वीरेन्द्र आस्तिक से अवनीश सिंह चौहान की बातचीत 

01-04-2021

वीरेन्द्र आस्तिक से अवनीश सिंह चौहान की बातचीत 

डॉ. अवनीश सिंह चौहान

मूर्धन्य कवि, आलोचक एवं सम्पादक श्री वीरेंद्र आस्तिक बाल्यकाल से ही अन्वेषी, कल्पनाशील, आत्मविश्वासी, स्वावलंबी, विचारशील, कलात्मक एवं रचनात्मक रहे हैं। बाल्यकाल में मेधावी एवं लगनशील होने पर भी न तो उनकी शिक्षा-दीक्षा ही ठीक से हो सकी और न ही विरासत में मिले शास्त्रीय संगीत और गायन में वह आगे बढ़ सके। जैसे-तैसे 1962 में हाईस्कूल की परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की और एक-दो वर्ष संघर्ष करने के बाद 1964 में देशसेवा के लिए भारतीय वायु सेना में भर्ती हो गये। पढ़ना-लिखना चलता रहा और छोटी-बड़ी पत्रिकाओं में वीरेंद्र बाबू और वीरेंद्र ठाकुर के नामों से छपना भी प्रारम्भ हो गया। आपकी पहिला कविता 1971 में 'साप्ताहिक नीतिमान' (जयपुर) में छपी थी। उन दिनों वे दिल्ली में रहा करते थे। दिल्ली में नई कविता का दौर चल रहा था, शायद इसीलिये उन्होंने यहाँ नई कविता और गीत साथ-साथ लिखे। 1974 में भारतीय वायु सेना छोड़ने के बाद वह कानपुर आ गए और अगले वर्ष (1975) से ही भारत संचार निगम लि. को अपनी सेवाएँ देने लगे। कानपुर में छंदबद्ध कविता की लहर थी। इस नये माहौल का उनके मनोमस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ा और वह गीत के साथ ग़ज़लें भी लिखने लगे। 1980 में आ. रामस्वरूप सिन्दूर जी ने एक स्मारिका प्रकाशित की, जिसमें — 'वीरेंद्र आस्तिक के गीत' (गीतों की संख्या 24) प्रकाशित हुए। 1984 में उन्होंने कानपुर विश्वविद्यालय, कानपुर से एम.ए. (हिंदी) की परीक्षा उत्तीर्ण की। 2007 में बीएसएनएल में लम्बे अरसे तक अपनी सेवाएँ देने के बाद ससम्मान सेवानिवृत्त हुए। 

600 से अधिक समकालीन गीत और 100 से अधिक शोधपरक आलेख, जो प्रतिष्ठित अख़बारों, पत्रिकाओं आदि में प्रकाशित और आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर प्रसारित हुए, के यशस्वी क़लमकार आस्तिक जी मुख्य रूप से कानपुर देहात की अकबरपुर तहसील के रहने वाले हैं। उन्होंने 'परछाईं के पांव' (गीत-ग़ज़ल संग्रह, 1982), 'आनंद! तेरी हार है' (गीत-नवगीत संग्रह, 1987), 'तारीखों के हस्ताक्षर' (राष्ट्रीय त्रासदी के गीत, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से अनुदान प्राप्त, 1992), 'आकाश तो जीने नहीं देता' (नवगीत संग्रह 2002), 'दिन क्या बुरे थे' (नवगीत संग्रह, सर्जना पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, 2012), 'गीत अपने ही सुनें' (प्रेम-सौन्दर्यमूलक नवगीत संग्रह, 2017) आदि काव्य-कृतियों का सृजन किया है। उन्होंने दो समवेत संकलनों— 'धार पर हम (1998, बड़ौदा विश्वविद्यालय में एम.ए. पाठ्यक्रम में निर्धारण : 1999-2005) एवं 'धार पर हम- दो' (2010, नवगीत-विमर्श एवं नवगीत के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर) का कुशल संपादन किया है। सितम्बर 2013 में 'संकल्प रथ' पत्रिका का एक विशेषांक— 'वीरेन्द्र आस्तिक पर एकाग्र' आस्तिक जी की रचनाधर्मिता पर केंद्रित किया गया। दिसंबर 30, 2019 को उन्हें 'उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान', लखनऊ द्वारा 'साहित्य भूषण सम्मान' से अलंकृत किया गया। 


अवनीश सिंह चौहान— 

आप सृजन की ओर कैसे प्रवृत्त हुए? तब और आज के साहित्यिक परिदृश्य में आप किस प्रकार का परिवर्तन देखते हैं?

वीरेन्द्र आस्तिक— 

घर में साहित्यिक पुस्तकें उपलब्ध थीं, उन्हें पढ़ने का संस्कार पिताजी से मिला। मेरे घर में गांधी और महर्षि दयानंद सरस्वती जैसे समाज-सुधारकों के जीवन-दर्शन की किताबें मौजूद थीं। उन दिनों (शायद 1955-56) 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' भी मेरे घर आता था। तब मैं 5वीं कक्षा में था। गाँव का रहन-सहन था। साहित्य क्या होता है, तब पता नही था। पिताजी की कई ख़ूबियों में एक थी उनका गायक होना। वे महफ़िलों मे ध्रुपद आदि गाते थे। कभी-कभी भजन आदि मुझसे भी गवाते थे। उक्त परिवेश में स्वाभाविक था, गीत-सृजन को महत्व देना।

आपके प्रश्न के उत्तरार्द्ध का उत्तर है— तब एकजुटता थी, समाज में साहित्य का आदर था, आज ख़ेमेबाज़ी है। व्यक्तित्व और कृतित्व में काफ़ी फ़र्क़ आ गया है। अपने गीत के युवाकाल में कवि सम्मेलनों का महत्व था। तब जो साहित्य लिखा जाता था, वही मंच पर पढ़ा जाता था। गोष्ठियों-साहित्यिक अड्‌डेबाज़ी में निराला, महादेवी, दिनकर, बच्चन और नेपाली के संस्मरणों पर और उनकी रचनाओं पर चर्चा होती थी। तब हास्य-कवियों का ज़माना नहीं था। मंच पर शृंगार और ओज के दस कवियों में एक हास्यरसी हुआ करता था, लेकिन आज इसका उलट है। स्वतंत्रता संग्राम के साथ-साथ एक कार्य और हुआ, वह था भाषा का निर्माण। जब युद्ध स्तर पर निर्माण कार्य चल रहा होता है, तब आदमी विदूषक नहीं हो सकता। आज लगता है जैसे हिन्दी भाषा के निर्माण का कार्य पूरा हो चुका है? शायद तभी सुविधा-सम्पन्न पूँजीपतियों ने हास्य को जन्म दिया। हिन्दी के अच्छे-अच्छे प्रवक्ताओं ने हास्य के व्यवसाय में घुसकर वास्तविक कविता को मंच से बाहर कर दिया। आज साधना नहीं, नाम और दाम के लिए लोग जुगाड़ के शॉर्टकट अपना रहे हैं।

अवनीश सिंह चौहान— 

आपने अपने साहित्यिक जीवन में गीत को ही अपनी अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम क्यों बनाया, जबकि आप ग़ज़ल, दोहे और हाइकु में भी क़लम चला लेते हैं। 

वीरेन्द्र आस्तिक— 

गीत के साथ-साथ मैंने ग़ज़लें, दोहे और हाइकु भी लिखे हैं। अब तो समीक्षाएँ भी लिख रहा हूँ। अभिव्यक्ति के लिए गीत को माध्यम बनाया, क्योंकि मैंने बताया कि मैं बचपन से हरि-भजन-कीर्तन आदि गाया करता था, मेरा कंठ भी सुगेय था। इन सभी के कारण मुझे लय और छन्द को समझने में कठिनाई नहीं हुई। दूसरी बात जो सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है कि मैं भावुक, कल्पनाशील और स्वप्नदर्शी कुछ ज़्यादा ही था।

अवनीश सिंह चौहान— 

आपके रचनाकर्म में जनचेतना और सामाजिक संवेदना का समाहार प्रभावशाली ढंग से हुआ है। 'रमुआ', 'नरगिस' और 'कोयल' जैसे गीत तो व्यापक स्तर पर व्याख्या चाहते हैं। इनके बारे में आपका अपना दृष्टिकोण क्या है?

वीरेन्द्र आस्तिक— 

गीत में चेतना और संवेदना का समन्वय ही तो किया जाता है। दूसरे शब्दों में कहूँ तो रचनाकार हृदय और बुद्धि का पारिग्रहण कराता है गीत में। कर्म का स्वामी होता है हृदय और कर्म को सार्थक दिशा देने का कार्य करती है बुद्धि। दरअसल मेरे गीतों के कथ्य में जनबोध और समाजबोध अलग-अलग नहीं हैं। वहाँ जन का ही समाज है। अब प्रश्न के उत्तरार्द्ध का उत्तर देना चाहूँगा। पहली बात— मैं कोई बड़ा आलोचक तो हूँ नहीं। आलोचकों की व्याख्याएँ विस्तार से होती हैं, फिर भी ... मेरे विचार से मूल तो रचना ही होती है। रचना की रचना होती है आलोचना। गीत रचते समय जो ज़मीनी-दृश्य होता है, उसके बारे में तो रचनाकार से ज़्यादा किसको पता होगा। दरअसल 'रमुआ' अति साधारण-जन का प्रतीक शब्द है। यह शब्द उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है, जो ग़रीबी की रेखा से भी निचले स्तर का है। इस गीत में अनेक संज्ञाएँ-विशेषण रमुआ के पर्यायवाची बनकर रमुआ के अर्थ को व्यंजित करते हैं, जैसे धोती, लंगोटी, रोटी, मोची, मज़दूरी, छप्पर आदि। इन शब्दों के विलोमार्थ शब्द भी हैं, जो रमुआ की अस्मिता को मूल्यांकित करते हैं। साथ में ये सारे शब्द एक कथा भी कहते जाते हैं। गीत का मुख्य केन्द्र है इसमें सुख और सुख के आसपास है घटनाओं का जाल। भारत की ग़रीब जनता जिस सुखवाद की छाया के नीचे बसर करती है, उसका प्रतीक है रमुआ। हिन्दी कविता में एक अलग तरह का जीवन-दर्शन है यह। इसमें गांधीवादी विचारधारा भी समाहित हो गई है शायद। मेरी कविता का नायक दरअसल भीड़ का भी प्रतीक है, उसका कोई अपना नहीं है, शायद तभी मंत्री की गाड़ी से कुचलकर मर जाने पर कोई दंगा आदि नहीं हुआ। वह ऐसा मोची है, जो ख़ुद जूता नहीं पहन सका, अर्थात उसकी हैसियत से बहुत दूर था जूता। इसी प्रकार 'नरगिस' है, जो छोटी कविता की बड़ी कथा है और जो सांप्रदायिकता और फिर सद्‌भाव के असाधारण रूप को प्रकट करती है। पता ही नहीं चल पाता कि कब रचनाकार ने प्रेम-तत्व या दैविक रूप को एक अस्त्र के रूप में खड़ा करके एक व्यक्ति (नरगिस के पापा) के हृदय का परिवर्तन कर दिया। उसे संप्रदायी होने से बचा लिया। 'कोयल' नौकरी-पेशा लड़कियों-महिलाओं का प्रतीक-शब्द है। यह गीत भी एक रूपक कथा है। महिला का तेज़ तर्रार होना, ईमानदार होना पुरुष वर्ग को असहनीय है। अंततः व्यवस्था के तहत धूर्तबाज़ सीनियर उसकी कीर्ति को धूमिल करने के प्रयास में जुट गए। विपत्ति में फँसी महिला को सीता याद आती है। सीता एक ऐसा प्रतीक-बिम्ब है, जो कथा को नयी दृष्टि देता है। राम याद आते तो ग़लत हो जाता। उस समय सीता जैसा धैर्य और साहस चाहिए था महिला को। सीता को राम पर अटूट विश्वास था, वे रावण का वध करके उसे मुक्ति दिलाकर अंगीकार करेंगे। यह सब कविता में है नहीं, सिर्फ़ सीता शब्द से उद्‌भाषित होता है। दरअसल 'कोयल' और 'नरगिस' स्त्री सशक्तिकरण की भूमिका में भी है।

अवनीश सिंह चौहान— 

मेरे विचार से आम आदमी की वेदना ही आपके गीतों का प्रतिमान है। क्या कहना चाहेंगे?

वीरेन्द्र आस्तिक— 

आपका सोचना बिल्कुल सही है, लेकिन यह वह वेदना है, जो आम आदमी के उत्पीड़न से उद्भूत है। वास्तव मे मेरे गीतों में आम और खास के द्वन्द्वात्मक संबंधों की व्यंजना है। कहीं-कहीं तो वेदना जीवन-दर्शन में रूपान्तरित हो गई है। कहीं तो 'जिन्दगी ही धर्म है' जैसी सूक्तियाँ हैं। कहीं अन्तिम आदमी में नई दुनिया के रचाव की उम्मीद है। अनपढ़  में तथागत का मूर्तन। निपट आदमी में ईश्वर का प्रकट होना। स्वर्ग का साधारणीकरण। तो कहीं गमले में खिले गुलाब के रूप में वही रमुआ है, जिसका अभी पीछे उल्लेख हुआ था। कहने का आशय यही कि आपको मेरे गीतों में संवेदना और विचार के विविध और अछूते आयाम मिलेंगे ।

अवनीश सिंह चौहान— 

आप व्यक्तिगत जीवन में अच्छे साहित्य एवं सच्चे साहित्यकारों के हिमायती रहे हैं, जिसका प्रमाण 'धार पर हम- एक और दो' और आपके समीक्षात्मक आलेख हैं। आलोचना की कसौटी पर अच्छा गीत और एक सच्चा गीतकार कैसा हो? 

वीरेन्द्र आस्तिक— 

गीतकार यदि सच्चा होगा तो गीत अच्छा होगा ही। 'आलोचना की कसौटी क्या है?'— पर विचार ही नहीं करता गीतकार। एक विषय के रूप में आलोचना-शास्त्र का अध्ययन ज़रूरी हो सकता है। अध्ययन तो रचनाकार के अनुभव-संसार को समृद्ध करता ही है। लेकिन रचना-प्रक्रिया के दौरान रचनाकार के सामने वह अनुभूत सत्य होता है जिसने उसको भीतर तक मथ दिया होता है। वहाँ अमूर्त, मूर्त होने के लिए सांगोपांग जुटाने की प्रक्रिया में होता है। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि उस समय रचनाकार स्वयं अनुभूति मात्र हो जाता है। रचना और आलोचना का पहला रिश्ता तो द्वन्द्व का है और द्वन्द्व में अच्छी रचना तो हो नहीं सकती। दूसरी बात, एक सच्चा गीतकार, आलोचना की कसौटी पर ध्यान ही नहीं देता। आलोचना स्वयं रचना की ओर आती है, क्योंकि रचना से ही आलोचना की नई मान्यताएँ निकलती हैं। हाँ यह सही है कि मैंने अच्छी रचना और सच्चे साहित्यकारों की तलाश में कुछ अच्छे कार्य किए हैं, लेकिन यह तभी संभव हो सका है जब मेरे भीतर पहले से ही वह ईमानदारी और दृष्टि मौजूद रही। आज तो ईमानदारी-सच्चाई जैसे मूल्यों का पतन होता दिखाई दे रहा है। सच्चा रचनाकार अच्छे की तरफ़ भागता नहीं, वह समग्रता में ख़ुद को तलाशता है। वह जो होता है, वही तलाशने में व्यतीत होता रहता है।

अवनीश सिंह चौहान— 

देखने में आया है कि महत्वपूर्ण गीत संकलनों में संपादकों ने अपनी रचनाओं को भी प्रस्तुत किया है, जैसे कि— 'धार पर हम'। किन्तु, 'धार पर हम- दो' में आपने अपने आपको क्यों नहीं रखा? क्या इस प्रकार की (पुस्तक प्रकाशन हेतु) कोई अन्य योजना भी है?

वीरेन्द्र आस्तिक— 

लेकिन ऐसे भी संकलन हैं, जिनमें संपादकों ने ख़ुद को बतौर रचनाकार प्रस्तुत नहीं किया। 'धार पर हम' (1998) का मैं संपादक भी हूँ और एक गीतकार भी। मैंने उसमें ख़ुद को अन्तिम कवि के रूप में रखा, यह सोचकर कि मैं तो निःस्वार्थ साहित्य-सेवा में तत्पर हूँ। किन्तु वहाँ यह तर्क तो दिया जा सकता है कि रचनाकार ने ख़ुद को चर्चा में लाने के लिए संकलन को निकाला। लेकिन यदि संपादन कार्य एक ही शीर्षक से दूसरे-तीसरे खण्ड के रूप में निकलता जा रहा है तो फिर कोई तर्क छोड़ना ठीक नहीं। तब संपादक पूरी तरह स्वतंत्र होता है अपनी दृष्टि-दिशा के प्रति। अच्छे परिणाम के लिए तभी वह निर्मम भी हो सकेगा। कभी-कभी ख़ुद पर आश्चर्य होता है— बिना किसी की सलाह लिए और बिना 'तार सप्तक' जैसी योजना को देखे यह कार्य कर डाला। भविष्य में, इस तरह की किसी योजना पर पुनः कार्य कर सकता हूँ, पर अभी कहना मुश्किल है।

अवनीश सिंह चौहान— 

गीत एवं नवगीत में अन्तर क्या है? उसके आधुनिक एवं उत्तर आधुनिक सरोकार क्या हैं? और उसके सामने कौन-सी चुनौतियाँ हैं?

वीरेन्द्र आस्तिक— 

गीत और नवगीत में काल (समय) का अन्तर है। आस्वादन के स्तर पर दोनों को विभाजित किया जा सकता है। जैसे आज हम कोई छायावादी गीत रचें तो उसे आज का नहीं मानना चाहिए। उस गीत को छायावादी गीत ही कहा जायेगा। इसी प्रकार निराला के बहुत सारे गीत, नवगीत हैं, जबकि वे नवगीत की स्थापना के पहले के हैं। दूसरा अन्तर दोनों में रूपाकार का है। नवगीत तक आते-आते कई वर्जनाएँ टूट गईं। नवगीत में कथ्य के स्तर पर रूपाकार बदला जा सकता है। रूपाकार बदलने में लय महत्वपूर्ण 'फण्डा' है। जबकि गीत का छन्द प्रमुख रूपाकार है। तीसरा अन्तर कथ्य और उसकी भाषा का है। नवगीत के कथ्य में समय सापेक्षता है। वह अपने समय की हर चुनौती को स्वीकार करता है। गीत की आत्मा व्यक्ति केन्द्रित है, जबकि नवगीत की आत्मा समग्रता में है। भाषा के स्तर पर नवगीत छायावादी शब्दों से परहेज़ करता दिखाई देता है। समय के जटिल यथार्थ आदि की वजह से वह छन्द को गढ़ने में लय और गेयता को ज़्यादा महत्व देता है ।

नवगीत, गीत का आधुनिक संस्करण ज़रूर है, लेकिन आज की युवा पीढ़ी नवगीत को ही गीत मानती है और यह स्वाभाविक भी है। पिता और पुत्र में पीढ़ी का अन्तर ज़रूर होता है, लेकिन पुत्र, पिता को पिता ही कहता है। सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण बात तो यह है कि रचना को गीत या नवगीत कुछ भी कह लें, पर उनके तीन अंग अविभाज्य हैं, ये हैं— लय, आमुख और अंत्यानुप्रासिकता। गीत-नवगीत के सौन्दर्यबोध के ये महत्वपूर्ण और अनिवार्य अंग है। अब आते हैं आपके प्रश्न के उत्तरार्द्ध पर। साहित्य (नवगीत) से आधुनिकता और उत्तर आधुनिकतावाद के सरोकार हैं, जैसे समाज के सरोकार हैं। आधुनिक युग तक आते-आते साहित्य, समाज का केवल दर्पण ही नहीं रहा, बल्कि अब तो वह मनुष्य और उसकी वैश्विक सभ्यता का द्रष्टा भी है और विश्व-विचारक/विश्लेषक भी। साहित्य का उत्तर आधुनिकतावाद, विश्व-समाज का भूमण्डलीकरण है, जो प्रकारान्तर से (व्यावसायिक और औपनिवेशिक दृष्टि से) एक साथ कई हरकतें कर रहा है— वह ग़रीब की रोटी छीन रहा है, भ्रष्टाचार को परवान चढ़ा रहा है, देश को अँग्रेज़ीपरस्त बना रहा है, स्त्री को निर्वसन कर रहा है और साहित्य को बेबस-निर्वीय बना रहा है। गीत-नवगीत को इन्हीं सारी चुनौतियों का जबाव देना है। किसी हद तक वह दे भी रहा है। लेकिन वह सतर्क रहे, भूमंडलीकरण के इस यज्ञ में घी डालने का अवसर मिल गया है, उन देसी सामंतवादी सांप्रदायिक ताक़तों को, जिनका सफाया कर दिया था प्रेमचंद, प्रसाद और निराला की आँधी ने।

अवनीश सिंह चौहान— 

कभी गीत और नई कविता के विद्वानों के बीच तनातनी सुनने को मिलती है, तो कभी कविता और कहानी के बीच। इससे आज के समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

वीरेन्द्र आस्तिक— 

संदेश तो अच्छा नहीं जाता, लेकिन वह पीढ़ी जो कविता बरक्स गीत या कहानी बरक्स कविता आदि से ख़ुद को चर्चा में रखती थी, अब अवसान की ओर जा चुकी हैं। मेरे विचार से साहित्य को पढ़ने वाला जो समाज है, वह साहित्य के भीतर की तनातनी और फतवेबाज़ी आदि को पढ़ने में रुचि नहीं लेता। मेरी जानकारी में अधिकांश जो कवि और लेखक हैं, साहित्य की दुरभिसंधियों से दूर रहना चाहते हैं। एक हक़ीक़त और भी है— हमारा समाज गद्य कविता में ज़्यादा रुचि नहीं लेता। वास्तव में साहित्य के पाठक वर्ग को बनाने में जिन विधाओं की महती भूमिका रही है, वे हैं— गीत, ग़ज़ल, दोहा, कहानी और उपन्यास, व्यंग्य विधा भी। ज़ाहिर है उसकी पसन्दगी इन्हीं विधाओं में केन्द्रित होगी।

अवनीश सिंह चौहान— 

नयी पीढ़ी को ऐसा लगता है कि पुरानी पीढ़ी के कुछ (नव)गीतकार उनकी रचनाओं को कमतर आँकते हैं (अपवादों को छोड़कर) और कई समर्थ (नव)गीतकार ऐसे भी हैं जो उभरते गीत-कवियों के बारे में न तो सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी करते हैं और न ही उनकी रचनाधर्मिता पर क़लम चलाते हैं, आप क्या कहना चाहेंगे?

वीरेन्द्र आस्तिक— 

देखिए, कला के क्षेत्र की स्पर्धा-स्पृहा तो जगज़ाहिर है। नई और पुरानी पीढ़ी में रचनात्मक द्वन्द्व का रहना स्वाभाविक-सा है, क्योंकि विरासत में हमें एक पॉलिटिक्स मिली हुई है— वह है कौन अपना, कौन पराया की। कहानी-कविता और उपन्यास आदि के क्षेत्र में ईर्ष्याएँ और दुरभिसंधियाँ कम देखने को मिलती हैं, वहाँ तो आलोचक भी प्रोत्साहित करते हैं। यह दुर्भाग्य है कि गीत-नवगीत के क्षेत्र में आलोचक उस स्तर के हैं नहीं। जो नवगीतकार आलोचक बनते हैं, वे पूर्वाग्रही ज़्यादा होते हैं। इन सबके बावजूद, एक समर्थ युवा रचनाकार को हताश नहीं होना चाहिए। देखिए, साहित्य के कथित  शिखर पर जो रचनाकार है, उनमें से कितनों को देखा गया है कि वे स्वयं विवादास्पद हैं। इतना ही नहीं, उन्हे 'साहित्य का माफ़िया' की डिग्री से भी नवाज़ा गया, लेकिन क्या कोई फ़र्क़ पड़ा? नहीं! इन्हीं के बीच डॉ. राम विलास शर्मा जैसी बेदाग़ हस्तियाँ रहीं। क्या कोई उनके आदर्शों पर चला? 

नवगीत के क्षेत्र में साधना तो है, लेकिन उसको मूल्यांकित करने वाला कोई नहीं है। वहाँ तो वर्चस्व की ज़ोर आज़माइश में बड़े-बड़ों के विरुद्ध षडयंत्र चल सकता है। उधर वरिष्ठों को मंच पर या काग़ज़ पर जब कुछ कहना होता है, तो उन्हें चाटुकार याद आते हैं। इसके इतर वे श्रम और प्रयत्न क्यों नहीं करते कि कहाँ-कहाँ वास्तविक रचना है। एक समर्थ रचनाकार चाहे युवा हो या वरिष्ठ, वह मुखापेक्षी नहीं होता। संयम, धैर्य और दूरदर्शिता हो, तो पीढ़ियों में बहुत कुछ सीखना-सिखाना चलता ही है। सोच यह होनी चाहिए कि साहित्य समुद्र में कोई कश्ती मिल जाये तो ठीक अन्यथा एक दिन रचनाकार को स्वयं कश्ती बन जाना होता है। गीत-बिरादरी में सबसे बड़ी कमी एकजुटता की है। इस बात को मैंने बार बार कहा है ।

अवनीश सिंह चौहान— 

गीत-नवगीत को समर्पित संस्थान एवं पत्र-पत्रिकाएँ कौन-सी हैं और उनका क्या योगदान रहा है?

वीरेन्द्र आस्तिक— 

यह सब मुझसे क्यों पूछ रहे हैं। आप स्वयं एक नवगीतकार है। इंटरनेट पर 'गीत-पहल' एवं 'पूर्वाभास' पत्रिकाएँ चलाते हैं। आपकी जानकारियाँ कुछ कम तो नहीं, फिर भी संस्थाओं-पत्रिकाओं का उल्लेख कर पाना तो मुश्किल है। देखने में आता है कि उन लघु-पत्रिकाओं की संख्या भी कुछ कम नहीं, जिनको गीतकवि स्वयं निकालते हैं, जैसे कहानीकार कहानी की पत्रिकाएँ निकालते हैं। मध्य प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान में तो परम्परा-सी है, वहाँ की सरकारें आर्थिक अनुदान और विज्ञापन आदि भी देती हैं। उत्तर प्रदेश में भी कभी-कभी किसी-किसी को कुछ मिल जाता है। पंजाब, कर्नाटक, और महाराष्ट्र और गुजरात से भी हिन्दी पत्रिकाएँ निकलती हैं। मेरे संज्ञान में है कि सभी छोटी-बड़ी पत्रिकाएँ नवगीत छापती हैं, अपवादों को छोड़कर। यह बात अलग है कि कुछ पत्रिकाएँ कविता शीर्षक से नवगीत छापती हैं ।

अवनीश सिंह चौहान— 

क्या आप युवा गीतकारों/ आलोचकों के लिए संदेश देना चाहेंगे?

वीरेन्द्र आस्तिक— 

यह बड़ा कठिन सवाल है। समकालीन गीत के नए रचनाकारों को मेरा यही संदेश है कि वे गीत की प्राचीन और आधुनिक बारीक़ियों को आत्मसात करें। अपनी आंखिन देखी को और जग देखी को भी मंथन करके गीत में उतारें ही नहीं बल्कि उसको विदग्ध और व्यंजनापूर्ण बनायें। युवा रचनाकार जो बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ लेकर गीत के क्षेत्र में आ रहे हैं, वे गीत के इतिहास का भी अध्ययन करें और अपने भीतर एक बड़ा आलोचक पैदा करने का प्रयत्न करें। ऐसा आदर्श आलोचक, जो गद्य कविता के आलोचकों पर भारी पड़े। अब केवल गीत लिखने से काम नहीं चलने वाला। आलोचना भी एक रचना है। इस मर्म को भी गीतकारों को समझना होगा।

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