अधूरा पूरा सा इश्क़

01-08-2021

अधूरा पूरा सा इश्क़

डॉ. रंजना जायसवाल

यादों के झरोखे पर आज फिर किसी ने दस्तक दी थी। न चाहते हुए भी अमन का मन उस ओर खिंचता चला गया, अपनी बेटी का आँसुओं से भीगा हुआ चेहरा उसे बार-बार कचोट रहा था। 

"विनय! मुझे माफ़ कर दो, मैं तुमसे शादी नहीं कर सकती। मैं अपने पापा को धोखा नहीं दे सकती। मैं उनका ग़ुरूर हूँ . . . उनके इतने वर्षों के भरोसे को मैं तोड़ नहीं सकती, हो सके तो मुझे माफ़ कर देना। "

देर रात श्रेया के कमरे की जलती हुई लाइट को देख अमन के क़दम उस ओर बढ़ गए थे। श्रेया की हिचिकियों की आवाज़ बाहर तक आ रही थी। अमन दरवाज़े पर कान लगाये खड़ा था, फोन के उधर किसी ने क्या कहा अमन ये तो नहीं सुन पाया पर श्रेया के शब्द सुनकर उसके पैर कमरे के बाहर ही जम गये। कितना ग़ुस्सा आया था उसे . . . पिता जी के ख़िलाफ़ जाकर उसने श्रेया का कोएड कॉलेज में दाख़िला कराया था और वो . . . 

"आग और भूसे को एक साथ नहीं रखा जाता, वैसे भी इसे दूसरे घर जाना है। कल कोई ऊँच-नीच हो गई तो मुझ से मत कहना।"

अपने बाबा की बात सुन श्रेया संकोच और शर्म से गड़ गई थी। तब अमन ने कितने विश्वास के साथ कहा था, "पिता जी! मुझे श्रेया पर पूरा भरोसा है। वो मेरा सर कभी झुकने नहीं देगी। "

श्रेया रोते-रोते सो गई, अमन उसे सोता हुआ देख रहा था। उसकी छोटी सी गुड़िया कब इतनी बड़ी हो गई, तकिया आँसुओं से गीला हो गया था, बिस्तर के बग़ल में रखे लैंप की रोशनी में उसका मासूम चेहरा देख अमन का कलेजा मुँह को आ गया। कितना थका सा लग रहा था उसका चेहरा मानो वो मीलों का सफ़र तय करके आयी हो। आँसू की चंद बूँदें उसके गालों पर भी ढुलक आई थीं। कितनी मासूम लग रही थी वो . . . उसकी श्रेया किसी लड़के के चक्कर में! अभी उसने दुनिया ही कहाँ देखी है? ये आजकल के लड़के बाप के पैसों से घुमाएँगे-फिरायेंगे और फिर छोड़ देंगे। श्रेया के मासूम चेहरे को देख अमन को किसी की याद आ गई, सच मानो तो इतने वर्षों के बाद भी वो उस चेहरे को भूल नहीं पाया था। 

उसे लगा आज किसी ने उसे पच्चीस साल पीछे लाकर खड़ा कर दिया हो। न जाने कितनी ही रातें उसने उसके ख़्यालों में बिता दी थीं। उसके जाने से कुछ नहीं बदला था, रात भी आई थी . . . चाँद भी आया था पर बस नींद नहीं आई थी। 

कितनी बार . . . हाँ न जाने कितनी ही बार . . . वो नींद से जागकर उठ जाता। तब एक बात दिमाग़ में आती, जब ख़्याल और मन में घुमड़ते अनगिनत सवाल और बवाल करने लगे तब तुम आ जाओ। तुम्हारा वो सवाल जुनून बन जायेगा और बवाल जीवन का सुकून . . . आज सोचता हूँ तो हँसी आती है। बावरा ही तो था वो . . . बावरे से मन की ये न जाने कितनी बावरी सी बातें थीं। कोई रात ऐसी नहीं थी जब वो साथ नहीं होती। हाँ, ये बात अलग थी वो साथ होकर भी साथ नहीं होती थी। अमन को कभी-कभी लगता उसके बिना तो रात में भी रात न होती, शायद इसी को इश्क़ कहते हैं . . . इतने साल बीत जाने पर भी वो उसको माफ़ नहीं कर पाया था। 

सच कहा है किसी ने मन से ज़्यादा उपजाऊ जगह कोई नहीं होती क्योंकि वहाँ जो कुछ भी बोया जाये उगता ज़रूर है चाहे वह विचार हो, नफ़रत हो या प्यार हो। कुछ ख़्वाहिशें बारिश की बूँदों की तरह होती हैं जिन्हें पाने की जीवन भर चाहत होती है; उस चाहत को पाने में हथेलियाँ तो भीग जाती हैं पर हाथ हमेशा ख़ाली रहते हैं। उसका प्यार इतना कमज़ोर था कि वो हिम्मत नहीं कर पाई। बस कुछ सालों की ही तो बात थी, बस कुछ साल . . . 

"कैसी लग रही हूँ मैं . . . ?"

ख़ुशी ने मुस्कुराते हुए अमन से पूछा था, अमन उसके चेहरे में खो सा गया था। लाल सुर्ख़ जोड़े और मेहँदी लगे हाथों में वो और भी ख़ूबसूरत लग रही थी। वह उसे एकटक देखता रहा और सोचता रहा . . . मेरा चाँद किसी और की छत पर चमकने को तैयार था। 

"तुम हमेशा की तरह ख़ूबसूरत . . . बहुत ख़ूबसूरत लग रही हो। "

"सच में…"

"क्या तुम्हें मेरी बात पर भरोसा नहीं, कोई गवाह चाहिए तुम्हें . . . "

अमन की आँखों में न जाने कितने सवाल तैर रहे थे। ऐसे सवाल जिनका जवाब उसके पास नहीं था। ख़ुशी ने अचकचा कर अपनी आँखें फेर ली और भरसक हँसने का प्रयास करने लगी। अमन उस मासूम हँसी को कभी नहीं भूल सकता था। न जाने क्या सोचकर वो एकदम से चुप हो गया। उस समय वो दोनों कमरे में अकेले थे, बारात आने वाली थी। सब तैयारी में इधर–उधर दौड़-भाग रहे थे। कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था, ऐसा सन्नाटा जिसको तोड़ने की हिम्मत न अमन की थी और न ही ख़ुशी की। शायद बारात आ गई थी, भीड़ का शोर बढ़ता जा रहा और ख़ुशी के चेहरे पर बेचैनी भी . . . वो तेज़ी से अपनी उँगलियों में दुपट्टे को लपेटती और फिर ढीला छोड़ देती। कुछ था जो उसके हाथों से छूटने जा रहा था पर . . . ख़ुशी सोच रही थी माथे का सिंदूर रिश्ते की निशानी हो सकती है पर क्या प्यार की भी . . . ? तब ख़ुशी ने ही बोलना शुरू किया, "अमन! शायद तुम्हें मुझसे, अपने जीवन से शिकायत हो। शायद तुम्हें लगे भगवान ने हमारा साथ नहीं दिया पर एक बार खिड़की से बाहर उन चेहरों को देखो जो मेरी ख़ुशी के लिए कितने दिनों से दौड़ भाग रहे हैं। मेरे पापा से मिल कर देखो, ख़ुशी उनकी आँखों से बार-बार छलक आ रही है और मेरी माँ . . . वो मेरी बलायें लेती नहीं थक रही। 

"क्या अगर आज हमने उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ जाकर चुपचाप शादी कर ली होती, इतने लोगों को दुख पहुँचा कर के हम नए जीवन की शुरुआत कर पाते? तुम्हें शायद मेरी बातें आज ना समझ में आए पर एक ना एक दिन तुम्हें लगेगा कि मैं ग़लत नहीं थी। हो सके तो मुझे भूल जाना . . . "

भूल जाना . . . कितना आसानी से कह दिया था ख़ुशी ने पर क्या ये इतना आसान था। अमन मुस्कुरा कर रह गया, उसकी मुस्कुराहट में ख़ुशी को न पा पाने का ग़म, अपने बेरोज़गार होने की मजबूरी बार-बार साल रही थी। आज ख़ुशी जिन लोगों का दिल रखने की कोशिश कर रही थी क्या किसी ने उसका दिल रखने की कोशिश की थी? ख़ुशी की बहनें जयमाल के लिए ख़ुशी को लेकर चली गईं, अमन काफ़ी देर तक उस स्थान को देखता रहा जहाँ ख़ुशी बैठी थी। उसके वजूद की ख़ुशबू वो अभी तक महसूस कर रहा था। ख़ुशी सिर्फ़ उसके जीवन से नहीं जा रही थी, उसके साथ उसकी ख़ुशियाँ, उसके होने का मक़सद को भी लेकर चली गई। वो तेज़ी से उठा और भीड़ में गुम हो गया। 

"अरे अमन! वहाँ क्यों खड़े हो, यहाँ आओ न फोटो तो खिंचवाओ।"

ख़ुशी की माँ ने हुलस कर कहा और वो झट से दोस्तो के साथ मंच पर चढ़ गया, न जाने क्यों ख़ुशी का चेहरा उतर गया था। एक अजीब सा तनाव और ग़ुस्सा अमन के चेहरे पर था, जैसे किसी बच्चे से उसका पसंदीदा खिलौना छीन लिया गया हो। अमन ख़ुशी के पति के पीछे जाकर खड़ा हो गया, जैसे वो ख़ुद को बहला रहा था, जिस जगह पर आज ख़ुशी का पति बैठा है ये जगह तो उसकी थी। 

आज उसका मन यादों के भँवर में घूम रहा था। याद है आज भी उसे ख़ुशी से वो पहली मुलाक़ात . . . फरवरी की वो गुलाबी ठंड शीतल हवा के झोंके चेहरे से टकराकर एक अजीब सी मदहोशी में डुबो रहे थे। बादलों से झाँकता सूरज बार-बार आँख-मिचौली कर रहा था। तभी सामने से आती एक सुंदर सी लड़की जिसने पीले रंग के सलवार कमीज़ पर चाँदी की चूड़ियाँ डाल रखी थीं। हाथ की कलाई में बँधी घड़ी को उसने बेचैनी से देखा। शायद उसे क्लास के लिए आज देर हो गई थी। उसके गोरे चेहरे पर सुतवां नाक ठंड से और भी लाल हो गई थी; उसकी सुंदरता को और भी बढ़ा रही थी। उसके चेहरे पर बिखरी हुई लटें किसी का भी मन को मोह लेने में सक्षम थीं, हर पल उसके क़दम अमन की ओर बढ़ते जा रहे थे उसके हर बढ़ते हुए क़दम के साथ अमन का दिल मानों कुलाँचे मारने लगा। साँसें थम सी गईं थीं; चेहरा घबराहट से लाल हो गया था। शायद ये उम्र का असर था या फिर कुछ और उसकी निगाहों की कशिश उसे अपनी ओर खींचने को मजबूर करती थी। उसे रोज़ देखने की आदत न जाने कब मुहब्बत में बदल गई। 

वो घण्टों एक-दूसरे के साथ सीढ़ियों पर बैठे रहते थे, उनके मौन के बीच भी कोई था जो बोलता था। एक-दूसरे का साथ उन्हें अच्छा लगता था। आज भी उस रास्ते से जब वो गुज़रता तो लगता वो उन सीढ़ियों पर मैं बैठा उसका इंतज़ार कर रहा हूँ और वो अपने सहेलियों के बीच घिरी कनखियों से उसके चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रही है। यही . . .  हाँ . . . यही तो उसने अपनी शादी का कार्ड पकड़ाया था, न जाने क्यों उसकी बोलती और चमकती आँखों में लाल डोरे उभर आए थे। कुछ खोई-खोई सी लग रही थी वो . . . उस दिन भी तो उसने उसका पसंदीदा रंग पहन रखा था। ये इत्तिफ़ाक़ था या फिर कुछ और वो आज तक समझ नहीं पाया…, पीले रंग में उसका रंग न जाने क्यों और अधिक तम्बाई लगने लगता। हाथों में वही चाँदी की चूड़ियाँ . . . लाल सुर्ख़ कार्ड को उसने अपनी झुकी पलकों और कँपकँपाते हाथों के साथ अमन को पकड़ाया, पता नहीं वो भ्रम था या फिर कुछ और उसके वो पतले गुलाबी होंठ कुछ कहने के लिए फड़फड़ाये थे पर . . . हिरनी सी चंचल आँखों से में एक अजीब सा सूनापन था। ख़ालीपन तो उसकी आँखों में भी था . . . 

"आओगे न . . . "

इस दो शब्दों ने उसके कानों तक आते-आते न जाने कितने मीलों का सफ़र तय किया था, सच ही तो है हम सब एक सफ़र में ही तो हैं। 

"तुम . . . तुम सचमुच चाहती हो मैं आऊँ . . . ?"

आँसू की दो बूँदें उस कार्ड पर टप से टपक गईं और वो मेरे बिना कोई जवाब दिए दूर बहुत दूर चली गई। कितना ग़ुस्सा आया था उस दिन . . . एक बार . . . हाँ एक बार भी नहीं सोचा उसने मेरे बारे में . . . क्या वो मेरा इंतज़ार नहीं कर सकती थी। कितनी शामें मैंने उसकी उस पसंदीदा जगह पर इंतज़ार किया था पर वो नहीं आयी। आज एक शाम फिर ढल गई, आज एक दिन फिर बीत गया पर वो नहीं आयी। शायद उसे आना भी नहीं था। खिड़की से झाँकता पेड़ मुझ से बार-बार पूछता . . . . . . क्या वो आयेगी . . . . . . पर नहीं। पार्क में पड़ी लकड़ी की वह बेंच . . . आज भी उस बेंच पर गुलमोहर के फूल गिरते हैं, जिन्हें वो अपने नाज़ुक हाथों में घुमा-घुमा अठखेलियाँ करती थी। बारिश की बूँदें जब उसके चेहरे को छू कर मिट्टी में लोट जातीं तब वह उसकी सौंधी ख़ुश्बू से पागल सी हो जाती। बरगद का वह विशाल वृक्ष जहाँ वो अमन के साथ घंटों बैठ कर भविष्य के सपने बुनती, आज भी उसका इंतज़ार कर रहा था। अपनी नाज़ुक कलाइयों से वो उस विशाल वृक्ष को बाँधने का निर्रथक प्रयास करती, उसका वो बचपना आज भी अमन को गुदगुदा देता। अचानक से अनजाने में उसके हाथों में न जाने कहाँ से एक जीर्ण-शीर्ण सी सींक आ जाती और वह कल्पना के आकाश में खड़े हो कर मन के घोड़े दौड़ाने लगती। उसकी वह आड़ी-तिरछी रेखाएँ आज भी उसकी कल्पना का हिस्सा बनने को तैयार . . . इंतज़ार करती हैं पर वो नहीं आयी। शायद उसे आना भी नहीं था, अमन अक़्सर सोचता . . . "अच्छा तुम उस दिन तो आओगी, जिस दिन हर कोई आकर एक फूल और चंद आँसू मेरे फोटो फ़्रेम के आगे रख जायेगा।" 

अमन सोच रहा था शब्द और सोच इंसानी दूरियाँ बढ़ा देते हैं; कभी हम समझ नहीं पाते और कभी समझा नहीं पाते। कल वो ख़ुशी को समझ नहीं पाया था और आज वो श्रेया को नहीं समझ पा रहा। उसने तो सिर्फ़ उतना ही देखा और समझा जितना वो देखना और समझना चाहता था। ज़िन्दगी भर उसे ख़ुशी से शिकायतें रहीं पर एक बार भी उसने ये सोचा कि ख़ुशी को भी तो उससे शिकायतें हो सकती हैं? वो भी तो उसके पिता से मिलकर उन्हें समझा सकता था। ख़ुशी का दिया ज़ख़्म उसे आज तक टीस देता था पर आज श्रेया के प्यार के बारे में जानकर भी वो कुछ नहीं करेगा? क्या उस नये ज़ख़्म को बर्दाश्त कर पायेगा। ख़ुशी और श्रेया न जाने क्यों उसे आज एक ही नाव पर सवार लग रही थीं जो दूसरों का दिल रखने के चक्कर में अपना दिल रखना कब का भूल चुके थे। 

सच कहा था उस दिन ख़ुशी ने एक दिन मुझे उसकी बातें समझ में आयेंगी। अमन की आँखें बोझिल हो रही थीं, वो थक गया था अपने विचारों से लड़ते-लड़ते . . . उसकी पत्नी नींद के आग़ोश में थी। अमन खिड़की के पास आकर खड़ा हो गया, बाहर तेज़ बारिश हो रही थी। हवा के झोंके ने अमन के तन को भिगो दिया, पानी की तेज़धार में पत्ते धुल गए थे और कहीं न कहीं अमन की ग़लतफ़हमियाँ भी . . . उसने अपनी भीगी हुई हथेलियों की तरफ़ देखा। इन हाथों में बेशक ख़ुशी के साथ जीने की लकीरें नहीं थीं पर मेरी श्रेया किसी की नफ़रत का शिकार नहीं बनेगी . . . वो कल ही उससे बात करेगा। 
 

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