ये ज़ख़्म मेरा

07-12-2015

ये ज़ख़्म मेरा

सुशील यादव

२२१२२ २२१२ २

 

ये ज़ख़्म मेरा, भरने लगा है
शहर इस नाम से, डरने लगा है

विष के प्याले, हाथों नहीं थे
'नस' ज़हर कैसे, उतरने लगा है

हाथ किस के आया, बीता जमाना
'पर' समय कौन, कुतरने लगा है

भूल रहने की, टूटी कवायद
रह-रह के अक़्स उभरने लगा है

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