"हैलो।”

"हैलो कौन?”

"आवाज़ पहचाने नहीं क्या?”

"हाँ, कुछ जानी पहचानी सी लग रही है, पर बताओ कौन हो आप?”

"बिंदु बोल रही हूँ।”

"ओह!”

"आजकल कहाँ हो आप? दिखते ही नहीं।”

"क्यों, आप देखकर क्या करोगी?”

"करना क्या है...”

"तो फिर क्यों पूछा?”

शहद सी मीठी आवाज़ को सुनने के लिए विवेक सवाल पर सवाल दाग रहा था और उसी सुरीले नज़र में जवाब दे रही थी बिंदु।

बिंदु वयस्क थी और यह सब चोंचले जानती थी। बिंदु बिंदास भी थी। विवेक युवा था, बढ़ती जवानी का उबलता जोश उसका विपरीत लिंग के प्रति आकर्षित होना स्वाभाविक था। इन बातों का सिलसिला चलना और विवेक-बिंदु का एक दूसरे के प्रति आकर्षण का कारण था बिंदु की पड़ोसन जो कि विवेक की मुहबोली माँ थी। उनका स्वभाव हँसी-मज़ाक का था और विवेक भी चंचल था तो ख़ूब जमती थी। यह देख बिंदु का यौवन मचल जाता था। विवेक अच्छे घर से था, संस्कारी भी था। लेकिन बिंदु विवेक पर इस क़दर आकर्षित हो गई कि कुछ भी करके वो विवेक को पाना चाहती थी। जवानी की दहलीज़ पर क़दम रखते हुए विवेक का भी दिल मचलता था। वो भी अब बिंदु पर फ़िदा होने लगा। दोनों का आकर्षण प्रगाढ़ रूप लेने लगा। विवेक पतंगा सा बन शमा सी बिंदु की तरफ खिंचा चला आता, लेकिन उसको इस बात का पता नहीं था कि शमा के पास जाने पर पतंगे का क्या हश्र होता है। लेकिन अस्थिर युवा दिल इन सब बातों को नज़रअंदाज करता हुआ मदहोशी में खोकर आगे बढ़ने लगा। 

बिंदु प्रौढ़ थी लेकिन शारीरिक आकर्षण किसी षोडशी युवती से कम न था। माद्यम बदन, हिरनी से तीखे नयन, गुलाब की अधखुली पंखुड़ी से गुलाबी होंठ, लता सी लहराती लचीली कमर, घनघोर घटा सी जुल्फ़ें, ऐसा भरपूर यौवन विवेक को मदहोश कर जाता था। बिंदु विवेक को लुभाने के कोई मौक़ा नहीं छोड़ती थी। विवेक जब भी मुहबोली माँ के घर आता तो बिंदु नहाकर खुले केशों को सुर्ख गालों पर लहराती, तो कभी नशीली मुस्कान बिखेरती, कभी तिरछे नैनों से इशारा कर जाती, कभी साड़ी का पल्लू गिरा देती। और इन अदाओं से विवेक मचल उठता, वो अंदर ही अंदर तड़पता इस हुस्न का दीदार करने को। अब वो ख़्वाबों में भी बिंदु को देखने लगा था। चकवे की तरह रात भर बातों में मशग़ूल रहता और मिलन के सुखद सपने सँजोता। अंजाम की परवाह किये बिना विवेक नादानी में उस प्यार के कंटक भरे राह पर बढ़ चुका था जिसका अंजाम बहुत बुरा था। शायद जवानी के जोश में काँटों को तो पार कर लेता पर आगे जो भयानक दलदल आने वाला था, उसका विवेक को भान नहीं था।

अब विवेक पलभर भी बिंदु से दूर नहीं रहना चाहता था। बिंदु बच्चों की माँ थी पर उसके बदन में वो कशिश थी कि किसी को भी घायल कर सकती थी फिर विवेक तो यौवन की उस दहलीज़ पर खड़ा था; जहाँ से विचलित होना स्वाभाविक था।
विवेक अब मस्त भौंरा बन हर वक़्त बिंदु के आस पास मँडराने लगा था। बिंदु की दिलकश अदायें विवेक को गुलाब की सी महक लगती थीं। वो अब उसके और क़रीब जाना चाहता था। उस तरफ़ से भी खुला आमंत्रण था बस विवेक और बिंदु अब मौक़े की तलाश में थे।

लेकिन विवेक की राह में उसका संकोच भी था। बिंदु उससे लगभग दुगुनी उम्र की थी तो थोड़ी शर्म भी विवेक को रोक रही थी। एक दिन मुँहबोली माँ कहीं रिश्तेदार की शादी में जा रही थी तो विवेक को घर की ज़िम्मेदारी सौंप गई कि रात को यहीं सो जाना। आज विवेक के दिल मे असंख्य अरमान जग गए, वो दिनभर बस ख़्वाबों में रहा और बेसब्री से रात का इंतज़ार करने लगा। आज बिंदु उसे सावन की घनघोर घटा सी लग रही थी और विवेक उस शीतल बारिश में बदन की तपन को शांत करने के सपने ले रहा था। विवेक से एक-एक पल बर्दाश्त नहीं हो रहा था, बिंदु से बात हो गई थी कि कब मिलना है। उधर बिंदु भी सज-सँवरकर मोरनी सी मन में नाच रही थी।

आख़िरकार वो पल आया जब नवांकुर पुष्प पराग सा विवेक का दिल और असंख्य पुषों का रसास्वादन कर चुकी तितली सी बिंदु का मिलन होना था। लेकिन विवेक ठिठक गया आगे बढ़ने में संकोच हो रहा था, बालपन था, यौवन भी भरपूर लेकिन कभी पुष्प का रस चखा नहीं था तो लाज भी आ रही थी। लेकिन ऐसे प्रेम मिलन की कई दहलीज़ें पर कर चुकी बिंदु ने उसके संकोच को दूर किया और ले गई अपने शयनकक्ष में।

अब विवेक की आँखों के सामने वो नज़ारा था जिसका दीदार वो स्वप्न में करता था। बिंदु ने यौवन से भरपूर मदहोश बदन के दर्शन कुछ यूँ करवाये कि विवेक ने अब यह दहलीज़ भी पार कर ली। जिस विवेक ने कभी किसी औरत का चेहरा भी ग़ौर से ना देखा हो उसके सामने खिला हुआ गुलाब सा नग्न बदन था, जिसकी ख़ुशबू पूरे कमरे में फैली हुई थी। विवेक ने भी अब आपा खो दिया और बिंदु से लिपट गया। भँवरा सा पुष्प का रसास्वादन करने चिपक गया। गुलाब की पंखुड़ी सी बिंदु ने उसे आग़ोश में ले लिया। एक तरफ़ युवा बदन की तपिश और दूसरी तरफ कामुकता से भरा मदहोश बदन, शरद रात में दोनों का मिलन यूँ हुआ जैसे सावन में दिनभर छाई घटा झूमकर बरस रही हो। बिंदु ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी, विवेक को इस क़दर घायल किया कि अब वो उसके आग़ोश में बाहर नहीं आना चाहता था। इस मधुर आलिंगन से विवेक की चेतना जगी तो भोर हो रही थी। सुबह के चार बज रहे थे। बिंदु को सोई छोड़कर विवेक घर की तरफ़ चला।

इस मिलन के पश्चात तो विवेक का जीवन ही बदल गया । अब वो सब कुछ भूल गया बस बिंदु ही उसके लिए सब कुछ थी। सैंकड़ों काम छोड़े, बिंदु को ख़ुश करने के लिए ख़ूब ख़र्चा करने लगा, उपहार देने लगा। लेकिन इस दिखावे में विवेक भूल गया कि वो इतनी बड़ी ग़लती कर रहा है जिसका अंजाम अविश्वसनीय है।

विवेक का मन अब काम पर नहीं लगता, सिर्फ़ बिंदु ही थी उसका जीवन। बदन का मिलन तो दोनों के लिए आम था, कभी भी कहीं भी।

जिस दहलीज़ से विवेक कतरा रहा था अब वो उस दहलीज़ को सैंकड़ों बार पार कर चुका था। अपने संस्कार, सोच ,शर्म और  काम अब विवेक को तुच्छ लगने लगे थे। बस बिंदु का प्यार उसके लिए स्वर्ग के समान था।

लेकिन बिना काम यह सब कैसे चलता? पैसे भी चाहिए थे; आये दिन बिंदु की कोई न कोई ख़्वाहिश रहती और विवेक ख़ुद भी अब स्टैंडर्ड से रहना चाहता था तो ख़र्चा बहुत ज़्यादा बढ़ गया। लेकिन जवान दिल इन बातों को नज़रअंदाज़ कर आगे बढ़ता गया। विवेक माँ से पैसे ले लेता, कहता वापिस कर दूँगा। माँ भी विवेक की इच्छा को पूरी करने कर्ज़ ले लेती और विवेक जब भी माँगता, उसको पैसे दे देती। लेकिन कर्ज़ वापिस भी करना होता है, विवेक करता कहाँ से। बिंदु के प्यार में खोकर वो अब काम तो कुछ करता ही नहीं था। कहीं जाता तो 10-12 दिन से ज़्यादा नहीं टिकता। बिंदु का आकर्षण उसे दूर रहने नहीं देता।

विवेक अनजाने में ऐसी दलदल में फँस गया था कि ना आगे रास्ता था ना पीछे। धीरे-धीरे माँ को शक होने लगा, विवेक के बदले व्यवहार पर, ख़र्चे पर। माँ ने ध्यान रखना शुरू किया तो बिंदु और विवेक के इस रिश्ते का आभास हो गया। कई बार माँ ने समझाया, लेकिन विवेक को कहाँ समझ में आता, ना बिंदु उसको कहीं जाने देती। थककर माँ ने एक दिन चार वर्ष के कर्ज़ का हिसाब बनाकर विवेक के हाथ में पर्ची थमा दी और बोली कि आज से मेरे घर की दहलीज़ पर क़दम मत रखना।

विवेक से पर्ची का हिसाब देखा तो पाँवों तले ज़मीन खिसक गई और सर से आसमान भी ग़ायब। विवेक की आँखें फट कर कानो तक जा पहुँचीं, इतना बड़ा कर्ज़ कैसे चुकाएगा? उसका तो पूरा जीवन इसी में चला जायेगा। ना इस नाजायज़ कर्ज़ के बारे में घरवालों से बात कर सकता; अब करे तो क्या करे?

विवेक ने बिंदु से बात की तो बिंदु ने बात टाल दी। उसने अपने दोस्तों से विमर्श किया लेकिन किसी के पास इतनी बड़ी रक़म नहीं थी। अब कहाँ जाए, कोई दहलीज़ ऐसी नहीं थी जिस पर विवेक की परेशानी का समाधान हो सके।
निराश होकर विवेक शराब पीने लगा। उसकी परेशानी का हल नहीं निकला। अब विवेक और ज़्यादा दलदल में डूबता जा रहा था। एक रोज़ दूसरे गाँव में वो अपने दोस्तों के पास बैठा शराब पी रहा था तो उसको बिंदु की याद आई। उसने बिंदु के पास फ़ोन किया लेकिन बिंदु दूसरे नंबर पर व्यस्त थी। विवेक से 8-10 दफ़ा काल किया लेकिन बिंदु ने जवाब नहीं दिया। विवेक का नशा उतर गया, क्योंकि जो बिंदु हर हालात में विवेक के फ़ोन का जवाब देती थी; आज क्यों नहीं दे रही है? विवेक को ग़ुस्सा आया, वो उठा और पैदल गाँव की तरफ़ चला।

कोई दो घंटे पैदल चलकर विवेक गाँव पहुँचा। सीधे बिंदु के घर गया। रात का सन्नाटा था तो सब सो रहे थे। बिंदु के कमरे के पास पहुँचते ही विवेक के पाँव ठिठक गए। कमरे में से मादक आवाज़ें आ रही थीं। कमरे में रोशनी थी तो विवेक ने खिड़की के छेद से झाँककर देखा तो विवेक के हाथ-पाँव शिथिल पड़ गए। मुँह खुला का खुला रह गया, जैसे लकवा मार गया हो। अंदर बिंदु किसी के साथ हमबिस्तर थी। विवेक वहीं बैठ गया रोने लगा, ग़ुस्सा आया कि पत्थर लेकर दोनों का सर फोड़ दे। लेकिन पता नहीं क्यों विवेक ने यह विचार अंदर ही दफ़ना दिया।

विवेक के रोने की आवाज़ शायद बिंदु के कान में पड़ी, वो आधे-अधूरे कपड़े पहन कर बाहर आई और ग़ुस्से में बोली, "तू यहाँ क्या कर रहा है? किससे पूछकर मेरे घर में आया है तू?”

विवेक निशब्द था, उसकी ज़बान तो बेजान हो गई थी। बिंदु बोलती रही, "तेरे पास अब है ही क्या? यह देख राज आज पहली बार आया है, यह सोने की चेन दी है, तेरे पास क्या अब? निकल मेरे घर से,” कहते हुए बिंदु ने विवेक का हाथ पकड़ कर धक्का दे दिया।

बिंदु की ऊँची आवाज़ पड़ोसियों ने सुनी तो दौड़कर आए। वहाँ विवेक को नशे में धुत और आधे-अधूरे कपड़ों में बिंदु को देखा तो बिना हक़ीक़त जाने सबने विवेक को ही ग़लत मान लिया। आधी रात के इस शोर से काफ़ी लोग इकट्ठे हो गए और बात विवेक के घर तक भी पहुँच गई। विवेक के घरवालों को यक़ीन नहीं हुआ कि उनके लाड़-प्यार का यह सिला मिलेगा। उन्होंने विवेक को वहीं छोड़ा और बोले कि पुलिस को बुलाओ या जो भी करना है करो, हमारा इससे कोई वास्ता नहीं है। विवेक की मुहबोली माँ बीच-बचाव करके विवेक को बाहर ले गई और बोली, "तूने आज तक मेरी बात नहीं मानी, आज एक अंतिम बात कर रही हूँ, यहाँ से दूर चला जा और तब तक ना आना जब तक तू इस कलंक को मिटा ना दे। समय हर घाव को भर देता है, कुछ ऐसा कर कि यह बात सब भूल जाएँ और नए विवेक को सब याद रखें,” कहकर माँ अंदर चली गई। विवेक चेतनाहीन होकर खड़ा रहा।

विवेक अपने घर की तरफ़ चला। छत पर जाकर सो गया, जहाँ वो अक्सर बिंदु से मिलने के बाद आकर सोता था। शून्य से मस्तिष्क में कुछ नहीं था, आसमान को देख रहा था। आँखों का पानी भी सूख गया था। ना ग़ुस्सा, ना चिंतन, बस एकटक आसमान निहार रहा था। पुरानी बातें याद आ रही थीं जो विवेक के दिल पर गहरा आघात दे रही थीं। नींद दूर-दूर तक नहीं थी।

चिड़ियाँ के चहचहाने की आवाज़ से पता चला कि सुबह हो गई है।

विवेक अपने अंजाम तक पहुँच गया था, अब बस आख़िरी दहलीज़ तक जाना था। सुबह घर से निकला और उसने माँ को फ़ोन किया। भरे गले से बोला, “माँ, आख़िरी बार 1000 रुपये दे दो।"
उधर से भी रुँधे गले से आवाज़ आई कि ले जा।

विवेक की जेब मे फूटी कौड़ी नहीं थी। माँ के घर पहुँचा नज़र झुकी हुई थी, माँ ने पैसे दे दिए, लेकर विवेक झुकी नज़रों के साथ ही घर से निकल गया।

बस पकड़ी और दिल्ली पहुँच गया, दो दिन स्टेशन पर सोचते हुए गुज़ार दिए। लेकिन विवेक को कोई रास्ता नहीं सूझा कि आखिर जाऊँ तो कहाँ जाऊँ। तीसरे दिन का सूर्य भी अस्त हो गया पर विवेक का विवेक अभी भी निस्तेज था। सोचते सोचते विवेक रास्ते पर चल रहा था। विवेक को पता ही नहीं चला कि चलते-चलते वो सड़क के बीच में आ गया था। वो अपने बीते हुए कल में इतना खो गया था कि उसे पता नहीं चला। अचानक एक गाड़ी से टकरा गया, विवेक सड़क पर गिर गया। गाड़ी से एक सज्जन बाहर निकले और देखा तो विवेक को चोट आई थी। सज्जन ने विवेक को गाड़ी में बैठाया और डॉक्टर के पास ले गया, पट्टी करवाई और विवेक का परिचय लिया तो विवेक ने अपने बारे बताया कि वो दिल्ली काम की तलाश में आया है। सज्जन दिल्ली के प्रतिष्ठित सेठ थे। उन्होंने विवेक को अपनी दुकान में काम पर रख लिया। विवेक भी अब पूरे मन से काम करता था, लेकिन उसका बीता हुआ कल उसको रात में सोने नहीं देता था।

बार-बार उसको बिंदु का वो बर्ताव और ख़ुद की ग़लती याद आती थी। वो कर्ज़ के बारे में सोचकर अक्सर रो पड़ता । सेठजी का काम बहुत बड़ा था। अपनी नादानी और बिंदु के व्यवहार से विवेक ने बहुत कुछ सीख लिया था। वो मन लगाकर और ईमानदार से सेठजी का काम सम्भालता रहा। उधर सेठजी भी ऐसा काम देखकर बहुत ख़ुश थे। हर माह विवेक के वेतन में वृद्धि होने लगी। 2 साल हो गए विवेक अब सेठजी का विश्वासपात्र बन गया था और हर माह वेतन घर पर भेजता था। विवेक का कर्ज़ धीरे-धीरे अब कम हो रहा था। विवेक अपना अतीत भूल कर आगे बढ़ रहा था। घरवाले भी कुछ संतुष्ट थे। सबसे ज़्यादा मुँहबोली माँ को सुकून था।

इधर बिंदु राज के साथ ख़ुश थी, लेकिन अपनी ग़लती की सज़ा तो हर किसी को भोगनी पड़ती है। बिंदु का एक 7 साल का बेटा था, अचानक एक दिन उसके पेट मे दर्द हुआ। बिंदु उसे डॉक्टर के पास ले गई तो पता चला कि लिवर में पानी भर गया है। ऑपरेशन करना पड़ेगा जिसके लिए पैसों की ज़रूरत है। बिंदु के पास जमा पूँजी थी नहीं। बिंदु ने राज को बात बताई और मदद के लिए कहा। राज ने ’कोशिश करता हूँ' कहकर कॉल काट दी। शाम के समय बिंदु बेटे को लेकर घर आई, आज बिंदु दुखी थी, अपने इकलौते बेटे के लिए तड़प रही थी जो उसकी आँखों के सामने था, लेकिन गंभीर बीमारी से ग्रसित था। बिंदु ने फिर राज को फ़ोन मिलाया तो राज का नंबर बन्द मिला। बिंदु को झटका लगा, लेकिन अगले ही पल सोचा कि राज कोशिश कर रहा है; मोबाइल बन्द हो गया होगा। लेकिन बिंदु के मन में किसी अनहोनी का डर बैठ गया। पूरी रात नींद आँखों में नहीं थी। जागते-जागते रात बीत गई। बिंदु ने उठते ही राज को फ़ोन किया लेकिन नंबर फिर बन्द । अब बिंदु का बदन काँपने लगा। वह रोने लगी। एक-दो और रिश्तेदारों से बात की लेकिन कहीं से मदद नहीं मिली। सब बिंदु के व्यक्तित्व को जानते थे; कोई मदद को तैयार नहीं हुआ। बिंदु के पास कोई चारा नहीं था। आँगन में दीवार के सहारे रोते हुई बैठ गई। पास में बिस्तर पर बिंदु का बेटा सो रहा था। बार-बार उसको देख रही थी। वो नादान, ना बिंदु के रोने का कारण जानता था और ना ही सामने खड़ी अनहोनी को।

कुछ देर रोकर शांत होने के बाद बिंदु को याद आया कि राज ने उसे 2-3 सोने के उपहार दिए थे, चेन अँगूठी और हाथ का ब्रेसलेट भी। कोई और रास्ता नहीं देखकर बिंदु ने सोचा कि उनको बेच दूँ और इलाज शुरू करवाऊँ। क्या पता राज का फ़ोन आ जाये और वो मदद कर देगा।

बिंदु ने चेन, अंगूठी, लॉकेट को लिया और दौड़ी सुनार की दुकान पर। बेहाल बिंदु ने आँखों से जलधारा बहाते हुए सुनार को सब बताया। स्वर्णकार ने कहा, बहन समान सही होगा तो अभी तुम्हें पैसे दे दूँगा। बिंदु ने मन मे सोचा आज राज कितना काम आया है। भले ही उसका फ़ोन बन्द है लेकिन उसके उपहार से ही आज मुन्ने का इलाज होगा। उसको क्या पता था कि अगले ही पल उसकी यह उम्मीद टूट जाएगी।

स्वर्णकार ने गहनों को दो-तीन दफ़ा देखा और पिघलाया लेकिन उनमें रत्ति भर भी सोना नहीं निकला। उसने बिंदु से कहा, "बहन यह सब नक़ली है, एकदम नक़ली इनका तो कोई एक रुपया भी नहीं देगा।" इतना सुनते ही बिंदु निढाल होकर वहीं गिर गई। स्वर्णकार ने उसे पानी पिलाया और घर भेजा, सांत्वना दी कि सब ठीक हो जाएगा।

बिंदु घर तो आई लेकिन इस तरह जैसे उसके पास आज कुछ नहीं है। आज बिंदु भी शून्य में थी। वो ख़ुद को कोस रही थी कि जिस राज को जिस्म दिया उसने ही इतना बड़ा धोखा दिया। अचानक बिंदु को याद आया कि चेन तो उसको विवेक ने भी दी थी। अचानक बिंदु के शरीर मे फ़ुर्ती आ गई, दौड़कर कमरे में गई, संदूक में से विवक की दी हुई चेन निकाली और वापिस दौड़कर गई उसी स्वर्णकार के पास, "दादा इसको देखो, शायद यह असली हो।" बिंदु रो रही थी। चेन भी भारी थी, स्वर्णकार ने देखा परखा, चेहरे पर चमक आई, बिंदु की साँसें रुकी हुई थीं। स्वर्णकार ने कहा, "बहन यह असली है।" 
बिंदु ने ठंडी साँस ली और अगले ही पल फूट-फूट कर रोने लगी। बड़ी मुश्किल से स्वर्णकार ने उसे चुप कराया। चेन के बदले बिंदु को 80000 रुपये मिले। हालाँकि इतने पैसे से मुन्ने का इलाज नहीं होगा लेकिन पता नहीं आज बिंदु को ख़ुद से नफ़रत हो गई थी।

उधर बिंदु की पड़ोसन और विवेक की मुँहबोली माँ ने बिंदु की कुछ मदद की और बिंदु को दिल्ली मुन्ने का इलाज करवाने भेज दिया।

बिंदु ने मुन्ने को अस्पताल में भर्ती करवाया और इलाज शुरू हो गया। पैसे तो बिंदु के पास अब भी कम थे, लेकिन इलाज ज़रूर शुरू हो गया था। डॉक्टर ने कहा कि ऑपरेशन से लिये 50000 और कम हैं। बिंदु ने कहा, "आप ऑपरेशन कीजिये। पैसे की व्यवस्था हो जाएगी।" हालाँकि बिंदु के पास 50 रुपये आने का भी रास्ता नहीं था। लेकिन ना जाने फिर भी बिन्दु ख़ुश थी। उसको सुकून था। आँखों से संतोष भरे आँसू थे। शायद विवेक के बारे में सोच रही थी।

इधर विवेक के सेठजी को मौसमी बुखार था तो विवेक सेठजी को हॉस्पिटल लेकर गया हुआ था। अचानक विवेक की नज़र बैंच पर बैठी बिंदु पर पड़ी, पहले तो विवेक छिप गया, फिर सोचा बिंदु यहाँ कैसे? रिसेप्शन पर पूछताछ में पता चला कि बिंदु मुन्ने का इलाज करवाने यहाँ आई है। विवेक को बिंदु पर ग़ुस्सा अब भी आ रहा था। लेकिन उसने सोचा कि मुन्ने का क्या क़ुसूर है वो तो नादान है। एक समय मैं भी नादान था। विवेक बिंदु के सामने नहीं आया। डॉक्टर से बात की तो पता चला कि मुन्ने के लिवर में पानी भरा हुआ है, ऑपरेशन करना होगा। डॉक्टर ने विवेक को सब बताया कि पैसे कम होने से ऑपरेशन में देरी हो रही है।

विवेक ने डॉक्टर को कहा कि आप ऑपरेशन कीजिये पैसे जमा हो जाएँगे।

विवेक छुपकर वहाँ से चला गया सेठजी को छोड़ने। घर आकर विवेक ने सेठजी से 50000 रुपये उथार माँगे। क्योंकि विवेक सेठ जी का सबसे अधिक विश्वासपात्र था, इसलिए उन्होंने पैसे विवेक को दे दिए।

विवेक वापिस हॉस्पिटल गया, पैसे जमा करवाये और मुन्ने का ऑपरेशन करवाया। बिंदु को पता नहीं था कि यह सब किसने किया।
मुन्ने का इलाज हो गया। बिंदु ख़ुश थी लेकिन वो उस शख़्स से मिलना चाहती थी जिसने यह मदद की थी।

कुछ दिनों में मुन्ना ठीक हो गया, डॉक्टर ने अब उसे घर जाने की इजाज़त दे दी थी। दवाई और कुछ नसीहत देकर डॉक्टर ने बिंदु को कहा कि आप अब आराम से घर जा सकते हो। बिंदु ने डॉक्टर से पूछा कि साहब यह बता दो ? ऑपरेशन के पैसे किसने दिए। डॉक्टर ने कहा कि मैं नाम तो उनका जनता नहीं हूँ लेकिन वो रोज़ सुबह-शाम यहाँ आकर मुन्ने का हाल-चाल पूछते हैं। अभी उनके आने का समय है।

बिंदु ने सोचा आज देखती हूँ कि कौन है वो इंसान!

कुछ देर में सूट-बूट में एक व्यक्ति आया, डॉक्टर से बात हुई और मुन्ने के स्वस्थ होने का पता चला तो खुश हुआ। बिंदु दूर से देख रही थी, ग़ौर से देखने पर बिंदु ने पहचाना कि यह तो विवेक है। बिंदु वहीं बैठ गई, उसके हाथ-पाँव सुन्न हो गए, आँखों के आँसू सूख गए थे। लेकिन दिल में दर्द भरी तस्सली थी। बिंदु विवेक से मिलना चाहती थी लेकिन इतनी हिम्मत नहीं हुई कि विवेक के सामने जा सके। बिंदु अतीत में खो गई थी। अचानक देखा कि विवेक उसके सामने से गुज़र रहा था। बिंदु के मुँह से आवाज़ नहीं निकली, बस हाथ उठा, लेकिन विवेक ने मुड़कर नहीं देखा था।

विवेक के मुख्य दरवाज़े से बाहर निकलने के बाद बिंदु हिम्मत करके उठी और बाहर की तरफ़ दौड़ी। लेकिन तब तक विवेक हॉस्पिटल की दहलीज़ पार कर चुका था। और उस दहलीज़ पर जाना अब बिंदु के बस का नहीं था। एकाएक बिंदु के आँखों से फिर अश्रुधारा निकल पड़ी। दहाड़ मार कर रोने लगी बिंदु, लेकिन अब विवेक और बिंदु के बीच बहुत दूरी थी। एक ऐसी दहलीज़ थी जो बिंदु ने स्वयं बनाई थी। आज बिंदु विवेक का चेहरा भी ठीक से नहीं देख सकी थी। आज बिंदु को ख़ुद के बदन पर ग़ुस्सा आ रहा था। और विवेक के नेक दिल पर उसकी आँखों से पश्चाताप के आँसुओं की धारा झरने के रूप में बह रही थी।

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