आँख  बचा कर 
कोलाहल से
इंद्रजाल सी यादों के
बियाबान जंगल में इक दिन
संजीवनी की खोज में
बेख़ौफ़ वो उतर गई
शांति की मृगतृष्णा के
लोभ में थी फँस  गई

भीषण घोर अँधेरा था
सन्नाटा भी पसरा था
चारों ओर तम विवर की
मुँह फैलाए प्रेतनियाँ 
आगे बढ़ डसने  लगीं
आग़ोश में लेने लगीं 
सिमट गई एक कोने में
चेतना निष्प्राण सी
सुस्ताने को दुबक गई

श्वासों के स्पंदन भी
कर्ण शूल बन कर जैसे
कानों को छलने लगे
गुज़रे हुए बीते पल के
सूखे हुए पत्ते भी
सर्र सर्र कर उस पर
प्रहार थे करने लगे
एक कंटीली चुभन
देह को देने लगे
जीवंतता अस्तित्व की 
भारी थी पड़ने लगी
चेतना भटकने लगी
अंततः बोध शून्यता की
यात्रा में  निकल गई।

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