दूसरा बाप

01-08-2019

दूसरा बाप

गोविन्द सेन 

क्रोधित चंपा मैडम ने मदन के पुट्ठे पर पूरी ताक़त से दो लात जमाकर उसे अन्दर धकेला दिया। तुरंत दरवाज़े पर ताला लगाकर उसे भीतर कोंड दिया। दूधिया रंग की चंपा का चेहरा क्रोध से एकदम लालचट हो चुका था। चाबी झटके-से अपने पर्स में डाल वह फनफनाते हुए घायल नागिन की तरह सर्राटे से चली जा रही थी। आसपास के लोगों को संपट ही नहीं पड़ी रही थी कि आख़िर हो क्या गया है!

मदन खिड़की के पीछे क़ैदी की तरह खड़ा टुकुर-टुकुर देख रहा था। कुछ समय वह यूँही खड़ा रहा, जैसे उसे कुछ सूझ न रहा हो या किसी की राह देख रहा हो। कोई दरवाज़ा खुलवाकर उसे छुड़ा ही ले। पर किसकी अड़ी थी जो आधी रोटी पर दाल लेता? कौन इस फजीतवाड़े में पड़े? कौन नागिन के टिपारे में हाथ डाले? ज़रा-ज़रा सी बात पर चंपा रणचंडी बन जाती थी। पड़ोसी उसका स्वभाव जानते थे। यदि उसे पता चल गया कि बाहर निकालने में मदन की किसी ने मदद की है तो फिर उस शख़्स की फ़ज़ीहत होनी ही थी। गालियाँ ऐसी देगी कि कान के कीड़े झड़ जायेंगे। उसे समझाना भी किसी के वश में नहीं था। इसलिए सभी दब-छिपकर तमाशा देखने में ही अपनी ख़ैरियत समझ रहे थे। देखें, अब आगे क्या होता है? सब साँसें रोके हुए छिप-छिप कर देख रहे थे। चंपा के डर से खुल्लम-खुल्ला तमाशा देखने की हिम्मत भी उनमें नहीं थी।

काफ़ी देर तक खड़ा रहने के बाद मदन को यक़ीन हो गया कि अब बाहर से कोई भी उसकी मदद करने के लिए नहीं आएगा। वह कमरे में ही चक्कर लगाने लगा, जैसे कोई बदहवास शेर बंद पिजरे में चक्कर लगा रहा हो। वह कभी शेर की तरह नज़र आ रहा था तो कभी सियार की तरह और कभी कोंडवाड़े में कोंडे गए किसी मूक पशु की तरह निरीह।

मदन पचपन पार का साँवला-सा अधेड़ था। सिर पर पुराने हीरो जैसे बालों का फुग्गा बना होता। वह अक्सर बिना इन के डार्क रंग की पैंट पहने रहता। हल्के रंग की कमीज़ की एक चौथाई आस्तीनें ओटी हुईं रहतीं। हमेशा ख़ामोश रहता। ख़ामोशी से उठता, ख़ामोशी से बैठता, ख़ामोशी से चलता और उतनी ही ख़ामोशी से अपने शिकार को दबोच लेता, जैसे कोई ख़ामोश बगुला सहसा मछली को चोंच से पकड़ गड़प लेता है। उसके चेहरे पर कभी हँसी देखी ही नहीं गई। कभी मजबूरी में ही हँसता हो तो हँसता हो। ज़बान से कम ही बोलता था। पर उसकी आँखें ज़रूरत से ज़्यादा ही बोलती थीं। स्त्री-देह को देखते ही उसकी आँखों से वासना टपकने लगती-टपाटप...टपाटप। बग़ैर किसी शर्म और लिहाज़ के वह आँखों से ही स्त्री के सभी उभारों को पी जाता। परस्त्री गमन में उसे महारत हासिल थी। कई बार रँगे हाथों पकड़ा भी गया, पर हाथ-पाँव जोड़कर छूट गया। कई बार मार भी खा चुका, पर अपनी आदत से बाज नहीं आता था और शर्म जैसी किसी लिजलिजी चीज़ को उसने कभी पाला ही नहीं। हाँ, उसने कई भैसें ज़रूर पाल रखी थीं। भैसों का दूध निकालना और बेचना, उसका धंधा था। दूध की कई बंदियाँ चल रही थीं। पुरखों की छोड़ी हुई काफ़ी खेती-बाड़ी थी। ब्याज पर भी काफ़ी पैसे चल रहे थे। अपना शौक-मौज पूरी करने के लिए उसे किसी भी तरह की तंगी का सामना नहीं करना पड़ता था।

अपने वासनाजनित शौक़ के चलते वह अब तक अनेक चारा वालियों को अपने घापे में ले चुका था। उसे तो अब उनकी गिनती भी याद नहीं। मकान के पीछे भैसें बँधती थी। चारा वालियों को वह पीछे के दरवाज़े से बुला लेता। चारा वालियों को चारे के दुगने-तीगुने पैसे मिल जाते। कुछ को तो चट लग गई, पर कुछ ने उसके घर चारा डालने से ही इंकार कर दिया। मदन चारे से अधिक उनकी उम्र और उभारों को तरजीह देता था और उसी हिसाब से वह चारा वाली को चुनता था।

चंपा का पति बलराम एक सरकारी ऑफ़िस में चपरासी था। ख़ूब दारू पीता। वेतन दारू में उड़ा देता। चंपा उससे रोज़ झगड़ा करती और कभी-कभी तो पीट भी देती। मदन ने बलराम को ब्याज से पैसे दे रखे थे। वह गाहे-ब-गाहे ब्याज वसूली पर आता था। इस दौरान उसकी नज़र चंपा पर पड़ी। वह उसकी  नज़र में चढ़ गयी। उसके दूधिया रंग और सुगठित उभारों ने उसे पागल कर दिया। चंपा को भी मदन भा गया था। वैसे भी वह अपने पति को अपने क़ाबिल नहीं समझती थी। वह जितनी रूपवान ख़ुद को समझती थी, अपने मुक़ाबले में वह अपने पति को पासंग के बराबर भी नहीं मानती थी। मदन के चक्कर बार-बार लगने लगे। ब्याज वसूली तो एक बहाना था। बलराम ब्याज चुका नहीं पा रहा था। मदन ने चंपा को ही ब्याज समझ लिया। वह भरपूर ब्याज वसूली करने लगा था। चंपा को भी लगने लगा था कि अब जाकर उसे अपने क़ाबिल आदमी मिला है। उसे ब्याज चुकाने में मज़ा आने लगा। बलराम दारू पीकर आगे के कमरे में पड़ा रहता। मदन और चंपा अन्दर के कमरे में पड़े रहते। बच्चे स्कूल में रहते। छुट्टी के दिन उन्हें कुछ पैसे पकड़ा कर सिनेमा देखने या किसी अन्य काम से बाहर भगा दिया जाता। इधर बलराम की दारू उतरने ही नहीं दी जाती थी।

पर बात फैलने लगी थी। मदन और चंपा को बलराम काँटे की तरह खटकने लगा। लोग कहते हैं कि वे बलराम की तम्बाकू और दारू में कोई धीमा ज़हर मिला-मिला कर देते रहे थे और एक दिन बलराम उस ज़हर के कारण ही मरा था। पर इल्ज़ाम दारू पर लगाया गया था कि दारू ने उसके लीवर को गला दिया। दोनों ही पाक-साफ़ बचे रहे। बलराम की मौत के बाद उन्हें सहसा मनचाहा करने की खुली छूट मिल गई। चंपा को पति की जगह पर अनुकम्पा नियुक्ति मिल गयी थी। अपने पति की तरह वह भी चपरासी बन गई और चंपा से चंपा मैडम में बदल गई थी। कोई भी उसे 'ए चंपा' नहीं कह सकता। पुकारो तो इज़्ज़त से ‘मैडम' कहकर। अक्सर जिन्हें मैडम कहा जाता है, वे उल्टे पल्ले की साड़ी पहनती हैं। पर चंपा पहनती तो सीधे पल्ले की साड़ी ही, पर जब उसे 'मैडम' शब्द से सम्बोधित किया जाता तो वह ख़ुश हो जाती। सीधे पल्ले की साड़ी में ही मैडम हो जाती। उसके चेहरे पर लालिमा बढ़ जाती। जो लोग मैडम कहकर पुकारते, वे उसे अच्छे लगने लगते। उसका नवांकुरित दर्प तुष्ट और पुष्ट होता।

शहर के भीतर का किराए का पुराना मकान छोड़ उसने एक अपना ख़ुद का अपना मकान एक विकसित होती कॉलोनी में ख़रीद लिया था। अब यहाँ उसे अधिक आज़ादी थी। पर बदनामी की छाया तो वहाँ भी आ पहुँची थी। अड़ोसी-पड़ोसी को मालूम पड़ गया था कि यह जो एक आदमी उसके साथ साए की तरह लगा हुआ रहता है, इसका पति नहीं है। वह मदन है। दूध का धंधा करता है।

मदन रोज़ चंपा के पास आने लगा। ठीक रात को आठ-नौ बजे आता। रातभर रुकता, सुबह साढ़े चार बजे वापस निकल जाता। यह रोज़ की दिनचर्या थी। शनिवार-रविवार को चंपा की छुट्टी होती, तब वह दिन को भी धमक जाता। अक्सर वह चंपा के नए बने घर में ही बना रहता। देर रात तक हा-हा, ही-ही होती रहती। पड़ोसियों ने चंपा को दो गुप्त नाम दे रखे थे- गोरे रंग और भैंस वाले से जुड़ी होने के कारण ‘भूरी भैंस’ और झगड़ालू होने के कारण ‘रणचंडी’। रात को वह जैसे ही गली में प्रवेश करता, लोग दबी ज़बान में कहते-'लो दूधवाला आ गया, भूरी भैंस का दूध निकालने।' 

चंपा के अपने पति से दो बच्चे थे। बड़ी लड़की और छोटा लड़का। रूप-रंग की दृष्टि से लड़की माँ पर गयी थी और लड़का बाप पर। लड़की माँ की तरह गोरी-चिट्टी थी, जबकि लड़का बाप की तरह ठिंगना और साँवला। लड़की सयानी थी। उसने इस नए बाप को लगभग स्वीकार कर लिया था। मदन उसे कभी-कभी सलवार-सूट, छोटे-मोटे आभूषण वग़ैरह दिलवा दिया करता। वह 'बाउजी...बाउजी' कह-कह कर उससे कुछ न कुछ झटकने की कला में माहिर हो चुकी थी। पर छोटा लड़का सरल था। कुछ भोला। कुछ भावुक। छोटा होने के कारण उसका नाम ही छोटू पड़ गया था। कुछ बड़ी उम्र के कुत्सित मानसिकता के लड़कों ने उससे दोस्ती गाँठ रखी थी। गाहे-ब-गाहे उसे खाने के लिए गुटका वग़ैरह दिला दिया करते। कभी-कभी दारू भी चखा देते। दरअसल उनकी नज़र बड़ी लड़की पर थी। वे उसके ज़रिए उस तक पहुँचना चाहते थे। उसके ज़रिए अपनी कच्ची कामनाओं को अंजाम देना चाहते थे। कुछ लड़के तो उसके घर के आसपास ऐसे मँडराने लगे थे, जैसे गुड़ के आसपास मक्खियाँ भिनभिनाती हों। लड़की को भी अपने गुड़ होने का एहसास था। एक-दो लड़के को तो कुछ ज़्यादा ही तरजीह देने लगी थी। चिट्ठी-पत्री का आदान-प्रदान होने लगा था। तब तक मोबाइल इतना चलन में आया नहीं था। ऐसे ही कुछ लड़के उससे उसकी माँ और नए बाप के बारे में तरह-तरह के सवाल पूछते। उसे यह सब अच्छा तो नहीं लगता, पर क्या करता? 

जिस शाम मदन की पत्नी कला ने अंतिम साँसें ली थीं, उस शाम भी वह चंपा के घर ही जमा हुआ था। उसका एक गंजा-सा शागिर्द उसे खोजते हुए चंपा के घर आया था। तब मदन चंपा के पास ही हा-हा, ही-ही, होहो में डूबा था। अजीब था कि बाहर वह जितना ख़ामोश रहता, चंपा और लड़की के सामने उतना ही मुखर हो जाता था। कहते हैं कि पति की चरित्रहीनता ने ही असमय कला के प्राण ले लिये थे, अन्यथा उसे नख में भी कोई रोग न था।

कोई भी क्रिया हो, एक दिन वह नीरस और यंत्रवत हो जाती है। नवीनता का रस उसमें नहीं रहता। उसमें कुछ नए पेंच निकल आते हैं। एक दिन हरा-भरा पेड़ भी पत्रहीन हो जाता है। उसमें नए पत्ते निकलने को आतुर हो जाते हैं। पुराने समीकरणों से सर्वथा भिन्न नए समीकरण बनने लगते हैं। भावनाओं की तीव्रता कम होने लगती हैं। सोचने के कोण बदल जाते हैं। दिल के बजाय दिमाग़ की रोशनी में सम्बंधों को तौला जाने लगता है। फ़ायदे-नुक़सान का गणित सक्रिय हो जाता है। पानी थम जाता है तो सड़ने लगता है। उन दोनों के बीच भी यही सब हो रहा था। उनके बीच देह का मामला ठंडा पड़ता जा रहा था और पैसे का मामला ज़ोर पकड़ता जा रहा था। दोनों एक दूसरे को तौलने लगे थे। मन ही मन अपना नफ़ा-नुक़सान सोचने लगे थे। निज अस्तित्व का बोध होने लगा था। अहंकार अपना फन उठाने लगा। केंद्र से देह खिसक गई थी और वहाँ पैसा आ गया था।

मदन को यह बात तुष्ट करती थी कि वह एक ऊँची जात की औरत को रख रहा है। चंपा के मन में यह हीनता थी कि वह एक नीची जात के मर्द की रखैल है। पर वह ख़ुद को यूँ समझाती कि उसके पुरखों ने नीची जात की अनेक औरतों को अपनी जाँघों और रसूख़ के बल पर रखा है और वह उन्हीं की वंशज है। चूँकि मदन ख़ुद उसके पास आता है, इसलिए वह उसकी रखैल नहीं है, बल्कि उसने मदन को रखा हुआ है। उसने उसे भेड़ बना रखा है। यह सोचकर वह ख़ुद को शंकर से श्रेष्ठ समझती। वह अपनी हीनता को हावी नहीं होने देती।

कुछ दिनों से मदन और चंपा के बीच चिक-चिक चल रही थी। चंपा ने भावों में बहकर मदन को भैंस ख़रीदने के लिए क़रीब डेढ़ साल पहले चालीस हज़ार रुपए दिए थे। अब वह रुपए लौटाने में आनाकानी करने लगा था। उसने अपने भविष्य निधि खाते से ये पैसे निकल कर मदन को दिए थे। मदन चंपा और उसके बच्चों पर हर माह करीब तीन हज़ार रुपए ख़र्च कर रहा था। उसने मन ही मन हिसाब लगा लिया था कि वह चालीस हज़ार तो कब के पूरे दे चुका है। चंपा ने जब पैसे का तक़ाज़ा किया तो उसने देने से इंकार तो नहीं किया, पर दिये भी नहीं। बस वह टाला-टूली करता रहा। इस महीने नहीं तो उस महीने दे देगा। कभी यह काम है तो कभी वह काम। रोज़ के बहाने सुनकर वह तंग आ चुकी थी।

कुछ दिनों से चंपा का मूड उखड़ा हुआ था। ऑफ़िस में भी नए साहब से कामकाज को लेकर तनातनी चल रही थी। उसने झाड़ू लगाने और पानी पिलाने से इंकार कर दिया था। उसकी निगाह में ये छोटे काम थे और उसे ऑफ़िस के नीची जात के चपरासी ही करें। वह ऊँची जात की थी और ऐसे काम करने से उसकी इज़्ज़त घटती थी। जबकि नए साहब चाहते थे कि चपरासी होने के नाते उसे ये काम भी करने होंगे। पुराने साहब ने उसे इन कामों से मुक्त कर रखा था। केवल फ़ाइल-रजिस्टर वग़ैरह ही उसे लाने ले जाने होते थे। यही कारण था कि इन दिनों उसका भेजा गरम रहा करता था। इधर मदन भी पैसे देने के मामले में सिर्फ़ टालमटोल ही कर रहा था। वह पूरी तरह उखड़ गयी। 

उस दिन जैसे ही मदन घर में आया, चाय-पानी का पूछे बग़ैर उसने अपने पैसे का पुरज़ोर तक़ाज़ा किया। मदन के ठंडे रुख से वह हिंस्र हो उठी थी। नतीजतन मदन घर के भीतर डोल रहा था और दरवाज़े पर ताला लटका था। उसे घर से बाहर निकालने में मदद करने चंपा के डर से कोई नहीं आ रहा था। हालाँकि सामने वाला पड़ोसी उसे चक्कर लगाते हुए देख रहा था। 

कुछ देर के असमंजस के बाद मदन ने घर से एक पेंचकस ढूँढ़ निकाला। खिड़की की जाली स्क्रुओं के ज़रिए लकड़ी की फ्रेम से जुड़ी थी। उसने एक-एक करके सभी स्क्रुओं को खोल लिया। फ़्रेम आसानी से निकल गया। अब वह खिड़की के ज़रिए बाहर निकल सकता था और वह बाहर निकल आया। दरवाज़े पर ताला पहले की ही तरह लटका हुआ था।

***

अभी वह सड़क के मोड़ तक पहुँचा ही था कि सामने उसे फनफनाती हुई चंपा आती दिखी। वह उससे बचने के लिए दाएँ-बाएँ होने लगा था। पर चंपा ने उसे बचकर निकलने नहीं दिया। उसने उछल कर उसके कमीज़ का कॉलर पकड़ा ही लिया। दहाड़ने लगी- 'ला म्हारा पयसा द भड़वा। का जय रो हिजड़ा। थके जेल म नी सड़ऊँ तो हूँ म्हारा बाप का मूत की नी। भरसा मत रयजे, असी-वसी मत समजजे भड़वा...छिनाल्या...थारी सीड़ी गुँतू थारी।'

मदन ने जैसे-तैसे ख़ुद को छुड़ाया। पर उसकी कमीज़ के बटन टूट चुके थे। कमीज़ के पल्ले खुलकर हवा में फरफराने लगे थे। बनियान छाती पर से फट चुकी थी। छाती के बेतरतीब बाल बाहर दिखने लगे थे। कुछ मुक्के और थप्पड़ वह खा चुका था। उसका मुँह झुका हुआ था। उसके सँवरे बाल बिखर गए थे। सिर का फुग्गा बिगड़ गया था। किसी से निगाहें मिलाए बिना वह नीची मुंडी कर निकल गया। लोगों ने भी दबे-छुपे इस दृश्य को देखा, पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। प्रतिक्रिया को सबने अपने भीतर ही जज़्ब कर लिया।

***

कुछ ही दिनों के बाद अपने नियत समय पर मदन को चंपा के घर पर आते हुए पड़ोसियों ने देखा। उसके चेहरे पर शर्म का कोई भी नामो-निशान भी नहीं था, जैसे कुछ हुआ ही नहीं था। उस घटना कि छाया तक उसके चेहरे पर नहीं थी। सिर पर पुराने हीरो जैसा बालों का फुग्गा पहले की ही तरह विद्यमान था। उसकी देह-भाषा में पहले जैसा आत्मविश्वास देख उन्हें घोर आश्चर्य हो रहा था। 

कुछ देर बाद ही घर से पहले की ही तरह रह-रहकर हा-हा, ही-ही, हो-हो की आवाज़ें आ रही थीं। लड़की और चंपा की हर्षित आवाज़ें भी उसमें सम्मिलित थीं। लगता था कि अब मामला सुलट गया है। 

लड़की और छोटू दोनों का ही पढ़ने में मन नहीं लगता था। दोनों ही जैसे-तैसे आठवीं-नौवीं करके घर बैठे थे। छोटू दिन भर और देर रात तक इधर-उधर भटका करता। केवल भूख लगने पर ही घर आता। किसी ने समझाया कि कुछ काम क्यों नहीं करता। तब वह एक चाय वाले के यहाँ काम करने लगा था। पर बड़ी लड़की बस बनाव-सिंगार में लगी रहती। मदन ने ख़ासतौर से लड़की की माँग पर एक रंगीन टीवी लाकर घर में रख दिया था। वह अक्सर उससे चिपकी रहने लगी थी। मदन की निगाह अब इस लड़की की देह पर टिकी थी। अक्सर वह चंपा की अनुपस्थिति में भी घर पर आने लगा था। लड़की को वह बनाव-सिंगार की तरह-तरह की चीज़ं लाकर देने लगा था।

अपने दोस्तों के हवाले से छोटू को मदन की कुत्सित मंशा की भनक लगी। शक का कीड़ा तब से ही उसके दिमाग़ को खाने लगा था। वह टोह लेने के लिए एक दिन दोपहर बाद अचानक घर आया। उस समय माँ ऑफ़िस में रहती थी और उसकी बहन घर पर ही अकेली रहती थी। दरवाज़ा भीतर से बंद था। उसने दस्तक दी। दरवाज़ा खुलने पर भीतर मदन और अपनी बहन को पाकर उसका माथा ठनका। बहन ने नया सूट पहन रखा था। उसे देख दोनों के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। उसे यह बहुत अटपटा लगा था। उसे लगा कि दाल में कुछ काला ज़रूर है। 

उस रात जब वह चाय की दुकान से लौटा तो घर में वही हा-हा, ही-ही, हो-हो की आवाज़ें आ रही थीं। उसने घर में घुसने से पहले रस्ते पर पड़ा एक पत्थर उठा लिया। घर में पहुँचते ही मदन की ओर इशारा करते हुए उसने कहा- ‘ए बाहर निकल तो...अबी कि अबी...चल।‘

‘कय हुयगो थके। थारो बाप हे रे, जरा ढंग सी वात कर,’ चंपा धीरे से बोली।

‘चोप्प...कायको म्हारो बाप। थके कय मालम। तू तो अपणी मस्ती मेज मस्त रे। यो तो म्हारो जीजो बणनु चइरो,’ छोटे के हाथ में पत्थर था और मुद्रा आक्रामक। 

चंपा ने पहले मदन को और फिर अपनी बेटी को घूरकर देखा। दोनों की नज़रें झुक गईं। 

‘सुण्यो कि नी टेगड़ा। कय बयरो हे। चल...बाहर निकळ..अबी,’ छोटू फिर गरजा। पर इस बार चंपा चुप ही रही। वह छोटू की बात से सहमत लग रही थी। 

 मदन मौके की नज़ाकत देख मुंडी नीची कर झट से घर से बाहर निकल गया।

‘इना घर म फिर कदी पांय मेल्यो नी तो थारा टांगड़ा तोड़ न्हाखूंगा,’ उसने जाते हुए मदन को चेतावनी दी। उसकी आँखों से अंगारे बरस रहे थे। वह क्रोध से तमतमा रहा था।  

पड़ोसियों की  नज़र में छोटू सहसा बड़ा हो गया था।

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