दिशाहीन

आस्था

एक
अनजाना सा अहसास
मीठी सी चुभन...
न ही उलझी हुई
न ही सुलझी हुई
पर जैसे
कोहरा में छिपी हुई...
आँखें साफ कर कर
देखना चाहूँ...
खुद के ही मन में
झाँकना चाहूँ..
पर कुछ भी
नज़र आता नहीं...
अपना आप ही
जैसे गुम हुआ..
ख़ुद को खोकर भी 
अनजान हूँ...
किसी को पाया या
ख़ुद को खोया...?
ये सोच सोच
परेशान हूँ..
मेरी जीत है
या कि हार..
कुछ समझ आता नहीं...!

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