अन्ततः

15-09-2019

रात्रि अपने यौवन पर थी पर उसकी आँखों में नींद नहीं थी। रह रह कर विवेक के बारे में ख़्याल आ रहा था। उसके मन में एक ही विचार उद्वेलित हो रहा था कि वह जो कर रही है क्या वह सही है। विचारों के इसी उथल-पुथल में ही कहीं उसकी आँंख लग गई।

हमेशा की तरह वनीता के काम में आज सुस्ती नहीं रही थी। आज वह जल्दी उठी थी। सारा कार्य पूर्ण कर वह अब शीशे के समक्ष थी। अपने प्रतिबिम्ब को ताकते हुए उसके मानस पर अनेक दृश्य उभरते हैं। वह उन्मुक्त बचपन, काॅलेज लाइफ़, दोस्त आदि। कितना अच्छा था समय। उसके मानस पर दृश्य पलटता है एवं सामने आती है एक अस्पष्ट सी तस्वीर। धीरे-धीरे स्पष्ट होता है वह चेहरा और घटनाएँ। यह तो विवेक ही था उसका दोस्त, उसका साथी, उसका प्यार। अचानक वर्तमान में लौट वनीता खीज उठती है, माथे पर खिन्नता के भाव तैरने लगते हैं। वह अपने को कार्य में व्यस्त कर लेना चाहती है पर उसे यह कार्य बहुत कठिन प्रतीत होता है।

उसे विवेक का इंतज़ार अखर रहा था। पत्रिका पढ़ने के उपक्रम में वह बैठी। अपना मस्तक कुर्सी के पाये से टिकाकर फिर विचारों में निमग्न हो गयी। अब फिर विवेक के सामने थी। विवेक समझा रहा था- वनीता यह तो कोई ज़रूरी नहीं है कि शादी एवं प्यार एक से ही हो। शायद भगवान को ऐसा ही मंजूर हो। जब भगवान एवं परिवार को तुम्हारी शादी कहीं और ठीक लगती है फिर हम विधि के विधान को बदलने वाले कौन है? मैं बुजदिली नहीं दिखा रहा था बल्कि सभी को दुखी कर एवं ग़लत बताकर स्वयं को सही सिद्ध नहीं करना चाहता। ”मुझे समझ नहीं आ रहा विवेक कि सही क्या है और क्या ग़लत है?”- रुँधे गले से वनीता से कहा।

 ”सही तो वही है जो माँ-बाप ने तय किया है, क्या वे ग़लत सोच सकते हैं? मैं तुम्हारा अच्छा दोस्त था एवं रहूँगा। इतना क्या कम है? फिर जब भी तुम्हें ज़रूरत हो तो मैं हूँ ही ना......।” 

एकाएक वह उठ खड़ी होती है। पति दफ़्तर जा चुके थे। राजेश यहीं नगर परिषद में बाबू है। धीर गम्भीर व्यक्तित्व एवं छुपा हुआ स्वभाव। ”बातें कम काम ज़्यादा” में विश्वास, घर को भी दफ़्तर बना छोड़ा था। घर पर भी फ़ाइलें ले आते हैं। सख़्त हिदायत है कि काम के समय उन्हें डिस्टर्बेंस न हो। शादी के बाद विवेक से बिछोह तो था ही उस पर राजेश की इस उदासीनता ने पति पत्नी के विचारों में अलगाव ला दिया। लम्बी संवादहीनता ने वनीता को एकाएक यह फ़ैसला करने पर विवश कर दिया, जिसके क्रम में विवेक को फोन कर वनीता ने उसे आज यहाँ बुलाया था। 

डोर बैल की आवाज़ सुनकर वनीता ने दरवाज़ा खोला। विवेक को देखकर वह फफक कर रो पड़ी। अविरल बहती अश्रु धारा से विवेक की कमीज़ भीग गयी थी। स्वयं विवेक के लिए भी ख़ुद को स्थिर रख पाना मुश्किल लग रहा था पर विवेक ने धैर्य का परिचय देते हुए वनीता को शांत करवाया एवं उसे अपने को यहाँ बुलाने का कारण पूछा। वनीता उसे बिठाते हुए एक बक्सा लेकर लौटती है। असमंजस में डूबा विवेक पूछता है, ”यह क्या है, तुम पहेली क्यों बनी हुई हो?” 

”यह मेरे गहने एवं पैसे हैं तुम मुझे तुरन्त ले चलो यहाँ से। मैं यहाँ एक पल भी रुकना नहीं चाहती।” 

झटके के साथ खड़ा हो गया विवेक, ”आख़िर कहना क्या चाहती हो तुम? तुम साफ़-साफ़ क्यों नहीं कहती?” 

वनीता ने कहा, ”क्या तुमने ज़रूरत पड़ने पर मदद करने को नहीं कहा था? विवेक मेरा यहाँ दम घुट रहा है, मैं यहाँ पल-पल मर रही हूँ। प्लीज़ मुझे यहाँ से ले चलो।”

”पागल हो गई हो, मैं कहाँ ले चलूँ?” हैरान विवेक ने कहा। अब विवेक का धैर्य जाता रहा एवं आवेश में कह उठा, ”मुझे शर्म आती है तुम्हें दोस्त कहते हुए, तुम इतनी कमज़ोर हो, मैं नहीं जानता था। तुम मेरे बारे में ऐसा भी सोच सकती हो.......।”

”ऐसा मत कहो विवेक। तुम मेरी परेशानी को नहीं समझ रहे हो।” बिफर पड़ी वह, “मैं कैसे जिऊँ? ज़िन्दा लाश बन कर रह गई हूँ मैं। यदि तुम भी मुझे नहीं समझोगे तो......।”

विवेक को लगा कि वनीता संयम में नहीं है। उसको साथ की ज़रूरत है। बड़ी शान्ति के साथ विवेक समझाने के स्वर में बोला, ”तुम्हारे पति की उदासीनता में तुम भी ज़िम्मेवार हो वनीता। क्या वे अकेले नहीं हैं? तुमने कभी पहल की? तुम अपने इसी ग़लतफ़हमी में हो कि तुम्हें किसी ने नहीं समझा है, पर क्या तुमने उनको कभी समझने की कोशिश की? नहीं, वनीता तुम्हें अपने को बदलना होगा।”

अनुराग अन्तर्वेदना की उत्तम औषधि है। अनुराग भरे शब्दों एवं सहानुभूतिपूर्वक समझाने पर वनीता आत्म विवेचन पर मजबूर हुई। उसे भी लगा कि उसने कठिनाइयों का सामना नहीं किया बल्कि उनकी विशद व्याख्या करके उन्हें महनीय बना रखा है।

अँधेरा ढल चुका था। राजेश ड्यूटी से लौट आया था। कमरे में अपनी फ़ाइल पर झुका था। कमरे में प्रवेश कर वनीता ने फ़ाइल खींचकर चाय का प्याला थमाते हुए कहा, ”शायद मैंने आपको डिस्टर्ब तो किया पर.......।” राजेश ने आश्चर्य से उसे देखा एवं वनीता के हाथ को थामते हुए कहा, ”मुझे तो कब से इंतज़ार था ऐसी डिस्टर्बेंस का। सच वीनू मैं हमेशा इन नीरस फ़ाइलों के ढेर पर बैठा सोचता हूँ, कोई बहाना लेकर तुम अन्दर आ जाती और अपने सुन्दर चेहरे की मुस्कान से मुझमें ऊर्जा भरती और पास बैठते हुए मुझसे कुछ न कुछ यूँ ही पूछती।” राजेश ने बोलना बन्द कर दिया था लेकिन मुग्ध आँखों से भाषा की अविराम संवाद धारा बह रही थी। वनीता के मन का मैल दूर हो गया। 

बहुत देर के बाद मौन तोड़कर उसने कहा, ”मैंने अपने दोस्त को यहाँ बुलाया है चलो तुम्हें मिलवाऊँ।” नीचे कमरे में जाकर देखा तो मेज़ पर एक पत्र पड़ा था। लिखा हुआ था, ”जीवन छोटे मोटे उतार चढ़ावों का समंजित रूप है, जब हम सुख-दुःख को जीवन का एक हिस्सा मानकर आगे बढ़ जाएँगे, तब देखना जीवन कैसा रसमय बन जाता है। सुखी रहो-विवेक।”

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