ज़िंदगी का आँचल

02-07-2014

ज़िंदगी का आँचल

स्वर्णलता ठन्ना

टूट जाती है
अकसर
सहानुभूति की सलाइयाँ
बुनते-बुनते
कठिनाइयों के धागे
खींझ जाती है
हाथों की बुनावट
बिखर जाता है
ज़िंदगी का
ताना-बाना
तभी कहीं से
हवा का मद्धम झोंका
हौले से
सहला जाता
मेरा माथा
टिका देता है
हथेलियाँ
गालों पर मेरी
झटक देती हूँ
तब मैं
अपनी परेशानियाँ
और बुनने में
तल्लीन हो जाती हूँ
टूटे हुए धागों से
ज़िंदगी के आँचल को
महीन बुनावट में...।

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