खोटा सिक्का

अलका प्रमोद

रंजन बैठा बैठा गेंद उछाल रहा था तभी मनी ने आ कर कहा, "रंजन रंजन चलो फिर एक अंकल-आंटी आये हैं देखें किसको ले जाते हैं इस बार।"

"आये हैं तो हम क्या करें हमें ये अंकल-आंटी लोग हमें बिल्कुल अच्छे नहीं लगते।"

"क्यों इतने अच्छे कपड़े पहनते हैं, गाड़ी से आते हैं, हम सब को खाने को देते हैं। चलो देखें तो वह हमारे लिये क्या-क्या लाये हैं," मनी ने कहा। वह जाने को उतावला हो रहा था, उसे भय था कि कहीं ऐसा न हो सब बच्चे उपहार मिठाई आदि ले लें और उसके लिये बचे ही नहीं।

रंजन बोला, "लेकिन उसके बाद हमारे किसी भाई-बहन को अपने घर ले जाते हैं अपना बेटा या बेटी बना कर।" 

"सच कह रहे हो फिर हमारा एक भाई या बहन हमसे बिछड़ जाएगा," मनी ने उसके पास बैठते हुए कहा।

मनी ने आशा भरे स्वर में कहा, "चलो चलें तो, क्या पता वह हमीं को ले जाएँ तब तो मज़ा ही आ जाएगा; हमारे भी मम्मी-पापा होंगे, घर होगा।"

रंजन बोला, "अरे बुद्धू वो सुंदर वाले बच्चे ले जाते हैं; तुम कितने काले हो और मेरा तो एक पैर ही नहीं है," कहते-कहते अपनी असमर्थता पर रंजन को ग़ुस्सा आ गया उसने हाथ में पकड़ी गेंद इतनी ज़ोर से फेंकी कि वह मृदुला जी की खिड़की से जा टकरायी और शीशा टूट गया। यह देख कर दोनों बच्चे डर गये। अब तो उन्हें डाँट पड़ेगी हो सकता है मार भी पड़े। तभी मृदुला जी वहाँ आयीं और उन्होंने पूछा, "गेंद किसने फेंकी है मेरी खिड़की पर?"

मनी ने डर कर कहा, "माँ मैने नहीं फेंकी।"

मृदुला जी ने रंजन से पूछा, "रंजन तुमने फेंकी है न गेंद?"

रंजन आखें झुकाए खड़ा रहा, मृदुला जी ने कहा "तुमने गेंद क्यों फेंकी?"

रंजन तब भी कुछ नहीं बोला तब मृदुला जी ने पूछा "क्या हुआ ग़लती से लग गयी क्या?"
 
रंजन ने कहा, "नहीं मैंने फेंकी है।"

उसकी ढिठाई देख कर मृदुला जी को आश्चर्य भी हुआ और क्रोध भी आया उन्होंने पूछा, "क्यों फेंकी, क्या तुम्हें पता नहीं कि शीशा टूट जाएगा?”

"हमें ग़ुस्सा आ रहा था इसलिये।"

"क्यों, ग़ुस्सा क्यों आ रहा था?"

"यह अंकल-आंटी क्यों आते हैं हमें अच्छे नहीं लगते," उसने बिना किसी भूमिका के कहा। 

मृदुला जी ने कहा, "यह तो कोई बात नहीं कि तुम्हें अंकल-आंटी नहीं पसंद तो तुम कुछ भी करोगे।" मृदुला जी ने कमला को बुलाया और कहा, "रंजन को इसके कमरे में ले जाओ आज के मेहमान जो उपहार लाये हैं रंजन को नहीं दिये जाएँगे।"

कमला रंजन का हाथ पकड़ कर उसे उसके कमरे में ले गयी और कहा कि "आज तुम यहीं रहोगे निकलोगे नहीं" यह कह कर कमला ने कमरा बाहर से बन्द कर दिया।

रंजन को रोना आ गया उसका मन कर रहा था कि जो अंकल-आंटी आए हैें उनको भगा दे। उसको चिंकी की याद आ रही थी, एक वही थी जो उसको प्यार करती थी, उसकी सबसे अच्छी दोस्त थी।जब सारे बच्चे उसके एक पैर न होने पर उसे चिढ़ाते और उसे खोटा सिक्का कहते तो चिंकी उन सबसे लड़ जाती और कहती "तुम सब खोटे सिक्के हो रंजन तो सबसे अच्छा है, वह मेरा सबसे अच्छा दोस्त है।" 

एक दिन वह टॉफ़ी का रैपर खोल कर मुँह में डालने जा ही रहा था कि जब टिंकू उसकी टॉफ़ी छीन कर भाग गया। रंजन उसको पकड़ने दौड़ा तो लड़खड़ा कर गिर गया तब बजाए इसके कि कोई उसे उठाता सब हँसने लगे। बस चिंकी आयी और उसका हाथ पकड़ कर उठने में सहायता की और फिर अपनी फ्राक से उसके आँसू पोंछे। चिंकी की दोस्ती उसके सारे दुख दूर कर देती थी।

पर उसका सुख बहुत दिन नहीं रह पाया एक दिन एक अंकल-आंटी आये और उसे अपने साथ बेटी बना कर ले गये। वह थी ही इतनी प्यारी कि किसी को भी पसंद आ जाए।

उसने चिंकी से कहा था, "मुझे छोड़ कर मत जाओ।"

चिंकी ने कहा उसे जाना तो होगा पर उसने वादा किया था कि वह उससे मिलने आती रहेगी और अपने नये मम्मी-पापा से कहेगी कि उसे भी अपना बेटा बना लें। रंजन प्रतीक्षा करता रहा कि चिंकी आएगी और उसे भी ले जाएगी पर चिंकी नहीं आयी उसने माँ से भी पूछा तो वो बोली, "अरे उसे अपना घर-परिवार मिल गया अब वह कभी नहीं आएगी उसे भूल जाओ।"

सच कहा था माँ ने चिंकी कभी नहीं आयी उसने मनी से कहा, "मनी लगता है चिंकी हमें भूल गयी।"

 मनी ने समझाया, "हो सकता है उसके नये मम्मी-पापा ने उसे आने ही न दिया हो।"

"वह ख़ुश होगी न?"

"पता नहीं।"

उस दिन के बाद से जब भी कोई अंकल-आंटी आते उसे ग़ुस्सा आ जाता पर मृदुला जी को समझ न आया कि अंकल-आंटी के आने से रंजन को ग़ुस्सा क्यों आया जबकि आश्रम के सारे बच्चे उनकी प्रतीक्षा करते रहते हैं। कुछ देर बाद जब मृदुला जी की नाराज़गी कम हुई तो उन्होंने रंजन को बुलवाया और कहा, "सॉरी बोलो तो तुमको अंकल-आंटी के लाये उपहार और मिठाई देंगे।"

"हमको उनके लायी कोई चीज नहीं चाहिये।"

"पर तुम्हें अंकल-आंटी इतने ख़राब क्यों लगते हैं? वह लोग तो तुम सबको प्यार करते हैं अच्छी अच्छी चीज़ देते हैं।"

"चाहे हमें वह कुछ न दें पर हमारे किसी भाई-बहन को न ले जायें।" 

अब मृदुला जी को समझ आया कि रंजन क्यों नाराज़ है उन्होंने उसे समझाते हुए कहा, "देखो बेटा माना तुम्हें बुरा लगता है अपने किसी भाई-बहन का जाना क्योंकि तुम अपने भाई-बहनों को बहुत प्यार करते हो। पर तुम्हें ख़ुश होना चाहिये कि उसे प्यार करने वाले मम्मी-पापा मिल गये, घर मिल गया।"

"पर हमें तो कोई नहीं ले जाता, कोई प्यार भी नहीं करता, हमारे पैर नहीं है इसीलिये न," कहते-कहते रंजन की वाणी रुँध गयी। मृदुला जी ने उसे गले लगाते हुए कहा, "पर हम तो तुम्हें प्यार करते हेैं न, अच्छा है तुम्हें कोई नहीं ले जाता, अगर ले गया तो तुम्हारी माँ अकेली हो जाएगी। माँ रोएगी तो तुम्हें अच्छा लगेगा?"

रंजन ने सिर हिला कर कहा, "नहीं।" 

"चलो फिर देखते हैं कि अंकल-आँटी क्या लाए हैं, आज सबसे अच्छा वाला खिलौना हमारे रंजन को मिलेगा," मृदुला जी ने उसे बहलाया।

रंजन के चेहरे पर मासूम सी हँसी खिल गयी। वह मृदुला जी के साथ उनके कक्ष में गया जहाँ सब बच्चे एकत्र थे। अंकल-आंटी सभी बच्चों से उनका नाम पूछ रहे थे उनसे कुछ कुछ बात कर रहे थे। सभी बच्चे अपने बारे मे बढ़-चढ़ कर बता रहे थे। जब रंजन की बारी आयी तो बस उन्होंने उसे उपहार दे दिया उसके बारे में कुछ नहीं पूछा तब रंजन ने कहा, "मेरा नाम रंजन है। मैं स्कूल जाता हूँ और मेरे नम्बर भी बहुत अच्छे आते हैं।" उसने अपनी बात की सत्यता सिद्ध करने के लिये मृदुला जी की ओर देखा, उसका आशय समझ कर उन्होंने कहा, "हाँ मिस्टर शर्मा रंजन बहुत अच्छा लड़का है।"

मिसेज शर्मा उसके सिर पर हाथ रख कर बोली, "बेचारा!"

उसके बाद वह अन्य बच्चों से उनके बारे में पूछने लगीं। अपनी उपेक्षा देख कर रंजन का उत्साह पानी के बुलबुले के समान बैठ गया। कुछ देर पहले प्रसन्नता से खिला चेहरा छुईमुई के समान मुरझा गया वह वहाँ से उठ कर चला गया। 

बाहर कमला बैठी थी उसे ग़ुस्से में जाता देख कर उसने पूछा, "क्या हुआ रंजन?"

"मुझे उन अंकल-आंटी से कोई बात नहीं करनी।

"अंकल-आंटी आते हैं जो बच्चे सुंदर होते हैं उन्हें ले जाते हैं उनको मम्मी-पापा मिल जाते हैं पर हमसे तो हमारे भाई बहन छूट जाते हैं हमको कितना रोना आता है। पहले टीटू गया फिर चिंकी गयी, मोना गई अब आज भी यह किसी को ले जाएँगे।"

फिर दुखी हो कर बोला, "हमें तो कोई देखता भी नहीं, आगे बढ़ जाता है, क्योंकि हमारे एक पैर नहीं है। हम दौड़ नहीं सकते, खेल नहीं सकते।" कहते-कहते रंजन फूट-फूट कर रोने लगा। यह देख कर कई बच्चे उसे घेर कर खड़े हो गये।

अभी अंकल-आंटी द्वारा लाई मिठाई चाकलेट और उपहारों के मिलने से जो प्रसन्नता का वातावरण बन गया था वह अचानक ही गंभीर हो गया। मृदुला जी की सहायिका रचना ने मृदुला जी को बताया कि रंजन रो रहा है। मृदुला जी ने कहा, "मुझे पता है वह बहुत आहत है।" उन्होंने रचना से कहा, "रचना हम लोगों ने कभी रंजन की दृष्टि से तो सोचा ही नहीं था। हम तो केवल जाने वाले बच्चे के भविष्य के प्रति आश्वस्त हो कर ख़ुश हो जाते हैं, पर यह नहीं सोचा कि यहाँ पीछे रह गये उसके साथियों को कैसा लगता होगा?"

"सच है दीदी एक तो उनका दोस्त बिछड़ जाता है; उससे भी अधिक पीड़ादायक होता है उन्हें स्वयं का न चुना जाना," रचना ने कहा।

"हाँ यह तो है; उन्हें अपने न चुने जाने पर बार-बार अस्वीकृति का दंश तो झेलना ही पड़ता है। उनके अन्दर हीनता का बोध भी बढ़ता जाता है।" फिर कुछ विचार करके मृदुला जी बोलीं, "पर रचना हम इसके लिये क्या कर सकते हैं? जिन बच्चों को घर-परिवार मिल रहा है, उनसे उनका सुखद भविष्य छीनना भी तो अपराध होगा न?"

हाँ यह सच था कि जब भी कोई दम्पती आश्रम में बच्चा गोद लेने आते, तो वह सब बच्चों को देखते, उनके बारे में पता करते और प्रायः ही जो बच्चे स्वस्थ और सुंदर होते तथा आयु में कम होते उन्हें ले जाते। यह अन्य बच्चों से अन्याय था, इसमें उनका तो कोई दोष नहीं होता था। 

मृदुला जी को उस रात नींद नहीं आयी। अन्य बच्चे तो खेल कूद कर मगन रहते थे या संभवतः उन्हें कम से कम एक आशा थी कि क्या पता उन्हें कोई अपना ले पर रंजन को अपनी कमी की अनुभूति थी, वह समझता था कि इस कमी के साथ उसे कोई नहीं अपनाएगा।

मृदुला जी उसे झूठी आशा भी नहीं दे सकती थीं। वह उसके दुख को समझती थीं पर वह क्या करती विवश थीं वह किसी से उसे लेने के लिये कैसे कह देती जब उसके स्वयं के माता पिता ही उसे आश्रम में छोड़ गये थे।

मृदुला जी रंजन का विशेष ध्यान रखने का प्रयास करने लगीं पर फिर भी वह दिन पर दिन उग्र होता जा रहा था। समय के साथ रंजन अंतर्मुखी और निष्ठुर होता जा रहा था, कभी वह किसी बच्चे से झगड़ा कर लेता, उसे पीट देता तो कभी किसी को धक्का दे कर गिरा देता। मृदुला जी उसे प्यार से दंड दे कर सभी उपायों से समझा चुकी थीं, पर प्रायः ही उसकी कोई न कोई शिकायत मिलती रहती थी वह समझ नहीं पा रही थीं कि उसे कैसे सँभालें। 

नवम्बर माह आ गया। इस माह में आश्रम में वार्षिक समारोह होता था जिसमें मृदुला जी का प्रयास होता था कि सभी बच्चे विभिन्न गतिविधियों में भाग लें जिससे उनके व्यक्तित्व का विकास हो। मृदुला जी ने कहा, "बच्चो, हर वर्ष की तरह इस बार भी 15-16 नवम्बर को हमारा वार्षिक समारोह आयोजित होगा।"

बच्चे यह सुन कर प्रसन्नता से ताली बजाने लगे। मृदुला जी के निर्देशानुसार सब बच्चे तैयारी में लग गये। खेल, कूद, चित्रकारी वाद-विवाद तथा गायन और नृत्य की अनेक प्रतियोगिताएँ आयोजित की गयी थीं। कोई गाने का अभ्यास कर रहा था तो कोई दौड़ लगा रहा था। मनी को चित्रकारी का शौक था अतः वह दिनभर चित्र बनाता रहता। रंजन भी अपना मनपसंद गीत याद कर रहा था।

इस वर्ष संयोग से प्रसिद्ध गीतकार श्री सुशान्त शहर में आये हुए थे। मृदुला जी ने उन्हें समारोह में मुख्य अतिथि तो बनाया ही उन्हें गीत प्रतियोगिता का निर्णायक भी बनाया।

समारोह का दिन आ गया। चारों ओर चहलपहल थी सभी बच्चे सुबह से नहा धो कर अच्छे-अच्छे कपड़े पहन कर तैयार थे। पहले दिन खेल-कूद और वाद-विवाद प्रतियोगिता हुई। दूसरे दिन प्रातः चित्रकला की प्रतियोगिता थी और शाम को नृत्य, गायन प्रतियोगिता और पुरस्कार वितरण समारोह था। कार्यक्रम के अंत में गायन प्रतियोगिता थी। जब रंजन की बारी आयी तो उसने एक पुराना फ़िल्मी गीत गाया "माँ मुझे अपने गले से लगा ले आंचल में छिपा ले कि आज मेरा कोई नहीं।"

जब उसने गाना समाप्त किया तो निर्णायक सुशान्त जी जो हर प्रतिभागी के गाने पर ताली बजाते थे, कुछ न कुछ प्रशंसा करके उसे प्रोत्साहित करते थे, वह चुपचाप बैठे रहे। रंजन समझ गया कि उसके गाने ने विशेष प्रभाव नहीं छोड़ा। वह दुखी मन से मंच से जाने को उठने लगा कि सुशान्त जी ने कहा "वहीं रुको।"

फिर वो स्वयं अपनी कुर्सी छोड़ कर मंच पर आये और रंजन को गले से लगा लिया। उन्होंने मृदुला जी से कहा, "मैडम आपने यह हीरा कहाँ छिपा रखा था। मैं तो आश्चर्य चकित हूँ इसका गाना सुन कर। इसकी वाणी मधुर तो है ही पर सबसे विशेष बात यह है कि मैंने बड़े-बड़े गायकों के स्वर में वह दर्द नहीं पाया जो इसमें है।"

उन्होंने मृदुला जी से अनुरोध किया, "मृदुला जी मैं आपसे बहुत बड़ी माँग कर रहा हूँ, क्या आप मानेंगी?"

"जी बताइये।"

"मुझे यह बच्चा दे दीजिये। मेरा दावा है कि इसे तराश दूँगा तो यह अनमोल हीरा बन जाएगा।"

मृदुला जी की प्रसन्नता का ठिकाना न था उन्होंने कहा, "आप नहीं जानते आपने इस बच्चे को क्या दे दिया है!"

रंजन पहले तो समझा ही नहीं पर जब मृदुला जी ने कहा, "देखा तुम कहते थे तुम्हें कोई पसंद नहीं करता, प्यार नहीं करता। आज इतने बड़े कलाकार तुम्हें साथ ले जाना चाह रहे हैं, तुम जाओगे न इनके साथ?"

रंजन भावुक हो गया बोला, "नहीं माँ मैं आपको अकेले छोड़ कर नहीं जाऊँगा!"

"पगले मैं अकेली कहाँ हूँ। मेरे साथ तो इतने सारे बच्चे हैं पर हाँ जब बड़े गायक बन जाना तो मुझे भूल मत जाना।"

रंजन मृदुला जी की बात अनसुनी करके सुशान्त जी से बोला, "सर मैं संगीत सीखना चाहता हूँ पर मैं अपनी माँ को नहीं छोड़ूँगा संगीत सीख कर आश्रम में वापस आऊँगा अपनी माँ के पास।"
मृदुला जी ने रंजन को गले लगा लिया। आज आश्रम का खोटा सिक्का अचानक ही सोने की मोहर बन गया था जिसके चेहरे पर उगते सूरज की आभा थी और वह आभा सम्पूर्ण वातावरण को आलोकित कर रही थी।

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