जीवन के परिप्रेक्ष्य में उभरने वाली कहानियाँ – 'परछाइयों के जंगल' 

01-01-2021

जीवन के परिप्रेक्ष्य में उभरने वाली कहानियाँ – 'परछाइयों के जंगल' 

डॉ. अन्नपूर्णा श्रीवास्तव


पुस्तकः परछाइयों का जंगल
लेखिका: देवी नागरानी
वर्ष: 2019
मूल्यः 350
पन्नेः160
प्रकाशकः भारत श्री प्रकाशन,
पटेल गली, विश्वास नगर,
शहादरा, दिल्ली, 110032.

shilalekhbooks@rediffmail.com

कहानी साहित्य की वह विधा है, जिस में कुशल साहित्यकार न केवल घटनाओं व पात्रों का वर्णन करता है बल्कि उसे जीता भी है। इस कला में वह जितना ही प्रवीण होता है कहानी उतनी ही जीवंत एवं पाठकों के साथ तादात्म्य स्थापित करने वाली होती है! देवी नागरानी के जीवन के परिप्रेक्ष्य में उभरने वाली हर कहानी अपने आप में अनुपम है तथा पाठक, श्रोताओं को यथार्थ की धरातल पर अवस्थित कर प्रत्यक्षदर्शी होने के अनुभव कराने में सफल है! 

किसी बड़े साहित्यकार के जीवन की पृष्ठभूमि सामान्य नहीं होती, अंतर्वाह्य, चतुर्दिक् विविध अयाचित, अग्राह्य तत्वों के विषम गरल को आत्मसात करने के पश्चात ही भावनाएँ इस क़दर उर्वर होती हैं कि अनायास ही अनेक अकल्पित, अनछुए पहलुओं का यथार्थ अत्यंत मार्मिकता के साथ उकेर कर पाठको के हृदय तल में प्रवेश कर जाती हैं।

सिंधी, हिन्दी, उर्दू एवं अंग्रेज़ी भाषा पर समान अधिकार रखनेवाली देवी नागरानी के साहित्य में सांस्कृतिक वैविध्य प्रमुखता से दृष्टिगत होता है। एक तरफ़ जहाँ भारतीय संस्कृति के प्रति उनकी निष्ठा और समर्पण चरम पर दृष्टिगत होती है, वहीं अमेरिकी संस्कृति में भी वह दूध और पानी की तरह समाहित हैं। यूँ कहिए कि देवी जी देश-काल, जाति-धर्म, अमीर-ग़रीब, आदि की सीमित परिधियों से मुक्त वैश्विक साहित्यकार हैं! मानव जीवन के लगभग सभी पक्षों का बख़ूबी चित्रण उन्होंने अपनी कहानियों में किया है। उनकी सूक्ष्मदर्शी दृष्टि की संवेदनात्मक पकड़ से मानव जीवन का शायद ही कोई पहलू अछूता रहा हो, अपनी मर्मभेदी लेखनी के भावनात्मक शब्द संयोजन के माध्यम वह पाठकों के अंतस्थल में समा कर घटनाओं को ज्यों का त्यों प्रस्तुत करने की क्षमता रखती हैं, यही कारण है कि इनके पात्र पाठक के निकटतम हो, बोलते-बतियाते, हँसते-रोते, अभिन्न-से प्रतीत होते हैं!

पुस्तक का शीर्षक "परछाइयों के जंगल" बेहद सारगर्भित एवं जीवन का शाश्वत यथार्थ है! वस्तुतः मानव जीवन भर परछाइयों के पीछे ही भागता रहता है . . . परछाइयाँ कभी विगत की अच्छी, बुरी, मधुर, तिक्त, भयावह या मधुरिम पलों की, तो कभी सुखद, मधुरिम भविष्य की कल्पनाओं की, जो स्पष्ट नहीं दिखे, परछाई ही तो है। फ़र्क़ यह है कि विगत अपरिवर्तनशील है उसपर अपना वश नहीं . . .  वर्तमान की कल्पनाओं की परछाइयों को हम परिवर्तित करने का प्रयास कर सकते हैं -जीवन परछाइयों का जंगल ही तो है . . . उन परछाइयों के जंगल में लहुलुहान हो देवी जी ने अपनी लेखनी नहीं चलाई है बल्कि लेखनी में स्वयं मूर्त हो उठी हैं प्रत्येक पात्र, भाव, घटना जिया-जिया सा प्रतीत होता है . . .  

संग्रह की प्रथम कहानी "परछाइयों के जंगल" उपर्युक्त भावों के ही अर्थ व्यंजक हैं। सच तो यह है कि मानव जीवन पर्यन्त परछाइयों के जंगल में ही भटकता रहता है . . .  यथार्थ तो बस वे पल होते हैं, जिसे वह जी रहा होता है, हाथ से छूटते ही वे परछाइयाँ बन कर ही रह जाते हैं  . . . अनगिनत छोटी-बड़ी, सुंदर-कुरूप, मनोरम-भयावह, मधुर-तिक्त, परछाइयाँ . . .  कुछ से मानव पीछा छुड़ाना चाहता है, कुछ को समेट कर साकार करना चाहता है। मगर अपने वश में क्या . . . . न पीछा छुड़ाना संभव, न सभी चाहत को साकार करना ही संभव हो पाता है। इस संग्रह में 22 कहानियाँ हैं, प्रत्येक कहानी अपने आप में अद्भुत। उसके हर किरदार पाठक के हृदय तल में प्रवेश कर अपनी उपस्थिति दर्ज करने एवं उद्देश्य की सार्थकता को सिद्ध करने में सक्षम प्रतीत होते हैं! 

संग्रह की प्रथम कहानी "परछाइयों के जंगल अत्यंत मार्मिक कहानी है, जिसके मुख्य किरदार में प्रविष्ट हो कर वे कहानी लिखती नहीं बल्कि उसे जीती हुई - सी प्रतीत होती हैं! मुट्ठी में सहेज के रखे हुए रत्न की तरह यादाश्त खोए पति को खो देने के बाद तिल-तिल कर जलते हुए जीवन बिताती नारी की असह्य मनोव्यथा एवं उसकी हिफ़ाज़त व सेवा में संलग्न युवती (पुत्री) के दर्द की पराकाष्ठा तो तब अनियंत्रित होने लगती है, जब लगता है कि वह माँ के पास रहकर प्रतिपल सहारा देने के प्रयास में ख़ुद को खोकर भी माँ की 'अपनी' नहीं हो सकी परायी ही रह गई . . . ! "यह कैसी बिडंवना है आदमी जिंदा हो पर जीता न हो, मरनेवाले की याद में खुद को बेखबरी के आलम तक ले आए और जानेवाले की निशानी ही एक मात्र अपनी रह जाय . . .  मैं अपनी परायी कैसे हूँ जो साथ छोड़ गया वह अब भी अपना है"। पुनः लेखिका को लगता है कि माँ ने अपनी व्यथा कथा सुनाते- सुनाते मेरे भीतर भी सन्नाटों की ख़लाओं को भर दिया है कि आज तक मैं उन कोहरों से बाहर नहीं निकल पायी हूँ इस क़दर कि अब अपना वजूद भी अपना नहीं लगता . . .  जैसे मैं जी रही हूँ परछाइयों के बीच, भाग रही हूँ उन यादों की परछाइयों के जंगल में . . .  माँ का सहारा बनते-बनते लग रहा है माँ नहीं, मैं बेसहारा हो गई! इस कहानी के एक एक शब्द जिगर को चीर कर रिसते हुए ज़ख़्मों के दीदार कराने में सक्षम हैं . . . !

संग्रह की दूसरी कहानी "भेद भाव की राजनीति" सामाजिक परिप्रेक्ष्य में उच्चवर्ग एवं दलित वर्ग के बीच भेद-भाव, एवं संघर्ष की कहानी है, जिसे लेखिका ने अपनी क्रांतिकारी क़लम से अभिप्रेषित कर अंततः सुधारवादी नई रौशनी के उजाले से भर दिया है . . .

इस कहानी में कथित उच्चस्तरीय सामाजिक ठेकेदारों के दलितों के प्रति कुकर्म, एवं भेद-नीति को चुनौती देती दो घटनाएँ, अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। प्रथम नायक की माँ के द्वारा तहसीलदार को उसके कुकृत्य के बदले औताक में बंद कर मिट्टी तेल छिड़क कर जला देना, ख़ुद भी जल जाना है। दूसरी घटना पंचों के बीच प्राचार्य को अपनी पुत्री सुजाता का विवाह उस दलित युवक आदित्य के साथ करने की स्वीकृति, जिसकी उच्चशिक्षा एवं प्रगति की हर संभावनाओं को सामाजिक अभियंत्रकों के द्वारा बड़ी बेरहमी से अवरुद्ध किया गया था, समाज में अवस्थित भेद-भाव के दीवारों को मिटाने का सशक्त प्रयास है।

तीसरी कहानी " गुलशन कौर" विभाजन की त्रासदी में बँटे हुए परिवार की मार्मिक कथा है जो देश के विभाजित होने के बावजूद भी अविभाजित हृदय और प्रेम का दस्तावेज़ है!

चौथी कहानी "रखैल की बेटी" आंध्रप्रदेश की सांस्कृतिक चेतना के दर्पण में अभिदर्शित नारी हृदय के सजग ममत्व एवं कर्तव्य चेतना की सशक्त अभिव्यक्ति है!

“मैं माँ बनना चाहती हूँ" कहानी वर्तमान परिप्रेक्ष्य में नारी व्यक्तित्व में निहित उस सुप्त चेतना, अनंत उर्जा, एवं अदम्य अलौकिक शक्ति का अन्वेषण करती है जिसके प्रभाव से कभी सूर्य ने अपना रथ रोक दिया था, यम ने अपने नियम बदल दिए थे। फ़र्क़ यही है कि वह संघर्ष सौभाग्य के जीवन के लिए था, यह मातृत्व के प्रतिष्ठापन के लिए! मातृत्व ही सृष्टि का मूल है! सृष्टि के समस्त कार्य - व्यापार परोक्ष में विविध रूपों से मातृत्व के क्रोड़ में ही पलते हैं . . .  अतः सौत एवं सौतेली बेटियों को स्वेच्छा से शिरोधार्य करने के बाद भी जब ठेस लगने पर रेश्मा का मातृत्व माँ बनने के संकल्प से दीप्त हुआ तो ईश्वर को भी झुकना पड़ा, वह गर्भवती हो उठी!

यह कहना न होगा कि देवी जी न केवल जीवन बल्कि मानव अंतस्थल के विविध भावों की भी कुशल चितेरा हैं। "सूर्यास्त के बाद" संग्रह की एक ऐसी भावनात्मक समस्यापरक कहानी है, जो प्रत्यक्ष में नायक की मानसिक उच्छृंखलता की समस्या से ग्रसित सी प्रतीत होती है, मगर यहाँ बात कुछ और है! लेखिका ने अंततः इसका रहस्योद्घाटन एवं समाधान भी बड़े सलीक़े से किया है . . . .!

प्रेम के दो पक्ष होते हैं, दैहिक पक्ष और आत्मिक पक्ष। आत्मिक पक्ष सूक्ष्म है वह सर्वदा, सहज दृष्टिगत नहीं होता, वरन् वह अक़्सर दैहिक पक्ष में ही मुखर होता है। नारी का प्रेम आत्मिक व भावपरक होता है पुरुष का वस्तुपरक अर्थात्‌ दैहिक लिप्सा में संलिप्त! शास्त्रों में विविध अवसरों पर पत्नी के विभिन्न रूपों की चर्चा की गई है, जिसमें सौभाग्य शय्या पर वेश्या के रूप ही आनंददायक माना गया है। इस कहानी की नायिका यहीं असफल होती है . . .  वह "वह सब" नहीं दे पाती, जो शगुफ़्ता से जमाल को मिलता है . . .  इस सत्य का पता उसे तब मिलता है जब वह अपने प्रेम की तलाश में शगुफ़्ता के दर तक पहुँच कर शगुफ़्ता से अपने पति को वापस देने की बात करती है और शगुफ़्ता कहती है, "यहाँ आने वाला मर्द किसी का पिता, पुत्र, पति नहीं होता, वह सिर्फ़ मर्द होता है"। रमिया अपने जमाल को पाने के लिए अपने को सम्पूर्णतः शगुफ़्ता में परिवर्तित करने को तत्पर हो जाती है। इस कहानी के दोनों स्त्री पात्र अपने आप में अद्भुत हैं, गौरवान्वित हैं . . .  रमिया का अपने पति जमाल के लिए शगुफ़्ता के दर तक पहुँचना और शगुफ़्ता बनने की सोच प्रेम की पराकाष्ठा है, वहाँ शगुफ़्ता का भी भीगी पलकों के साथ बहन का सम्बोधन देते हुए जमाल को वापस भेजते हुए अपने दिल और देहरी के दरवाज़े सदा के लिए बंद करने का वचन देना भी नारी हृदय की उदात्तता का प्रतीक है।

इस कहानी के माध्यम लेखिका ने एक बहुत बड़ी समस्या का सलीक़े से रहस्योद्घाटन किया है, जिससे ग्रसित ना जाने कितने परिवार हैं।

प्रस्तुत संग्रह में लेखिका ने देश, काल, समाज परिवार ही नहीं, स्वयं व्यक्ति के अंतर्मन में भी घटित होनेवाली विविध त्रासदियों एवं समस्याओं को अपनी संवेदनात्मक, सूक्ष्मतम पैनी दृष्टि से परखते हुए भावों, शब्दों एवं विचारों के इन्द्रधनुषी रंगों से सजाया है! हर कहानी अपने आप में अद्भुत है! जहाँ उन्होंने "दीवार हिल गई" कहानी के माध्यम पुरुष की बीमार मानसिकता, शक और अहंता से पोषित व्यक्तित्व की छाँव में बग़ैर समाधान, विनाश को प्राप्त परिवार के हालात की अभिव्यक्ति कर ऐसे विकृत लोगों को चेतावनी व सीख देने का प्रयास किया है, तो वहीं अपनी पत्नी लक्ष्मी को प्रतिदिन मांस के लोथड़े की मांनिद नोचने, मरोड़ने, नशे में पीट-पीट कर बेहोश तक कर देने वाले पति पीरसन (प्रायश्चित कहानी के नायक) के हृदय में बेटी मोना के द्वारा कहे गए कुछ शब्दों के फलस्वरूप प्रायश्चित एवं प्रेम के भाव उभार कर यह साबित किया है कि हर मानव के अंतस्थल के गहनतम कंदराओं में कहीं न कहीं एक कोमल कोना अवश्य होता है, जिसे झकझोरने की आवश्यकता होती है!

सच तो यह यह है कि देवी जी का यह संग्रह सामाजिक विविधताओं के अभिव्यंजक भाव, शब्दों एवं विचारों का गुलदस्ता है, जिसे उन्होंने अपनी सूक्ष्मतम दृष्टि के गहन अन्वेषण एवं कल्पनाओं के इन्द्रधनुषी संम्प्रेषण से सजाया है। 

साहित्य समाज का न केवल दर्पण होता है वरन् प्रवर्तक, निर्देशक एवं सर्जक भी होता है! देवी नागरानी का यह कहानी संग्रह उक्त उद्देश्यों के संपोषक एवं सत्यम शिवम् सुंदरम का परिचायक है! मुझे विश्वास है कि यह कथा संग्रह "परछाइयों के जंगल" सामाजिक चेतना के क्षेत्र में पांचजन्य स्वर-सा साबित होगा!

शुभकामनाओं के साथ
डॉ. अन्नपूर्णा श्रीवास्तव
पटना बिहार (भारत) 

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