छूटा हुआ भगवान 

31-05-2008

छूटा हुआ भगवान 

तरुण भटनागर

पहाड़ पर एक मंदिर है। घर की खिड़की से कोई मंदिर नहीं दीखता है। बस ऊँचे पहाड़ पर एक झण्डा दिखता है। एक छोटे धब्बे की तरह। एक छोटा लाल धब्बा। हवा में लहराता हुआ। सुना है वहाँ एक मंदिर है। पर उस मंदिर के बारे में कोई बात नहीं करना चाहता है। वहाँ बहुत कम लोग जाते हैं। उन दिनों मैं पाँच साल का था और वह मंदिर मुझे उत्सुक करता था।

“कावेरी वहाँ चलेंगे ना...”

“कहाँ? ”

“वहाँ पहाड़ पर... जहाँ मंदिर है, ”मैंने खिड़की के पार आकाश पर दीखते उस लाल धब्बे की ओर इशारा किया।

“नहीं बाबू वहाँ कुछ नहीं है।”

कावेरी घर में नौकर है। माँ और पिताजी दोनों नौकरी पर चले जाते हैं और मैं दोपहर भर कावेरी के पीछे-पीछे घूमता रहता हूँ।

“तुम झूठ बोलती हो। वहाँ भगवान की मूर्ति है।”

“तुम्हें किसने बताया? ”

“मन्टू ने”

“हुंह...उसको कैसे पता होगा? ”

“उसके बापू ने बताया होगा ना...।”

“वे लोग तो अभी आए हैं। उनको कुछ नहीं मालूम है।”

“नहीं उसको मालूम है। वह कह रहा था वहाँ भगवान की मूर्ति है। बिल्कुल माँ के ठाकुरजी जैसे भगवान। तेरे को तो कुछ भी नहीं पता।”

“अच्छा और क्या बताया उसने? ” घर में कावेरी मुझे नहलाती है। कपड़े पहनाती है। खाना खिलाती है। फिर दोपहर को सुला देती है।

“बताओ मन्टू ने और क्या बताया? ”

बात करते -करते उसने मेरे कपड़े उतार दिये। अंगीठी पर रखे भगौने के गर्मपानी को बाल्टी में ऊँडेल दिया। फिर पानी मे ऊँगली डालकर उसकी गरमाहट देखने लगी। वह अपने काम में मगन थी और मैं उसे बता रहा था।

“मन्टू बता रहा था। पहले वहाँ कोई बाबा रहते थे। वे ही उस मूर्ति को वहाँ लाये थे। वो लाल रंग वाला झण्डा भी। वो जो खिड़की से दिखता है...।”

कावेरी मुझे नहलाने लगी। मेरी बातें पतझर के पीले पत्तों की तरह आँगन में झड़ने लगीं। जिन्हें महतरी रोज़ बुहारकर फेंक देती है। कावेरी ने मुझे नहलाकर तैय्यार कर दिया। तब तक मेरी बातें भी बदल गईं थीं। पर थोड़ी देर बाद मुझे पहाड़ पर लहराता वह झण्डा फिर से दिख गया। छूटी हुई बात फिर से जुड़ गई। पर अब वह एक कोरी ज़िद थी।

“कावेरी चलो ना।”

“बाबू बाद में जायेंगे। पहले आप खाना खा लो।”

“नहीं। अभी चलो, ”मैंने कावेरी की साड़ी का पल्लू पकड़ लिया और खींचने लगा।

“बाबू वहाँ नहीं जाते। तेरे को मालूम है..वहाँ पर एक साँप भी है।”

“नहीं, मैं जाऊँगा...तू ले चल।”

“नहीं, अभी नहीं। बाद में।”

“नहीं अभी चल, ” मैं ज़मीन पर पैर पटकने लगा।

“अच्छा माँ आ जायें तब चलेंगे।”

"माँ नहीं जाने देगी तू अभी चल।"

"बाबू ज़िद नहीं करते पहले आप खाना खा लो।"

मैं ज़ोर-ज़ोर से पैर पटकने लगा। जब शांत हुआ तब हिचकियाँ रह गईं। कावेरी ने मुझे मना लिया। मैंने खाना खाया और सो गया। वह मंदिर मेरी आँखों में रह गया जैसे एकदम से अँधेरा हो जाने के बाद कुछ देर तक ट्‌यूबलाइट का प्रोजेक्शन आँखों में रह जाता है मेरी उत्सुकतायें बढ़ गईं। क्या उस मंदिर के भगवान माँ के ठाकुर जी जैसे दिखते हैं? उस भगवान की पूजा कौन करता होगा? पहाड़ के ऊपर जब बादल आ जाते हैं तब कैसा लगता होगा? सुना है वह मंदिर बड़ा है पर वह दिखता तो छोटा है? वहाँ पूजा कैसे होती है? कुछ दिनों बाद मेरे विचित्र से कल्पना संसार में मण्टू भी शामिल हो गया। मण्टू मेरे से थोड़ा छोटा था। उस ने मेरी कल्पना के तलाब में, जो मेरी उत्सुकता के साथ फैलता और सिकुड़ता था, अपने पैर डाल दिये थे और छपर-छपर करने लगा।

"तेरे को नहीं मालूम बाबू भगवान अलग-अलग होते हैं। शंकर जी, गणेश जी, तुम्हारी माँ के ठाकुर जी, पहाड़ वाले भगवान,.....… सब, सब अलग-अलग होते हैं।"

"पर सब चुप रहते हैं। कोई बोलते नहीं। चलते नहीं। बस एक जगह बैठे रहते हैं। है ना...।"

"नहीं बाबू वो चलते भी हैं। बोलते भी हैं।"

"तेरे को कैसे मालूम?"

“पिता जी ने बताया।”

"क्या बताया?"मैं उत्सुकता से, बिना सिर-पैर वाली ख़ुशी के साथ उस की ओर खिंच सा गया।

"वो बता रहे थे, भगवान बहुत बड़े होते हैं। वो जो सामने वाला इमली का पेड़ है ना, उससे भी बड़े। बहोत बड़े। बहोत बहोत बड़े....।"

आकाश की ओर उठे मण्टू के हाथों में भगवान का विशाल आकार नहीं समा रहा था। मैं आकाश की ओर उठे उस के हाथों को देख रहा था। उस के दोनों हाथों के बीच नीले आकाश पर बगुलों का एक झुण्ड व्ही के आकार में उड़ा जा रहा था....।
बचपन की यह बात मुझे अक्सर याद आ जाती है। अकारण याद आ जाती है। उस दिन भी मैंने इस बात को याद किया। तब मैं छब्बीस वर्ष का था। उसदिन मैं रेस्ट हाऊस के दालान में बैठे-बैठे उकता गया था। मैं इन्तज़ार कर रहा था। वह काफ़ी देर बाद आया।

"तुम तैय्यार हो?"

"हाँ। पर थोड़ी देर बाद चलेंगे। एक-एक कप चाय पीते हैं।"

"हम वैसे ही लेट हो चुके हैं।"

"कुछ नहीं होता मैं फ़ुर्सत में हूँ।"

सूरज पश्चिम की ओर खिसक रहा था। गर्मियों में शाम आते ही तपिश और बढ़ जाती है। दोपहर की उबासी मुझसे चिपकी थी। उसे झटककर अलग करने के लिए चाय ज़रूरी थी।

"तुमने पहले कभी कोई ऐसी केव देखी है?"

"नहीं।"

"इट्‌स वर्थ सीइंग।"

"सुना ज़रूर है पढ़ा भी है। वो क्या कहते हैं...कार्स्ट...चूना पत्थर वाले एरिया में होती है। इज़ दैट ट्रू?"

’हाँ। जब मैं वहाँ पहली बार गया था, मुझे अजीब सा लगा। मुझे लगा जैसे पता नहीं मैं कहाँ हूँ। ज़मीन से बीस फीट नीचे, उमस और ठंड में। गहरे काले अँधेरे में। जहाँ हाथ को हाथ नहीं सूझता है। अगर लाइट बुझ जाये तब आप उस गुफा से बाहर नहीं निकल सकते है। गुफा के अन्दर अँधेरे में विश्वास ही नहीं होता है कि बाहर दोपहर होगी। धूप खिली होगी। चिलचिलाती धूप वाली दोपहर।"

"तुम वहाँ अकेले गये थे।"

"नहीं। इसी गाँव का एक आदमी था और एक फ़ॉरेस्ट गार्ड था। वहाँ अकेले नहीं जाना चाहिए।"

"क्यों?"

"बड़ी ऊटपटांग जगह है। आड़े टेढ़े अँधियारे रास्ते। गुफा के अन्दर बहुत अन्दर तक...क़रीब तीन एक किलोमीटर तक, अँधेरी भूलभुलैय्या सी है। पूरी तरह उलझ जाते हैं। कहीं बहुत चौड़े गलियारे से हैं, तो कहीं इतनी संकरी दरारें कि लेटकर, सरककर धीरे-धीरे ही आगे बढ़ा जा सके। फिर कोई एक रास्ता नहीं है। कहीं-कहीं तो एक साथ आठ दस दरारें या रास्ते हैं। कुछ रास्तों का तो पता ही नहीं चलता। वे भीतर किसी अँधियारे कोने में होते हैं। फिर पहचानना मुश्किल कि कौन सा रास्ता सही है। कहीं-कहीं बहुत गहरे गड्ढे हैं। बड़े कुओं के माफ़िक....उससे भी बड़े। अगर उनमें टार्च की रोशनी फेंको तो वह उस के नीचे तक, उस के पेंदे तक नहीं पहुँच पाती है। रोशनी अँधेरे में ही ख़त्म हो जाती है। मैं एक बार उस गुफा में बड़ी वाली सर्चलाइट ले गया था। पर उस की रोशनी भी उन गड्ढों के तल तक नहीं पहुँच पाई और उस के भयंकर अँधेरे में गुम हो गई। अगर उन गड्ढों में कोई बड़ा सा पत्थर फेंको तो पत्थर की आवाज़ काफ़ी देर बाद सुनाई देती है। वह भी मद्धम सी...ध्यान से सुनने के बाद। उन गड्ढों का साइंटिफ़िक नाम सिंक होल्स है। कुछ गुफाओं में वे इतने विशाल पाये गये हैं कि पूरी की पूरी नदी उनमें समा जाती है। शायद योगेस्लाविया में ऐसा एक सिंक होल है। जो किसी विशाल नदी को लील जाता है। यह गुफा थोड़ी डरावनी भी है। अगर कोई उस गुफा में एक बार भटक गया तो फिर उस का बाहर निकलना असंभव है।"

वह थोड़ी देर के लिए चुप हो गया। नौकर चाय ले आया। उस ने सिगरेट जला ली।

"इस गुफा में एक एक्सीडेण्ट हो गया था। दैट इंसिडेण्ट सम टाइम्स हॉन्ट्‍स मी। सोचता हूँ तो भीतर तक हिल जाता हूँ।"

वह कुछ कहते-कहते रुक गया। सिगरेट के धुएँ का एक छल्ला उसके सिर के ऊपर डगमगाता सा डिफ़्यूज़ होता जा रहा था।

"उस आदमी का नाम इमैन्युएल था। वह ऑस्ट्रिया का रहने वाला था। इंट्रेस्टिंग परसन...। वह एक स्कॉलर था और कार्स्ट गुफाओं की स्टडी के लिए यहाँ आया था। मेरी उससे दोस्ती हो गई। फिर वह कुछ दिन मेरे साथ मेरे घर भी रहा। वह लगभग रोज़ उन गुफाओं में जाता था। वह कामचलाऊ अँग्रेज़ी जानता था। कुछ दिनों में हमारी अच्छी पटने लगी। एक बार मुझे काम से शहर जाना पड़ा। इस दौरान वह मेरे घर में ही रहा। घर की चाबी मैं उसे दे आया था। पन्द्रह रोज़ बाद जब मैं घर लौटा तो मैंने देखा कि घर का ताला बंद था। मैंने सोचा इमैन्युएल कहीं घूमने गया होगा। पर जब काफ़ी देर हो गई और वह नहीं लौटा तो मैंने आसपास के कुछ गाँव वालों से उस के बारे में पूछा। मुझे पता चला कि वह तो क़रीब आठ-नौ रोज़ से घर नहीं आया है। मेरा माथा ठनका। मैंने दरवाज़े का ताला तोड़ा। फिर कुछ लोगों के साथ घर में घुसा। मैंने पाया कि घर का सारा सामान ठीक-ठाक है। और इमैन्युएल का डफल बैग, उसकी किताबें, उसके कपड़े सब सही सलामत हैं। पर वह नहीं था। मुझे लगा यह बार पुलिस को बतानी चाहिए। सो मैंने एक शिकायत दर्ज करा दी। शुरू में पुलिस ने कुछ नहीं किया। पर क़रीब पच्चीस एक रोज़ बाद, एक दिन अचानक, पुलिस का एक इंस्पेक्टर उस की फोटो और ऑस्ट्रिया, ऐंबेसी के कुछ काग़ज़ लेकर मेरे पास आया और उस के बारे में पूछताछ करने लगा। इमैन्युएल का वीसा ख़त्म हो चुका था और उसे वापस लौटना था। पर वह वापस नहीं लौटा था, सो, ऐंबेसी उसकी खोज-ख़बर ले रही थी। पुलिस ने कुछ दिन तो छान-बीन करी और फिर उसके मिसिंग होने की रिपोर्ट ऑस्ट्रिया, ऐंबेसी भेज दी। इस घटना को हुए क़रीब एक साल हो गया। इमैन्युएल का सामान मैंने पुलिस के मार्फ़त ऑस्ट्रिया, ऐंबेसी भेज दिया। बस उसकी एक डायरी जिसमें वह अपनी रोज़ की बातें और खोज सम्बन्धी विवरण लिखता था और उस का फोटो एलबम जिसमें ज़्यादातर गुफाओं के चित्र तथा मेरी और उस की तस्वीरें थीं, मैंने अपने पास रख लीं। फिर एक दिन एक अजीब सी बात हुई....।"

उसकी चाय ठंडी हो गई थी। उस ने दूसरी सिगरेट सुलगा ली थी। उस की आँखें चौड़ी हो गई थीं। उस का चेहरा भावविहीन सपाट हो गया था। वह रेस्ट हॉऊस की छत की ओर देखने लगा।

"फिर कुछ दिनों बाद एक और सज्जन आये। वो यहीं की यूनिवर्सिटी में जियोलाजी के प्रोफेसर थे। उन्हें प्रोमोशन के लिए पीएच.डी. करनी थी। सो वे इन गुफाओं पर रिसर्च करने चले आये। मेरी उनसे मुलाक़ात हुई। मैंने उन्हें इमैन्युएल के बारे में बताया। उन्होंने मुझसे उस की वह डायरी माँगी जिसमें उसके उन गुफाओं संबन्धित ऑब्सरवेशन लिखे थे। मैंने वह डायरी उन्हें दे दी। वे गुफा के उन्हीं भागों का अध्ययन करने लगे जिसे इमैन्युएल ने अपनी डायरी में लिखा था। एक तरीक़े से वे इमैन्युएल के अधूरे काम को आगे बढ़ा रहे थे। फिर एक दिन दोपहर को वे मेरे पास आये। उनके साथ वह इंस्पेक्टर भी था, जिसने, ऐंबेसी को रिपोर्ट भेजी थी। वे किसी चीज़ की शिनाख़्त मुझसे करवाना चाहते थे। एक टार्च, एक चमड़े का जर्जर बैग, एक हथौड़ा... और एक कपड़े में बँधी आदमी की हड्डियाँ, बाल, सूखी चमड़ी के कुछ टुकड़े। जानते हैं। वह कौन था? वह इमैन्युएल था। उस के टार्च और बैग से मैंने उसे पहचाना। वह गुफा में बहुत अन्दर तक चला गया था। फिर शायद रास्ता भटक गया और फिर उस गुफा से कभी भी बाहर नहीं निकल पाया। अगर वह प्रोफेसर ना आता और मैं उसे इमैन्युएल की डायरी नहीं देता या वह इमैन्युएल के काम को आगे बढ़ाते हुए उसी रास्ते पर नहीं जाता जहाँ वह गया था... गुफा के बहुत अन्दर, गहरे अँधेरे में, कई किलोमीटर भीतर, जहाँ कभी कोई नहीं गया... तब शायद कोई भी नहीं जान पाता कि इमैन्युएल का क्या हुआ? जिस दिन इमैन्युएल को हम उस के देश वापस भेज रहे थे, मुझे बड़ी अजीब सी रिक्तता महसूस हुई। क्या कोई सोच सकता है, ऑस्ट्रिया का एक व्यक्ति हज़ारों किलोमीटर दूर इस देश के एक छोटे से गाँव में आयेगा... वह भी अँधेरी गुफाओं में भटकने के लिए...फिर अचानक ग़ायब हो जायेगा, सालों बाद भुला दिया जायेगा... और फिर एक दिन अचानक हम उस की सूखी बेजान हड्डियों को विदा करेंगे। नो वन, ऐण्टीसिपेट द टाइम...।"

वह चुप हो गया। ठंडी चाय में पड़ा सिगरेट का अधजला टुकड़ा चिनचिनाता हुआ ठंडा रहा था। फिर उस ने अचानक पूछा-
"मिस्टर माथुर डू यूबिलीव इन गॉड?"

यह आसान सा प्रश्न मुझे उलझा देता है। मुझसे बहुत कम लोगों ने यह प्रश्न पूछा है। मैंने एक बार भी इस प्रश्न का जवाब नहीं दिया है। मुझे इस प्रश्न का जवाब नहीं आता है।

मुझे बचपन में घर की खिड़की से दिखने वाला मंदिर का वह झण्डा याद आ गया।

"कावेरी मुझे वहाँ जाना है।"

मैं बचपन की प्यास खुजाने लगा। वह प्रश्न भी अटका रहा- डू यूबिलीव इन गॉड। कावेरी मुझे उस मंदिर नहीं ले गई। लेकिन मुझे वहाँ जाना था। फिर मैंने अपने दोस्तों को वहाँ चलने को कहा। वे तैय्यार हो गये। और एक दिन मैं, मण्टू और आरती उस पहाड़ की ओर चल पड़े। हम तीनों में आरती सबसे बड़ी थी। वह एक बार और जा चुकी थी। पर यूँ अकेली पहली बार जा रही थी। अकेली इसलिए, क्योंकि हम लोगों का होना ना होना बराबर था। वह आगे-आगे चल रही थी और मैं और मण्टू उस के पीछे। पता नहीं आरती को भी रास्ता पता था या नहीं। हमने उस से नहीं पूछा कि उसे रास्ता पता है या नहीं। उस ने बताया कि वह एक बार जा चुकी है, सो हम दोनों उस के पीछे-पीछे चल दिये। अक्सर हम दोनों उस के पीछे-पीछे चला करते थे। वह हम दोनों पर अपनी धौंस भी जमाती थी। उसने हमें समझाया था, कि वह हम दोनों से बड़ी है। और जिस तरह छोटों को बड़ों का आदर करना चाहिए वैसे ही मुझे और मण्टू को उसका कहना मानना चाहिए। मुझे और मण्टू को उस की बात ठीक लगी थी।

पहाड़ से पहले ही झाड़ियाँ शुरू हो जाती थीं। रास्ता थोड़ा कठिन था। चट्टानें थोड़ा गरम थीं। छाँव बहुत कम थी। चढ़ाई लगातार थी। जब हम थक जाते तब उमस भरे गर्म आकाश के नीचे किसी चट्टान पर सुस्ताने बैठ जाते। पर हम कम ही सुस्ताये। ज़्यादा देर चलते रहे। कभी-कभी बेतरतीब झाड़ियों के बीच से हमें रास्ता बनाना पड़ता। हम उनकी बिखरी डालों और टहनियों को इधर-उधर करते, रास्ता बनाते और चल पड़ते। गुलमेंहदी के काँटे हमें चुभ जाते और सूखी खाल पर सफेद लकीर सी बन जाती। एक अजीब सा आकर्षण था। पता नहीं वहाँ क्या-क्या होगा? मंदिर का झण्डा, वहाँ की मूर्तियाँ, पत्थर का चबूतरा, वहाँ से दिखने वाले छोटे-छोटे घर....। हम रास्ते भर बात करते रहे कि, वहाँ पहुँचकर कितना मज़ा आयेगा।

हम काफ़ी देर बाद मंदिर पहुँच पाये। पहाड़ पर ऊपर पहुँच जाने के बाद भी मंदिर कुछ दूर था। वहाँ एक मैदान सा था और वह उस के बीच था। वह आम मंदिरों की तरह नहीं था। बस एक चबूतरा था, जिस पर पत्थर की मूर्ति रखी थी। मूर्ति के किनारे एक त्रिशूल था और मंदिर से थोड़ा दूर एक ऊँचा झण्डा गड़ा था। मूर्ति के पास मिट्टी का एक टूटा दीया रखा था, जिसमें बरसाती पानी भरा था। चबूतरे के दोनों तरफ़ नारियल के छिलके और दोने पड़े थे। मंदिर से थोड़ा दूर पानी का एक पोखर था। हम तीनों थोड़ा देर उस पोखर के पास खेलते रहे और फिर मंदिर की मूर्ति के पास आकर बैठ गये।

मैंने उस मूर्ति को देखा। वह शांत थी। क्या वे यहाँ अकेले हैं? क्या बरसों से वे अकेले हैं? उनकी कौन देखभाल करता होगा? ....मैंने आरती से पूछा। उस ने बताया, कि कभी-कभी पुजारी आता है। वह भी त्यौहारों में। बाक़ी समय तो इक्का-दुक्का दर्शनार्थी आते हैं। सो वह नहीं आता है। मुझे यह जानकर दु:ख हुआ कि भगवान को इस सुनसान निर्जन पहाड़ पर अकेले रहना पड़ता है। फिर मुझे उस पुजारी पर भी ग़ुस्सा आया। कोई किसी को इस तरह अकेला छोड़ता है, भला।

"यहाँ का पुजारी अच्छा नहीं है।"

"क्यों?"आरती ने पूछा।

"वह भगवान को अकेले जो छोड़ जाता है।"

"जब कोई पूजा करने वाला नहीं होगा तो पुजारी क्या करेगा।"

"पुजारी को भी तो पूजा करनी चाहिए।"

"हुँह...तेरे को तो कुछ भी नहीं मालूम। पुजारी पूजा थोड़े करता है। वह तो पूजा करवाता है। वह ख़ुद थोड़े पूजा करता है।"

"जो भी हो उसे भगवान को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।"

"भगवान तो अकेले ही रहते हैं। वे बहुत बड़े हैं। उन्हें कोई डर थोड़े लगता है कि वो अकेले ना रह पायें।"

"हाँ आरती ठीक कहती है।"

मण्टू ने आरती की हाँ में हाँ मिलाई।

"पर ठंड में बरसात में भगवान को दिक्क़त होती होगी, है ना....।"

जाने क्या था मैं इस बात पर आरती और मण्टू की सहमति चाहता था। चाहता था कि वे मानें... कि भगवान को दिक्क़त होती होगी। ठंड में वे ठंड से कुड़कुड़ाते होंगे। गर्मी में तपते पहाड़ पर उन्हें कितनी तक़लीफ़ होती होगी। पर मेरी बात नहीं मानी गई।

"भगवान को ठंड नहीं लगती। भगवान को गर्मी नहीं लगती। भगवान कोई क्या हमारे जैसे होते हैं।"
"हमारे जैसे ही तो होते हैं। देखो उनके हाथ हैं, पैर हैं, । आँखें हैं, कान हैं....। वे हमारे जैसे ही हैं। उन्हें ठंड भी लगती होगी और गर्मी भी। फिर तुझे कैसे पता, कि उन्हें ठंड नहीं लगती। तूने क्या भगवान से बात की है।

"तू तो बुद्धू है।"

"बुद्धू तो तू है। अगर मेरी बात पर यक़ीन नहीं है, तो तू ख़ुद भगवान से पूछ ले कि उन्हें ठंड लगती है या नहीं....।"

"हट....भगवान से कोई बात कर सकता है क्या?"

"हाँ कर सकता है।....भगवान बोलते हैं।"

"भगवान नहीं बोलते।"

"बोलते हैं।"

"नहीं बोलते।"

"बोलते हैं।"

"नहीं बोलते, नहीं बोलते, नहीं बोलते.....एएएए।"

आरती मुझे चिढ़ाते हुए अपनी जीभ दिखाने लगी। पर मण्टू ने मेरा समर्थन किया-

"नहीं आरती बोलते हैं। तेरे को और मुझे दादी ने ध्रुव वाली कहानी सुनाई थी ना जिसमें भगवान ने ध्रुव से बात की थी। भगवान बोलते हैं।"

मण्टू हम दोनों को छोड़कर मंदिर की ओर भाग गया। मैं और आरती बहस करते रहे। पर मैंने उसे चुप करा दिया। मुझे लगा मैं जीत गया। मुझे यक़ीन था, कि मैं सही हूँ। भगवान को ठंड लगती है। भगवान को अकेले में डर भी लगता होगा। ये कैसा पुजारी है। जो उन्हें अकेला छोड़ गया। पुजारी ख़राब है। माँ तो ठाकुरजी का कितना खयाल रखती हैं। उनको नहलाती हैं। नये कपड़े पहनाती हैं। झूला झूलाती हैं। और यह पुजारी...। मुझे लगा इस भगवान को मैं अपने घर ले जाऊँ। थोड़ी देर बाद मण्टू चहकता सा हमारे पास आया। उस के हाथ में गेरू का एक ढेला था। उस ने गेरू से भगवान की मूर्ति के गले में माला, कान में बाली, करधनी ...लगभग सारे क़िस्म के गहने बना दिये थे।

फिर मैं भी उस के साथ लग गया और भगवान का शेष बचा शृंगार गेरू से पूरा कर दिया। आरती हमें मना करती रही। पर हम दोनों ने उस की एक ना सुनी। थोड़ी देर बाद हम उस मंदिर से लौटने लगे। भगवान को यूँ अकेला छोड़कर जाना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। मुझे तक़लीफ़ सी हुई कि भगवान अब हर रोज़ की भाँति अकेले रह जायेंगे। रात को जब ठंड पड़ेगी तब वे ठंड से कुड़कुड़ायेंगे। कोई नहीं होगा उनकी मदद करने वाला। मुझे लगा मझे भगवान की मदद करनी चाहिए। पर कैसे? .....तभी मुझे एक उपाय सूझा। मैंने अपनी शर्ट उतारी और भगवान को पहना दी। आरती ने मुझे ऐसा करने से मना किया और धमकी भी दी कि अबकी बार वह मेरे साथ यहाँ नहीं आयेगी। पर मैं नहीं माना। मण्टू मुझे देखता रहा और फिर मुस्कुरा दिया...।

"चलें...। क्या सोचने लगे?"

वे खड़े हो गये। हम दोनों चल दिए। जीप वे ही चला रहे थे। क़स्बा छोड़कर हम जंगलों की ओर बढ़ गये। फिर एक जगह उन्होंने गाड़ी रोक दी। आगे गाड़ी नहीं जा सकती थी और हमें अब पैदल चलना था। घने जंगलों के बीच हम एक पगडंडी पर चल दिए। चारों ओर सन्नाटा था। सूखे पत्तों पर हमारे जूतों की आवाज़ के अलावा वहाँ बस चुप्पी ही थी। क़रीब एकाध किलोमीटर चलने के बाद वह पगडंडी भी ख़त्म हो गई। सामने एक हल्की गहरी घाटी जैसी थी। चारों ओर पेड़ों और झाड़ियों से घिरे होने के कारण वह ढँक सी गई थी। पूरी घाटी थोड़ी गहराई में थी। हम दोनों कुछ देर से किसी ढाल पर उतर रहे थे। फिर संभलकर घाटीनुमा गड्ढे में उतरने लगे। जल्दी ही हम उस स्थान पर उतर गये, जहाँ लगभग दस फीट लम्बी और दो फीट चौड़ी दरार सी थी। चट्टानों के बीच वह दरार किसी अंतहीन कुँए सी दीख रही थी। इस दरार में लोहे की सीढ़ियाँ नीचे को उतर रही थीं। हमें इसी से नीचे उतरना था। मुझे बताया गया था, कि पूरी गुफा ज़मीन के नीचे बीस से पचास फीट गहराई में है।

उन्होंने अपनी कैप ठीक की। सर्चलाइट जलाई और लोहे की सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे। मैं उनके पीछे-पीछे सँभलकर, सीढ़ियों पर अपने पैर जमाता हुआ उतरने लगा। थोड़ी देर बाद वे दरार के भीतर दिखते अँधेरे में गुम हो गये। मुझे अजीब सी बेचैनी हुई। मैंने लगभग चीखते हुए उनसे पूछा- तुम्हें रास्ता तो पता है ना...। मेरी बात पर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया बस मेरी तरफ़ सर्चलाइट घुमा दी। उनके पीछे-पीछे मैं भी घुप्प अँधेरे में घुस गया।

सीढ़ियों से थोड़ा नीचे उतरने के बाद एक बड़ी सी चट्टान थी। जिसपर हम दोनों खड़े हो गये। लगता था कि उस चट्टान के आगे कोई रास्ता नहीं है। पर चट्टान के किनारे एक माँद सी थी। जो मुश्किल से ही दिखती थी। जिसमें से एक समय में एक ही आदमी भीतर जा सकता था। वह भी लेटकर लगभग घिसटते हुए। उन्होंने अपने घुटने मोड़े और उस माँद में घुस गये। मैं भी उनके पीछे-पीछे उस माँद में उतर गया। वह माँद संकरी और भीतर को उतरती सी थी। लेटे-लेटे तो कहीं पर उकडू घिसटते हुए हम दोनों उस माँद में उतरते गये। क़रीब बीस फीट उतरने के बाद वह माँद गुफा के अन्दर खुलती थी। गुफा का वह अन्दरूनी हिस्सा एक विशाल खोह जैसा था। चारों ओर घुप्प अँधेरा था। सर्चलाइट की रोशनी भी बमुश्किल उस खोह की छत और दूसरे किनारे तक पहुँच पा रही थी। एक अजीब सा मुर्दा सन्नाटा हमें घेरे था। गुफा में हमारे पैरों के पास से ठंडा पानी बह रहा था। बहते पानी की आवाज़ के अलावा वहाँ और कोई आवाज़ नहीं थी।

हम उस गुफा में चलते रहे। थोड़ी देर बाद उन्होंने गुफा की छत की ओर टार्च की रोशनी फेंकी-

"देखिये मैं इनकी बात कर रहा था।"

छत से अजीब सी शंखाकार आकृतियाँ नीचे की ओर उल्टी लटक रही थीं। पत्थर का अजीब सा रूप। सफेद और चमकता हुआ। टार्च की रोशनी में वे आकृतियाँ कांच के टुकड़ों की तरह चमक रही थीं। फिर उन्होंने गुफा के फर्श पर सर्चलाइट की रोशनी फेंकी। जहाँ हम खड़े थे वहाँ से लेकर गुफा के दूसरे किनारे की ओर जहाँ तक रोशनी जा रही थी, चारों ओर नुकीली शंखाकार आकृतियाँ नीचे से ऊपर की ओर उठी हुई थीं। वैसी ही चमकती और लुभाती। ... मैं विस्मृत सा उन्हें देखता रहा। उन्होंने मुझे यूँ ताकते हुए देखा और पूछने लगे-

"उस समय हमारी बात अधूरी रह गई थी।"

"क्या?" मैंने अनमने से भाव से कहा।

"डू यूबिलीव इन गॉड? समबाडी वाज टेलिंग मी...यूबिहेव लाइक एन एथीस्ट।"

"डू यूथिंक सो?"मैं उस के चेहरे को पढ़ने लगा।

तभी हमारे पैरों के पास से बहने वाले पानी में हलचल सी हुई। जैसे कोई अपने हाथों से उसमें छप-छप कर रहा हो। वहाँ इतनी शांति थी, कि पानी की आवाज़ पूरी गुफा में गूँजती सी लग रही थी।

"ब्लाइन्ड फिशेज़....ये सिर्फ़ इन गुफाओं में ही पाई जाती हैं और हाँ गहरे समुद्र में भी। बहुत गहरे समुद्र में। कई किलोमीटर नीचे जहाँ सूरज की रोशनी नहीं पहुँच पाती है।"

"स्ट्रेंज...।"

"अँधेरे में आँखों की ज़रूरत नहीं। इन मछलियों को भी नहीं।"

मैं गुफा के भीतर तक, गहरे अँधेरों तक भागती पानी के छपाकों की आवाज़ सुनता रहा। हम दोनों क्षण भर को सुस्ताने वहाँ बैठ गये। उस ने सर्चलाइट बुझा दी। मुझे यह सोचकर मतली सी आने लगी कि कहीं वह प्रश्न फिर से ना आ जाये- डू यूबिलीव इन गॉड। यह बड़ा घिसा पिटा सा प्रश्न है। मैंने कई बार ख़ुद से यह प्रश्न पूछा है। फिर अक्सर मुझे कुछ अजीब सा लगने लगता है। ख़ासकर तब जब सोचता हूँ, कि कितने लोग यह प्रश्न अपने से पूछते होंगे। ज़्यादातर लोगों को ज़रूरत ही नहीं है। वे बस मानते हैं कि भगवान है। वे प्रश्न नहीं खड़ा करना चाहते। वे यह भी मानना नहीं चाहते कि ऐसा प्रश्न हो सकता है। और साफ़ मन से उस का जवाब भी ढूँढा जा सकता है। वे इस प्रश्न से बचते हैं। जबकी इसकी ज़रूरत नहीं है।....पर मैं भी तो इस प्रश्न से बच रहा हूँ। शायद बच नहीं रहा। मुझे इस प्रश्न का जवाब देना झंझट सा लगता है। कितनी बार तो जवाब दिया है। कितनी बार ख़ुद से। बार-बार वही जवाब। एक बोरियत सी होती है।पर उस बात को सोचते बोरियत नहीं होती है, जो इस प्रश्न और उत्तर के पीछे दुबकी सी पड़ी है। जैसे बैठी अलसाती कुतिया के नीचे से उस का पिल्ला झाँकता है। बरसों बाद हमने वह जगह छोड़ दी। पहाड़ वाला मंदिर मेरी स्मृति में धूल खाता पड़ा रहा।


एक दिन मुझे फिर उस जगह जाना पड़ा। तब मेरी शादी हो गई थी। हम किसी काम से उस जगह गये थे। फिर शाम को हम तीनों याने मैं, मेरी पत्नी निशा और मेरी माँ उस मंदिर गये। मैं नहीं जाना चाहता था। कुछ और काम ज़्यादा ज़रूरी थे। पर माँ की ज़िद के कारण हम वहाँ गये। मेरे मन में उस समय भी बचपन वाले मंदिर की छवि थी। जहाँ पहुँचने के लिए कंटीली झाड़ियों से अटे पड़े रास्ते से गुज़रना पड़ता था। पहाड़ पर खुले आकाश के नीचे चबूतरे पर रखी एक मूर्ति। मुझे कभी समझ नहीं आया था, कि वह किस भगवान की मूर्ति थी। मैं बचपन में उस मूर्ति को इस तरह नहीं देख पाया था, कि वह किस भगवान की है। पर उस रोज़ सब कुछ ध्यान से देखा। सब कुछ ध्यान से दिख गया। बहुत कुछ बदल गया था। पहाड़ के ऊपर तक जाने के लिए सीढ़ियाँ थीं। सीढ़ियों के दोनों ओर लाइट लगी थी। कंटीली झाड़ियों का कहीं नामों निशान नहीं था। माँ ख़ुश थीं, कि सब कुछ कितना बदल गया। सब कुछ कितना अच्छा हो गया। पहाड़ पर उस नंगे चबूतरे की जगह एक मंदिर बन गया था। शाम को भगवान की आरती होने वाली थी। चारों ओर लोग इकट्ठा थे। हम भी भीड़ में घुस गये। मैंने भीड़ में धँसकर उस मूर्ति को देखा। वह विष्णु की मूर्ति थी। एक हाथ में गदा, एक में चक्र, एक में शंख ...नीचे शेषनाग। हाँ वे विष्णु ही थे। पर मुझे कुछ शंका हुई। क्या ये वही मूर्ति है, बचपन वाली? जिसको मैंने अपनी शर्ट पहनाई थी। जिसे बचाया था ठंड से। जिसके लिए माँ ने डाँटा था। जिसके लिए यक़ीन हुआ था, कि वे मुझे लूला-लंगड़ा नहीं बनायेंगे। जिसके कारण मैंने माना था, कि माँ झूठ बोलती हैं। जिसके लिए मैंने माँ से बहस की थी। जिसके कारण मैं रात को सो नहीं पाया था। सोचता रहा था, कि क्या भगवान वास्तव में मुझसे नाराज़ हो जायेंगे। मैं उन्हें ख़ुद से नाराज़ नहीं जानना चाहता था। जैसे वे मेरे अपने हों। उन्होंने मुझे परेशान किया था। ठीक वैसे ही जैसे निशा से मिलने के बाद कुछ दिनों तक मुझे अजीब सी बेचैनी रहती थी। अगर मैं निशा को नहीं पा पाया तो...। अगर उस ने मुझे गंभीरता से नहीं लिया तो। ...पर फिर लगा ऐसा कुछ नहीं होगा। भला क्यों हो? कोई इतना अच्छा लगे कि आप संबंधों को नातेदार ना मान पायें...तब खोने का कैसा भय। पर उस रोज़ जैसे मैं कुछ खो रहा था। इस प्रश्न के साथ कि क्या ये वही भगवान हैं? 

"माँ ये वह वाली मूर्ति तो नहीं है....है ना।"

"पता नहीं।"

"माँ ध्यान से देखकर बताओ ना...।"

माँ हाथ जोड़े कुछ बुदबुदाती सी खड़ीं थीं। मेरा यूँ टोकना उन्हें अच्छा नहीं लगा। वे झुँझलाहट भरी नज़र से मुझे देखने लगीं। निशा ने कुहनियों से मेरी पीट दबाई और इशारे से पूछने लगी- क्या हुआ? मैं चुपचाप खड़ा रहा। थोड़ी देर बाद मैंने माँ से फिर पूछा- "लगता है।....नई मूर्ति है।"

"नहीं ये वही है।"

"पर माँ वह ऐसी कहाँ थी?"

"तुझे क्या मालूम तू तो छोटा था। यक़ीनन यह वही है।"

मैं संदेह में था। बचपन की स्मृति में मूर्ति का आकार ख़त्म हो चुका था।

"यह मूर्ति बहुत पहले से यहाँ पर है। बरसों पहले से। पहले यहाँ सिर्फ़ एक चबूतरा था और उस पर खुले आकाश के नीचे भगवान विराजे थे। फिर....।"

पुजारी ने हमारी बात सुन ली थी। उस ने बताया यह मूर्ति वही है। पर मैंने उस की बात को अनसुना कर दिया। मेरा मन किया कि मैं अ्नसुना कर दूँ। मुझे उसे सुनने का मन नहीं किया। ये वे भगवान कैसे हो सकते हैं? इनके पास तो हज़ारों लोग हैं। उनके पास कोई नहीं था। उनके पास तो कुछ नहीं था। पर इनके पास तो सोने के जेवर हैं, सुंदर कपड़े हैं। उनकी कोई छत नहीं थी। पर इनके पास तो पूरा मंदिर है। वे इतने बेसहारा थे, कि उनके लिए एक बच्चे की शर्ट भी बहुत थी। वे इतने ग़रीब थे, कि बच्चे भी उन पर दया करते थे। बचपन में हमें लगा था, कि उन्हें हमारे सहारे की ज़रूरत है। उनके पास हम खेले थे। तब लगा था, कि वे हमारे खेल को देखकर ख़ुश होते होंगे। हम सतर्क रहते थे कि भगवान देख रहे हैं।....यक़ीनन ये वे भगवान नहीं हो सकते। क्या मैं इनके लिए माँ की डाँट खा सकता हूँ? क्या इनके लिए रात भर सोचते-सोचते जाग सकता हूँ? क्या इस मंदिर का झण्डा कौतुहल पैदा कर सकता है? क्या..... जाने क्या हुआ मैं मंदिर के बाहर आ गया। अँधेरे में मेरे बचपन का शहर पहाड़ के नीचे जगमगाता दीख रहा था। थोड़ी देर बाद निशा आ गई।

"क्या हुआ?"

"देख रहा था इन चमकती लाइटस में से हमारे बचपन का घर कौन सा है...?"


तभी उन्होंने सर्चलाइट जलाई और उठ खड़े हुए। टार्च की लाइट छिछले पानी पर गिर रही थी और पानी का शांत सा प्रतिबिम्ब गुफा की ऊबड़-खाबड़ दीवार पर पड़ रहा था। मेरे मन में अभी भी उस रात के चित्र बन रहे थे, जब हम आख़िरी बार उस मंदिर गये थे। जब भी वह बात याद आती है, मैं उसे भूलने की कोशिश करता हूँ। वह बात अक्सर याद आती है। पता नहीं कैसे वह महत्वपूर्ण हो गई? 

हम दोनों गुफा के और भीतर जाने लगे। वे मुझे गुफा के बारे में बताते जा रहे थे और मैं एक अजीब से आकर्षण के साथ उनके पीछे-पीछे चलता रहा। हम क़रीब दो घंटे तक चलते रहे। कहीं गहरे संकरे रास्तों पर, तो कहीं अँधेरे गहरे खोहनुमा हिस्सों में। जगह-जगह बेतरतीब चट्टानें और अँधेरे में खड़ी ऊँघती सी विशाल आकृतियाँ थीं। जैसे पत्थरों के विशाल दानव खड़े हों, हाथियों से भी बड़े। अजीब सी भूलभुलैय्या चारों ओर थी जो घनघोर काले अँधेरे और सन्नाटे के कारण कुछ भयवाह से लग रहे थे। जगह-जगह शाखाओं की तरह संकरे अँधेरे रास्ते थे। गुफा के कई हिस्सों में कुछ गड्ढे और गलियारे से थे, जिनमें से कुछ अनजान रास्ते गुज़रते थे। जहाँ कोई नहीं जाता था।

चलते-चलते हम एक विशाल बोगदेनुमा हिस्से में पहुँचे। गुफा की दीवार और किनारों से कई संकरे रास्ते भीतर के अनजान अँधेरों में खोये हुए थे। मेरी इच्छा हुई कि इनमें से किसी रास्ते में चला जाय। ऐसा रास्ता जहाँ वे भी नहीं गये हों।

"नो...इट्‌स ए रिस्की जॉब।"

"रास्ता ध्यान रहे तो फिर कोई परेशानी नहीं होगी।"

यद्यपि अब तक का रास्ता मुझे ख़ुद याद नहीं था। अगर मुझे छोड़ दिया जाता, एक टॉर्च लेकर तो भी मैं बाहर नहीं आ सकता था। पर मैं निश्चिंत था, कि वे मेरे साथ हैं। वे कई बार यहाँ आ चुके हैं।

"मैं उधर कभी नहीं गया हूँ।"

"बहुत अन्दर नहीं जायेंगे....बस।"

"इट्‌स अगेंस्ट द रूल्स।"

"रूल्स।"

"हाँ, फॉरस्ट डिपार्टमेण्ट का रूल है। फ़िक्स रूट के अलावा दूसरे पर नहीं जा सकते हैं।"

"यहाँ कौन देख रहा है। ज़मीन से कई मीटर नीचे घुप्प अँधेरे में कि आप फ़ॉलो कर रहे हो या नहीं।"

"बट....।"

"लेट्‌स मूव।"

मैं आगे को बढ़ गया। वह थोड़ी देर को झिझकता सा वहीं खड़ा रहा। मैं अकेला कुछ आगे तक बढ़ गया। थोड़ी दूरी के बाद टार्च की रोशनी आनी बंद सी हो गई। मैं बहुत आगे चला गया था। उनके हाथ में वह टार्च एक बिंदु की तरह दिख रही थी। मुझे अजीब सा अकेलापन लगा। कई फीट ज़मीन के नीचे, बहुत अन्दर। लगता मानो यह जगह इस संसार का हिस्सा नहीं है। शायद कोई नहीं जानता कि हम यहाँ हैं। मुझे एक अंतरिक्ष यात्री के संस्मरण याद आये जो मैंने कुछ दिनों पहले पढ़े थे। वह चाँद पर गया था। उसे एक अजीब सा डरा देने वाला अकेलापन महसूस हुआ था, जब उस ने लाखों मील दूर आकाश पर चमकती पृथ्वी को देखा था। दूसरी दुनिया में होने के अहसास से उपजा अकेलापन बहुत अलग होता है। थोड़ी देर बाद वह मेरे पीछे-पीछे आने लगा। हम अनजान रास्ते पर चल पड़े।

एक संकरी कंदरा में कुछ दूर चलने के बाद रास्ता बंद सा लगा। हम रुक गये। पर वहाँ गुफा में बहने वाला पानी एक गड्ढे में उतर रहा था। एक चौड़ा अँधेरा गड्ढा। हमें लगा शायद वहाँ से आगे को रास्ता हो। हम धीरे-धीरे उस गड्ढे में उतरने लगे। फिसलन भरे उस गड्ढे में कुछ देर तक उतरने के बाद हम संकरी सी एक जगह पर थे जो चारों ओर से ऊबड़-खाबड़ चट्टानों से अटी पड़ी थी। हम आगे बढ़ते रहे। कभी चट्टानों पर चढ़ते तो कभी संकरे रास्तों पर नीचे उतरते....हम चलते रहे। तभी हम एक अजीब सी उमस भरी जगह पहुँचे। इस जगह चारों ओर चट्टानों के बीच की खाली जगहों पर तरह-तरह के सफेद क्रिस्टल से थे। हमने उन्हें टॉर्च की रोशनी में देखा। उनमें से बहुत से क्रिस्टल पानी के भीतर चमकते से थे।

"ये बहुत रेअर फ़ॉरमेशन है।"

"यह चमकता भी है।"मैंने उन्हें छूकर देखा। वे कुछ भुरभुरे से थे। हम उन्हें देखने के कौतुहल में और आगे बढ़ गये। जगह-जगह पानी के गिरने और सूखने से क्रिस्टल जैसी आकृतियाँ बन गयी थीं।

"तुम्हें यहाँ अकेलापन नहीं लग रहा है। दुनिया से दूर इस घनघोर अँधेरे में...।"

"मुझे लगता है। भगवान हर जगह है। यहाँ भी फिर अकेलापन कैसा।"

मेरी ओर देखकर मुस्कुराते हुए उस ने कहा। मुझे अँधेरे में उस के चमकते दाँत दिख गये।

चलते-चलते हम एक ऐसे संकरे गलियारे में थे, जहाँ घुटनों-घुटनों तक पानी भरा था। हम सँभलकर आगे बढ़ रहे थे, कि अचानक उस का पैर फिसल गया। मैंने लिया पकड़ लिया पर सर्चलाइट उनके हाथ से फिसल कर पानी में गिरकर बुझ गई। चारों ओर घोर अँधेरा हो गया। हमने किसी तरह वह लाइट पानी से टटोल कर बाहर निकाली। उसे जलाने की कोशिश की पर वह नहीं जली। हम घबरा गये। डर की बात यह थी, कि हम बाहर कैसे निकलेंगे। गुफा के भीतर हमें लगभग पाँच घंटे हो चुके थे। अँधेरे में रास्ता ढूँढना नामुमकिन था। हम एक दूसरे का हाथ पकड़े रास्ता ढूँढते रहे। मैं बार-बार अपनी घड़ी देख रहा था। दो घंटे, चार घंटे, पाँच घंटे.... और फिर घड़ी में नये दिन की तिथि रेडियम में चमकने लगी। पर हम रास्ता नहीं ढूँढ पाये। हम जिन रास्तों पर टटोलाते हुए बढे़ थे, शायद वे ग़लत थे और हम और भी ज़्यादा उलझ गये थे। पर फिर भी अंत तक हमने कोशिश नहीं छोड़ी। हम लगे रहे। तब तक लगे रहे जब तक कि हमें विश्वास नहीं हो गया कि अब कुछ नहीं हो सकता....। यहाँ से निकलना अब नामुमकिन है। हम अब कभी भी यहाँ से नहीं निकल पायेंगे। हम उस गुफा से फिर निकल नहीं पाये। मुझे इमैनुअल की बात याद आई। मुझे उसका मरना याद आया। मुझे तक़लीफ़ हुई। क्योंकि मैं इतनी जल्दी मरना नहीं चाहता था। उस गुफा में फँसे हमें पाँच दिन हो गये थे। हम बोल भी नहीं पा रहे थे। पर मैं उससे वह बात कह चुका था-

"तुम पूछते थे ना....डू यूबिलीव इन गॉड। सुनो मेरे एक ईष्ट थे। मेरे भगवान....पहाड़ के ऊपर। बचपन से मैंने उन्हें ही जाना। पर अब लगता है, जैसे वे बदल गये हैं। जैसे उन्हें मेरी ज़रूरत नहीं। मानो किसी ने उन्हें मुझसे अलग कर दिया हो। वे बदल गये हैं। उन्हें बदल दिया गया है। वे अब मेरे वाले भगवान नहीं रहे। मुझे एक बात विचार आया था कि मैं किसी दूसरे भगवान को अपना लूँ। सब लोग तो ऐसा करते हैं। एक बार में कई-कई भगवानों की पूजा करते हैं। मैं भी कर पाऊँगा। पर मैं नहीं कर पाया। मैं उस भगवान की जगह किसी और को नहीं ला पाया। पता नहीं मैं क्यों नहीं कर पाया?"

दूसरी ओर से कोई आवाज़ नहीं आई। मैंने रुककर उस से दूसरी बात पूछी-

"क्या मैं नास्तिक हूँ? तुम क्या सोचते हो....एम आई एन एथीस्ट?"

दूसरी ओर से कोई आवाज़ नहीं आई। मैंने उन्हें अँधेरे में टटोलकर देखा। उनका शरीर ठंडा पड़ चुका था। उनकी साँस बंद थी और नब्ज़ ग़ायब।

मरने से पहले उन्होंने अपने भगवान को याद किया था। और मैं सोच रहा था, कि मैं कितना अकेला हूँ। मेरे कोई भगवान तक नहीं... थोड़ी देर बाद मैं उस घुप्प अँधेरे में सीलन भरे फ़र्श पर लुढ़क गया। मैं इन्तज़ार करने लगा-जाने मैं कब मरूँगा? 

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