सर्दी की सुनसान रात को चारों तरफ़ छाए हुए शांत रहस्यमयी वातावरण को तेज़ क़दमों की आहट भंग किये जा रही है। धीरे-धीरे गति बढ़ती ही चली जा रही है "टप टाप टप टप"। अब वह क़दम लगभग भागने ही लगे और दूसरे क़दम भी जो आगे चल रहे क़दमों का पीछा कर रहा था। एक क़दम भाग कर बचना चाहते थे तो दूसरे उनको दबोच लेना। एकदम से चलने की आवाज़ रुकी गई और कंठ से आवाज़ निकली, "आ जा मेरी बुलबुल! कहा जा रही है।"

"छोड़ो मुझे जाने दो," आवाज़ में दर्द और कराह दोनों ही साफ़ स्पष्ट हो रहे है। विरोध करने की कोशिश करती हुई लड़की अजनबी की गिरफ़्त में है मगर बेबस व लाचार। अपने को छुड़ाने में असमर्थ। अजनबी अपने से हाथ लड़की की कमर सहलाने लगता है। लड़की रोते हुए गिड़गिड़ाने लगी, "भगवान के लिए मुझपर रहम करो। यह इज़्ज़त हम स्त्रियों का आभूषण होता है।"

अजनबी ने बड़ी दिलफेंक ज़ुबान में कहा, "देखो उस ईश्वर का संयोग। तुम्हारी इज़्ज़त तुम्हारा आभूषण है और मैं आभूषणों की ही चोरी करता आया हूँ। बस यह आभूषण पहली बार चुरा रहा हूँ।"

एकदम से एक ज़ोर की चीख गूँजती है मगर बहरे शहर पर इसका रति भर फ़र्क नहीं पड़ा। रात अपनी भयानकता बढ़ती चली जाती है और अब आवाज़ें धीमी हो चली है। आवाज़ लगभग मर ही गई शायद।

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