एक ज़रूरी आवाज़ जो दबाई नहीं जा सकती

01-01-2020

एक ज़रूरी आवाज़ जो दबाई नहीं जा सकती

डॉ. रीता दास राम


पुस्तक : सिर्फ़ स्थगित होते हैं युद्ध
लेखक : प्रभा मजुमदार
प्रकाशक : परिदृश्य प्रकाशन
1, अनमोल सोराबजी संतुक लेन,
मरीन लाइंस, मुंबई-400 002
प्रथम संस्करण : 2019
ISBN : 978-81-93877-3-5
मूल्य : रु. 175/-
पृष्ठ संख्या : 144


नए काव्य संग्रह के लिए प्रभाजी को हार्दिक बधाई। ‘अपने अपने आकाश’, ‘तलाशती हूँ जमीन’, एवं ‘अपने हस्तिनापुर’ जैसे तीन काव्य संग्रहों के बाद 2019 में परिदृश्य प्रकाशन से आए ‘सिर्फ़ स्थगित होते हैं युद्ध’ प्रभा मुजूमदार जी का चौथा काव्य संग्रह उनकी सशक्त लेखनी का प्रमाण है। ‘सिर्फ़ स्थगित होते हैं युद्ध’ शीर्षक ही अपनी बात रखता कि संघर्ष का कोई अंत नहीं वो निरंतर है जो देश, समाज, व्यक्ति से होते हुए उसके भीतर तक स्थान पाता है। संघर्षशीलता ही जीवन की गतिशीलता है। 

इस संग्रह की पैंसठ कविताओं में कवयित्री ने समाज में पसरे बिखरे अव्यवस्था, त्रासदी, जाल-साज़ी, धोखाधड़ी, पैंतरेंबाज़ी, भ्रष्टाचारों से सर्वसमान्य पर होते अन्याय, उनकी परेशानी और दर्द को शब्द दिये हैं। वे अपनी टीस, बौखलाहट, बेचैनी के साथ विरोध भी जताती हैं। 

आज विकास की अंधी दौड़ में हर क्षेत्र, हर व्यक्ति एक स्पर्धा यानी एक मूक प्रतियोगिता का सामना कर रहा है। हर कोई प्रथम आना चाहता है। आगे बहुत आगे उत्कर्ष पाना चाहता है पर क्या इसका कोई अंत है? लोगों ने प्राथमिकताएँ बदल दी हैं। तनाव, ईर्ष्या, द्वेष, जलन लोग स्वाभाविक रूप से अपनाते चलते हैं। 

प्रभा जी कविताएँ समाज पर एक संपूर्ण दृष्टि डालती हैं। सामाजिक एवं आत्मिक रिश्तों में ज़िंदगी का अर्थ ढूँढती हैं। संभावनाओं को बचाना चाहती हैं। वहीं असंभावनाओं पर प्रश्न उठाती सचेत करती हैं कि ऐसे समय पर ज़िंदा कैसे रहा जा सकता है। संकल्प और भयमुक्त स्वर ही लेखिका के संबल हैं जो उन्हें संभावनाओं की रोशनी देते हैं। 

प्रभाजी कहती हैं युद्ध सिर्फ़ बाहर नहीं होते युद्ध इंसान के भीतर भी होते हैं। वे अपने भीतर के युद्धों से जूझती हैं, थकती हैं, परेशान भी होती हैं पर हारना नहीं चाहतीं। हारने के पहले रुकना चाहती हैं। वह मानती हैं कि जीवन निरंतर गतिशील है और इस संघर्षशीलता को हमें अंत तक जीना है। 

समाज में व्याप्त भय और वर्तमान स्थिति के लिए उनकी पंक्तियाँ देखिएगा – इन दिनों/ कुछ भी देखने सुनने/ और कहने से/ बचने लगी हूँ मैं/ पता नहीं कब/ मेरी प्रतिक्रिया को ही/ बयान की तरह दर्ज कर लिया जाय। साहित्यकारों, पत्रकारों की हत्याओं द्वारा हो रही विचारों की हत्या बड़ा प्रश्न हैं जिसके उत्तर की मूक तलाश जारी है। 

कविताएँ चीखें, ठहाकों के शोर को नहीं पीछा करने वाली गूँज को शब्द देती हैं। भाषा को अर्थ प्रदान करने वाली चुप्पी की वे पक्षधर हैं। महत्वाकांक्षा के पहाड़ से डरती भीतर के मरुस्थल, और ठूँठ को महसूस कर कमियों से ख़ुद को बचाने की कोशिश करती हुई अपने तरल एहसासों को सूखने नहीं देती। जबकि हर कोई दहशत में जीने के लिए अभिशप्त है। प्रभा जी वर्तमान को भयावह ठहराव मानती हैं। 

ममतत्व के आग़ोश में पंख फैलाकर उड़ती सार्थकता को महसूस करती हैं तो बिछोड़ को भी झेलती हैं। फिर भी आस लगाना हर इंसान का अपना आधिकारिक स्थल है। जिसका अपने इच्छा अनुसार हर कोई इस्तेमाल करता है। प्रभा जी समाज में स्त्रियों को अट्टालिकाओं में क़ैद मानती हैं। घर ही उनका संसार है। बदलाव प्रकृति का नियम। छूटी चीज़ें अक्सर सवाल करती हैं पर हम कोई जवाब नहीं दे पाते और ख़ामोश रुलाई के साथ आगे बढ़ जाते हैं। यहाँ प्रभाजी औरत के भीतर का सच कहती हैं। दुख और विरूपताओं के बीच सुंदरता को भी स्थान देती हैं। अंधेरे कोने में आँसू बहाने को वे आत्मगौरव नहीं मानती। नारी को चुप रहने के दिए गए सुझावों के ख़िलाफ़ अपनी बात रखती हैं। ‘वरना’ शब्द के बाद दी जाने वाली धमकी से सतर्क करती हैं। 

आज समाज में धर्मगुरु राज नेता ही नहीं माफ़िया भी प्रवचन दे रहे हैं। बावरी मस्जिद, गोधरा, इंदिरा गांधी का मरना, श्रीनगर में दरिंदगी और निर्मम हत्याएँ, मुजफ्फरनगर, भीमा कोरेगांव, कासगंज आदि घटनाओं पर अपने शब्द देने के अलावा उनकी पंक्ति देखिएगा कि ज़्यादा ज़रूरी हैं बचा रहे इंसान के भीतर थोड़ा सा इंसान। 

समाज की अव्यवस्था पर विरोध दर्ज करती उनकी कविताएँ वहशी प्यास पर अंकुश लगाने की  बात करती है। शुरुआती कविताओं में प्रतीकों बिंबों के सहारे अपनी वेदना को शब्द देती आत्म मंथन को सहेजती पिरोती हैं। वेताल की कथाओं, रामायण के पात्रों और इतिहास की पड़ताल कर वर्तमान मुद्दों की चर्चा करती उनकी कविताएँ अच्छी लगती हैं। जब कायरता को शौर्य, काहिली को उपलब्धि, मौत के सौदागरों को शांति दूत की तरह प्रतिस्थापित किया जाता हैं तब आम आदमी को डराने, धमकाने, उनके वजूद को नकारने, धराशायी करने को वे समाज में होते मदारी के नाच की संज्ञा देती हैं। 

सीमा पर होते हमले और शहीदों की चिंता करती हैं तो आत्ममुग्ध सत्ताधारियों को भी खरी-खोटी सुनाती हैं। अन्याय के ख़िलाफ़ न बोलते मुर्दा शहर में प्रभाजी ऐसी आवाज़ हैं जो निडरता के साथ सीधे और सटीक वार की हिम्मत रखती हैं। गाँधी जी के चरखे, लाठी, घड़ी, चश्मा, हर चीज़ को भुनाते उन्हें अप्रासंगिक साबित करने के प्रयास जो चल रहे हैं ऐसे समय में गाँधीजी की चुप्पी कवयित्री को खलती है। 

प्रभाजी हार मानने के ख़िलाफ़ हैं। वे मानती हैं कि जीत से विवाद जुड़ता ही रहा है अतः युद्ध कभी ख़त्म नहीं होते, न होंगे। यह जीवन संघर्ष के प्रति आशावान दृष्टि है कि थको नहीं, रुको नहीं, बढ़े चलो, यह तो बस एक पड़ाव था। यहाँ टैगोर कि पंक्तियाँ याद आती हैं –
जो दी तोर डाक शुने केयू ना आशे तौबे एकला चोलो रे .... 

कवयित्री कहती है साज़िशों के दौर में ‘अ’ से अराजक, ‘ब’ से बम और बारूद ‘ ‘न’ से नफ़रत और ‘ह’ से हत्या का पाठ बदस्तूर जारी है तो मैं कहना चाहती हूँ कि ‘स’ से सर्व सामान्य की समझ के ‘ब’ से बर्बाद होने से पहले समाज की ‘च’ से चेतना को जगाना हम साहित्यकारों की ‘ज’ से ज़िम्मेदारी है और हम डटे हुए हैं। 

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