31-10-2014

वो सब फ़साने चले गए

डॉ. विक्रम सिंह ठाकुर

खुशियाँ तो हमको कब से मय्यस्सर ना थीं ऐे दोस्त
अब तो लबों पे हसीं के ज़माने चले गए


लगता था हमें भी कभी दुनिया को बदलेंगे
पर उम्र के साथ वो सब फ़साने चले गए

बापू, चाचा, बाबा के जाने का नहीं अफ़सोस
ग़म है के साथ उनके आज़ाद ज़माने चले गए

ग़ज़ल, ठुमरी, शायरी की क्या बात करें ऐे दोस्त
अब तो मोहोब्बत के वो सब तराने चले गए

तुम तो रूठे ही न थे हमसे कभी ऐे दोस्त
हम तुम्हें न जाने क्यों मनाने चले गए

शम्मां तो जलती है अब भी मेरी बज़्म में हर रोज़
पर शम्मां पे मरने वाले वो परवाने चले गए

इक वो के जिनको हम पे कभी ऐतबार न हुआ
इक हम जो उनके वादों को निभाने चले गए

वो भी दिन थे जब हमें घर थीं ये क़ायनात
अब तो यारों वो सभी ठिकाने चले गए

क़ीमत मोहोब्बत की बोहोत सस्ती है मेरे दोस्त
जब से लैला मजनूं से दीवाने चले गए

अब तो अपने सच की भी कोई क़ीमत नहीं
तुमको मनाने के वो सब बहाने चले गए

हम तो अब भी उसी मोड़ पर खड़ें है ऐे 'जिगर'
तुम सनम मगर कहाँ न जाने चले गए

अब तो लगता है कोई नासेह नहीं है
जब से घर के बूढ़े और सयाने चले गए

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