05-10-2007

दुःखों की बस्तियों में तो, बस आँसू का बसेरा है

डॉ. भावना कुँअर

दुःखों की बस्तियों में तो, बस आँसू का बसेरा है
जिधर भी देखती हूँ मैं, अँधेरा ही अँधेरा है ।


वो कैसे जी रहें हैं यूँ, न रोटी है न कपड़ा है 
उन्हें मायूसियों के फिर, घने जंगल ने घेरा है ।


न रुख़्सत हो सकीं बेटी, ज़माने का सितम देखो
हर इक चेहरे के पीछे ही, छिपा बैठा लुटेरा है।


नज़र आती नहीं कोई, किरण उम्मीद की उनको
मगर सेठों के घर में तो, सवेरा ही सवेरा है ।


मिले तो कोई अब हमको, जो समझे हाल-ए-दिल अपना
जो हम भी कह सकें सबको, यहाँ कोई तो मेरा है।
 

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