जूते की अभिलाषा

04-05-2016

जूते की अभिलाषा

अवधेश कुमार झा

 

चाह नहीं मैं विश्व-सुंदरी के
पग में पहना जाऊँ,
चाह नहीं नव-गृह के छत पर,
नज़र उतारने को लटकाया जाऊँ।

चाह नहीं राजाओं के चरणों में,
हे हरि डाला जाऊँ,
चाह नहीं मैं बड़े मॉल में
बैठ भाग्य पर इठलाऊँ।

मुझे पैक कर लेना तुम बढ़िया,
उसके मुँह पर फिर देना फेंक,
नेता जो आये वोट माँगने,
जिससे शर्मिंदा हो सारा देश॥

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