जो ग़म है सीने में दबाये बैठे हैं

07-03-2009

जो ग़म है सीने में दबाये बैठे हैं

अवनीश कुमार गुप्ता

जो ग़म है सीने में दबाये बैठे हैं
फ़िर भी होठों पर हँसी सजाये बैठे हैं


पत्थर की ठोकर से गिरकर भी 
टकटकी आसमाँ पर लगाये बैठे हैं


और होता भी क्या ऐसी ख़्वाहिशों का 
उम्मीद यारी की दुश्मनों से लगाये बैठे हैं


किसी के रूठ जाने का ग़म नहीं उनको
जो ज़माने भर के सताये बैठे हैं

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