इत्तिफ़ाक़न

01-03-2020

इत्तिफ़ाक़न

विजय हरित

इत्तिफ़ाक़ का हमारे जीवन में बड़ा महत्व है। हम कहते हैं इत्तिफ़ाक़ से हमारी लॉटरी लग गई, इत्तिफ़ाक़ से वह एक्सीडेंट से बच गया। इत्तिफ़ाक़ अगर हमारे ख़िलाफ़ हो तो समझो सब ख़त्म और अगर एक दिन इत्तिफ़ाक़ से, वही इत्तिफ़ाक़ हमारे पक्ष में आ जाए तो?

अमित के जीवन में भी ऐसा ही कुछ हुआ, जिसके विषय में यह कहानी है:

सारा को अमित उन दिनों से जानता था जब वह 16 साल का रहा होगा। वे दोनों मुंबई की एक पॉश कॉलोनी में रहते थे। पास में एक सुंदर पार्क था जहाँ सुबह-सुबह लोग घूमने और जोगिंग करने जाते थे। अमित की, जब कभी सुबह नींद खुल जाती, तो वह भी चला जाता। वहीं एक दिन उसने सारा को देखा: दो बॉडीगार्ड के साथ में जोगिंग करती, उस हमउम्र सी गोरी-चिट्टी, सुंदर लड़की को वह देखता रह गया। इसके बाद तो वो रोज़ पार्क आने-जाने लगा! माता पिता हर्षित भी थे और हैरान भी, कैसे ये रात का चमगादड़ सुबह इतनी जल्दी उठने लगा? लेकिन अमित को अलग धुन थी। कभी जब सारा नहीं आती तो वह काफ़ी समय उसका इंतज़ार करता। उसका धधकता दिल हर पल यही सोचता, "अब आ जाए काश तो दिन बन जाए"। अक्सर वह आती थी, और अमित बस उसे देखता रहता था। यह उम्र ही ऐसी होती है, जब एक लड़का आकर्षण के मायने समझता है। उस अति तीव्र भावना को महसूस करता है जो लहू के साथ उसके रगों में दौड़ती है। और उसे नाम देता है प्यार!

यूँ तो अमित कोएड में पढ़ता था और लड़कियों से बेहिचक बात कर सकता था, लेकिन सारा को देखते ही उसकी हिम्मत चली जाती। उसके साथ घूम रहे बॉडीगार्ड के डर से भी वह कभी उससे बात नहीं कर पाया। ऐसे ही समय बीतता रहा। फिर अचानक एक दिन ज़मीन से 3000 फ़ीट ऊपर कुछ ऐसा हुआ जिससे अमित का जीवन उथल-पुथल हो गया। प्लेन क्रैश में उसके मम्मी डैडी का देहांत हो गया। वह अकेला रह गया। उनका बहुत बड़ा बिज़नेस था जिस को सँभालने का उसे कोई तजुर्बा नहीं था। उसके चाचा जायदाद हड़पना चाहते थे और इसमें कोई शंका नहीं थी कि वो अपना लक्ष्य पाने के लिए अमित को मार भी सकते थे। मामा उससे बहुत प्यार करते थे, उन्होंने अमित का जीवन बचाया और पढ़ाई के लिए लंदन भेज दिया। अमित 5 साल बाद लंदन से वापस आया और मामा के साथ बिज़नेस की बारीक़ियाँ समझने लगा। वह सारा को लगभग भूल सा गया था। अब तो उसका एकमात्र उद्देश्य बिज़नेस को उन उँचाइयों तक ले जाना था जहाँ उसके पिता भी ना ले जा सके। 

 

 

उस दिन बिज़नेस के सिलसिले मे ही अमित सिंगापुर से वापस मुंबई आ रहा था। प्लेन में काफ़ी रश होने के कारण उसे इकॉनमी क्लास में सफ़र करना पड़ा। तभी उसने देखा, सारा उसकी तरफ़ ही आ रही है और उसके पास की सीट पर आकर बैठने लगी। सारा और भी सुंदर लगने लगी थी। यह इत्तिफ़ाक़ ही था। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि सारा की इस तरह से उसके जीवन में दोबारा एंट्री होगी। सारा के चेहरे पर एक अजीब सी उदासी थी। उसने सारा से पूछा, “क्या आप विंडो सीट पर बैठना चाहेंगी।” लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया और अपनी सीट पर बैठ गई। सारा शायद अमित को पहचानी ही नहीं थी। अमित सारा से बात करना चाहता था पर समझ नहीं आ रहा था कि कौन सा विषय चुने। अनेकों ख़्याल अमित के दिल में आए। अंत में उसने हिम्मत करके कहा, "मैं आप ही की कॉलोनी में रहता हूँ। क्या आप मुझे पहचानती हैं?” 

लेकिन उसने इसका भी कोई उत्तर नहीं दिया। चुपचाप गुमसुम सी बैठी रही। चाह कर भी अमित उससे कोई बात नहीं कर सका। मुंबई आने के बाद अमित ने उससे कहा, “अगर आपके पास कोई ट्रांसपोर्ट नहीं है तो मैं आपको घर ड्रॉप कर दूँगा।” 

लेकिन उसने अनसुना करते हुए "नो थैंक्स" कहा और कैब ले कर चली गई। अमित उसकी इस बेरुख़ी का मतलब नहीं समझ पाया। 

“सच में, बाहर से सुंदर दिखने वाले लोग अंदर से कितने ख़राब होते हैं," उसने सोचा!

अमित ने एक नया प्रोजेक्ट शुरू किया था, जिसके लिए एक पार्टी ऑर्गेनाइज़ की थी। अमित सारा और उसकी फ़ैमिली को इनवाइट करने उनके घर गया। गेट उसकी मम्मी ने खोला, जो शायद अमित को पहचान गई थी, बोली, “आओ बेटा बैठो यहाँ।” और सारा से कहा, “एक ग्लास पानी ले आओ।” 

सारा की मम्मी बिल्कुल देवी जैसी लग रही थी; उनके चेहरे पर बहुत अधिक तेज था। 

उन्होंने अमित से पूछा, “कैसे आए हो बेटा, तुम कपूर साहब के बेटे हो ना?”

अमित ने हाँ में सिर हिलाया। वह कहने लगी, “तुम्हारी मम्मी को मैं अक्सर किटी पार्टी या लेडीज़ फ़ंक्शन में मिलती थी, बहुत ही भली लेडी थी। तुम्हारी मम्मी मेरी बेस्ट फ़्रेंड थी। तुम लोग के साथ बहुत बुरा हुआ।“

अमित ने बताया, “शनिवार को घर पर एक पार्टी रखी है, आप लोग आएँगे तो उसे बहुत अच्छा लगेगा।“ 

थोड़ा हिचकिचाते अमित ने यह भी बताया कि वह और सारा एक ही फ़्लाइट में सिंगापुर से आए थे, लेकिन सारा ने उससे रास्ते में ज़रा भी बात नहीं की। चुप रही, पता नहीं क्यों बड़ी सीरियस सी बैठी रही। 

सारा की माँ ने बताया, “बेटा कुछ साल पहले हमारे जीवन में भी एक भूचाल आया। एक सर्द सुबह को सारा के पिता ने ऑफ़िस की 26वें माले से कूदकर आत्महत्या कर ली। मैं और सारा उस समय घर पे थे। तभी से सारा ग़मगीन रहती है। बड़ी तेज़ी से घटनाएँ घटी हैं। हम अर्श से फ़र्श पर आ गए, देखते ही देखते अरबों का कारोबार ख़त्म हो गया, थोड़ा बहुत जो बिज़नेस बचा है वह सारा के चाचा और पार्टनर देखते हैं, लेकिन हमेशा लॉस ही बताते हैं। अब तो घर भी बड़ी मुश्किल से चलता है। यहाँ तक कि सारा के मंगेतर विक्रम ने भी उसे छोड़ दिया है। उसीसे मिलने सारा सिंगापुर गई थी। मुँहफट विक्रम ने कह दिया कि वह चमनजी लाल टंडन की बेटी से प्यार करता था। एक भी कारण से नहीं। इसीलिए सारा बहुत गंभीर रहती है। घर पर भी छुप-छुप कर रोती है। पता नहीं भगवान ने हमें किस क़सूर की सज़ा दी है। यह मकान भी गिरवी है, अगले महीने इसकी नीलामी होनी है पता नहीं हम लोग क्या करेंगे, कहाँ जाएँगे, कहाँ रहेंगे?"

बगल वाले कमरे में बैठी सारा अपनी माँ की बातें सुन रही थी। उस दिन जो हुआ उसकी अब सिर्फ़ धुँधली यादें बची हैं। रोने की कान फाड़ने वाली आवाज़ों के बीच सारा को लगता था कि शायद कोई उसे झटका के अभी जगा देगा। शायद उसके पिताजी अभी उस दरवाज़े से आ जाएँगे। दिन सालों में बदल गए लेकिन वो यादें सारा को अब भी सोते से जगा देती थीं, और 26, इस अंक से उसे डर लगता है। 

अमित ने सारा की माँ को हिम्मत बँधाते हुए कहा, "माँजी मैं तो छोटा हूँ लेकिन एक बात मुझे ज़िंदगी ने सिखाई है: अच्छे दिन आते हैं चले जाते हैं, बुरे दिन आते हैं चले जाते हैं, यह तो प्रकृति का नियम है। देख लीजिएगा जिस भगवान ने आपको यह दुख दिया है वही उसको ख़ुशियों से भर देगा। आप लोगों के जीवन में फिर अच्छे दिन आएँगे पहले जैसे ही आप लोग मुस्कुराएँगे। मुझे ही देखिये। माता-पिता के जाने के बाद चाचा ने मुझे मारने की कोशिश भी की थी। पर आज मैं पिताजी का बिज़नेस नयी उचाइयों पे ले गया हूँ।"

"पता नहीं बेटा, भगवान करे ऐसा ही हो, तुम आते रहा करो। बड़ी अच्छी बातें करते हो, तुम्हारी बातों से दिल को बड़ी तसल्ली मिली।"

सारा की माँ ने अमित को बताया कि सारा तो शायद ही पार्टी में आए, अब तो वह कहीं जाती ही नहीं है। विक्रम की बेवफ़ाई के बाद तो उसे सारी मर्द जात से ही नफ़रत हो गई है, शादी के लिए कहते हैं तो कहती है शादी का ज़िक्र मेरे सामने मत करना। माँ मुझे शादी हरगिज़ नहीं करनी।”

अमित ने कहा, "कोई बात नहीं माँजी धीरज रखिए, जल्द ही सब ठीक हो जाएगा। वैसे यह विक्रम क्या करता है किस चीज का कारोबार है इसका सिंगापुर में?"

माँ ने उसे बताया, “सिंगापुर में उसकी वीनस कॉरपोरेशन करके एक कंपनी है।” 

अमित ने याद करते हुए कहा, "वीनस कॉरपोरेशन! तब तो मैं विक्रम को जानता हूँ, मैं उससे बात करूँगा।"

 

पार्टी में आ रहे बहुत सारे गेस्ट्स के बीच अमित को सारा का इंतज़ार था। काफ़ी इंतज़ार के बाद उसने देखा सारा अपनी माँ के साथ आ रही है। सारा ने कोई मेकअप नहीं कर रखा था फिर भी वह येलो ड्रेस में वह बहुत सुंदर लग रही थी। पार्टी में सारा से बात करने का अमित ने कई बार प्रयास किया लेकिन वह बस हाँ या ना मैं उत्तर देती रही। सारा की माँ यह सब बड़ी बारीक़ी से देख रही थी। बेटी की माँ थी इसलिए शायद उनके दिमाग़ में कुछ चल रहा था। उन्होंने कहा, “तुम दोनों बैठो, बातें करो मैं ज़रा मिसेज़ शर्मा और मिसेज़ गुप्ता से बात करके आती हूँ।”

सारा से अमित ने पूछा, "पार्टी कैसी लग रही है?" 

सारा ने कहा, "ठीक है।"

अमित ने वेटर की तरफ़ इशारा करते हुए पूछा, “क्या लेंगी आप?”

सारा ने कहा, “कुछ नहीं।”

“कुछ नहीं डिश तो यहाँ नहीं मिलेगी। मैं आपके लिए कॉफी और पनीर कटलेट मँगवाता हूँ,” अमित ने मुस्कुराते हुए कहा। 

"जी नहीं, कुछ लाने की आवश्यकता नहीं है। मुझे जो भी लेना होगा मैं स्वयं ले लूँगी, आप गेस्ट्स को अटेंड कीजिए," सारा का लहज़ा थोड़ा सख़्त था। 

“अरे सारा जी आप पार्टी इंजॉय नहीं कर रहीं; क्यों ऐसे गुमसुम बैठी हैं? मुझे पता है आप मुस्कुराते हुए बड़ी अच्छी लगेंगी।"

सारा बुरा मान कर जाने लगी और बोली, "मुझे चिपकू लोग बिल्कुल पसंद नहीं हैं।” 

पार्टी ख़त्म होने के बाद अमित सारा और उसकी मम्मी को घर तक छोड़ने गया। रास्ते में उसने सारा की मम्मी से कहा सारा ने पार्टी में कुछ नहीं खाया है। 

सारा ने थोड़ा बिगड़े मूड में कहा, “आपको मेरी चिंता करने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है और मुझसे ज़्यादा चिपकने की ज़रूरत नहीं है। मैं आपको बिल्कुल पसंद नहीं करती। प्लेन में मेरी सीट आपके पास क्या पड़ी आप तो तब से मेरे पीछे ही पड़े हुए हैं!”

माँजी थोड़ा आगे चली गईं थीं। अमित ने वातावरण को हल्का करने के लिए सारा से कहा, “सारा जी मैं फ़ेविकोल थोड़े हूँ जो आपसे चिपक जाऊँगा? और रही मेल-जोल की बात, तो मैं आपको पिछले 6 सालों से जानता हूँ, तब से जब आप इस पार्क में अपने बॉडीगार्ड्स के साथ जोगिंग और घूमने आया करती थीं। मैं पार्क में आपका बेसब्री से इंतज़ार करता था। अगर मैं यह कहूँ कि आप मेरा पहला और आखरी क्रश हैं तो यह ग़लत नहीं है। मैं तो सिर्फ़ आप लोगों के जीवन में पहले सी ख़ुशियाँ लाना चाहता हूँ और कुछ भी नहीं।”

“अच्छा तो आप पुराने आशिक़ हैं! ऐसी बातों से मुझे बड़ी चिढ़ है। आप हमारे बारे में मत सोचिए, हमें हमारे हाल पर छोड़ दीजिए तो आपकी मेहरबानी होगी,” सारा ने बुरा मानते हुए कहा। 

 

ऐसे ही समय बीतता गया। अमित ने कई बार सारा से बात करने, उसके निकट आने का प्रयास किया, लेकिन विफल रहा। धीरे-धीरे घर की नीलामी का समय भी आ गया। नीलामी से 2 दिन पहले सारा की माँ अमित के घर गई। अमित ने उन्हें आदर के साथ बिठाया और कहा, “अरे माँजी, आप क्यों आईं मुझे बुला लिया होता।”

माँजी ने कहा, “बेटा परसों का सोच के दिल घबरा रहा था, सब ठीक हो जाएगा ना?“

अमित ने हिम्मत बँधाते हुए कहा, “माँजी आप बिल्कुल चिंता ना करें, मैंने सारा इंतज़ाम कर दिया है। वह दोनों अब जेल में हैं। नीलामी में आख़िरी बोली हमारी ही होगी आप घर जाकर बिल्कुल आराम से सोएँ।"

माँ ने कहा, “बेटा जो तुमने हमारे लिए किया है, वह भगवान भी नहीं कर सकता! शब्द नहीं हैं मेरे पास, बस इतना कह सकती हूँ कि मेरी उम्र भी तुम्हें लग जाए। तुम जीवन में बहुत सुखी रहो, बस तुम्हारे प्रति सारा के व्यवहार से मुझे बहुत दुख होता है।”

"माँजी सारा बहुत अच्छी और समझदार लड़की है,” अमित ने कहा। 

"बेटा, मेरी आख़िरी चिंता और मिटा दो, सारा की ज़िम्मेदारी भी तुम ले लो। तुम्हारी माँ और मैंने बरसों पहले यह सपना देखा था, फिर अचानक दोनों परिवारों में यह हादसे हो गए।"

अमित ने तसल्ली देते हुए कहा, “भगवान ने चाहा तो ऐसा ही होगा माँजी, मैं तो आप में अपनी माँ को ही देखता हूँ। अब चलिए मैं आपको घर छोड़ आता हूँ।” 

 

 

नीलामी के रोज़ टंडन साहब के घर बहुत बड़ा मजमा लग गया था। सरकारी अमला भी आ गया था। बोलियाँ लगने लगीं। घर बड़ा ही शानदार था; लोग एक से बढ़कर एक बोलियाँ बोल रहे थे। मिसेज़ टंडन और सारा के चेहरे पर चिंता और व्यग्रता स्पष्ट दिखाई दे रही थी। 

नीलामी में अंतिम बोली अमित ने ही बोली और नीलामी उनके पक्ष में हुई। अमित ने सारे काग़ज़ात माँजी को दे दिए और कहा, “लीजिए माँजी यह घर पुनः आपका हो गया।”

सारा उठ कर चली गई, शायद उसे यह सब अच्छा नहीं लगा। माँजी बहुत देर तक उसे आशीर्वाद देती रहीं। 

अमित उनसे विदा लेकर जाने लगा तो गेट पर सारा ने उसका रास्ता रोक लिया और तल्ख़ लहज़े में ताली बजाते हुए कहा, "वाह जनाब वाह! कहाँ जा रहे हैं? अब तो आपने हमें ख़रीद ही लिया। पहले हम सांवरिया सेठ के कर्ज़दार थे अब आपके हो गए। कितनी मोहलत देंगे आप हमें इस घर में रहने की?"

“कैसी बातें कर रही हो सारा! यह घर तुम्हारा था, तुम्हारा है, और तुम्हारा ही रहेगा। मैंने नीलामी में एक पैसा भी नहीं लगाया है। मुझे ग़लत समझना छोड़ो,” अमित ने कहा। 

"कैसे ना सोचें मिस्टर! आपके एक-एक एहसान ने मुझे गहरे ज़ख़्म दिए हैं। अब बस और नहीं; हमें हमारे हाल पर छोड़ दीजिए, और आज के बाद कभी हमें अपनी सूरत नहीं दिखाइएगा। आपकी बहुत मेहरबानी होगी। आपका चेहरा हरदम मुझे हमारी बर्बादी, हमारी बेबसी की याद दिलाता है।"

"अब ज़्यादा ही हो रहा है सारा, हद होती है हर बात की। ठीक है, मैं भी आज के बाद तुम्हें अपनी शक्ल दिखाने कभी नहीं आऊँगा," अमित ने थोड़ा ग़ुस्से में कहा और वहाँ से चला गया।

इस सब का जब माँजी को पता चला तो उन्हें बहुत ग़ुस्सा आया। उन्होंने सारा को बुलाया और कहा, "हद होती है सारा तुम्हें अच्छे-बुरे की पहचान ही नहीं है। जिसने हमारे लिए इतना कुछ किया, तुम हमेशा उसे बुरा-भला कहती रही। अमित क्या है मैं बताती हूँ। अमित ने तुम्हें बताने के लिए मना किया था पर आज मैं तुम्हें सबकुछ बताती हूँ। तुम्हारे पापा ने आत्महत्या नहीं की थी, तुम्हारे चाचा और पार्टनर ने मिलकर उनकी हत्या की थी। यह सब अमित ने ही अपने प्राइवेट जासूसों को लगाकर पता लगाया और आज उसी के प्रयासों से तुम्हारे चाचा और पार्टनर जेल में हैं। अमित ने सही दामों पर तुम्हारे पापा का ऑफ़िस बिकवा दिया और उसी के पैसों से नीलामी में यह घर हमारा हुआ है। उसने हमारी राह के सारे काँटे हटा दिए। तुम्हारे लिए पलकें बिछाए रहा लेकिन तुम तो हमेशा उसे ग़लत ही समझती रही। हर आदमी विक्रम नहीं होता! विक्रम जैसे मौक़ों का फ़ायदा उठाने वाले करोड़ों होते हैं। लेकिन अमित जैसा एक ही होता है।"

मूर्ति बनी बैठी थी सारा। उसे लग रहा था कि वह कोई दुःस्वप्न देख रही है। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

वह अपने किए पर बड़ी शर्मिंदा थी, सोचती रही, "यह मैंने क्या किया? ख़ुद ही अपनी दुश्मन बन बैठी। बहुत बुरा भला कहा है मैंने अमित को। वह शायद अब मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा। मुझे अभी अमित से माफ़ी माँगनी होगी"।

"चलो माँ अकेले मुझ में उसका सामना करने की हिम्मत नहीं है," सारा ने माँ से कहा।

तभी दरवाजे पर घंटी बजी तो सारा ने सोचा अमित आया है। उसने दौड़ कर गेट खोला, लेकिन वह सामने खड़े सज्जन को देखकर स्तब्ध रह गई। सामने और कोई नहीं विक्रम था। उसे देखते ही सारा ग़ुस्से से तमतमा गई, "क्यों आए हो यहाँ?”

विक्रम ने हाथ जोड़ते हुए कहा, “मुझसे ग़लती हो गई सारा, मुझे माफ़ कर दो।"

“कोई माफ़ी नहीं, चले जाओ यहाँ से। मैं तुम्हारी सूरत भी नहीं देखना चाहती,” सारा ने लगभग चीखते हुए कहा। 

विक्रम की आँखों में आँसू थे, "प्लीज़ सारा एक बार माफ़ कर दो, मुझे अंदर आने दो। मैं बेहद शर्मिंदा हूँ।"

"प्लीज़ माँजी, मैं बहुत शर्मिंदा हूँ। मुझे माफ़ कर दीजिए नहीं तो मैं बर्बाद हो जाऊँगा," विक्रम ने लगभग रोते हुए सारा की माँ से गुहार की।

इंसानियत के नाते सारा की माँ ने विक्रम को अंदर बुलाया और पानी दिया।

"प्लीज़ सारा वापस आ जाओ। तुम्हारे बिना सब अधूरा है।"

कुछ देर बाद सारा का ग़ुस्सा थोड़ा शांत हुआ।

"मुझे सोचने का समय दो," उसने विक्रम से कहा। 

विक्रम की बेचैनी से उसे लगा कि शायद सच में उसे अहसास हुआ है। लेकिन सारा की माँ को कुछ अटपटा सा लगा।

इतनी तेज़ी से घटनाचक्र चला कि रात भर सारा सो नहीं पाई। सुबह उठते ही उसने अमित को बहुत फोन लगाए पर नो रिप्लाई आया। सारा तैयार होकर तेज़ी से अमित से मिलने चल दी लेकिन गेट पर सुरक्षाकर्मियों ने बताया साहब तो रात ही कुछ महीनो के फ़ॉरेन टूर पर निकल गए। कुछ दिनों में आएँगे। विदेश में भारत के सिम इस्तेमाल नहीं करते, तो आने के बाद ही आप उनसे बात कर पाएगी। 

 

इस बात को कई दिन बीत गए लेकिन ना अमित आया नहीं उसका फोन। 

सारा को विक्रम का फोन लगभग रोज़ आता था। सारा अब भी उसे माफ़ नहीं कर पाई थी। उसकी बातों में कहीं सारा को बनावट सी लगती थी। मन में कहीं वो अमित को भुला नहीं पायी थी। ये क्या भावना थी जो वो अमित के लिए महसूस करती थी? ऐसा उसे कभी विक्रम के लिए नहीं लगा। अमित को खोकर सारा ने प्यार क्या है, ये जाना। बेटी की सूनी आँखों को उसकी माँ पढ़ चुकी थी। और एक दिन जिसका इंतज़ार था वो आ ही गया।

गेट बेल बजी। सारा ने दरवाज़ा खोला तो देखा अमित खड़ा था। सारा के चेहरे पर अनेकों भाव आए और चले गए। सारा को सूझ ही नहीं रहा था कि वह क्या कहे या करे? जैसे-तैसे उसने कहा, “अंदर आइए ना।"

“नहीं मैं यहीं ठीक हूँ, आपको तक़लीफ़ देने नहीं आया। माँजी को बुला दीजिए उनसे थोड़ा काम है,” अमित ने धीमे स्वर में कहा। 

कुछ पल की हिचक के बाद सारा बोली, "मेरी नादानी की मुझे इतनी बड़ी सज़ा मत दीजिए। मैं आपके साथ किए गए व्यवहार के लिए बेहद शर्मिंदा हूँ। मैं आपको पहचान ही नहीं पाई मुझे माफ़ कर दीजिए। प्लीज़ अंदर आ जाइए आपको मेरी क़सम है, जिसने मेरे पापा के क़ातिलों को जेल पहुँचाया, हमें बेघर-बार होने से बचाया, क़दम-क़दम पर हमारी सहायता की, उसे कैसे मैंने ग़लत समझ लिया। अब और सज़ा मत दीजिए. . .” सारा ने लगभग रोते हुए कहा। 

“एक शर्त पर आता हूँ, आप रोना बंद कीजिए। आप रोते हुए बिल्कुल अच्छी नहीं लगती, और ना ही आपने कोई ग़लती की है फिर माफ़ी किस बात की। आप तो वैसे ही ग़ुस्सा होते हुए और डाँटते हुए अच्छी लगती हैं। मैंने तो आपकी किसी बात का कभी कोई बुरा नहीं माना,”अमित ने बनावटी हँसी हँसते हुए कहा। 

"विक्रम से धोखा खाने के बाद मैं हर आदमी को ग़लत समझने लगी, कुछ दिन पहले उसने आ के माफ़ी माँगी थी। ख़ैर आप बैठिये, मैं माँ को बुलाती हूँ ।"

विक्रम का नाम सुनकर अमित के चेहरे पे एक दर्द सा उभरा। सारा शायद इसका मतलब समझती थी

"माँ आप लोगों ने कब सारा की शादी तय की है, या हो चुकी?" अमित ने सारा की माँ से पूछा।

"सारा ज़रा तू अंदर जा," सारा की माँ ने कहा। 

"बेटा विक्रम ने माफ़ी माँगी और शायद सारा ने उसे माफ़ भी कर दिया। पर मुझे लगता नहीं वो शर्मिंदा है। उस दिन कुछ तो था जो वो हमें नहीं बता रहा था। तुम कह रहे थे कि तुम उसे जानते हो। सच बताओ बेटा, क्या कुछ ऐसा है जो तुम हमें नहीं बता रहे हो। मेरी बेटी की ज़िंदगी का सवाल है।"

थोड़ी हिचक के बाद अमित बोला, "माँजी, विक्रम का सारा आर्डर मेरी इंडस्ट्री से ही मिलता है, जो मैंने उसे भेजना बंद कर दिया था। और कहा है जब तक सारा नहीं कहेगी मैं उसे ₹1 का सामान भी नहीं भेजूँगा। इसलिए ही वो शायद इतना बेबस था। अब अगर आपको लगता है कि वो सच में बदल गया है, तो मैं वापस उससे बिज़नेस रिलेशन बनाऊँगा।"

कुछ देर बाद लम्बी साँस लेते हुए सारा की माँ बोली, "बेटा आज तुमने मेरी ये दुविधा भी दूर कर दी। हमेशा सोचती थी, ये धूर्त लड़का १८० डिग्री से कैसे परिवर्तित हो गया? अब समझ आया। सारा की माँ हूँ, उसके बिना कुछ बोले ही समझ लेती हूँ वो क्या चाहती है। वो सच्चे दिल से सिर्फ़ तुम्हें ही चाहती है। पिछले कई दिनों से उसकी आँखों में छुपा हुआ दर्द, आज तुम्हें देख के छलका है। अब बस मैं तुम दोनों को एक होते देखना चाहती हूँ।"

कुछ पल अमित शांत रहा। कुछ कहने की हिम्मत शायद बटोर रहा था। उसकी आँखों से बेबसी और दुख पानी के साथ बह रहे थे। 

"माँजी एक और बात है। सारा से निराश होकर जब मैं विदेश गया तो वहाँ मामा जी ने अपने एनआरआई दोस्त की लड़की से मेरी शादी तय कर दी थी। परसों मेरी मंगनी है और मैं आप लोगों को उसी के लिए इनवाइट करने आया था।" इससे ज़्यादा कुछ कह पाता उससे पहले उसका गला रुंध गया,"मामाजी ने कितना कुछ किया है मेरे लिए। अब अगर इस शादी से उन्हें ख़ुशी मिलती है तो मैं किस मुँह से मना करूँ, जब पहले मैंने ही हाँ किया था।" धीरे से अमित बोला, "काश एक बार पूछ लेता मैं आपसे।" 

ज़िंदगी में दूसरी बार वो अथाह निराशा महसूस कर रहा था।

सारा की माँ स्तब्ध रह गयी। उन्हें लगा ज़मीन नीचे से फट रही है। ये भगवान का फ़रिश्ता जो उनके सामने बैठा है, जो सारा को सच्चे दिल से चाहता है, सारा की नादानी की वज़ह से जा रहा है। उनका मन किया हाथ पकड़ के रोक लें उसे। पर फिर उन्होंने अपने आप को सँभाला।

"बेटा तुम सही सोच रहे हो। मामाजी का कहा मानना ही सही धर्म है। और फिर तुम तो मेरे बेटे हो, बेटा माँ से कहाँ अलग होता है," अपने आँसू रोकते हुए वो बोली।

इसके बाद जैसे वक़्त थम गया। एक बार फिर इत्तेफ़ाक़ ने उन्हें मजबूर कर दिया था। इतना पास आकर भी अमित ने सारा को शायद खो दिया था। दूसरे कमरे से सारा की परछाई उसे देख रही थी। आज फिर सारा की आँखों में शायद आँसू थे, जिनकी वज़ह अमित था। 
माँजी से विदा लेकर जब अमित घर से निकला, तो उसने एक बार पलट के देखा। सारा उसे देख रही थी। सारा की आँखों में दर्द था और अमित की आँखों में मजबूरी। 

सगाई वाले दिन, सारा को उसकी माँ ने किसी तरह से तैयार किया। 

“अमित ने हमारे लिए इतना कुछ किया। अब उसकी ख़ुशी के लिए हमें स्वार्थी नहीं होना चाहिए," पर ना चाह कर भी सारा चाहती रही कि ये शादी टूट जाए। 

अमित के बंगले को दुल्हन की तरह सजाया गया था। चारों ओर रौनक़ ही रौनक़ थी, महँगे कालीन बिछे हुए थे, शहर के सारे इज्जतदार लोग आए हुए थे। सामने स्टेज था, जिस पर रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किया जा रहा था। अमित और मामा जी ने सारा और उसकी माँ को तेज़ी से जाकर रिसीव किया और स्टेज के सामने वीआईपी सोफ़े पर बैठाया। रंगारंग कार्यक्रम ख़त्म होने के बाद मामा जी स्टेज पर पहुँचे और उन्होंने अनाउंस किया, “अब कुछ ही देर में मंगनी की रस्म अदा की जाएगी। उसके बाद आप सभी लोगों से प्रार्थना है कि आप लोग डिनर करके जाएँ।”

 

अमित लाल रंग की शेरवानी में जँच रहा था। उसे देखकर सारा के दिल में दर्द हुआ। उसे लगा कि सगाई के इस शोर में उसकी ज़िंदगी कहीं खो रही है।

थोड़ी देर बाद मामा जी दोबारा स्टेज पर आए और बोले, “अब मैं आमंत्रित करता हूँ, अपने प्रिय भांजे अमित कपूर और उसकी लकी चार्म सबसे प्यारी बेटी सारा टंडन को कि वो स्टेज पर आए जिससे मंगनी की रस्म पूरी की जा सके।”

सारा स्तब्ध सी रह गई उसे लगा जैसे उसने ग़लत सुना है। माँ की तरफ़ देखा वह भी समझ नहीं पा रही थी यह क्या हो रहा है, मामा जी ने फिर सारा की ओर देखकर कहा, “मैं आप ही से कह रहा हूँ बेटा।"

अमित ने सारा के पास आकर कहा, “क्या सुनाई नहीं दे रहा मामा जी तुम्हें ही बुला रहे हैं।” 

सारा उठकर अमित से लिपट गई। उसके दिल की धड़कन बढ़ी हुई थी और पैर हाथों में कंपन थी।"यह सब क्या है अमित।" उसकी आँखें पूछ रही थीं। 

अमित ने धीरे से कहा, “यह तो मुझे भी नहीं मालूम। वैसे मामा जी अक्सर ऐसे सरप्राइज़ देते रहते हैं और अगर यह सच है तो दुनिया में मुझसे सुखी कोई नहीं होगा। मैं तुमसे हद से ज़्यादा प्यार करता हूँ। अब चलो स्टेज पर देखते हैं मामा जी ने क्या चक्कर चलाया है। दरअसल मेरे मामाजी को समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। माँजी आप भी चलिए, जल्दी करो सारा मेरे मामा जी को ग़ुस्सा भी बड़ी जल्दी आता है।”

मामा जी ने माँ को बताया की अमित उनका इकलौता भांजा है। जब यह आपके घर से उदास आया तो मैंने इससे सब मालूम कर लिया। सारा ही इसके बचपन का प्यार है। मैंने अपने एनआरआई मित्र को मना लिया। अमित की ख़ुशियों के अलावा हमें चाहिए भी क्या?

रस्म के बाद अमित ने सारा के कान में कहा देखो, "वहाँ विक्रम बैठा है। मुझसे शादी करने में अगर अभी भी कोई पछतावा है तो विक्रम से बात करूँ।"

"अगर पिटने से डर नहीं लगता तो करना, तीनों से पिट जाओगे तुम," सारा ज़ोर से बोली। सब हँसने लगे।

"आज तारीख़ क्या है माँ?"उस रात सारा ने पूछा।

"26," माँ बोली।

सारा को लगा कि उसके पिता आसमान से उसे देखकर मुस्कुरा रहे हैं।

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