क़दम पर शहर में चर्चा आम थी। कोई उन्हें कोस रहा था तो कोई आजकल के डाक्टरों की व्यवसायिक भूमिका पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा था।

न जाने किस दबाव के चलते अपराधियों को सबूतों और गवाहों के अभाव में छोड़ दिया गया। सच तो यह था कि उनकी उँची पहुँच वाले सम्पर्कों के कारण जो थोडे़ बहुत गवाह थे वह भी पीछे हट गये और साक्ष्यों को या तो मिटा दिया गया या अपर्याप्त माना गया। सारांश यह था कि प्रभावशाली सूत्रों के दबाव में न्याय का पलड़ा झुक गया और वो बरी हो गये।

डॉक्टर धवन ने बताया, "वो बरी होते या दंड के भागीदार होते पर डॉक्टर जैसे अपने काम के प्रति समर्पित निर्दोष इंसान को न जाने किस दंड के विधान के तहत आजीवन दंड भुगतना पड़ा।"

"क्यों क्या हुआ नमन को वो बच तो गये न?" रजत ने व्यग्र होते हुए पूछा।

"हाँ बच तो गये पर मात्र साँस लेने को यदि बचना कहते हैं तो वो बच गये हैं।"

"वो कहाँ है उसका कोई पता है तो बताइये, मैं उसका अच्छे से अच्छा इलाज कराऊँगा," रजत ने कहा।

डॉक्टर धवन ने कहा, "डॉक्टर रजत मैं आपकी भावना का सम्मान करता हूँ, ऐसा नहीं है कि किसी को उनकी चिन्ता नहीं है। उनके पूरे स्टाफ़ ने उनकी पत्नी ने और परिवार ने अपनी पूरी क्षमता भर उनकी चिकित्सा कराने का प्रयास किया। पर आप तो जानते हैं कि डॉक्टर भी इंसान होता है और उसकी क्षमता की भी एक सीमा होती है। डॉक्टर नमन को ऐसी जगह चोट लगी कि उनका स्नायु तंत्र डिस्टर्ब हो गया अब वो न तो बोल सकते हैं न चल सकते हैं बस बिस्तर पर पड़े रहते हैं। कोई आत्मीय उनके निकट जाता है तो उनकी आँखों से बहते अश्रु उनके विषाद की कहानी कहते हैं।"

"अब यह अस्पताल आप ने ले लिया है?"रजत ने पूछा।

"हाँ किसी न किसी को तो इसे लेना ही था मुझे इतना प्रसिद्ध स्थापित अस्पताल मिल गया तो मैंने इसे ले लिया," डॉक्टर धवन ने कहा।

"डॉक्टर काश अगर वो लोग जिन्होंने डॉक्टर नमन का यह हाल किया वो समझ जाते कि डॉक्टर नमन का कोई दोष नहीं उनके मरीज़ का इलाज अब संभव नहीं था...," रजत ने कहा।

"डॉक्टर ऐसा नहीं है कि जानते नहीं थे कि उनका मरीज़ अब कुछ दिनों का मेहमान है, डॉक्टर नमन ने तो उन्हें पहले ही बता दिया था। उन्होंने अनुनय विनय करके ही अपने दद्दू को भर्ती कराया था।"

"फिर उन्होंने ऐसा क्यों किया?"

डॉक्टर धवन ने कहा, "सुनने में अविश्वसनीय लगता है पर जो मैंने सुना वो यह था कि दो महीने भर्ती रहने पर उस मरीज़ के अस्पताल में रहने की फ़ीस इलाज का व्यय आदि मिला कर लाखों का बिल बना था और वह बिल न देना पड़े इस लिये उसके परिजनों ने उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे वाली कहावत पर अमल किया था और डॉक्टर को ही दोषी सिद्ध कर दबाव बनाया था।"

"पर इसके लिये उनकी जान से खेलने की क्या आवश्यकता थी?” डॉक्टर रजत ने आवेश में कहा।

"संभवतः उन्होंने मात्र मारपीट करने की सोची होगी, पर जब शोर मचने पर डॉक्टर की सहायता के लिये लोग आ गये और उन पर भी चोट पड़ने लगी तो आवेश में उन्होंने डॉक्टर को अधिक ही मार दिया होगा।"

रजत ने डॉक्टर धवन से नमन का पता लिया और उनसे मिलने उनके घर गये। अपने बचपन के मित्र का यह हाल देख कर उनकीं  आँखें भीगने से बच न पायीं। उसने निश्चय कर लिया कि जब तक अपराधी को दंड नहीं मिलता, वो धरती आसमान एक कर देंगे। रजत ने तय किया कि डाक्टरों की एक सभा बुलाएँगे कि और वो निर्णय लेंगे कि आगे से किसी भी गंभीर मरीज़ का इलाज नहीं करेंगे और फ़ीस पहले ही जमा करवा लेंगे। उन्होंने शहर के सभी डाक्टरों से सम्पर्क करना प्रारम्भ कर दिया। नमन ये सब देख कर बेचैन था पर वह कुछ कह नहीं पा रहा था, एक दिन नमन ने इशारे रजत से कुछ कहा। 

रजत कुछ समझ नहीं पा रहा था तब नमन ने रजत की हथेली पर अपने काँपते हाथों से लिखा ‘भारती’। पहले तो रजत कुछ समझा नहीं फिर अचानक उसके मस्तिष्क में अतीत कौंध गया गया जब वह और रजत स्कूल में पढ़ते थे और उनके पाठ्यक्रम में एक कहानी, डाकू खड्ग सिंह और बाबा भारती की कहानी जिस पर वह प्रायः बहस करते। जिसमें बाबा भारती ने डाकू से कहा था कि उसने उन्हें धोखा दिया यह बात वह किसी से न बताए नहीं तो कोई किसी की सहायता नहीं करेगा। 

इस कहानी पर रजत और नमन की सदा ही असहमति होती थी। नमन के अनुसार बाबा का विचार बिल्कुल सही था, क्योंकि यदि लोगों को पता चल गया कि किस प्रकार बाबा ने उस डाकू की मानवता के नाते उस पर विश्वास कर उसकी सहायता की और उस डाकू ने उनके विश्वास का गला घोंट कर उन्हे धोखा दिया यह बात प्रचारित होने से लोग इंसान की सहायता करना छोड़ देंगे; पर रजत का सोचना था कि बाबा का विचार अव्यवहारिक था। जिस प्रकार डाकू ने बाबा को धोखा दिया वह सबको पता होना चाहिये जिससे शिक्षा ले कर वो सावधान हो जाएँ।

रजत समझ गये कि नमन क्या कहना चाहते हैं वह भावुक हो गये, उनका यार नमन अभी भी वैसा ही है बिल्कुल नहीं बदला अपना जीवन नष्ट कर के भी उसके विचार उसकी आस्था नहीं बदले, सच में वो महान है।

आज रजत निश्चय नहीं कर पा रहे थे कि अब उनका अगला क़दम क्या होना चाहिये? निश्चय ही इस प्रकार की घटनाओं को रोकना होगा अपराधी को सज़ा दिलाने का प्रयास भी करना होगा पर आज पहली बार उसे रजत के विचारों से सहमत होने का मन कर रहा था क्योकि उसका अन्तर्मन भी यही कह रहा था कि डॉक्टर गंभीर मरीज़ों का इलाज करना छोड़ देंगें और तब क्या सिसकती मानवता का रुदन कोई रोक पाएगा?

आज रजत नमन को इलाज के लिये अमेरिका ले जा रहे थे, यदि उसको कुछ हो गया तो एक वह ही नहीं वो सारे जीवन संकट में हो जाएँगे जिनको उस जैसा सक्षम डॉक्टर जीवन देगा। नमन के चेहरे पर आज संतुष्टि थी कि अब मानवता नहीं रोएगी।

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