लेखन प्रतिभा की धनीः डॉ शैलजा सक्सेना

01-12-2019

लेखन प्रतिभा की धनीः डॉ शैलजा सक्सेना

डॉ. सुधांशु कुमार शुक्ला

डॉ. शैलजा सक्सेना का नाम हिंदी समाज प्रेमियों के बीच बहुआयामी व्यक्तित्व से भरी कवयित्री, कहानीकार, निर्देशिका और मझी साक्षात्कारा के रूप में चर्चित है। भारत के एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय में अध्ययन-अध्यापन करने के उपरान्त कनाडा में रची-बसी डॉ. शैलजा प्रवासी साहित्यकारों की अग्रण्यी पंक्ति में आती हैं। उनसे मेरा परिचय पोलैंड में आने पर हुआ। लगातार अनेक कार्यक्रमों को देखने के पश्चात् उनकी तीन कहानियाँ चाह, कागज़ की कश्ती और शार्त्र पढ़ीं। तीनों कहानियाँ अपने अलग-अलग अंदाज़ के कारण रोचक लगीं। कहानियाँ लघु होने के कारण एक ही बैठक में पढ़ ली गईं। तीनों कहानियाँ उम्दा हैं। कहानी का मूल तत्व जिज्ञासा प्रारंभ से अंत तक पाठक को बाँधे रखता है। तीनों कहानियों में दो-तीन पात्र हैं, इतने कम पात्रों का परस्पर ताना-बाना रोचकता पूर्ण परिवेश को बनाए रखता है। कहानीकार शैलजा लोक से जुड़ी होने के कारण, भाषा में लोक भाषा, नए उपमानों और आँचलिकता की झलक अनायास दर्शाती चलती हैं। भाषा के साथ स्वाभाविकता का गुण उनकी कहानियों को चार चाँद लगा देता है।

कागज़ की कश्ती माँ-बेटे, गाँव-शहर और दो पीढ़ियों के अन्तराल में बसी जीवन की नैसर्गिकता को दर्शाती है। नरेटर अर्थात् कहानीकार एक माँ जो गाँव से शहर के फ़्लैट में मजबूरी में आई है। उसे गाँव, अपना लोक अच्छा लगता है। उसे गाँव के हल्दी-अक्षत के पर्व अच्छे लगते हैं। सब के साथ पेड़-पौधों को बचाना अच्छा लगता है। शहर में दुनिया केवल फ़्लैट की ही है। बेटे को स्वयं का समय बचाना, अपने बेटों के लिए घर पर माँ का छोड़ना हितकर लगता है। बेटे की ज़िद के सामने माँ को झुककर शहर में उसके पास रहना पड़ता है। माँ का बच्चों के सिर में तेल मालिश करना, कहानियाँ सुनाना, ताश, तो कभी गिट्टे खेलना शहरी वधू को नहीं भाता। बारिश के दिनों में बच्चों को लेकर कागज़ की कश्ती को तैराना, बच्चों को खेलता देखकर बेटा और बहू की आँखों में बचपन उतर आता है, आन्तरिक सुख की अनुभूति सभी को होती है।

यह कहानी बदलते परिवेश, बदलते लोगों को दर्शाती है। गाँव की धरती पानी पीकर लहलहाती है, लेकिन शहर की कंकरीट की सड़कें पानी नहीं पीती हैं, ना ही लहलहाती है। वे तो मात्र बाढ़ का रूप लेती हैं। माँ पहले अपने बेटे के सिर में तेल की मालिश करती थी, उसके साथ खेलती थी। अब वह अपने पोतों के साथ वही सब कुछ करती है। खेल का, बचपन का, संजीदगी का भाव हमेशा एक सा रहता है। उसका स्थान और उम्र से कुछ लेना-देना नहीं है। इस कहानी का मूल उद्देश्य जीवन की प्राणशक्ति अर्थात् अपनी सहजता, स्वाभाविकता और बचपन की मासूमियत को बनाए रखना है। यह मासूमियत माँ, बेटे, बहू और पोतों की आँखों में नज़र आती है। जिज्ञासा रोचकता से भरी यह कहानी हमें अपनी ही लगती है।

चाह कहानी पति-पत्नी के अर्थात् दाम्पत्य जीवन के रिश्तों की कहानी है। पति-पत्नी अर्थात् पुरुष सत्ता और पत्नी अर्थात् स्त्री सत्ता की टकराहट को प्रतिध्वनित करती है। यह कहानी स्त्री-पुरुष के सार्वभौमिक, सार्वकालिक, सार्वदेशिक सत्य को उद्घाटित करती है। राज और गीता कहीं के भी हो सकते हैं, परिवेश कहीं का भी हो। उसमें अहं की टकराहट, शब्दों को पकड़कर तर्क-वितर्क की शैली, स्त्री पुरुष को सामान्य नहीं रहने देती है। हमारा पढ़ना, बौद्धिक सोच हमें हर शब्द के प्रयोग की प्रासंगिकता को लेकर क्यों? कैसे? किया की टकराहट में उलझा कर रिश्तों की अहमियत और संवेदना की तासीर को शुष्क बना देती है। यह कहानी भाषायी खेल में अपनी छोटी सी चाह की हत्या को दर्शाती है। राज और गीता का घर के लोगों और कामों की भीड़ से निकल कर झील पर आना पति-पत्नी के रिश्तों को दर्शाता है। दोनों की चाह कुछ पल एक साथ बैठकर, अपने आप को खुला छोड़ने को दर्शाती है। परन्तु राज का अधलेटा सा गीता के पास होना, 'आए हुए दो मिनट नहीं हुए और तुम शुरू हो गए।' गीता का राज को यह कहना और राज का 'मैंने क्या कहा' अपनी ख़ुशी, अपनी चाहत को बदरंग कर देते हैं। पति राज का अधलेटा होना, पत्नी को निहाराना, देखना, सुखद होना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पत्नी गीता का पत्नीत्व जाग उठा यह तो बस शुरू हो गए। भाषायी अहंकार प्रश्नों की झड़ी लगा देता है, दोनों ओर से और सुखद वातावरण, सुखद अनुभूति विषाक्त बनती चली जाती है। 'यहाँ तो आओं', 'क्यों', क्यों क्या पास आने में क्या हर्ज है? 

राज और गीता का आपसी संवाद प्रेम की जगह अपने-अपने अहंभाव के कारण केवल शब्दों को पकड़कर बाल की खाल निकालने में तर्क-वितर्क करते हैं। फ़ायदे और हर्ज़ की चिंता एक दूसरे के प्रति नए-नए प्रश्नों को जन्म देती है। राज का गीता के साथ संबंध समसामयिक परिवेश में विषैले तनाव, बिखराव, अलगाव की स्थिति को दर्शाता है। राज पति होने के कारण सदैव अपनी रुचि, अपने अनुसार चलाना चाहता है। भागती-फिसलती आधुनिक जीवन शैली में हर कोई स्वयं के अनुसार 'कुछ चाहत रखना चाहता है।', 'यही कुछ' होने का भाव गीता में होना राज को पसंद नहीं है। स्त्री पुरुष के संबंधों की बखिया उधेड़ दी गई है, इस कहानी में। इस कहानी को पढ़ने के बाद मोहन राकेश के आधे-अधूरे नाटक की संवेदना मस्तिष्क में घूमने लगती है। अपने अधूरेपन की तलाश, पूर्णता की चाह समाज को कैसे विषाक्त बना रही है। शैलजा जी की भाषा की कलात्मकता अद्भुत है, संबंधों के अनुरूप नए प्रतीकों, उपमानों को गढ़ती हैं, जिससे कहानी और भी जीवंत बन गई है। पनियाला स्वर, कतरा कतरा मुहब्बत बन कर, दुनियावी व्यवहार, चट्टान होना आदि का प्रयोग अद्भुत है। भागम-भाग ज़िंदगी को दर्शाती शैलजा की कहानी आधुनिक बोध से परिपूर्ण है। मानव मशीन बन कर रह गया है, केवल शब्दों के आदेश को रोबोट की तरह ग्रहण करता है, जिसके कारण वह जो उसके पास है, उसका भी आनंद नहीं ले पाता है। जो है उसकी परवाह नहीं, जो नहीं है उसके लिए परेशान हैं। साथ ही साथ पुरुष के अहंभाव मैं करता हूँ को बहुत सुंदर तरीके से राज के रूप में चित्रित किया है। कहानी की सार्थकता उसके बहने के साथ-साथ पाठकों को बहा देने में है। 

शार्त्र युगांडा की पृष्ठभूमि से उपजी दक्षिणी अफ़्रीकन महिला शार्त्र की कहानी है। युगांडा और तंज़ानिया के बीच आपसी युद्ध, तनावग्रस्त जीवन और यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ़्रंट की भूमिका से बदलती युगांडा की स्थिति को दर्शाती यह कहानी स्त्री-मनोविज्ञान को भी दर्शाती है। केवल दो पात्रों के माध्यम से रची कहानी में नरेटर अर्थात् कहानीकार और शार्त्र के बीच वार्तालाप का होना कहानी को जिज्ञासा और रोचकता से भर देता है। नौकरी के लिए आई शार्त्र लूले लेखिका की कम्पनी हेल्थ केयर (स्वास्थ्य देखभाल) में निजी सहायक के पद पर साक्षात्कार देने आती है। उसके नाम का अर्थ अर्थात् ख़ुशी, प्रसन्नता सुनकर लेखिका आगे व्यक्तिगत बातें भी करने लगती है। तुमने नर्स का कोर्स भी किया है, कहीं तुम फिर नर्स बनना चाहो और यह नौकरी छोड़ दो। शार्त्र लूले का कहना कि मेरी माँ का देहान्त हो गया है, वह मेरे लिए 'अफ़सोस करने की नहीं गर्व करने योग्य महिला थीं। मेरी माँ में सब्र था, वह मुझे डॉक्टर बनाना चाहती थी पर मैं डॉक्टर नहीं बनना चाहती थी, उसने मुझे नर्स का कोर्स करवाया, ताकि मैं बाद में रुचि होने पर मेडिकल की पढ़ाई में रुचि लेने लगूँ। मेरी माँ के जीवन-मृत्यु ने मुझे बिना शर्तों के जीवन जीना सिखाया है। वह अपने देश में डॉक्टरों की कमी के कारण मुझे डॉक्टर बनाना चाहती थीं। हम उसे बीमार, असहाय समझते थे, लेकिन वह देश के लिए यूनाइटेड नेशनल लिवरेशन फ़्रंट में काम करती थी। यह बात उसने किसी को नहीं बताई, उसकी बीमारी से ही मुझे पता लगा। शार्त्र लूले का मानना है कि हम बड़े विश्वास से कहते हैं कि हम इसे जानते हैं, लेकिन क्या हम किसी को जान पाते हैं। भीतरी दुनिया में मनुष्य क्या-क्या रचता है, यह कोई नहीं जानता। मुझे बड़े और छोटे ओदे से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। वह जानती है कि इतना बताने पर शायद उसे नौकरी पर ना भी रखा जाए। वह अंत में मुस्कुराते हुए अपने नाम की सार्थकता अर्थात् प्रसन्नता, खुशी जाहिर करती चली जाती है।

यह कहानी शार्त्र लूले की माँ के धैर्य और देश प्रेम को दर्शाती है। युगांडा की हालत बहुत अराजकतापूर्ण थी। प्रत्येक परिवार के एक सदस्य को शाही सेना में भर्ती होना पड़ता था। उसने अपने देश के लिए अपनी चुप्पी, अपने मन को मज़बूत करके अपनी स्थिति बच्चों के सामने नहीं आने दी। अपनी बेटी शार्त्र को वह डॉक्टर बनाकर देश के लोगों का उपचार करवाना चाहती थी। ऐसी माँ की संतान शार्त्र को बिना शर्तों का जीवन जीना अच्छा लगता था। 

कहानीकार की भाषा की रवानगी और नए मुहावरों के कारण कहानी अधिक प्रभावशाली बन गई हैं। आवाज़ में सेंध लगाना, काली दुनियादारी आदि। कहानीकार की आँखों की भाषा की समझ अचूक है। आँखों के भावों को पढ़ने-समझने में निपुण होने के कारण उनकी तीनों ही कहानियाँ अपने पात्रों को जीवंत रूप में प्रस्तुत करती नज़र आती हैं। हमें यह कहानियाँ अपने परिवेश में घटित नज़र आती हैं। शैलजा जी का संवेदना जगत् अद्भुत है, यह कहना अनुचित न होगा कि उनकी कहानियाँ सभी दृष्टि से खरी उतरती हैं।

1 Comments

  • डॉ. सुधांशु कुमार शुक्ला जी ने प्रवासी साहित्यकारों की समीक्षा पर जो अपनी लेखनी चलाई है वह सराहनीय है। डॉ. शैलजा का कार्य और डॉ. शुक्ला की समीक्षा सोने पर सुहागा है। दोनों को बहुत-बहुत बधाई डॉ. नीरज भारद्वाज

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