दीप-संदेश

परिमल पीयूष

हे दीप-ज्योति, हे रश्मि-पुंज!
तू आज तमस को दूर भगा,
मेरे अंतरतम में प्रकाश की-
एक अलौकिक ज्योत जगा।

तू बढ़ता जा झिलमिल-झिलमिल,
नव दीपों के उजियारों से,
तू करता जा हर खंड धवल-
इस जीवन के, सुविचारों से।

तू चिर नवीन, तू झर निर्मल,
हर वैमनस्य को परे हटा
है दिशाहीन हो रहा मनुज,
उसको जीवन की दिशा दिखा।

दे भर प्रकाश तू अंबर तक,
अब चीर अमावस की छाती
तू आज जगा हर ओर अलख-
हर कुविचार, बन अविनाशी।

तू बन मशाल, तू जलता चल
हो एकाकी, पर चलता चल,
तेरे जलने से ही रोशन-
हो रहा हृदय, बन रहा सबल
तेरे दम से ही है जीवन-
कोमल, निर्मल, अविरल, अविरल...।

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