08-01-2019

अक्सर इन्सान गिरगिट बन जाते हैं

रचना गौड़ 'भारती'

अक्सर इन्सान गिरगिट बन जाते हैं 
मतलब के लिए रंग अपना दिखाते हैं 

मौज़ों को साहिल से जोड़कर फिर 
भँवर में फँसने का इल्ज़ाम लगाते हैं। 

ग़मज़दाओं को ग़महीन बनाने के लिए 
कुरेद कर ज़्ख़्म उनके हरे कर जाते हैं ।

कुर्सी के लिए चूसकर रक्त का क़तरा-क़तरा 
मरणोपरान्त मूर्तियाँ चौराहों पर लगाते हैं। 

रखते हैं गिद्ध दृष्टि दूसरों की बहू-बेटियों पर
अपनी बेटी को देखने वालों के चश्में लगाते हैं। 

मुद्दतों से ख़तो-ख़िताबत करने वाले
ग़ुनाह करके कैसे अंजान बन जाते हैं।
 

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