हिन्दी उपन्यासों में राजनीतिक दर्शन

01-02-2020

हिन्दी उपन्यासों में राजनीतिक दर्शन

डॉ. मोहन सिंह यादव

मानव समाज परम्परागत विचारधाराओं का दास नहीं, बल्कि वह नवीन विचारों का सृजन भी करता है। और इस बदलते विचारों से राजनीतिक मानदंड प्रभावित हुए हैं। स्वतन्त्रता से पूर्व राजनेताओं में देशभक्ति एवं जनसेवा की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी, लेकिन स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद सेवा, त्याग एवं समस्त मानवीय मूल्य नेताओं के लिए निरर्थक हो गये। स्वतंत्र भारत के नेता अपने पद की सुरक्षा और अपने लिए अधिकाधिक धन एकत्र करने की चिन्ता में राजनीतिक उधेड़ बुन में व्यस्त हैं। इस प्रकार राजनीति पूर्णतः भ्रष्ट हो गयी है, और तत्कालीन उपन्यासों में इस भ्रष्ट राजनीतिक स्थिति पर कुठाराघात किया गया है।  “राजनैतिक क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार, स्वार्थपरता, भाई-भतीजावाद, जातिवाद, प्रतिवाद जैसे फोड़े सारे राष्ट्र के शरीर में एकाएक फूट पड़े और चारों ओर मवाद,सड़ते मांस और गंदे खून की महक भर गयी।”1 चारों ओर राजनेताओं में नैतिक पतन दिखाई दे रहा है। संसदीय लोकतन्त्र का भव्य दृश्य प्रस्तुत करता हुआ यह भारत व्यवहार में जनतंत्र नहीं बन पाया है। शासन में जनता की हिस्सेदारी नहीं, यहाँ तक कि सरकारी नीतियाँ भी जनता के वास्तविक हितों को दृष्टि में रखकर नहीं बनाई जाती हैं। इस प्रकार राजनीति भ्रष्ट हो गयी है। अब कोई महात्मा गाँधी का आदर्श शेष नहीं रह गया है। उसके स्थान पर बहती गंगा में हाथ धोने की प्रवृत्ति बढ़ गयी है। 

भारत ने जो अपना संविधान तैयार किया था, उसमें राजनीतिक और आर्थिक रूप से सबको समान अवसर प्रदान करने की बात कही गयी थी। लेकिन इस संविधान के बनने में देर न हुई कि  राजनीतिक चूहों ने उसे कुतरना शुरू कर दिया। पं. जवाहरलाल नेहरू और सरदार बल्लभभाई पटेल के समय में ही भीतर ही भीतर षड्यंत्र चल रहे थे, और देश के राजनीतिक प्रासाद में दरारें पड़ने लगी थीं। “गाँधी के नाम की दुहाई देने वाले राजनीतिक नेताऔं की कथनी और करनी में बहुत अंतर आ गया। स्वयं राजनीतिज्ञ ख़रीदे जाने लगे हैं। राजनीतिक दल और पूँजीपति दोनों ही राजनीतिज्ञों का क्रय-विक्रय करने में जुटे हुए हैं। दल-बदल सामान्य राजनीतिक धर्म हो गया है।”2 वर्तमान राजनीतिज्ञों में न अब स्वच्छ चरित्र रहा है और न देश के प्रति आस्था ही शेष बची है। राजनीति अब व्यवसाय बन गयी है, और यह देश के लिए एक गंभीर प्रश्न है। वस्तुतः देश के नेताओं ने पारस्परिक फूट, प्रांतीयता सांप्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद, आदि के द्वारा चारों ओर अंधकार फैला दिया है। हिन्दी-अँग्रेज़ी भाषा को लेकर दंगे भी राजनीतिज्ञों के कराये हुए हैं। राष्ट्रध्वज और संविधान को फाड़कर उन्होंने ही जलाया है। नदियों का पानी बँटवारा संघर्ष और सांप्रदायिक दंगों में भी इन्हीं राजनीतिज्ञों का हाथ है। मिल मालिकों और मज़दूरों के पारस्परिक झगड़े ये ही भ्रष्ट राजनीतिज्ञ करवाते हैं। इस प्रकार राजनीतिक मंच पर भ्रष्टाचार पूरी तरह फैला हुआ है। देशवासियों की राजनीतिक चेतना में एक नई गतिशीलता और नया प्रवाह अवश्य आया है। देश पुरानी राजनीतिक लीक से अलग हटने का प्रयास कर रहा है। पंचवर्षीय योजनाओं से देश को एक नई दिशा प्रदान की गयी है। इस प्रकार राजनीतिक परिवर्तन के साथ-साथ विकास कार्य भी हुआ है। राजनीतिक चेतना की धारा को आगे बढ़ाने में इन राजनीतिक परिवर्तनों का विशेष योगदान है।

‘रंगभूमि’ उपन्यास में लेखक ने देश की राजनीतिक चेतना के बदलते रूप को सशक्त स्वर दिया है। पात्र डॉ. गांगुली अँग्रेज़ी शासन की निन्दा करते हुए कहता है - “अब हमको स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि केवल हमको पीसकर, तेल निकालने के लिए, हमारा अस्तित्व मिटाने के लिए, हमारी सभ्यता तथा हमारे मनुष्यत्व  की हत्या करने लिए, हमको अनन्तकाल तक चक्की का बैल बनाए रखने के लिए हमारे ऊपर राज किया जा रहा है।”3 ‘कर्मभूमि’ में लेखक ने पात्रों के माध्यम से राजनीतिक चेतना के रूप की अभिव्यक्ति दी है। उपन्यास का नायक अमरकांत राजनीतिक चेतना से परिपूर्ण है “देशवासियों के साथ शासक मण्डल की कोई अनीति देखकर उसका ख़ून खौल उठता था। जो संस्थाएँ राष्ट्रीय उत्थान के लिए उद्योग कर रही थीं, उनसे उसे सहानुभूति हो गयी। वह अपने नगर  की कांग्रेस कमेटी का मेम्बर बन गया और उसके कार्यक्रम में भाग लेने लगा।”4 ‘गोदान’ में गांधीवादी तथा साम्यवादी राजनीतिक विचारधारा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। लेखक साम्यवादी राजनीतिक विचार की अभिव्यक्ति पात्र मेहता के माध्यम से इन शब्दों में करते हैं - “मैं तो केवल इतना जानता हूँ कि हम या तो साम्यवादी हैं या नहीं हैं, हैं तो उसका व्यवहार करें, नहीं हैं तो बकना छोड़ दें। मैं नक़ली ज़िंदगी का विरोधी हूँ।”5 मेहता के विचार से राष्ट्र की राजनीतिक चेतना मुखरित होती है। ‘झाँसी की रानी’ उपन्यास में  रानी लक्ष्मीबाई स्वराज्य प्राप्ति के लिए अँग्रेज़ों से संघर्ष करने का दृढ़ संकल्प लेती हैं। रानी को जनता की शक्ति पर विश्वास है। देश की आज़ादी के प्रति पूर्ण विश्वस्त वह सक्रोश अँग्रेज़ों को ललकारती हुई कहती हैं - “हमको एक बड़ा संतोष है। जनता हमारे साथ है। जनता सब कुछ है। जनता अमर है। इसको स्वराज्य के सूत्र में बाँधना चाहिए। राजाओं को अँग्रेज़ भले ही मिटा दें, परन्तु जनता को नहीं मिटा सकते। एक दिन आवेगा जब इसी जनता के आगे होकर मैं स्वराज्य की पताका फहराउंगी।”6 महारानी लक्ष्मीबाई अँग्रेज़ों से स्वराज्य के लिए लड़ती हुई, युद्धभूमि में घायल हो जाती हैं, मरणासन्न रानी अंत समय में सोचती हैं - “स्वराज्य की नींव का पत्थर बनने जा रही हूँ।”7 राष्ट्र के लिए यह नि:स्वार्थ समर्पण राजनीतिक चेतना का ज्वलन्त उदाहरण है। 

‘विकास’ में देश की परतंत्रता तथा निर्धनता को दूर करने के लिए लेखक साम्यवादी राजनीतिक चेतना पर बल देते हुए कहता है-“जब तक साम्यवाद का प्रचार न होगा, तब तक भारत ही क्या, संसार की गुलामी का अंत न होगा।”8 उपन्यास के पात्र साम्यवादी राजनीति से प्रभावित हैं। ‘यथार्थ से आगे’ उपन्यास में देश के राजनीतिज्ञों के क्रियाकलापों के प्रति असंतोष व्यक्त करते हुए वीरेंद्र कहता है - “उस वर्ग से संघर्ष लेने का बल, जो आज शासन और व्यवस्था की कुर्सियों पर बैठकर न्याय और सत्य का अपमान करता हुआ नहीं लजाता और केवल यह देखता है कि मेरी वह कुर्सी जीवन भर के लिए स्थिर बनी रहे और जिन आदेशों पर मेरे हस्ताक्षर होते  हैं, उनका पालन निर्विघ्न होता रहे, जनता और समाज के हित चूल्हेभाड़ में जाय।”9 वीरेंद्र के आक्रोश से स्पष्ट होता है कि उपन्यास के पात्र स्वच्छ राजनीति के आकांक्षी हैं। ‘सुनीता’ उपन्यास में भारतीय नारी सुनीता, राष्ट्रभक्त क्रांतिकारी हरिप्रसन्न के जीवन से प्रभावित होकर वह राजनीति के क्षेत्र में आना चाहती है। हरिप्रसन्न क्रांतिकारी दल का नेता है, वह सुनीता को दल की नेत्री बनाना चाहता है। वह सोचता है - “यह सुनीता आज घर में गृहणी है, वह रण की दुर्गा क्यों न बने? युवकों में कहाँ से स्फूर्ति भरनी होगी? जीवन की स्पृहा उनमें कहाँ से आएगी? उसके लिए एक नारी की आवश्यकता है।”10 इस प्रकार सुनीता तथा हरिप्रसन्न में राजनीतिक चेतना विद्यमान है। उपन्यास में गाँधीवादी विचारधारा भी उपस्थित है। हरिप्रसन्न के द्वारा घर पर रिवाल्वर ले आने पर श्रीकांत इसको विरोध करते हुए कहता है - “मुझे तो ऐसा दीखता है कि मानव–सम्बन्धों के बीच में यदि किसी ओर से भी रिवाल्वर प्रविष्ट होने दिया जाता है तो उसे चतुर्मुखी हो पड़ने से नहीं रोका जा सकेगा। तब रिवाल्वर साधु का नाश और दुष्ट का उद्धार नहीं करने लगेगा, इसका तुम्हें आश्वासन है?”11 श्रीकांत के कथन से गाँधीवादी राजनीति की पुष्टि होती है।

‘दादा कामरेड’ उपन्यास के अधिकांश पात्र देश के समुचित विकास के लिए साम्यवादी राजनीतिक विचारधारा को अपनाने के पक्ष में हैं। प्रमुख पात्र दादा कामरेड सशस्त्र क्रांति के पक्षधर हैं- “स्टडी और नये तकनीक (अध्ययन और नई प्रणाली) नई-नई बातें न मैं जानता हूँ और न मुझे इनसे मतलब है। इतने समय तक लड़कर मैंने निभाया है और आगे भी लड़ता रहूँगा।”12 ‘झूठा सच’ उपन्यास में लेखक ने तत्कालीन भारतीय राजनीति में पनप रहे भ्रष्टाचार एवं स्वार्थी प्रवृत्ति पर असंतोष प्रकट किया है। कुछ स्वार्थी नेता भारत विभाजन की बात करते हैं, तो देशप्रेमी भार्गव इसका विरोध करते हुए कहता है - “यक़ीन रखिए, हम पाकिस्तान हरगिज़ बनने नही देंगे।”13 उपन्यास के पात्रों में राजनीतिक चेतना स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है - “लोग दौड़ पड़े, कुछ लड़ने के लिए और बहुत से बचने के लिए। लाठियाँ निकल आईं-भागते दौड़ते लोगों के जूतों की आहट से बाज़ार गूँज उठा। जुबैद के गले में लाउडस्पीकर की शक्ति थी, वह चिल्लाकर बोला भाइयो, यह हिन्दू–मुसलमान का झगड़ा नहीं है, यह गुंडों की शरारत है।”14 लेखक ने सांप्रदायिकता की आग से देश को बचाने के लिए देशवासियों का आह्वान किया है। 

‘धरती’ उपन्यास में राजनेताओं का जनता की सेवा से नहीं बल्कि सत्ता से मोह रहता है। पात्र मोहन कहता है- “हर पाँच साल बाद ये चुनाव का जो नाटक करते हैं, उसके मंच की सारी व्यवस्था ये अपनी मुट्ठी में रखते हैं और सरकार की सारी शक्ति जीतने में लगा देते हैं। उस पर भी कोई आदमी हार जाता है तो ये पीछे के दरवाज़े से उसे बुला लेते हैं या गवर्नर बना देते हैं। जनता के लिए ये लोग इतना ही करना पर्याप्त समझते हैं कि वह पाँच सालों में एक बार मत दे ले फिर जनता और सरकार कहाँ, इससे किसी को कोई मतलब नहीं रहता। पाँच साल में एक बार चुनाव करा लेना ही जनतंत्र की सीमा है इनके लिए।”15 ‘रागदरबारी’ में आज के राजनेता कितनी घटिया क़िस्म की राजनीति करते हैं, इसका उदाहरण दर्शनीय है। जनसेवियों के सत्तासेवी रूप का कच्चा चिट्ठा खोलता हुआ उपन्यास का पात्र गयादीन कहता है - “जो जहाँ है, अपनी जगह गोह की तरह चिपका बैठा है। टस से मस नहीं होता। उसे चाहे जितना कोंचो चाहें जितना दुरदुराओं, वह अपनी जगह चिपका रहेगा।”16 वर्तमान समय में सत्तालोलुप राजनीति का विकास हुआ है।

‘महाभोज’ उपन्यास में बिसेसर की मौत, राजनीति के अखाड़े में खेलने वाले राजनीतिज्ञ-गिद्धों के लिए महाभोज का जुगाड़ कर गयी है। बिसेसर की मौत पर सभी राजनीतिक दल अपनी–अपनी राजनीति की रोटियाँ सेकते हैं। बिसेसर की मौत कुटिल राजनीतिज्ञ सुकुल बाबू के लिए जैसे सुनहरा अवसर हो - “बिसु की मौत लगता है जैसे थाली में परसकर मौक़ा आ गया है उनके सामने। अपनी हार को जीत में  बदलना है उन्हें इस मौक़े का फ़ायदा उठाकर।”17 सत्ता प्राप्ति के लिए राजनीतिज्ञों द्वारा नेताओं की ख़रीद–फ़रोख्त लोकतन्त्र के लिए शुभ लक्षण नहीं है। वर्तमान दूषित राजनीति और धोखेबाज़ राजनेताओं के दोहरे चरित्र से आज का नवयुवक दुखित है। बिन्दा आक्रोशित होकर कहता है - “तीस साल से आप लोगों की बातें ही तो सुनते–समझते आ रहे हैं। क्या हुआ आज तक ? पेट भरने के लिए अन्न नहीं, आप की बातें –ख़ाली बातें-बातें। जैसे सुकुल बाबू तैसे आप।”18 देश की राजनीतिक गिरावट यहाँ तक पहुँच गयी है कि वर्तमान चुनाव के समय नोट से वोट ख़रीदे जाते हैं - “राजनीतिक स्तर और आदमी के वोट की क़ीमत को पाँच रुपये पर उतार दिया जाए, बड़ी शोचनीय स्थिति है यह।”19 वर्तमान राजनीति स्तरहीन एवं दूषित हो गई है।  

संदर्भ ग्रंथ सूची

1 -  नई कहानी की भूमिका-कमलेश्वर, पृष्ठ-15
2 - हिन्दी उपन्यासों में मार्क्सवादी चेतना-डॉ. वीरेंद्र कुमार, पृष्ठ-59
3 - रंगभूमि-प्रेमचंद, पृष्ठ-576
4 - कर्मभूमि-प्रेमचन्द्र, पृष्ठ-17 
5 - गोदान-प्रेमचंद, पृष्ठ-57
6 - झाँसी की रानी-वृन्दावनलाल वर्मा, पृष्ठ-164    
7 - यथोपरि, पृष्ठ-487
8 - विकास-प्रतापनारायण श्रीवास्तव, पृष्ठ-464
9 - यथार्थ से आगे-भगवती प्रसाद वाजपेयी, पृष्ठ-197
10 - सुनीता-जैनेन्द्र कुमार,पृष्ठ-175
11 - यथोपरि, पृष्ठ - 102
12 - दादा कामरेड-यशपाल, पृष्ठ-53 
13 - झूठा सच-यशपाल, पृष्ठ-118
14 - यथोपरि, पृष्ठ-87
15 - धरती-भैरव प्रसाद गुप्त, पृष्ठ-398
16 - रागदरबारी-श्रीलाल शुक्ल, पृष्ठ-130
17 - महाभोज-मन्नू भंडारी, पृष्ठ-29
18 - यथोपरि, पृष्ठ-79
19 - यथोपरि, पृष्ठ-146

डॉ. मोहन सिंह यादव
शिक्षक, हनुमान सिंह इण्टर कालेज
देवकली, गाजीपुर
संपर्क-9452587083
Mohan Yadav
ymohan114@gmail.com
 

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