औरतें ही तय करती हैं कि 
चादरें बदलनी हैं और
गिलाफ गंदे हो गये हैं
या कि अब ये पर्दे 
बैठक के क़ाबिल नहीं रहे,
और चमचमा देती हैं घर
ख़ुद धूल में लिपटकर....…

वो अक्सर सुनती हैं ये जुमला - 
"तुम करती क्या हो दिन भर…?"

और ऐसा नहीं कि जवाब नहीं है 
लेकिन पूछने वाला जानता नहीं 
कि वो झेल नहीं पायेगा 
जवाब का वज़न......
ये ऐसा ही है कि जैसे 
कोई हिमालय से कहे,
"तुम करते क्या हो??
या समंदर से कहे कि, 
"बेकार इतनी जगह में पसरे पड़े हो"
वो दोनों भी औरत की ही तरह 
ख़ामोश रह जायेंगे
पूछने वाले की अक़ल पर 
मन ही मन हँसते हुए

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