01-04-2019

दिलो दानिश उपन्यास में सामंती परिवेश और स्त्री की स्थिति

कल्पना सिंह राठौर

शोध-सारांश –

भारतीय समाज पुरुष प्रधान समाज रहा है, यहाँ स्त्रियाँ हमेशा ही एक ऑब्जेक्ट या वस्तु की तरह समझी गयी हैं। कभी वह मनोरंजन का ज़रिया रही हैं, तो कभी युद्धों की वजह। दिलो दानिश उपन्यास का कलेवर आज़ादी-पूर्व की सामंती व्यवस्था की चौहद्दी में स्त्री की स्थिति को  उभरता है। आज़ादी से पहले की सामाजिक व्यवस्था में रईसों का कई स्त्रियों से सम्बन्ध होना सहज स्वीकार था। सामंती समाज व्यवस्था में स्त्री, घर, ज़मीन और जानवरों की तरह पुरुषों की सम्पत्ति मानी जाती थीं। स्त्रियों के पैतृक सम्पत्ति में कोई अधिकार नहीं हुआ करते थे। वे आजीवन पिता, पति और पुत्र के आधीन रहने को मजबूर थीं। उपन्यास की कहानी एक सामंती हवेली और रईस समाज व्यवस्था से ताल्लुक़ रखती है लेकिन कृष्णा सोबती ने जिस रचनात्मकता और तटस्थ आत्मीयता के साथ उसकी अच्छाइयों और बुराइयों का चित्रण किया है वह बेजोड़ है। उपन्यास की तीनों स्त्रियाँ अपनी-अपनी हद से सामंती व्यवस्था को अस्वीकार करती हुयी दिखाई देती हैं। कुटुंब प्यारी, महक बानो और छुन्ना तीनों में से कोई भी जस की तस परिस्थति को स्वीकार नहीं करती हैं, वे अपने परिवेश को अपने लायक़ बनाने का भरसक प्रयास करती हैं। उपन्यास जड़ परिवेश में सशक्त हस्तक्षेप करता है। यह उपन्यास की लेखिका की रचनात्मकता है कि वे ऐसे घोर सामंतवादी परिवेश के समानान्तर इतने जुझारू स्त्री पात्र खड़े कर पाने में सफल होती हैं। दिलो-दानिश उपन्यास को प्रेम, सामाजिकता और जीवन के सुख-दुःख की छोटी-बड़ी कहानियों का संगठित बिम्ब कहा जा सकता है।

शोध समस्या –

दिलो दानिश उपन्यास के माध्यम से सामंती परिवेश में स्त्री की स्थिति का अध्ययन करना।

मूल शब्द –

सामंतवादी व्यवस्था, सामाजिक परिवेश।

शोध पत्र -

हिंदी उपन्यास की सीधी बहती हुई धारा में कृष्णा सोबती के उपन्यास एक रचनात्मक मोड़ लेकर आते हैं। उनके साहित्य ने समाज में स्त्रियों की दशा को उकेरते हुए पाठकों के मन में कई तरह के सवाल पैदा किये हैं। भारतीय समाज पुरुष प्रधान समाज रहा है, यहाँ स्त्रियाँ हमेशा ही एक ऑब्जेक्ट या वस्तु की तरह समझी गयी हैं। कभी वह मनोरंजन का ज़रिया रही हैं, तो कभी युद्धों की वजह। पुरुष जब चाहे जितनी चाहे स्त्रियों से सम्बन्ध रख सकता है और मन भर जाने पर वह उनको उतनी ही आसानी से छोड़ भी सकता है। किन्तु स्त्री हर तरह से पुरुष के अधीन है। दिलो दानिश उपन्यास का कलेवर आज़ादी-पूर्व की सामंती व्यवस्था की चौहद्दी में स्त्री की स्थिति को  उभरता है।

उपन्यास के नायक कृपानारायण की ज़िन्दगी में दो स्त्रियाँ हैं, एक ब्याहता पत्नी हैं तो दूसरी ‘जानम’। दोनों ही स्त्रियों के चरित्र सामंती परिवेश के अनुकूल ही गढ़े गए हैं। पत्नी कुटुंब प्यारी  निरंतर तनावग्रस्त हैं क्योंकि उनके पति के दूसरी औरत से सम्बन्ध हैं और उससे दो संतानें भी हैं। यह जानकर भी कुटुम्ब प्यारी ज़ुबान चलाने और टोने-टोटके से ज़्यादा कुछ भी नहीं कर पाती हैं।  कुटुंब प्यारी पूरी ताक़त के साथ पति से लड़-झगड़ ही सकती हैं, इसके आलावा उनके अख़्तियार में कुछ भी नहीं है। “एक ही आदमी जाने शतरंज की कितनी चालें चला करता है। पूरी गृहस्थी को अलग-अलग गोटों से खेलता है। किसी को रिझाता है। पटाता है, सताता है। ज़ेर साया में तो हम पड़े हैं। इनके लिए तो कसोरा हैं। पिया, जब जी भर गया तो दूसरा उठा लिया।”1 मायूस होकर वह मायके की शरण लेती हैं। मायके में भाई से फ़रियाद करने पर सीधा सा जवाब मिलता है कि – “वकील साहब को जो करना था सो कर चुके। बाल बच्चे हो गए। अब हमारे कहने से कुछ होगा भला! ... अब अक्लमंदी इसी में है कि इसको लेकर ज़्यादा शोर न किया जाये।”2 भाई से सपाट जवाब पाकर कुटुंब प्यारी अपनी भाभी से गुहार लगाती हैं कि वे भाई से कहकर कृपानारायण को समझाएँ की वे महक बानो को छोड़ दें। जवाब में उनकी भाभी कहती हैं कि – “दयाप्रसाद की बहन को लेकर इन्हें भी बिरादरी ने कहाँ बख्शा। तभी से ढीले पड़े हैं। ... यह भी इसी चक्कर में फँसे हैं। बहनोई के ख़िलाफ़ आवाज़ कैसे बुलंद करेंगे ?”3 कुटुंब प्यारी की भाभी भी उन्हें पति के ‘शौक़’ को सहने की सलाह देती हैं। क्योंकि हमारे समाज में औरत का अंतिम सहारा उसका पति ही होता है। भाभी कुटुंब प्यारी को समझाती हैं कि – “हमारी मानो तो धीरज से उन्हें जीतने की कोशिश करो। आखिर तो दुनिया में वही तुम्हारे अपने हैं। कहा नहीं जाता कि ससुराल से दुत्कारी हुई को मायके में भी चैन नहीं। कहने का बुरा तो मानना मत।”4 हमारे समाज में स्त्री मायके की तभी तक है जब तक वह ससुराल की है। ससुराल या पति द्वारा त्याज्य औरतों के लिए मायके में भी जगह नहीं होती है। मायके से मायूस होकर लौटने के बाद वे सास से पति की शिकायत करती हैं। लेकिन सास बेटे को समझने की बजाय कुटुंब प्यारी को ही नसीहत देती हैं कि – “अरे जो बाप-दादा करते रहे वही तो बेटे करेंगे। खानदानों में ऐसे जलजले – भूचाल तो उठते ही रहते हैं। उलट-फेर के बाद फिर वहीं के वहीं। कुछ साल और निकल जाने दो। हमेशा मरे हुस्न के चक्कर नहीं रहते। रोग-बीमारी में पलट कर आयेंगे तुम्हारे ही पास। बहुजी, हमारी मानो तो इस कलंक को निकाल दिल से बाहर फेंको। यह हुस्नपरस्ती उम्र भर नहीं चलती। तुम तो अपनी जगह टिकी रहो।”5

कुटुंब प्यारी हर ओर गुहार लगाकर थक जाती हैं लेकिन कोई भी कृपानारायण की ज़िन्दगी में दूसरी औरत के होने को ग़लत नहीं मानता है। उस समय के सामंती समाज में यह आम रवायत थी। कुटुंब प्यारी की रोज़ की झिक-झिक से तंग आकर कृपानारायण उसको साफ़-साफ़ बता देते हैं कि – “सुनिए हर मर्द के हाथ में एक जाल हुआ करता है। अपनी हिम्मत और मर्दानगी से वह इस जहाँ में जितना चाहे समेट ले।”6 कृपानारायण के जीवन का सीधा सा फ़लसफ़ा है कि – “क़िस्सा कोताह इतना है कि बड़े मुक़द्दमों की कमाई बीवी के हाथ और छोटे-मोटे की ख़ुशनुमाई घर के बहार। आख़िर जमे हैं गृहस्थी में। बिरादरी में दबदबा है। साख है। उसके लागू किये गए क़ानून से भी कैसे बाहर जायेंगे! मर्यादा है। बाक़ी साहब इश्क़-मोहब्बत, सो पानदान की तरह साथ लगे ही हैं।”7 मायका, सास और पति तीनों ओर से निराश होने के बाद कुटुंब प्यारी टोन-टोटके का सहारा लेती हैं। उपन्यास में यहाँ गहरा अंतर्द्वंद्व उभरता है कि, कुटुंब प्यारी अपने पति को अवैध संबंधों से बचाने के लिए ख़ुद उसी का शिकार हो जाती हैं। वो एक बाबा के चक्कर में पड़कर गर्भवती भी हो जाती हैं। “तमाम रात हम अपने घर में नहीं कहीं और ही भटकते रहे। कीकर का जंगल सा उगा था। उस घोर वीराने में वह अँधेरी सी कुटिया जैसे सन्नाटे में पड़ी कोई बुचकी हो। उसमें तो हमीं बँधे हैं। हमारी घिग्घी बँध गयी ... इन्होंने हिलाया तो हम इनका हाथ पकड़ फिर बाबा में खो गए। - देवी हमारा ध्यान करो। हम तुमसे दिशाओं का बंधन करेंगे। हम तुम्हारा गुंथन करेंगे। हमें अपने में संयोजित करो।”8 टोना टोटका करके भी उनको निराशा ही हाथ लगती है। अंततः हर ओर से निराश होकर कुटुंब प्यारी आत्महत्या का प्रयास करती हैं। इस घटना के बाद से कृपानारायण महक बानो से किनारा कर लेते हैं। नैतिक-अनैतिक हर तरह के जतन करके अंततः कुटुंब प्यारी अपने पति को ‘दूसरी औरत’ के चंगुल से छुड़ाने में कामयाब हो जाती हैं।

उपन्यास की दूसरी महत्वपूर्ण स्त्री पात्र महक बानो हैं। महक बानो वकील कृपानारायण की मुवक्किल नसीम बानो (कलावंत डेरेवाली) की बेटी है। नसीम बानो को किसी क़त्ल के जुर्म में सज़ा हो जाती है। ऐसे में वे अपनी ज़ेवरातों भरी संदूक और मासूम महक बानो को वकील साहब को सौंप कर जेल चली जाती हैं। वकील साहब महक बानो को अपनी ‘जानम’ बना लेते हैं और ज़ेवरात की संदूक को अपने कब्ज़े में ले लेते हैं। वे महक बानो का फ़राशखाने वाला घर छुड़वाकर उसकी रहाइश का इंतज़ाम कर देते हैं। इस तरह से महक बानो वकील साहब के खानदान में ‘फ़राशखाने वाली औरत’ के नाम से मशहूर हो जाती हैं। महक बनो कृपानारायण के लिए दिलजोई का समान बन जाती हैं। वे जब चाहें जैसे चाहें अपना मन बहला सकते हैं। कृपानारायण कहते हैं – “भला पूछिए मर्द हैं हम। मेहनत करते, कमाते हैं। कुनबे को पलते पोसते हैं। तो कए थोड़ी-बहुत दिलजोई-दिल्लगी पर भी हमारा कोई अख़्तियार नहीं!”9 यहाँ दिल्लगी की ‘समान’ जीती-जागती औरत, महक बानो हैं। 

महक बानो कम चाहत और ज़्यादा मजबूरी में वकील साहब की सरपरस्ती स्वीकार कर लेती हैं। महक बानो के पास इसके सिवा कोई रास्ता नहीं था, क्योंकि वकील साहब ने उनकी माँ की सम्पत्ति दबा रखी थी। अपने ज़ेवर का संदूक पा जाने के आसरे ही महक बानो वकील साहब के साथ जीवन गुज़ार देती हैं। शायद अगर यह ज़ेवर रूपी सम्पत्ति उनके पास होती तो वे अपना साथी चुनने के लिए स्वतंत्र होतीं और कभी भी वकील साहब के मन बहलाव का साधन बनना पसंद नहीं करतीं। महक बानो के पास कृपानारायण से हुए दो बच्चे हैं, चंद हसीं रातें हैं, और एक लम्बा इंतज़ार है उस सम्पत्ति का जो उसकी माँ की थी और उसकी है। महक बानो कृपानारायण से कहती है – “मुंडेर पर कोहनी टिकाये कभी आपका इंतज़ार करती हैं तो लगता है हम नहीं अम्मी खड़ी हैं। ... कभी कान में चुपके से हिदायत देने लगती हैं कि बानो मेरी बेटी, अपने हक़ न छोड़ना।”10 कृपानारायण महक के बच्चों से तो लाड़ करते हैं लेकिन महक को लेकर सशंकित रहते हैं। महक जब भी उनसे अपने ज़ेवर की फ़रमाइश करती है तब वकील साहब को लगता है कोई उसको बहला रहा है। ज़ेवर के रूप में महक बानो की कुंजी कृपानारायण के हाथ में रहती है। ज़ेवर के बिना महक कहीं नहीं जा सकती है। महक भी अपने बच्चों का मुँह देखकर इसी उम्मीद से जीती रहती है कि उसकी माँ के ज़ेवर से उसके बच्चों का भविष्य सँवरेगा।

हमारे समाज में गहनों को स्त्रीधन कहा जाता है। सामंतवादी समाज में स्त्री ख़ुद सम्पत्ति की तरह समझी जाती थी। ऐसी दशा में उसका पैतृक सम्पत्ति में हक़ या उसकी ख़ुद की कोई सम्पत्ति होने का कोई सवाल ही नहीं उठता है। किसी भी मुसीबत में औरतों के लिए उनके ज़ेवर ही उनका अंतिम सहारा होते हैं। अपने धन को पाने की उम्मीद में महक बानो अपनी आधी ज़िंदगी गुज़ार भी देती हैं, लेकिन कृपानारायण से ज़ेवर मिलने की कोई भी उम्मीद नज़र नहीं आती है – “महक बानो अनमनी सी हो गयी। पास लेटे शख़्स पर नज़र डाली तो लगा कोई गोश्त और पोस्त का आदमी न हो, तहखाना हो, जिसमें बरसों पुरानी मिसलों के ढेर लगे हों।”11 महक बानो को लगता है कि अपनी बेटी की शादी में उनको अपने ज़ेवर ज़रूर मिल जायेंगे, लेकिन महक बानो से मासूमा की माँ होने का अधिकार भी छीनने की कोशिश की जाती है। समाज और बिरादरी के डर से कृपानारायण मासूमा को क़ानूनी तौर पर गोद लेकर उसकी शादी करना चाहते हैं। यहाँ कुटुंब प्यारी मासूमा की क़ानूनी माँ बनायी जाती हैं। कृपानारायण, महक बानो को यह भी स्पष्ट कर देते हैं कि शादी के बाद मासूम का मायका हवेली ही होगी, महक बानो का घर नहीं। इस घोषणा के बाद ही महक बानो के चरित्र में क्रान्तिकारी बदलाव आता है। वह अपने ज़ेवर की माँग को लेकर अड़ जाती हैं। महक बानो अब तक अपने बच्चों के भविष्य को लेकर ही चुप थीं, लेकिन अब चुप रहने का कोई कारण ही नहीं बचा। महक के बार-बार कहने पर भी जब कृपानारायण ज़ेवर देने को तयार नहीं होते हैं तब महक बानो खां साहब के साथ मिलकर वकील साहब को अदालत से अर्जी भिजवाती हैं। तमाम कानूनी दाँव-पेंच के बावजूद कृपानारायण को महक बानो के ज़ेवर लौटने ही पड़ते हैं। ज़ेवर मिलने के साथ ही जैसे महक बानो का आत्मविश्वास भी लौट आता है। अब उनको वकील साहब की रहाइश की ज़रूरत नहीं थी। वे अपना पालन करने में समर्थ थीं। मासूमा की शादी में महक बानो का आत्मविश्वास देखकर छुन्ना कहती हैं – “दद्दा आप हमारी बात का यक़ीन मानिये। उस मौक़े पर महक भाभी के खड़े होने का अंदाज़, बात करने में रुआब उनका ख़ास अपना ही था। खां साहब का इस अदा से कोई ताल्लुक़ नहीं था। लगता था वह ज़ेवर पहनते ही उनपर उनका खानदानी स्वरूप उतर आया था, ऐसे जैसे दुनिया को पछाड़कर खड़ी हो गयी हों।”12 ज़ेवर वापसी के बाद कृपानारायण और महक बानो के संबंधो में दूरियाँ आ जाती हैं, कृपानारायण के अंतिम समय में महक बानो भीगी आँखों से उनको अंतिम विदाई देती हैं।

इस उपन्यास की तीसरी और मह्त्वपूर्ण स्त्री पात्र छुन्ना है। वह कृपानारायण की बहन है। छुन्ना विधवा है, और पूरी ठसक के साथ मायके में रहती है। घर के हर मामले में वह अपनी राय रखती है। उनकी यह ठसक कई बार भाभियों के लिए इर्ष्या का विषय बन जाती है। छुन्ना के लिए वैधव्य जीवन का अंत नहीं जीवन में घटित एक घटना मात्र है। अपने देवर की ख़राब नीयत देखकर छुन्ना हमेशा के लिए मायके आ जाती है। मायके में छुन्ना अपनी छूटी हुई पढ़ाई पूरी करके आत्मनिर्भर बनती है, फिर भुवन नाम के व्यक्ति का चयन करके उससे शादी भी करती है। 

इस उपन्यास में सामंती समाज व्यवस्था में इन तीनों स्त्रियों के चरित्र को बख़ूबी उभरा गया है। उपन्यास में कृपानारायण का चरित्र भी बहुत मत्वपूर्ण है, वह तीनों स्त्रियों के केन्द्र में हैं। आज़ादी से पहले की सामाजिक व्यवस्था में रईसों का कई स्त्रियों से सम्बन्ध होना सहज स्वीकार था। कृपानारायण के अपनी पत्नी के आलावा सिर्फ़ एक औरत से सम्बन्ध थे, लेकिन कृपानारायण इन दोनों स्त्रियों और उनकी औलादों का पालन जिस नेकनीयती से करता है वह क़ाबिले तारीफ़ है। कृपानारायण ने ‘दो क़िस्मों, दो मिज़ाज,और दो गिरोहों’ की संतानों का एक समान पालन किया। इसीकारण पाठक की सहानुभूति स्त्रियों से ज़्यादा कृपानारायण को मिलती है।

सामंती समाज व्यवस्था में स्त्री घर, ज़मीन और जानवरों की तरह पुरुषों की सम्पत्ति मानी जाती थी। स्त्रियों के पैतृक सम्पत्ति में कोई अधिकार नहीं हुआ करते थे। वे आजीवन पिता, पति और पुत्र के आधीन रहने को मजबूर थीं। दिलो-दानिश उपन्यास की तीनों स्त्रियाँ पराश्रित तो हैं किन्तु कमज़ोर नहीं हैं। कुटुंब बानो की पति को पूरी तरह से अपना बनाने की तड़प और जिद पूरे उपन्यास में गूँजती रहती है। अंत में आत्महत्या का प्रयास में यथास्थिति का नकार दिखाई देता है। महक बानो आधी ज़िन्दगी अपना अधिकार पाने की लालसा और इंतज़ार में बिता देती हैं। किन्तु अंततः उनको बग़ावत करनी पड़ती है। साथ ही ज़ेवर पाने के बाद महक बानो के व्यक्तित्व में जो बदलाव आता है वह आर्थिक आत्मनिर्भरता की निशानी है। 

हालाँकि इस उपन्यास की कहानी एक सामंती हवेली और रईस समाज व्यवस्था से ताल्लुक़ रखती है लेकिन कृष्णा सोबती ने जिस रचनात्मकता और तटस्थ आत्मीयता के साथ उसकी अच्छाइयों और बुराइयों का चित्रण किया है वह बेजोड़ है। उपन्यास की तीनों स्त्रियाँ अपनी-अपनी हद से सामंती व्यवस्था को अस्वीकार करती हुयी दिखाई देती हैं। कुटुंब प्यारी, महक बानो और छुन्ना तीनों में से कोई भी जस की तस परिस्थति को नहीं स्वीकारती हैं, वे अपने परिवेश को अपने लायक़ बनाने का भरसक प्रयास करती हैं। यह उपन्यास जड़ परिवेश में सशक्त हस्तक्षेप करता है। उपन्यास की लेखिका की रचनात्मकता है कि वे ऐसे घोर सामंतवादी परिवेश के समानान्तर इतने जुझारू स्त्री पात्र रचने में सफल होती हैं। दिलो-दानिश उपन्यास को प्रेम, सामाजिकता और जीवन के सुख-दुःख की छोटी-बड़ी कहानियों का संगठित बिम्ब कहा जा सकता है।


सन्दर्भ सूची –

  1. दिलो-दानिश, कृष्णा सोबती, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली, तीसरी आवृत्ति 2013, पृ.सं - 80 
  2. वही, पृ. सं. – 86 
  3. वही, पृ. सं. – 87 
  4. वही, पृ. सं. – 85
  5. वही, पृ. सं. – 147 
  6. वही, पृ. सं. – 53 
  7. वही, पृ. सं. – 117  
  8. वही, पृ. सं. – 174
  9.  वही, पृ. सं. – 118 
  10. वही, पृ. सं. – 196 
  11. वही, पृ. सं. – 198 
  12. वही, पृ. सं. – 64 

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