विश्व हिन्दी सम्मेलन में प्रवासी हिन्दी साहित्यकारों की उपेक्षा

16-09-2017

विश्व हिन्दी सम्मेलन में प्रवासी हिन्दी साहित्यकारों की उपेक्षा

डॉ. सुधा ओम ढींगरा

(पंजाब केसरी, २० जुलाई, २००७)

 

१३,१४,१५ जुलाई २००७ को आठवाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन न्यूयॉर्क की धरती पर बड़ी धूमधाम से मनाया गया जिसका शुभारंभ संयुक्तराष्ट्र के मुख्यालय में विदेश राज्यमंत्री आनंद शर्मा ने ’जन गण मन’ के गान से करवाया। संयुक्तराष्ट्र संघ के मुख्यालय में हिन्दी में बात करना अपने आप में गर्व की बात थी। और भी गर्व की बात तब हुई जब संयुक्तराष्ट्र के महासचिव बान की मून ने कहा कि हिन्दी दुनिया भर के लोगों को पास लाने का काम कर रही ह यह एक ऐसी भाषा है जो दुनिया भर की संस्कृतियों के बीच एक पुल का काम कर रही है।

संयुक्तराष्ट्र के महासचिव ने हिंदी में धाराप्रवाह बोलने की अपनी दिली इच्छा का इज़हार करते हुए हिन्दी में बोल कर सबको चमत्कृत कर दिया। उन्होंने हिंदी में कहा, “इस सम्मेलन में भाग लेते हुए मुझे खुशी हो रही है। मैं सबको शुभकामनाएँ देता हूँ, नमस्ते और धन्यवाद।“

जोरदार तालियों के बीच बान की मून ने हिंदी में कहा, “मैं थोड़ा-थोड़ा हिन्दी में बोलता हूँ। जो कुछ भारत में सीखा था (नई दिल्ली के कोरियाई दूतावास में) वह अब भूल गया हूँ। मुझे भारत इतना अच्छा लगा कि मैंने एक भारतीय को अपनी बेटी दी है। मेरा दामाद बहुत अच्छी हिन्दी बोलता है। मेरे बेटे का जन्म भारत में हुआ।“ यह सचमुच एक ऐतिहासिक अवसर था कि संयुक्त राष्ट्र का कोई महासचिव पहली बार विश्व हिन्दी सम्मेलन में शिरकत कर रहा था।

’संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी’ विषय पर डॉ. गिरिजा व्यास की अध्यक्षता में अनन्त राय त्रिपाठी, प्रो. राम शरण जोशी, डॉ. रत्नाकर पाँडे और नारायण कुमार की बातचीत सुखद लगी।

आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के उद्‌घाटन समारोह को छोड़ कर शेष गतिविधियाँ और कार्यक्रम न्यूयॉर्क के मैनहट्टन इलाके में स्थित विश्व प्रसिद्ध फैशन इंस्टिच्यूट ऑफ़ टैक्नोलॉजी में सम्पन्न हुए। झुंड के झुंड भारतीयों को देख कर बहुत अच्छा लगा, आनंद आया। हिन्दी का उत्सव मनाया जा रहा था लेकिन यह खुशी क्षणभंगुर निकली। बातों ही बातों में पता चला कि बहुत से लोगों का हिन्दी से कोई वास्ता नहीं था। वे सिर्फ़ अमरीका घूमने आए हैं। कइयों के बच्चे यहाँ हैं और कई यूँ ही घूमने आए हैं। सरकारी मशीनरी से कनैक्शन होने की वज़ह से वे चुने गए और वीज़ा उन्हें दिलवा दिया गया और वे सरकारी खर्चे पर चले आए।

प्रवासी हिन्दी विद्वानों की उपेक्षा

सम्मेलन के कई सत्रों में ऐसे वक्ता थे जिनको उस विषय में ज्ञान ही नहीं था। ’हिन्दी के प्रचार-प्रसार में हिन्दी फिल्मों की भूमिका’ के सत्र में चेन्नई की डॉ. निर्मला एस, मौर्या गुलज़ार को गुलज्जार बोलती गईं और उनकी फिल्म ’मौसम’ में शर्मिला टैगोर की बजाय मौसमी चैटर्जी की तारीफ़ करती गईं। ’मुग़ल-ए-आजम’ को भी ठीक से बोल नहीं पाईं और उसका डायरैक्टर बिमल राय को बताती रहीं। दुख इस बात का हि कि निर्मला जी ने शुरू में कहा कि उनका विषय शोध है। क्या यही शोध वह करके लाई थीं और भारत सरकार ने उन्हें यहाँ भेजा। इतना सब गलत कहने पर हॉल में बैठे कई लोगों ने विरोध किया। ’प्रवासी हिन्दी साहित्य’ के सत्र में उन साहित्यकारों को बोलने ही नहीं दिया गया जिन्होंने प्रवासी साहित्य के शोध और प्रवासी साहित्य पर उम्र गंवा दी। स्टेज पर वे लोग आए जिन्हें प्रवासी साहित्य का ज्ञान ही नहीं था।

अमरीका ने आज तक अनगिनत सफल कवि सम्मेलन दिए हैं। कवि सम्मेलन विश्व हिन्दी सम्मेलन की शान होना चाहिए था। न्यूयॉर्क की धरती पर सबसे घटिया कवि सम्मेलन रहा। यहाँ पर भी अमरीका के कवियों को नहीं बुलाया गया और फसल काटने के अंदाज़ से कविताएँ सुनाई गईं और चीजों के बंटवारे की तरह कविताओं का निपटारा किया गया।

भारत सरकार की पॉलिसी समझ में नहीं आई। हज़ारों लोगों को भारत से लाकर ही हिन्दी सम्मेलन करवाना था तो भारत में ही करवा देते।

आठवां विश्व हिन्दी सम्मेलन अमरीका में हुआ और यहाँ के बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, लेखकों, कवियों को मंच देना तो दूर उनकी पुस्तकों की प्रदर्शनी और उनके कार्य तक को स्थान नहीं दिया गया। भारत सरकार ने अपनी और भारत के पत्रकारों की ही प्रदर्शनी लगने दी।

ऐसे में प्रवासी साहित्य की पहचान कैसे होगी? कैसे पता चलेगा कि हिन्दी का कितना काम हो रहा है? हमने अपनी धरोहर कैसे संभाल कर रखी हुई है? हमारे बच्चे हमारी संस्कृति को कैसे बचाए हुए हैं?

भारत के कुछ चुनिंदा लेखकों का वर्चस्व भारत के साहित्य संसार में है और उन्होंने ही विश्व मंच संभाला तो हिन्दी का क्या प्रचा-्रसार हुआ। हिन्दी सम्मेलन का क्या लाभ हुआ?

करोड़ों रुपए भारत से लोग ले जाने पर लगा दिए लेकिन विदेशों में हिन्दी का कितना कार्य हो रहा है यह सामने नहीं आया क्योंकि कंट्रोल भारत की सरकारी मशीनरी का था।
व्यवस्था इतनी बुरी थी कि होटल पैन्सिलवेनिया में सम्मेलन की रजिस्ट्रेशन को घंटों लगे जबकि अमरीका व्यवस्थित तौर-तरीकों के लिए जाना जाता है। नाश्ते की तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया। होटल में ऐसा नाश्ता दिया गया जो भारत से आए लोगों को ठंडा और सख्त लगा। वे लंच तक भूखे रहते थे।

अंत में सम्मान समारोह और समापन डॉ. कर्ण सिंह ने किया। पद्‍मश्री लेने वालों को ही फिर से सम्मानित किया गया। अमरीकी सृजनकार फिर पीछे रह गए। पूरे सम्मेलन में गुलज़ार का बोलना, काव्य पाठ और सांस्कृतिक कार्यक्रम में सितार वादक शुजात हुसैन, नृत्यांगना पद्‌मश्री गीता चंद्रन का नृत्य और समापन पर पंकज उधास का ग़ज़ल कार्यक्रम ही मनोरंजक एवं आकर्षक रहा।

सत्रों में वक्ता विषयों से भटक जाते थे। लोग शोर डाल-डाल कर उन्हें वापस लाते थे। कोई तैयारी हुई नहीं लगती थी। कई वक्ता भारत से आकर भी पहुँचे नहीं। लोगों को बुलाकर खानापूर्ति की गई। एक सत्र में संचालक ही नहीं पहुँचा।

इस सम्मेलन को देखकर ग़ालिब का शे’र याद आता है-

हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है।

क्या यही हिन्दी क प्रचार-प्रसार है? हाँ, हिन्दी भाषियों का मेल-जोल हो गया यह बहुत बड़ी बात है पर इस खर्चे पर?

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