अंतिम पूँजी 

15-06-2020

अंतिम पूँजी 

पवित्रा अग्रवाल

अनूप बहुत ग़ुस्से में था, वह आँगन से ही बोलता हुआ आया, "माँ सुना आपने अभी वह क्या कहा रहा था?”

बिना पूछे ही मैं समझ गई कि वह किसके विषय में कह रहा है। जब से चाची जी मरी हैं तब से इस घर के सब सदस्यों का मन संतू के प्रति आक्रोश से भरा है। रिश्ते में तो वह अनूप का चाचा यानि मेरा देवर लगता है। संतुष्टि के लिए कहूँ तो सौतेला देवर किन्तु अर्थहीन रिश्तों के मध्य संबोधन रह ही कहाँ जाता है। 

मैंने अनूप को टोका, "अब क्या हुआ? तुझे इतना ग़ुस्सा क्यों आ रहा है?"

अभी उसने मुझे दूर से आते देख लिया था। मुझे सुनाने के लिए किसी से तेज़ आवाज़ में बोला,"चाची के मरने पर सबसे ज़्यादा प्रकाश भैया के घर वाले रोये थे। ...अब माल देने वाली चली गई, इसी बात का उन्हें दुःख होगा।"

"माँ मन में तो करता है उसे आँगन से खींच कर बाहर ले आऊँ और मार-मार कर 85 वर्षीय चाची के अपमान का बदला ले डालूँ। ...परजीवी कहीं का, जैसे अपाहिज हो। बूढ़ी चाची से भी बस पाते रहने की उम्मीद करता रहा। चाची की टाँग तोड़ेगा!"

उसकी आँखों से चिंगारियाँ निकल रहीं थीं। इतने ग़ुस्से में मैंने उसे कभी नहीं देखा था। युवा ख़ून है जवानी का जोश है, मैं तो डर रही थी कि न जाने क्या कर बैठे। मैंने उसे प्यार से पास बैठाया, "तू तो पागल है, वो जो कह रहा है उसे कहने दे। उसकी असलीयत सब जानते हैं। चाची की पवित्र आत्मा जिसने आज तक अपने दुश्मन के लिए भी कभी बुरा नहीं सोचा, वह अंतिम समय में उसे कोसती हुई मरी हैं। भगवान फल देगा, तू फ़ालतू की बातें मत सोचा कर। चाची को तो एक दिन जाना ही था पर कारण संतू द्वारा पहुँचाया गया मानसिक दुःख बन गया। बेटा ज़्यादा क्रोध करना अच्छा नहीं होता, क्रोध विवेक का हरण कर लेता है और यही संतू का सब से बड़ा अवगुण है। तुझे भी बहुत क्रोध आने लगा है।"

समझा-बुझा कर मैंने अनूप को शांत करा दिया किन्तु क्या मैं शांत हूँ? शायद इस घर का कोई भी सदस्य शांत नहीं है। यों बाहर से सभी सहज दिखने का प्रयास कर रहे हैं। चाची सब की चेतना पर सामान रूप से छाई हुई हैं। चाची जी यानि अनूप की परदादी, मेरी दादिया सास। उन्हें मेरे ससुर जी से लेकर बच्चे तक चाची ही कहते आये हैं। हर चार-पाँच महीने बाद वो मथुरा से यहाँ पेंशन लेने आती थीं और लगभग हर बार संतू की उपेक्षा से आहत होती थीं। पहले चाची संतू के यहाँ रुकती थीं पर बाद में उन्होंने वहाँ रुकना बंद कर दिया था। वह अक़्सर हमारे पास आकर दुखी होती थीं - "संतू ने आज यह कहा, वह कहा!"

तो मैं खीज कर उनसे कहती थी, "क्या करें चाची आपको भी वहाँ गए बिना चैन नहीं पड़ता। जब वह आप से लड़ता है तो आप वहाँ क्यों जाती हैं?" 

तब वह भावुक हो उठती थीं, "सुन मैं वहाँ क्यों जाती हूँ। संतू का पिता यानि तेरा ससुर हरी मरते समय तेरी सास (सौतेली, संतू की माँ) को लेकर बहुत उदास था और मुझ से कहा था कि चाची मेरे पीछे संतू की माँ का ख़्याल रखना। जब भी तुम मथुरा से आओ तो उसी के पास रुकना और वहीं खाना-पीना। उस की बात रखने के लिए मैं वहाँ जाती हूँ। लगता है अपने उस बेटे से वह भी डरती है। उससे कभी कुछ नहीं कहती।" 

फिर भी चाची जी ने वहाँ जाना नहीं छोड़ा बल्कि संतू को ख़ुश करने के लिए विशेष कोशिश करती रहती थीं। एक दिन चाची जी ने उसे टोक दिया, "लाल मैं चार-पाँच महीने में दो-चार दिन को आती हूँ, देख कर पैर छूना तो दूर रहा तू तो नमस्ते भी नहीं करता।"

"नहीं करता नमस्ते, क्यों करूँ?...तेरा सगा लाल प्रकाश और उनके बच्चे हैं तो तेरी पूजा करने को...मेरे लिए क्या करके भूल गई हो?" 

चाची ने कहा था, "लाल ग़ुस्सा क्यों होते हो? मैं तो सब को बराबर मानती हूँ... प्रकाश के लिए भी मैं क्या कर देती हूँ? मुझ बुढ़िया के पास है ही क्या जो किसी को दूँगी। पेंशन कुल पचहत्तर रुपये मिलती  है जिसे मैंने आज तक अपने ऊपर ख़र्च नहीं किया। ग़रीबों, ब्राह्मणों की बेटियों को शादी में देकर कुछ पुण्य कमा लेती हूँ। ...अपने लिए तो आस-पास के बच्चों को घेर-बटोर कर पढ़ाती हूँ और उससे अपना ख़र्च चलाती हूँ। मेरे पास बचता ही क्या है जो तुझे या किसी और को दूँगी? बेटा मैं तो तुम सब की शुभचिंतक हूँ। देने के लिए तो मेरे पास सिर्फ़ आशीर्वाद है।"

"हमें नहीं चाहिए तुम्हारा आशीर्वाद। कहती हो सब को बराबर मानती हूँ। प्रकाश भैया की शादी में दस तोले का हार चढ़ाया था तुमने, हमें क्या दिया?"

"चाची जी अगर आप सब को बराबर मानती हैं तो उस हार के हिस्से कर दो," संतू की पत्नी ने पति की बात को आगे बढ़ाया।

चाची जी भड़क उठीं थीं, "बहू तुम कौन होती हो उस हार के हिस्से कराने वाली? वह मेरी अपनी चीज़ थी। वह न तुम्हारे बाप की थी न तुम्हारे ससुर की। आज तो कह दिया, अब न कहना उस बारे में कुछ। उसकी शादी तुम से पच्चीस साल पहले हुई थी। ...अब मेरे पास देने को कुछ नहीं है। हाथ में यह दो चूड़ी और उँगली में एक अंगूठी है, बस।"

संतू की पत्नी ने कहा, "तुम्हारे पास चार-पाँच तोले की ज़ंजीर भी तो थी, वो कहाँ गई?" 

"कहीं भी गई हो तुम्हें क्या करना है? लेकिन अब वो मेरे पास नहीं है।"

"तो यह चूड़ी ही हमें दे दो।" 

"यह चूड़ी तेरी देवरानी माँग रही थी। मैंने कहा मेरे मरने के बाद ले लेना। अब तू भी माँग रही है तो क्या कहूँ, दोनों एक-एक ले लेना।" 

"हमें नहीं चाहिए, अपने सगे लाल प्रकाश को ही दे देना और उन्हीं के घर रुका भी कर," संतू दहाड़ा था।

तब से चाची जी ने वहाँ ठहरना बंद कर दिया था, बस उसकी माँ से मिलने चली जाती थीं। उस बार भी पेंशन के रुपयों से सौ रुपये उसे दे आई थीं। जब भी वह आतीं उसे ख़ुश करने की कोशिश करती थीं ताकि उससे भी आदर पा सकें। 

एक बार वह अपने लिए कम्बल ख़रीद कर लाई थीं। संतू ने देखा तो कहा, "चाची नीले रंग का यह कम्बल तो बहुत अच्छा है। ..काफ़ी गरम भी होगा, कितने का लिया?" एक मुझे भी ख़रीदना है।" 

"तुझे चाहिए तो इसे तू ले ले," – चाची जी को जैसे संतू को ख़ुश करने का बहाना मिल गया था। वह संतू के मना करने पर भी उसे देकर संतुष्ट नज़र आई थीं। 

 उसके बाद वह फिर एक धारियों वाला कम्बल लाई थीं, देख कर संतू ने कहा, "चाची रंगीन धारियों वाला यह कंबल तो पहले वाले से भी अच्छा है, मुझ से बदल लो।"

"हाँ, हाँ क्यों नहीं, बदल ले लाल। मुझ बुढ़िया को तो सर्दी से हाड़ बचाने को चाहिए, रंग कैसा भी मुझे क्या करना है?" एक बार पुनः हर्षित होते हुए चाची ने कंबल बदल लिया था और कुछ अधिक ही ख़ुश नज़र आई थीं। वह जानती थीं कि बूढ़ा शरीर है, भगवान के यहाँ से कभी भी बुलावा आ सकता है अतः अपने अंतिम समय में किसी को भी नाराज़ नहीं करना चाहतीं थीं। इतनी उम्र होने पर भी उन्होंने कभी लाठी का सहारा नहीं लिया था। घर से बाहर जाते समय वह हमेशा साफ़-सुथरे सफ़ेद कपड़े पहनती थीं पर घर में अक़्सर मटमैली पीली-सी पड़ गई धोती पहने रहती थीं। बच्चे टोक देते, "चाची आपकी धोती कितनी मैली हो रही है, कभी-कभी धोबी से धुलवा लिया करो, अच्छी नहीं लगती।"

"हाँ लल्ला हमें देख कर तुम्हें शर्म आती है, रोज़ धुली हुई ही तो पहनती हूँ। इनका रंग ही अब ऐसा हो गया है। धोबी से धुलवाने को पैसे कहाँ से लाऊँ? यहाँ से जो तेरी माँ धोबी से धुलवा कर देती है, वहाँ मैं उन्हें बाहर पहनने के काम मैं लाती हूँ।"

कहने को मन होता कि आप इतना दान करती हो पर अपने लिए इतनी कंजूसी क्यों? धोबी से धुलवाने में भी कितने पैसे लगते हैं? पर कहना व्यर्थ था उन्हें अपने पर खर्च करना फिजूलख़र्ची ही लगता था। 

उनकी आवाज़ में अभी भी वही ठसक थी जो उनके अध्यापिका काल में रही होगी। पैर छुआने का उन्हें विशेष शौक़ था। कोई बच्चा पैर छूना भूल जाता था तो वह आदेश देकर चरणस्पर्श कराती थीं। 

वैसे वह सभी को बहुत प्यार करती थीं। किसी के दुःख-दर्द में हमेशा साथ देती थीं। फिर भी यह सही था कि अनूप के पिता से उन्हे विशेष प्यार था। इतना जितना किसी सगी स्नेही माँ को अपने बेटे से होता है। मेरी सगी सास तो अनूप के पिता को पाँच-छह साल का छोड़ कर चल बसी थीं। तब घर में चाची के अतिरिक्त कोई और महिला नहीं थी। वह भी नार्मल स्कूल में अध्यापिका थीं अतः बाहर ही रहती थीं। तब ससुर जी कम उम्र की नाज़ुक सी लड़की को पुनः ब्याह कर लाये थे। छोटी सी दिखने वाली वह नई माँ पहली के बच्चों को सम्हाल पाती, उससे पहले ही वह स्वयं माँ बन गई और यह सिलसिला चलता ही रहा। अनूप के पिता को तब चाची जी ने ही पाला था। उन्हें पालते समय मातृत्व के सुख से वंचित, बाल विधवा चाची जी मातृ-स्नेह से भर उठी थीं। 
 बच्चों की बढ़ती संख्या, उनकी बीमारी, घर के बढ़ते ख़र्चों की वज़ह से ससुर जी ने अनूप के पिता को दस क्लास से आगे पढ़ाने से मना कर दिया था। तब चाची जी ने अपने ख़र्चे से उन्हें पढ़ने बनारस भेज दिया था। वहीं पढ़ते हुए वह स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ गए और विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ जेल चले गए थे। कई महीनों तक घर में उनकी कुशलता की कोई सूचना नहीं मिली थी कि वह जीवित भी हैं या नहीं? फिर चाची जी अनूप के पिता पर ग़ुस्सा होती थीं, जाड़ों की ठंडी रातों में अपने ऊपर से रजाई उठा कर फेंक देती थीं, "मैं यहाँ रजाई ओढ़ूँ और मेरा लाल जाने कहाँ, किस हाल में होगा। ...जाकर पता तो कर कि वह कहाँ है? ख़ाली चिट्ठियाँ लिखते रहने से कुछ नहीं होगा। मैं औरत की जात अकेली जा कर कहाँ भटकूँ?"

बुढ़ापे में इनसान के पास अतीत की स्मृतियाँ ही शेष रह जाती हैं, चाची जी अक़्सर उन्हें ही दोहराती रहती थीं। सुन-सुन कर वह घटनाएँ हमें ऐसे याद हो गयी थीं जैसे हमने उन्हें सुना नहीं बल्कि वहाँ उपस्थित रह कर स्वयं देखा है। ऐसे ही किन्हीं क्षणों में अपने अतीत को स्मृतियों में जीने के प्रयास में चाची जी ने बताया था - "तेरे दादिया ससुर (प्रकाश के बाबा जी) से हमारी कोई रिश्तेदारी नहीं थी, जाति भी अलग थी। पड़ोस के नाते हमारे ससुर जी उन्हें बेटे की तरह चाहते थे। मैं तो तेरह वर्ष की उम्र में विधवा हो गई थी। मेरे पति अपने पिता की एक मात्र संतान थे। उन दिनों प्लेग फैला था। इस महामारी में घर के घर ख़ाली होते जा रहे थे। बचे हुए लोग घर- गाँव छोड़ कर दूसरी जगहों पर भाग रहे थे। यही प्लेग मुझ से मेरे पति को छीन कर ले गया। ... और मैं बैठी रह गई, मुझे मौत नहीं आई। मेरे ससुर जी का बुढ़ापे का शरीर था। वह अक़्सर मुझे लेकर दुखी होते थे कि मेरे बाद इसका क्या होगा। मरने से पहले उन्होंने सब ज़मीन, जायदाद, मकान आदि बेच कर पैसा, गहना सब मेरे लिए प्रकाश के बाबा जी के पास जमा करवा दिया था, वो मास्टर थे। उनसे मैं जेठ का रिश्ता मानती थी और उन्हें जेठ जी कहती थी। वह बहुत अच्छे इंसान थे, उन्होंने मुझे पढ़ाना प्रारम्भ किया। पढ़ते-पढ़ते मैंने मिडिल पास किया फिर मैंने अध्यापिका बनने की ट्रेनिंग ली। कुछ दिन बाद स्कूल में मेरी नौकरी लग गई।

बाद में जेठ जी ने बैक में खाता खुलवा कर मेरा सब पैसा उस में जमा करवा दिया और मेरे गहने मुझे सौंप दिए। प्रकाश के पिता हरी की शादी मेरे सामने ही हुई थी। जब प्रकाश पैदा होने को था तो सपने में मुझे मेरे पति दिखाई दिए, उन्होंने कहा मैं हरी के बेटे के रूप में जन्म लेकर तेरे पास आ रहा हूँ। मैं छुट्टी लेकर तेरी सास के पास आ गई। तभी प्रकाश पैदा हुआ था, उसे छह-सात वर्ष का छोड़ कर तेरी सास की मौत हो गई थी।"

चाची जी को इन्हीं स्मृतियों को समेटने और जीने के प्रयास में मैंने वह सूत्र पा लिया था कि वह अनूप के पापा को विशेष प्यार क्यों करती हैं और तभी मैंने जाना था कि रिश्ते सिर्फ़ ख़ून के ही नहीं होते। रिश्ते विश्वास के भी होते हैं, जिसकी जड़ें मन में कहीं गहरी फ़ैल चुकी होती हैं और उन्हें उखाड़ा नहीं जा सकता। अनूप के पिता का भी चाची जी से विशेष लगाव रहा है। वह हमेशा कहते रहे हैं कि "वह मेरी दादी नहीं माँ हैं, आज मैं जो कुछ हूँ उन्हीं की वज़ह से हूँ"। वे चाची से हमेशा कहते रहे कि "अब तुम्हें आराम की ज़रूरत है, घर आकर बच्चों के पास रहो, तुम्हें कुछ कमी नहीं होने दूँगा।"

किन्तु चाची जी ने कभी कुछ नहीं लिया। कहतीं, "नहीं लाल अभी तो मेरे हाथ पैर चल रहे हैं, जब काम नहीं कर पाऊँगी तो तेरे पास ही आऊँगी लेकिन अभी नहीं। तुझ पर बड़ा भारी गृहस्थी का ख़र्चा है, उसे सम्हाल। पैसों के लिए ही तो बीबी, बच्चों से दूर परदेश में अकेला एक जगह से दूसरी जगह भटकता फिरता है। पैसे बचाने के लिए ही अपने हाथ से कच्ची-पक्की रोटी या खिचड़ी बना कर खाता है। मरी सरकार भी नहीं सोचती। जब चाहे, जहाँ चाहे वहाँ तबादला कर देती है। बच्चों की पढ़ाई बरबाद करो या फिर परिवार से दूर रहो। तू मेरी चिंता मत किया कर, अभी मुझ से जितना होता ही दान-पुण्य का काम कर लेती हूँ।अंत में यही तो साथ जायेगा। फिर जहाँ मैं रहती हूँ, वह भी कहाँ छोड़ते हैं? थोड़े दिन को भी मुश्किल से आने देते हैं।"

इस तरह चाची जी स्थायी रूप से रहने कभी नहीं आयीं। मथुरा में अपने पास पड़ोस में उनका बहुत सम्मान था। बड़ी बूढ़ी औरतें उनके पैर छूती थीं। वहाँ पर चाची जी सिद्धों की तरह पुजती थीं। कोई पुत्र की कामना से आशीर्वाद लेने आ रहा है तो कोई परीक्षा में पास होने या मुक़दमा जीतने के लिए। और जिसकी मनोकामना पूरी हो जाती, एक तरह से वह उनका भक्त हो जाता था। इच्छा पूरी होने पर कोई उन्हें धोती दे जाता, कोई रुपये, मिठाई व फल। वास्तव में ट्यूशन का तो सिर्फ़ नाम था; वरना अधिकांश बच्चों से तो वह फ़ीस भी नहीं लेती थीं। उनमें से कोई रोज़ उन्हें अपनी भैंस का दूध दे जाता था। तो कोई उन्हें रोज़ कुँए से पानी भर कर दे देता था। कोई उनके कपड़े धो जाता था, कोई बाज़ार से सामान ला देता था। किसी ने उन्हें अपनी छोटी सी कोठरी बिना किराये के रहने को दे रखी थी। वह जिन लोगों के बीच रहती थीं वह रोज़ खाने-कमाने वाले साधारण वर्ग के लोग थे। वहाँ सबके दुःख-दर्द बाँटने का ज़िम्मा जैसे उन्होंने ही ले रखा था। उन लोगों के छोटे-मोटे झगड़े वह चुटकियों में निबटा देती थीं। आये हुए फल-मिठाई अपने लिए रख कर वहीं बच्चों में बाँट देती थीं। चाची जी जब भी यहाँ आती थीं तो बच्चों को साफ़ सुथरे कपड़ोंं में देख कर कहती थीं - "तुम लोग कितने अच्छे-अच्छे कपड़े पहनते हो। ..क्या ज़रूरत है इतना ख़र्चा करने की? मेरा लाल वहाँ बड़ी मेहनत से कमाता है, उसे कुछ जोड़ने भी दो।"

यद्यपि वह जो कहती थीं वह हमारे प्रति उनका स्नेह और चिन्ता ही थी, फिर भी कभी कभी मैं खीज जाती थी। सोचती थी बच्चों को कुछ जोड़ी कपड़ों में भी साफ़-सुथरा रखती हूँ तो चाची जी समझती हैं कि मैं पैसा बरबाद करती हूँ। सब कपड़े ख़ुद घर पर सिलती हूँ। चौका-बरतन के लिए कोई काम वाली भी नहीं रखी हुई है फिर भी फिजूलख़र्ची के आरोप से मन दुखी होता था। 

अनूप के पिता जी ने किसी दोस्त की सलाह पर सरकारी कोटे से स्कूटर के लिए एप्लाइ किया था, उसके लिए ऑफिस से लोन भी मिल रहा था। सब ने सलाह दी कि ले लो, जब चाहे बेच लेना,अच्छे दाम मिल जाएँगे। स्कूटर लेकर उन्होंने हमारे पास भेज दिया था। स्कूटर देखते ही चाची जी बोलीं, "इसे तो लल्ली के ब्याह में देने के लिए रख लो।"

एक बार अनूप वही स्कूटर लेकर चाची जी को मंदिर से वापस लाने को चला गया तो उन्होंने वहीं पर शोर मचा दिया- "मैं इस स्कूटर पर नहीं बैठूँगी। कोई भी चीज़ नई मत छोड़ना, तू इसे लाया क्यों?"

अनूप घर आकर बहुत झुंझलाया था।

मुझे कहतीं, "बहू तूने दो-दो चटाई क्यों निकाल रखी हैं, चादर फट गई है तो पैबंद लगा कर स्तेमाल कर लो। नई मत निकालो, छोरी के ब्याह के लिए रहने दो।"

शरारती अनूप एक बार तेज़ धूप में नंगे पैर बाहर चला गया तो चाची चिल्लाई, "अरे तपती ज़मीन है, पैर जल जाएँगे। चप्पल क्यों नहीं पहनता?"

"चाची पुरानी चप्पल टूट गई हैं। ..नई छोरी के ब्याह में काम आएँगी।"

"अच्छा लाल तो तुम हमारा मज़ाक उड़ा रहे हो?"

अक़्सर अनूप के पिता उन तारीख़ों में ही छुट्टी पर आते थे जिन में चाची जी भी आ सकें और पेंशन भी ले सकें। और जब कभी वह नहीं आ पाती थीं तो वह स्वयं मथुरा जा कर उन से मिल आते थे। अनूप के पिता पिछ्ले महीने ही आये थे और चाची जी से भी वहाँ जाकर मिल आये थे। 

अभी दस दिन पहले ही चाची यहाँ पेन्शन लेने आई थीं। पेंशन उन्हें चार-पाँच दिन बाद मिलनी थी। तभी एक दिन वह रोती हुई लौटी थीं और माथे पर हाथ रख कर धम्म से चारपाई पर बैठ गयीं।

हम सब अवाक थे कि क्या हुआ? वह सिसक रही थीं, "आज तक किसी ने हम से ऐसे शब्द नहीं बोले, जेठ जी तक ने नहीं। मैंने सन्तु को गोद में खिलाया है,आज बड़ा हो कर वह मेरी टाँगें तोड़ेगा? लाल को आने दो, मैं उससे शिकायत करूँगी। उस घर में मेरा एक बक्सा पिछले 25-30 वर्ष से रखा है। ..किसी बच्चे को भेज कर उठवा ले बहू वरना उसमें वो आग लगा देगा।"

मैंने कहा, "कोई आग नहीं लगाएगा, रखा रहने दो। ...उसके कहने का क्या है, वह बोलता बहुत ज़्यादा है।"

"नहीं बहू तू नहीं जानती, वो ऐसा ही है, तू जल्दी से बक्सा उठवा ले। वह हम से इतना बोल गया पर उसकी माँ और पत्नी ने एक बार भी नहीं टोका कि तू चाची से ऐसे क्यों बोल रहा है? हम उस घर में अब अभी पैर भी नहीं रखेंगे, हमारी लाश को उसे हाथ भी नहीं लगाने देना। दस साल बाद देखना उसकी क्या गत होगी, हमें सताने का फल भगवान उसे ज़रूर देगा।" 

मैं सिर्फ़ सुनती रही, समझ नहीं पा रही थी कि क्या करूँ? 35-36 साल की उम्र हो गई, दो बच्चों का बाप है फिर भी समझदारी नहीं आई। मैंने चाची से पूछा - "क्या बात हो गई थी, वह आप से इतना क्यों लड़ा?"

"पिछले जाड़ों में मैं जो धारियों वाला नया कंबल लाई थी वह सन्तु ने लेकर पहला वाला मुझे लौटा दिया था। मथुरा लौटते समय सर्दी कम हो गई थी तो मैं अपना कंबल भी उसी के पास छोड़ गई थी कि अगली सर्दियों में आकर ले जाऊँगी। ...अब सर्दी शुरू हो गई है तो मैं उससे अपना कंबल लेने गई थी तो उसने मुझे नया धारियों वाला कंबल ही लौटा दिया। मैंने कहा सन्तु यह तो तुझे पसंद आया था और तू ने बदल कर इसे ले लिया था, मुझे तो पुराना वाला ही दे दे।"

वह बोला, "इसे तो कीड़ों ने खा लिया है, इसका अब मैं क्या करूँगा " इसे तुम ही ले जाओ " मैंने खोल कर देखा तो पूरा कंबल कटा पड़ा था, मैंने कहा, "लाल मैंने तो तुम्हें दोनों कम्बल नए ही दिए थे, कीड़ों ने काट दिया तो मुझे दे रहे हो। परदेश में रहती हूँ फटे हाल रहूँ तो लोग क्या कहेंगे? इसे भी तू ही रख ले, मैं दूसरा ले लूँगी।"

संतू ने दोनों कम्बल उठा कर मुझ पर फेंक दिए और कहा, "उठा दोनों कंबल और निकल मेरे घर से बाहर"...

मैंने कहा, "मैं तेरे घर नहीं तेरी माँ के पास आती हूँ।"

"अम्मा से मिलना है तो घर से बाहर बुला कर मिला कर। ..इस घर में घुसी तो तेरी टाँगें तोड़ दूँगा। तेरा जो सामान यहाँ पड़ा है उसे भी उठवा ले वरना मिट्टी का तेल डाल कर उसमे आग लगा दूँगा।"

संतू से झगड़े का कारण बता कर चाची फिर रोने लगीं। थोड़ी देर बाद चाची बिना ताले का एक बक्सा बच्चों को साथ ले जाकर उठवा लाई थीं। ...साथ में देवरानियों के गुप्तचर बच्चे बक्से के ख़्ज़ाने की टोह लेने के लिए इकट्ठे हो गए थे। सब के बीच चाची जी ने वह बक्सा खोला। उस में रखी थी एक रजाई की खोली, एक गद्दे का कपड़ा, एक जनानी नई धोती, एक ब्लाउज और पेटीकोट का कपड़ा। मुझे दिखाती हुई बोलीं, "देख बहू यह हमने अपने लिए रख छोड़े हैं। मेरे मरने के बाद इन्हें ब्राह्मण को दान कर देना। ..मैंने धीरे-धीरे चार सौ रुपये दुकान पर तेरे देवर राधे के पास जमा करा रखे हैं ताकि कोई यह न कहे कि बुढ़िया ने दिया तो कुछ नहीं पर मरते समय सब ख़र्चा हमारे सिर पर डाल गई। यों तो मौत का कोई भरोसा नहीं कि कहाँ मरती हूँ... यहाँ, मथुरा में या कहीं और? ... मैंने मथुरा में भी अपने लिए ऐसा इंतज़ाम कर रखा है।"

उस बक्से में दो-तीन मर्दाने धोती-कुर्ते भी रखे थे जिन पर जंग लग गया था और तह पर से कट गए थे। उन्हें देख कर मैं सोच रही थी कि इनको क्यों रखा हुआ है। 

तभी उन पर धीरे-धीरे हाथ फिराती और ठीक से तह करने का प्रयास करती वह कहीं दूर देखने लगी थीं। कुछ देर ठहर कर रुँधे कंठ से वह बोलीं, "ये कपड़े मेरे पति के हैं और सब तो मैंने बाँट दिए थे, पता नहीं ये एक-दो कैसे बचे रह गए। अब तो इनका कपड़ा भी गल चुका है, किसी को देने के मतलब के तो रहे नहीं। जब मरूँ तो इन्हें भी मेरे साथ जला देना।" आँखें उनकी नम थीं।

वह कुछ ठहर कर बोलीं, "रह गया अब ये बक्सा, अनूप जब अपनी पढ़ाई पूरी कर के कमाने लगे तो कहना अपने रुपये पैसे इसी बक्से में रखा करेगा। ..उसे यह बक्सा ख़ूब फलेगा, यह मेरा आशीर्वाद है। कल अपनी पेन्शन ले आऊँ फिर जल्दी-जल्दी आकर लिया करूँगी। .. बीच में ही मर गई तो सब पैसा सरकार के पास ही रह जायेगा।"

दूसरे दिन सुबह से ही, पेन्शन लेने जाने की तैयारी ऐसे ज़ोर-शोर से शुरू कर दी थी जैसे बहुत दूर जाना हो। अगले दिन सुबह ही उन्हें मथुरा वापस लौटना था। 

पेन्शन लाने के बाद अपने बिखरे सामान को पुरानी पेन्टों से बने थैलों में समेट कर रख लिया था। अनूप उन्हें छोड़ने जाने वाला था। शाम को ही मैंने उनकी पसंद के मलाई के लड्डू मँगा कर उनके थैले में रख दिए थे। देवर राधे ने सन्तरे लाकर दिए थे तो कहने लगीं, "इतना सब मैं कैसे खाऊँगी? व्यर्थ में पैसे बर्बाद करते हो।"

उस दिन रात को वे राधे की तरफ़ सोयी थीं। रोज़ सुबह चार बजे उठ कर ठंडे पानी से नहा कर पूजा पाठ करने वाली चाची जी जब छह बजे तक नहीं उठीं तो राधे की पत्नी ने राधे से कहा - आज चाची जी ने उठने में बहुत देर कर दी, देखना कहीं मर वर तो नहीं गईँ।

"अरे सो रही होंगी, मैंने रात को उन्हें बहुत देर तक करवट बदलते देखा था, देर से सोई हैं तो नींद नहीं खुली होगी,सोने दे।"

तब वह मेरे पास आई- "भाभी जी चाची जी अभी तक सो रही हैं, मुझे तो डर लग रहा है, एक बार आप चल कर देखो न।" 

मैंने जा कर उन्हें हाथ पकड़ कर हिलाया फिर भी वह नहीं जागीं। तब तक राधे भी उठ कर आ गये थे। डाक्टर को बुलाया गया। डाक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया था। उनके अनुसार हार्ट फेल हुआ था। मैंने और राधे ने मिल कर उनका शव ज़मीन पर उतारा था।

चाचा जी के जाने का उतना दुख नहीं था। उम्र भी काफ़ी हो गयी थी, उन्हें तो एक दिन जाना ही था। किन्तु जिस मानसिक स्थिति में घुटते, रोते, कलपते वह गई हैं उससे मन अस्थिर हो गया था।निशब्द रुदन फूट पडा़ था।

चाची जी की मौत का कारण संतू बना था और इसीलिए सब के आक्रोश का वह केन्द्र था। अनूप के पिता को टेलीग्राम भेज दिया गया था किन्तु वह बहुत दूर थे, तीन-चार दिन से पहले नहीं आ सकते थे।

संतू उस समय घर पर नहीं था, नौ बजे क़रीब वह लौटा था तब चाची जी को नहलाया जा रहा था। नहला कर कपड़े पहनाने का समय आया तो संतू की पत्नी बोली, "चाचीजी के बक्से मे एक धोती थी उसे ही पहना देते हैं।"

"वह धोती तो चाची ने ब्राह्मण को देने को कहा था।"

"अरे ब्राह्मण को क्या देना, अभी तो वही पहना देते हैं वरना अभी बाज़ार से मँगानी पड़ेगी।"

मैंने कहा, "मेरे पास एक कोरी धोती रखी है वह पहना दो।" धोती के साथ मैंने अन्य सभी कपड़े लाकर उन्हें दे दिए थे और बता दिया था कि इनका क्या करना है।

कपडे़ पहना कर अर्थी तैयार की जा रही थी। तभी संतू हड़बड़ाता हुआ वहाँ आया। उसकी पत्नी औरतों के बीच बैठी थी फिर वह राधे के पास गया, "भैया चाची की चूड़ियाँ व अंगूठी तो उतार ली न? ...ठीक किया। चाची की ज़ंजीर का पता नहीं चल रहा, काफ़ी भारी थी। पता नहीं उसका क्या किया?"

राधे को मौन पाकर पुनः बोला, "दे गई होंगी अपने सगे लाल को, और कहाँ जाएगी?"

राधे ने कहा, "उनको नहीं,चाची चेन मुझे दे गई हैं।"

वह खिसियाया सा बोला -"तब ठीक है।" 

संतू के लिए राधे की पत्नी अक़्सर ही कहती थी -उसको मुफ़्त का खाने की आदत पड़ गई है। अपनी कमाई तो जेब में रखता है। घर का सारा ख़र्च दुकान से होता है। माँ को भी स्वार्थवश अपने साथ रख रहा है वरना धक्का मार कर उन्हें भी अलग कर दिया होता। चालक है, अम्मा के बहाने दुकान से उसका ख़र्चा भी चल रहा है। अम्मा के पास जो भी गढ़ा, दबा है वह भी उसे ही मिलेगा। ये (राधे) भी चुप रहते हैं। एक तो उसकी दबंगई से डरते हैं दूसरी बात पुश्तैनी दुकान है, मना भी कैसे करें?"

यह सब सुन कर मैं चुप ही रही, क्या कहती? मन में तो आया था कह दूँ कि तुम एक माँ के हो अतः पुश्तैनी सम्पति पर तुम सब का ही हक़ है। फ़ालतू तो हम ही थे जिन्हें दूध की मक्खी की तरह अलग करके सब कुछ समेट लिया। 

किन्तु कहने से कोई फ़ायदा नहीं, हमने संतोष कर लिया है। कहने को तो लोग कहते हैं कि अनूप के पिताजी सीधे हैं और सीधी उँगली से घी नहीं निकलता। पर अनूप के पिता का कहना है, "हम हैं तो एक ही पिता की संतान, माँ ही तो दो थीं। कोर्ट-कचहरी करके मुझे खानदान की हँसी नहीं उड़वानी। हरेक के माँ-बाप बच्चों को कुछ देकर ही तो नहीं जाते। कम से कम ये मकान छोटा ही सही, हमें दे गये हैं। इस से मुझे बहुत सहारा है।" 

लोगों के समूह में चाची जी का कीर्ति गायन हो रहा था, संतू का चेहरा मुरझाया हुआ था। 

अर्थी को कन्धा देते समय "ॐ नाम सत्य है" रूप में सबसे तेज़ आवाज़ उसी की सुनाई दे रही थी। जैसे अपने अंतर की खीज को वह इस शोर में दबा देना चाहता हो। 

मन हुआ कोई उससे कह दे कि चाची जी की अर्थी को वह कन्धा नहीं दे, यह चाची की भी इच्छा थी पर कौन कहता?

चाची जी के बिस्तर, जिस पर वह मरी थीं, लपेट कर मेहतर को देने के लिए एक तरफ़ रखते हुए उसमें से उनकी रामायण निकल कर नीचे गिर गई थी और जाप करने की माला बाहर लटक रही थी। 

गिरते ही रामायण और माला मैंने उठा ली। सब की नज़रें मुझ पर टिक गई थीं कि मैंने क्या उठाया। 

मैंने सब की जिज्ञासा शांत करते हुए कहा, "रामायण और माला है, किसी को चाहिए?"

वे सब झेंप गए, "नहीं हमें क्या करना है?"

फिर भी तिरछी नज़रें इधर ही लगी थीं कि कहीं कोई रक़म इसमें भी तो नहीं छिपी है।

मैंने रामायण को उन्हीं के सामने उलट-पलट डाला। उसमें से अनूप के पिता का एक पुराना फोटो और उन्हीं का लिखा एक पोस्टकार्ड निकल कर ज़मीन पर गिर पड़ा था। यह चाची जी की अंतिम और अमूल्य पूँजी थी जिसे वह सदा अपने साथ रामायण के पन्नों में दबा कर रखती थीं। 

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