आत्मनिरीक्षण 

इन्द्रभूषण मिश्र

कभी- कभी मैं अज्ञात
बालक बन जाता हूँ।
कभी- कभी मैं छोटी सी
बात पे भी रूठ जाता हूँ॥

कभी- कभी मैं अपनी
समझ पे इतराता हूँ।
कभी-कभी मैं अपनी कमियों का
अनुभव कर दुखी हो जाता हूँ॥

कभी- कभी मैं भविष्य की
आशंकाओं से घबराता हूँ।
कभी- कभी मैं स्वयं को जीवन की
बाधाओं से अकेले ही टकराने में परिपूर्ण पाता हूँ॥

कभी- कभी मैं सांसारिकता के
भ्रम में भटक जाता हूँ।
कभी-कभी मैं जीवन के गूढ़
रहस्यों को समझने मे लग जाता हूँ॥

लेकिन सर्वदा मैं स्वयं को
मानव कर्म निभाने के प्रयास में संलग्न पाता हूँ…

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