जब से मैंने तुम्हें निहारा

29-01-2012

जब से मैंने तुम्हें निहारा

भूपेंद्र कुमार दवे

जब से मैंने तुम्हें निहारा
तुझमें मुझमें रहा ना अंतर॥

तुझे प्रतीक्षा रहती मेरी
मैं उलटी साँसें गिनता हूँ
बाट जोहता रहता है तू
मैं गिरता चलता रहता हूँ
पद रखने की आहट पाकर
सपनों की दुनिया के अंदर
मैं तेरे अंदर जग जाता
तू जग जाता मेरे अंदर

जब से मैंने तुम्हें निहारा
तुझमें मुझमें रहा ना अंतर॥


तुम हो कल्पित साथी मन के
मेरे एकाकी जीवन के
मैं भी बंदी बनकर तेरा
जीता हूँ हर पल जीवन के
करता है तू बस मुझसे ही 
जन्म-मरण के प्रश्न चिरंतर
मैं आँसू के कण गिन गिनकर
सोचा करता मैं क्या दूँ उत्तर

जब से मैंने तुम्हें निहारा
तुझमें मुझमें रहा ना अंतर॥

मुखरित है हर सिन्धु लहर में
युग युग की है तेरी वाणी
मैं बोलूँ या लिखना चाहूँ
बनता वह नयनों का पानी
छिपना है तो छिप जा मुझमें
मेरे तन मन उर के अंदर
तू ही तो कहता था मुझसे
छिप न सकेंगे उर के क्रंदन

जब से मैंने तुम्हें निहारा
तुझमें मुझमें रहा ना अंतर॥

रंगबिरंगी रत्न जड़ित-सा
है शृंगार अनोखा तेरा
मेरे दुख सब रत्न बने है
आँसू है मोती सा मेरा
तू मूरत पत्थर की बनकर
शोभित करता अपना मंदिर
मेरी काया घेर रखे हैं
मेरे पथ के सारे पत्थर

जब से मैंने तुम्हें निहारा
तुझमें मुझमें रहा ना अंतर॥

सकल विश्व है तेरा अनुपम
सुन्दरता सब तुझसे ही है
पर विष जो तेरे कंठ धरा
मधुरस-सा वह मुझमें भी है
तू बैठा निश्चिंत अकेला
सबके बाहर, सबके अंदर
मैं बैठा सुनसान डगर पर
सोचूँ क्या है मेरे अंदर

जब से मैंने तुम्हें निहारा
तुझमें मुझमें रहा ना अंतर॥

0 Comments

Leave a Comment